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Jai maa saraswati ji ki jai ho ji
Sadbuddi pradayini maa Sharde Jai ho

एक नन्हा परिंदा अपने परिवारजनों से बिछड़ गया। बिछड़ कर अपने आशियाने से बहुत दूर आ गया था। उस नन्हे परिंदे को अभी उड़ान भरना अच्छे से नहीं आता था। उसने उड़ना सीखना अभी शुरू ही किया था। इधर नन्हे परिंदे के परिवार वाले बहुत परेशान थे और उसके आने की राह देख रहे थे। इधर नन्हा परिंदा भी समझ नहीं पा रहा था कि वह अपने आशियाने तक कैसे पहुंचे? वह उड़ान भरने की काफी कोशिश कर रहा था पर बार-बार कुछ ऊपर उठकर गिर जाता। कुछ दूर से एक अनजान परिंदा अपने मित्र के साथ ये सब बड़े गौर से देख रहा था। कुछ देर देखने के बाद वह दोनों परिंदे उस नन्हें परिंदे के करीब आ पहुंचे। नन्हा परिंदा उन्हें देख कर पहले घबरा गया फिर उसने सोचा शायद ये उसकी मदद करें और घर तक पहुंचा दें।

अनजान परिंदा – क्या हुआ नन्हे परिन्दे, काफी परेशान हो?

नन्हा परिंदा – मैं रास्ता भटक गया हूं और मुझे शाम होने से पहले अपने घर लौटना है। मुझे उड़ान भरना अभी अच्छे से नहीं आता। मेरे घर वाले बहुत परेशान हो रहे होंगे। आप मुझे उड़ान भरना सिखा सकते हैं? मैं काफी देर से कोशिश कर रहा हूं पर कामयाबी नहीं मिल रही है।
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अनजान परिंदा (थोड़ी देर सोचने के बाद) – जब उड़ान भरना सीखा नहीं तो इतना दूर निकलने की क्या जरूरत थी?

वह अपने मित्र के साथ मिलकर नन्हे परिंदे का मजाक उड़ाने लगा उन लोगों की बातों से नन्हा परिंदा बहुत क्रोधित हो रहा था।

अनजान परिंदा हंसते हुए बोला – देखो हम तो उड़ान भरना जानते हैं और अपनी मर्जी से कहीं भी जा सकते हैं।

इतना कहकर अनजान परिंदे ने उसके सामने पहली उड़ान भरी। वह फिर थोड़ी देर बाद लौटकर आया और 2-4 कड़वी बातें बोल उड़ गया।

ऐसा उसने 5-6 बार किया और जब इस बार वो उड़ान भर कर वापस आया तो नन्हा परिंदा वहां नहीं था।

अनजान परिंदा अपने मित्र से – नन्हें परिंदे ने उडान भर ली ना? उस समय अनजान परिंदे के चेहरे पर खुशी झलक रही थी।

मित्र परिंदा – हां नन्हें परिंदे ने तो उड़ान भर ली, लेकिन तुम इतना खुश क्यों हो रहे हो मित्र? तुमने तो नन्हें परिंदे का कितना मजाक बनाया।

अनजान परिंदा – मित्र तुमने मेरी केवल नकारात्मकता पर ध्यान दिया लेकिन नन्हा परिंदा मेरी नकारात्मकता पर कम और सकारात्मक पर ज्यादा ध्यान दे रहा था। इसका अर्थ यह है कि उसने मेरे मज़ाक को अनदेखा करते हुए मेरी उड़ान भरने वाली चाल पर ज्यादा ध्यान दिया और वह उड़ान भरने में सफल हुआ।

मित्र परिंदा – जब तुम्हें उसे उड़ान भरना सिखाना ही था तो उसका मजाक बनाकर क्यों सिखाया?

