Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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⚜️ आज का प्रेरक प्रसंग ⚜️

          *!! लालच का फल !!*

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किसी गांव में एक गड़रिया रहता था। वह लालची स्वभाव का था, हमेशा यही सोचा करता था कि किस प्रकार वह गांव में सबसे अमीर हो जाये। उसके पास कुछ बकरियां और उनके बच्चे थे। जो उसकी जीविका के साधन थे।

एक बार वह गांव से दूर जंगल के पास पहाड़ी पर अपनी बकरियों को चराने ले गया। अच्छी घास ढूँढने के चक्कर में आज वो एक नए रास्ते पर निकल पड़ा। अभी वह कुछ ही दूर आगे बढ़ा था कि तभी अचानक तेज बारिश होने लगी और तूफानी हवाएं चलने लगीं। तूफान से बचने के लिए गड़रिया कोई सुरक्षित स्थान ढूँढने लगा। उसे कुछ ऊँचाई पर एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया बकरियों को वहीँ बाँध उस जगह का जायजा लेने पहुंचा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। वहां बहुत सारी जंगली भेड़ें मौजूद थीं।

मोटी-तगड़ी भेड़ों को देखकर गड़रिये को लालच आ गया। उसने सोचा कि अगर ये भेड़ें मेरी हो जाएं तो मैं गांव में सबसे अमीर हो जाऊंगा। इतनी अच्छी और इतनी ज्यादा भेड़ें तो आस-पास के कई गाँवों में किसी के पास नहीं हैं।

उसने मन ही मन सोचा कि मौका अच्छा है मैं कुछ ही देर में इन्हें बहला-फुसलाकर अपना बना लूंगा। फिर इन्हें साथ लेकर गांव चला जाऊंगा।

यही सोचते हुए वह वापस नीचे उतरा। बारिश में भीगती अपनी दुबली-पतली कमजोर बकरियों को देखकर उसने सोचा कि अब जब मेरे पास इतनी सारी हट्टी-कट्टी भेडें हैं तो मुझे इन बकरियों की क्या ज़रुरत उसने फ़ौरन बकरियों को खोल दिया और बारिश में भीगने की परवाह किये बगैर कुछ रस्सियों की मदद से घास का एक बड़ा गट्ठर तैयार कर लिया।

गट्ठर लेकर वह एक बार फिर गुफा में पहुंचा और काफी देर तक उन भेड़ों को अपने हाथ से हरी-हरी घास खिलाता रहा। जब तूफान थम गया, तो वह बाहर निकला। उसने देखा कि उसकी सारी बकरियां उस स्थान से कहीं और जा चुकी थीं।

गड़ेरिये को इन बकरियों के जाने का कोई अफ़सोस नहीं था, बल्कि वह खुश था कि आज उसे मुफ्त में एक साथ इतनी अच्छी भेडें मिल गयी हैं। यही सोचते-सोचते वह वापस गुफा की ओर मुड़ा लेकिन ये क्या… बारिश थमते ही भेडें वहां से निकल कर दूसरी तरफ जान लगीं। वह तेजी से दौड़कर उनके पास पहुंचा और उन्हें अपने साथ ले जाने की कोशिश करने लगा। पर भेडें बहुत थीं, वह अकेला उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकता था… कुछ ही देर में सारी भेडें उसकी आँखों से ओझल हो गयीं।

तुम्हारे लिए मैंने अपनी बकरियों को बारिश में बाहर छोड़ दिया। इतनी मेहनत से घास काट कर खिलाई… और तुम सब मुझे छोड़ कर चली गयी… सचमुच कितनी स्वार्थी हो तुम सब।

गड़रिया बदहवास होकर वहीं बैठ गया। गुस्सा शांत होने पर उसे समझ आ गया कि दरअसल स्वार्थी वो भेडें नहीं बल्कि वो खुद है, जिसने भेड़ों की लालच में आकर अपनी बकरियां भी खो दीं।