अनजान परिंदा – मित्र, नन्हा परिंदा अपने जीवन की पहली उड़ान भर रहा था और मैं उसके लिए अजनबी था। अगर मैं उसको सीधे तरीके से उड़ना सिखाता तो वह पूरी जिंदगी मेरे एहसान के नीचे दबा रहता और आगे भी शायद ज्यादा कोशिश खुद से नहीं करता। मैंने उस परिंदे के अंदर छिपी लगन देखी थी जब उसको कोशिश करते हुए देखा था तभी समझ गया था। उसे बस थोड़ी सी दिशा देने की जरूरत है और जो मैंने अनजाने में उसे दी और वो अपनी मंजिल को पाने में कामयाब हुआ। अब वो पूरी जिंदगी खुद से कोशिश करेगा और दूसरों से कम मदद मांगेगा। इसी के साथ उसके अंदर आत्मविश्वास भी ज्यादा बढ़ेगा।

मित्र परिंदा अनजान परिंदे की तारीफ करते हुए बोला – तुम बहुत महान हो। जिस तरह से तुमने उस नन्हें परिंदे की मदद की, वही सच्ची मदद है।

सच्ची मदद वही है, जो मदद पाने वाले को यह महसूस ना होने दे कि उसकी मदद की गई है। बहुत बार लोग मदद तो करते हैं पर उसका ढिंढोरा पीटने से नहीं चूकते ऐसी मदद किस kam ki
Jai maa saraswati ji jai ho

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सिग्नल / लघुकथा

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सिग्नल पर लाल बत्ती देख कार फिर से रुक गई और हिचकोले खाता डैश-बोर्ड पर पड़ा वह लाल गुलाब अचानक स्थिर हो गया!.लेकिन दोनों अभी भी चुप थे।
तभी उसकी नजर कार से बाहर उस बच्चे पर पड़ी और अभी-अभी वहां से आधे किलोमीटर पीछे वाले सिग्नल पर घटित वह घटना उसके आंखों के सामने चलचित्र की तरह उभर आया…
“आंटी खरीद लो ना!”
आवाज सुन उसने सिग्नल पर रुकी अपनी कार से बाहर झांका..लगभग आठ-दस साल का लड़का कई रंग के गुलाब हाथ में लिए खड़ा था।
“ले लो ना आंटी!”
बच्चे ने उसे मनुहार किया था और उसे भी उस बच्चे की मुस्कान ने आकर्षित किया था..
“कितने के हैं?”
“दस रुपए।”
उसने अपने पर्स में झांका था पचास के दो नोट पड़े थे।
“एक लाल गुलाब दे दो।”
बच्चे से एक लाल गुलाब ले उसे पचास का नोट थमा उसने मुस्कुराकर गुलाब अपने पति की ओर बढ़ा दिया था।
“आंटी छुट्टे दे दो ना!”
बच्चा पचास का नोट हाथ में लिए उसकी ओर देखा था।
“बेटा!.मेरे पास छुट्टे नहीं है।”
बच्चा उदास हुआ लेकिन अगले ही पल मुस्कुरा कर बोल उठा था..
“आंटी!.मैं बस अभी देता हूंँ!”
ऐसा कहते हुए वह भागकर सड़क किनारे एक गुमटी की ओर गया था।
कार में बैठे दोनों पति-पत्नी उसे देख रहे थे तभी सिग्नल हरा हो गया था और गाड़ियों के हार्न से आसपास का माहौल गूंज उठा था।
“इन लोगों का यही धंधा है।”
ऐसा कहते हुए उसके पति ने हाथ में थामा वह लाल गुलाब डैश-बोर्ड पर रख स्टेयरिंग संभाल लिया था।
कार एक रफ्तार से चलती हुई वहां से लगभग आधी किलो मीटर दूर अभी-अभी दूसरे सिग्नल पर लाल बत्ती देख रुक गई थी और अब वही बच्चा हाथ में चार दस के नोट लिए सामने खड़ा था।
“आंटी!.आपके चालिस रूपए।”
बच्चा हांफ रहा था,..उसकी सांस उखड़ रही थी।
उसने वह रूपए उसे खुद के पास रखने का इशारा कर हाथ बढ़ा उस बच्चे के दूसरे हाथ में पकड़े गुलाबों में से और चार लाल गुलाब ले वहीं सामने डैश-बोर्ड पर पड़ी बिसलरी की बोतल उसकी ओर बढ़ा उसके माथे को सहला दिया..
तभी उस सिग्नल की बत्ती भी हरी हो गई और उसके पति ने अपनी कार आगे बढ़ा दिया लेकिन उसका ध्यान अभी भी उस बच्चे ने अपनी और खींच रखा था। वह मन ही मन सोच रही थी कि….
“बड़ी गाड़ियों में बैठे लोग पैदल चलने वालों के बारे में अक्सर कितना गलत सोचते हैं।”

पुष्पा कुमारी “पुष्प”
पुणे (महाराष्ट्र)

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💐💐क्रोध से भिड़ो नहीं, उसे मोड़ो💐💐

एक बार सात्यकि, बलराम एवं श्रीकृष्ण यात्रा कर रहे थे । यात्रा करते-करते रात हुई तो उन्होंने जंगल में पड़ाव डाला और ऐसा तय किया कि दो लोग सोयें तथा एक जागकर पहरा दे क्योंकि जंगल में हिंसक प्राणियों का भय था ।

पहले सात्यकि पहरा देने लगे और श्रीकृष्ण तथा बलराम सो गये । इतने में एक राक्षस आया और उसने सात्यकि को ललकारा : ‘‘क्या खड़ा है ? कुछ दम है तो आ जा । मुझसे कुश्ती लड़ ।’’ सात्यकि उसके साथ भिड़ गया । दोनों बहुत देर तक लड़ते रहे । सात्यकि की तो हड्डी-पसली एक हो गयी । सात्यकि का पहरा देने का समय पूरा हो गया तो वह राक्षस भी अदृश्य हो गया ।

फिर बलरामजी की बारी आयी । जब बलरामजी पहरा देने लगे तो थोड़ी देर में वह राक्षस पुनः आ धमका और बोला : ‘‘क्या चौकी करते हो ? दम है तो आ जाओ।’’ बलरामजी एवं राक्षस में भी कुश्ती चल पड़ी । ऐसी कुश्ती चली कि बलरामजी की रग-रग दुखने लगी । श्रीकृष्ण का पहरा देने का समय आया तो वह राक्षस दृश्य हो गया ।

बलरामजी श्रीकृष्ण को कैसे बताते कि मैं कुश्ती हारकर बैठा हूँ ?
श्रीकृष्ण पहरा देने लगे तो वह राक्षस पुनः आ खड़ा हुआ और बोला :
‘‘क्या चौकी करते हो ?’’ यह सुनकर श्रीकृष्ण खिल-खिलाकर हँस पड़े। वह राक्षस पुनः श्रीकृष्ण को उकसाने की कोशिश करने लगा तो श्रीकृष्ण पुनः हँस पड़े और बोले : ‘‘मित्र ! तु तो बड़ी प्यारभरी बातें करते हो !’’
राक्षस : ‘‘कैसी प्यारभरी बातें ? तु डरपोक हो ।’’ श्रीकृष्ण : ‘‘यह तो तु भीतर से नहीं बोलते, ऊपर-ऊपर से बोल रहे हो, यह हम जानते हैं ।’’ जब राक्षस ने सात्यकि एवं बलरामजी को ललकारा था तो दोनों क्रोधित हो उठे थे और राक्षस भी बड़ा हो गया था, अतः उससे भिड़ते-भिड़ते दोनों थककर चूर हो गये लेकिन जब उसने श्रीकृष्ण को ललकारा तो वे हँस पड़े और हँसते-हँसते जवाब देने लगे तो राक्षस छोटा होने लगा । राक्षस ज्यों-ज्यों श्रीकृष्ण को
उकसानेवाली बात करता, त्यों-त्यों श्रीकृष्ण सुनी-अनसुनी करके, उस पर प्यार की निगाह डालकर हँस देते । ऐसा करते-करते वह जब एकदम नन्हा हो गया तो श्रीकृष्ण ने उसे अपने पीताम्बर में बाँध लिया ।

सुबह उठकर जब तीनों आगे की यात्रा के लिए चले तो सात्यकि ने श्रीकृष्ण के पीताम्बर में कुछ बँधा हुआ देखकर पूछा : ‘‘यह क्या है ?’’
श्रीकृष्ण : ‘‘जिसने तुम्हारा ऐसा बुरा हाल कर दिया वही राक्षस है यह ।’’ ऐसा कहकर श्रीकृष्ण ने पीताम्बर की गाँठ खोली तो वह नन्हा-सा राक्षस निकला ।
सात्यकि : ‘‘रात को जो दैत्य आया था वह तो बड़ा विशालकाय था ! इतना छोटा कैसे हो गया ?’’
श्रीकृष्ण : ‘‘यह क्रोध रूपी राक्षस है । यदि तुम क्रोध करते जाते हो तो यह बढ़ता जाता है और तुम प्रसन्नता बढ़ाते जाते हो तो यह छोटा होता जाता है । मैं इसकी बात बार-बार सुनी-अनसुनी करता गया तो यह इतना नन्हा हो गया । तुमको सीख देने के लिए ही मैंने इसे पीताम्बर के छोर में बाँध दिया था ।’’