शिक्षा:-
मित्रों! जो व्यक्ति स्वार्थ और लोभ में फंसकर अपनों का साथ छोड़ता है, उसका कोई अपना नहीं बनता और अंत में उसे पछताना ही पड़ता है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है पर्याप्त है।।
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🚩🚩🚩सच्चा इतिहास🚩🚩🚩अक्सर दलित पिछड़ा आरक्षण समर्थक यह कहते हैं कि हजारों साल शोषण किया गया, लेकिन यह सही नहीं है।
चलिए हजारों साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं –

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछुआवरे की पुत्री सत्यवती से।
उनका बेटा ही राजा बने, इसलिए भीष्म ने विवाह न करके, आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की|

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे। क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछुआरे थे,
पर महर्षि बन गए।वो गुरुकुल चलाते थे |

विदुर, जिन्हें महापंडित कहा जाता है, वो एक दासी के पुत्र थे। हस्तिनापुर के महामंत्री बने। उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है|

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया ।

श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे । उनके भाई बलराम खेती करते थे। हमेशा हल साथ रखते थे|
यादव क्षत्रिय रहे हैं। कई प्रान्तों पर शासन किया और श्री कृष्ण सबके पूजनीय हैं। गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे ।
उनके पुत्र लव कुश वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे, डाकू थे।

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात। स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था। सबको शिक्षा का अधिकार था। कोई भी ऊंचे पद तक पहुँच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार ।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे, वो बदले जा सकते थे। जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं ।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश के राज रहा वो जाति से नाई थे। नन्द वंश की शुरुआत महापद्मानंद ने की थी, जो की राजा के नाई थे। बाद में वो राजा बन गए । फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये ।

उसके बाद मौर्या वंश का पूरे देश पर राज हुआ। जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई, जो की एक मोर पालने वाले परिवार से थे। एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया।

506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा|

फिर गुप्ताओं का राज हुआ, जो की घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।
140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़कर , 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्हीं का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं।…
तो शोषण कहाँ से हो गया?

यहाँ भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है।
इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।
अंत में मराठों का उदय हुआ। बाजी राव पेशवा जो की ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया..,,
चरवाहा जाति के होल्कर को मालवा का राजा बनाया।
अहिल्या बाई होल्कर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी…
ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।

मीरा बाई जो की राजपूत थी… उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे।
यहाँ भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो जाती है और यहाँ से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी कुप्रथा चीजें शुरू होती हैं|

1800-1947 तक अंग्रेजों के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ। जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।
अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब कास्ट ऑफ़ माइंड में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया
और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये, जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं… जैसी की मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी।
फाहियान ह्यू सेंग, अलबरूनी जैसे कई, किसी ने भी नहीं लिखा की यहाँ किसी का शोषण होता था।

योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत रहे हैं।पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं।
मंदिरों पर जाति विशेष के ही लोग रहे, ये भी गलत है।

कोई अगर हजारों साल के शोषण का झूठ बोले तो उसको ये पोस्ट पढवा देना।
राष्ट्रभक्त🚩🚩🚩

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐कर्ज़💐💐

एक सेठ जी बहुत ही दयालु थे । धर्म-कर्म में यकीन करते थे । उनके पास जो भी व्यक्ति उधार मांगने आता, वे उसे मना नहीं करते थे । सेठ जी मुनीम को बुलाते और जो उधार मांगने वाला व्यक्ति होता उससे पूछते कि “भाई ! तुम उधार कब लौटाओगे ? इस जन्म में या फिर अगले जन्म में ?” जो लोग ईमानदार होते वो कहते – “सेठ जी ! हम तो इसी जन्म में आपका कर्ज़ चुकता कर देंगे ।” और कुछ लोग जो ज्यादा चालक व बेईमान होते वे कहते – “सेठ जी ! हम आपका कर्ज़ अगले जन्म में उतारेंगे ।”