…तो क्षमा, प्रसन्नता एवं विचार से व कामना और अहंकार के त्याग से क्रोध नन्हा हो जाता है।

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रामकृष्ण कभी पूजा करते थे, कभी नहीं करते थे। और कभी दो—दो, चार—चार दिन तक मंदिर का दरवाजा बंद ही रहता। और कभी चौबीस घंटे नाचते रहते। मंदिर के अधिकारियों ने समिति बुलायी। उन्होंने कहा कि यह पुजारी तो ढंग का नहीं है। यह कैसी पूजा? रामकृष्ण को बुलाया, पूछा कि यह कैसी पूजा? रामकृष्ण ने कहा कि जब होती है तब होती है, जब नहीं होती तब नहीं होती। झूठी नहीं करूँगा। जब मेंरा हृदय नहीं पुकार रहा है, तब मैं कैसे पुकारूँ? मेरे होंठ कुछ कहें और मेरा हृदय कुछ कहे, यह मुझसे नहीं होगा। अपनी नौकरी सँभालो!

नौकरी भी क्या थी! चौदह रुपये महीने मिलते थे। खैर, उन दिनों चौदह रुपये बहुत थे। ट्रस्टी ज़रा हैरान हुए, क्योंकि कोई इतनी आसानी से नौकरी नहीं छोड़ देता। लेकिन रामकृष्ण ने कहा कि पूजा जब होगी तब होगी, हाँ कभी—कभी जब पूजा होती है तो आधी रात में भी फिर मैं यह थोड़े ही सोचता हूँ कि यह कोई वक्त है! आधी रात को धुन बँध जाती है, आधी रात तार जुड़ जाते हैं, तो आधी रात दरवाजा खोल लेता हूँ। अब इससे पास—पड़ोस के लोग भी परेशान थे कि आधी रात पूजा होने लगी!

कभी दिन—भर पूजा नहीं होती। यह क्या पूजा का ढंग है? असल में पूजा का ढंग होता ही नहीं। जब पूजा ढंग से होती है, तो झूठी होती है। पूजा की तो एक सरलता होती है, एक सहजता होती है। एक हृदय की उमंग है। एक हवा का झोंका है। अज्ञात से आता है, नचा जाता है, तब एक सचाई है। उस सचाई में परमात्मा से मिलन है। लेकिन तुम्हारे सब आचार झूठे हैं, नियोजित हैं, व्यवस्थित हैं। तुमने सब भाँति उनका अभ्यास कर लिया है। अभ्यास से बचना। अभ्यास से आदमी झूठा हो जाता है अभ्यास से आदमी पाखंडी हो जाता है। अभ्यास से मत जीना, सहजता से जीना, सरलता से जीना।

ओशो

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पत्थर की कीमत
संत सुमति दास की लोकप्रियता देखते हुए तत्कालीन नरेश ने भी उन्हें सत्संग
करने के लिए अपने महल में निमंत्रित किया। उद्देश्य अपना वैभव और
लोकप्रियता दिखाना भी था। अगले दिन संत महल में पहुंच गए। प्रवचन के
पश्चात उन्हें पूरा महल घुमाया गया। नरेश ने उन्हें अपने ख़ज़ाने में जमा
बहुमूल्य पदार्थ, बेशकीमती रत्न और पत्थर आदि दिखाए। संत निर्लिप्त भाव
से सब देखते रहे। महल से चलते हुए उन्होंने भी राजा को अपनी कुटिया पर
आकर सत्संग लाभ लेने के लिए आमंत्रित किया। अगले दिन राजा उनकी
कुटिया पर पहुंचे तो उन्होंने भी राजा को अपना सामान दिखाना प्रारम्भ किया,
जिनमें कुछ जरूरी बर्तन, दो-चार कपड़े और एक पत्थर की चक्की रखी थी।
नरेश अरुचि से सब देखते रहे। जब संत चक्की के बारे में बताने लगे तब नरेश
बोले, ‘इसमें विशेष बात क्या है। हर घर में होती है और चंद रुपयों में कहीं भी
मिल जाती है।’ इस पर संत ने गम्भीरता से समझाया, ‘आपके ख़ज़ाने के रत्न
भी तो पत्थर ही हैं, मगर वह किसी के काम आने के बजाय अपनी सुरक्षा पर
ही अपना धन व्यय करवाते हैं। यह चक्की भी पत्थर की होते हुए भी सदा
लोगों का उपकार करते हुए उनका पेट भरती है। आप ही बताएं कि कौन से
पत्थर अधिक उपयोगी हैं।’
प्रस्तुति : मुकेश कुमार जैन

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☀️ स्वयं को पहचाने ☀️

🔷 एक बार स्वामी विवेकानंद के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला “महाराज! मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूं, मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया। भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा-लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।”

🔶 स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा-सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा ‘‘तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।’’

🔷 आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी-खासी सैर कराकर जब वह व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहूँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था, जबकि कुत्ता हांफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।

🔶 स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा कि “यह कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ-सुथरे और बिना थके दिख रहे हो|”

🔷 तो व्यक्ति ने कहा “मैं तो सीधा-साधा अपने रास्ते पर चल रहा था लेकिन यह कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसलिए यह थक गया है।”

🔶 स्वामी जी ने मुस्करा कर कहा “यही तुम्हारे सभी प्रश्रों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आसपास ही है वह ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पर जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो।”

🔷 यही बात लगभग हम सब पर लागू होती है। प्रायः अधिकांश लोग हमेशा दूसरों की गलतीयों की निंदा-चर्चा करने, दूसरों की सफलता से ईर्ष्या-द्वेष करने, और अपने अल्प ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करने के बजाय अहंकारग्रस्त हो कर दूसरों पर रौब झाड़ने में ही रह जाते हैं।

🔶 अंततः इसी सोच की वजह से हम अपना बहुमूल्य समय और क्षमता दोनों खो बैठते हैं, और जीवन एक संघर्ष मात्र बनकर रह जाता है।

👉 दूसरों से होड़ मत कीजिये, और अपनी मंजिल खुद बनाइये।

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एक बार चाणक्य का एक परिचित उनसे मिलने आया और बोला – क्या तुम जानते हो कि “मैंने तुम्हारे मित्र के बारे में क्या सुना है?”

चाणक्य ने उसे टोकते हुए कहा – “एक मिनट रुको।”
इसके पहले कि तुम मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताओ, उसके पहले मैं
तीन छलनी परीक्षण करना चाहता हूं।

मित्र ने कहा “तीन छलनी परीक्षण?”

चाणक्य ने कहा – “जी हां मैं इसे तीन छलनी परीक्षण इसलिए कहता हूं क्योंकि जो भी बात आप मुझसे कहेंगे, उसे तीन छलनी से गुजारने के बाद ही कहें।”

“पहली छलनी है “सत्य “।
क्या आप यह विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि जो बात आप मुझसे कहने जा रहे हैं, वह पूर्ण सत्य है?”

“व्यक्ति ने उत्तर दिया – “जी नहीं, दरअसल वह बात मैंने अभी-अभी किसी से सुनी है।”

चाणक्य बोले – “तो तुम्हें इस बारे में ठीक से कुछ नहीं पता है। “

“आओ अब दूसरी छलनी लगाकर देखते हैं।

दूसरी छलनी है “भलाई “।

क्या तुम मुझसे मेरे मित्र के बारे में कोई अच्छी बात कहने जा रहे हो?”

“जी नहीं, बल्कि मैं तो…… “

“तो तुम मुझे कोई बुरी बात बताने जा रहे थे लेकिन तुम्हें यह भी नहीं मालूम है कि यह बात सत्य है या नहीं।”- चाणक्य बोले।

“तुम एक और परीक्षण से गुजर सकते हो।

तीसरी छलनी है “उपयोगिता “।
क्या वह बात जो तुम मुझे बताने जा रहे हो, मेरे लिए उपयोगी है?”

“शायद नहीं…”
यह सुनकर चाणक्य ने कहा
“जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो, न तो वह सत्य है, न अच्छी और न ही उपयोगी। तो फिर ऐसी बात कहने का क्या फायदा?”