और अपनी चालाकी पर वे मन ही मन खुश होते कि “क्या मूर्ख सेठ है ! अगले जन्म में उधार वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है ।” ऐसे लोग मुनीम से पहले ही कह देते कि वो अपना कर्ज़ अगले जन्म में लौटाएंगे और मुनीम भी कभी किसी से कुछ पूछता नहीं था । जो जैसा कह देता मुनीम वैसा ही बही में लिख लेता ।

एक दिन एक चोर भी सेठ जी के पास उधार मांगने पहुँचा । उसे मालूम था कि सेठ अगले जन्म तक के लिए रकम उधार दे देता है । हालांकि उसका मकसद उधार लेने से अधिक सेठ की तिजोरी को देखना था । चोर ने सेठ से कुछ रुपये उधार मांगे, सेठ ने मुनीम को बुलाकर उधार देने को कहा । मुनीम ने चोर से पूछा – “भाई ! इस जन्म में लौटाओगे या अगले जन्म में ?” चोर ने कहा – “मुनीम जी ! मैं यह रकम अगले जन्म में लौटाऊँगा ।” मुनीम ने तिजोरी खोलकर पैसे उसे दे दिए । चोर ने भी तिजोरी देख ली और तय कर लिया कि इस मूर्ख सेठ की तिजोरी आज रात में उड़ा दूँगा । वो रात में ही सेठ के घर पहुँच गया और वहीं भैंसों के तबेले में छिपकर सेठ के सोने का इन्तजार करने लगा । अचानक चोर ने सुना कि भैंसे आपस में बातें कर रही हैं और वह चोर भैंसों की भाषा ठीक से समझ पा रहा है । एक भैंस ने दूसरी से पूछा – “तुम तो आज ही आई हो न, बहन !” उस भैंस ने जवाब दिया – “हाँ, आज ही सेठ के तबेले में आई हूँ, सेठ जी का पिछले जन्म का कर्ज़ उतारना है और तुम कब से यहाँ हो ?” उस भैंस ने पलटकर पूछा तो पहले वाली भैंस ने बताया – “मुझे तो तीन साल हो गए हैं, बहन ! मैंने सेठ जी से कर्ज़ लिया था यह कहकर कि अगले जन्म में लौटाऊँगी । सेठ से उधार लेने के बाद जब मेरी मृत्यु हो गई तो मैं भैंस बन गई और सेठ के तबेले में चली आयी । अब दूध देकर उसका कर्ज़ उतार रही हूँ । जब तक कर्ज़ की रकम पूरी नहीं हो जाती तब तक यहीं रहना होगा ।” चोर ने जब उन भैंसों की बातें सुनी तो होश उड़ गए और वहाँ बंधी भैंसों की ओर देखने लगा । वो समझ गया कि उधार चुकाना ही पड़ता है, चाहे इस जन्म में या फिर अगले जन्म में उसे चुकाना ही होगा । वह उल्टे पाँव सेठ के घर की ओर भागा और जो कर्ज़ उसने लिया था उसे फटाफट मुनीम को लौटाकर रजिस्टर से अपना नाम कटवा लिया ।

हम सब इस दुनिया में इसलिए आते हैं, क्योंकि हमें किसी से लेना होता है तो किसी का देना होता है । इस तरह से प्रत्येक को कुछ न कुछ लेने देने के हिसाब चुकाने होते हैं । इस कर्ज़ का हिसाब चुकता करने के लिए इस दुनिया में कोई बेटा बनकर आता है तो कोई बेटी बनकर आती है, कोई पिता बनकर आता है तो कोई माँ बनकर आती है, कोई पति बनकर आता है तो कोई पत्नी बनकर आती है, कोई मित्र बनकर आता है तो कोई शत्रु बनकर आता है, कोई पड़ोसी बनकर आता है तो कोई रिस्तेदार बनकर आता है । चाहे दुःख हो या सुख हिसाब तो सबको देने ही होते हैं ।

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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