निष्कर्ष :—
“जब भी आप अपने परिचित, मित्र, सगे संबंधी, स्वजाति बन्धु के बारे में कुछ गलत बात सुने”,
ये तीन छलनी परीक्षण अवश्य करें।
कुछ सुनने से पहले सामने वाले की नियत को जरूर समझें

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संपूर्ण भारत वर्ष में कथावाचक के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके डोंगरेजी महाराज एकमात्र ऐसे कथावाचक थे जो दान का रूपया अपने पास नही रखते थे और न ही लेते थे।
जिस जगह कथा होती थी लाखों रुपये उसी नगर के किसी सामाजिक कार्य,धर्म व्यवस्था, जनसेवा के लिए दान कर दिया करते थे। उनके अन्तिम प्रवचन में गोरखपुर में कैंसर अस्पताल के लिये एक करोड़ रुपये उनके चौपाटी पर जमा हुए थे।

उनकी पत्नी आबू में रहती थीं। पत्नी की मृत्यु के पांचवें दिन उन्हें खबर लगी । बाद में वे अस्थियां लेकर गोदावरी में विसर्जित करने मुम्बई के सबसे बड़े धनाढ्य व्यक्ति रति भाई पटेल के साथ गये।
नासिक में डोंगरेजी ने रतिभाई से कहा कि रति हमारे पास तो कुछ है ही नही, और इनका अस्थि विसर्जन करना है। कुछ तो लगेगा ही क्या करें ?
फिर खुद ही बोले – “ऐसा करो कि इसका जो मंगलसूत्र एवं कर्णफूल हैं, इन्हे बेचकर जो रूपये मिले उन्हें अस्थि विसर्जन में लगा देते हैं।”

इस बात को अपने लोगों को बताते हुए कई बार रोते – रोते रति भाई ने कहा कि “जिस समय यह सुना हम जीवित कैसे रह गये, बस हमारा हार्ट फैल नही हुआ।”
हम आपसे कह नहीं सकते, कि हमारा क्या हाल था। जिन महाराजश्री के मात्र संकेत पर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, वह महापुरूष कह रहे हैं कि पत्नी के अस्थि विसर्जन के लिये पैसे नही हैं और हम खड़े-खड़े सुन रहे थे ? फूट-फूट कर रोने के अलावा एक भी शब्द मुहँ से नही निकल रहा था।

ऐसे वैराग्यवान और तपस्वी संत-महात्माओं के बल पर ही सनातन धर्म की प्रतिष्ठा बनी है।

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सभ्यता के नाम पर हमारे पास है क्या ?

बर्ट्रेंड रसेल पहली बार एक आदिवासी समाज में गया।
पूरे चांद की रात. और जब आदिवासी नाचने लगे और ढोल बजे और मंजीरे बजे तो रसेल के मन में उठा कि सभ्य आदमी ने कितना खो दिया है!
सभ्यता के नाम पर हमारे पास है क्या?
न ढोल बजते हैं, न मंजीरा बजता है,
न कोई नाचने की क्षमता रह गयी है;
पैर ही नाचना भूल गये हैं।
रसेल ने लिखा है कि उस रात पूरे चांद के नीचे,
वृक्षों के नीचे नाचते हुए आदिवासियों को देखकर मेरे मन में यह सवाल उठा कि हमने पाया क्या है प्रगति के नाम पर?
और उसने यह भी लिखा कि अगर लंदन में लौटकर मैं ट्रेफिलगर स्क्वायर में खड़े होकर नाचने लगा तो तत्क्षण पकड़ लिया जाऊंगा। लोग समझेंगे पागल हो गये।
लोग दुख को तो समझते हैं स्वास्थ्य। और आनंद को समझते हैं विक्षिप्तता। हालतें इतनी बिगड़ गयी
हैं कि इस दुनिया में केवल पागल ही हंसते हैं, बाकी
समझदारों को तो हंसने की फुर्सत कहां है?
समझदारों के हृदय तो सूख गये हैं।
समझदार रुपये गिनने में उलझे हैं।
समझदार महत्वाकांक्षा की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं।
समझदार तो कहते हैं दिल्ली चलो।
फुर्सत कहां है हंसने की,
दो गीत गाने की,
इकतारा बजाने की,
तारों के नीचे वृक्षों की छाया में नाचने की,
सूरज को देखने की,
फूलों से बात करने की,
वृक्षों को गले भेंटने की, फुर्सत किसे है?
ये तो आखिर की बातें हैं, जब सब पूरा हो जायेगा—धन होगा, पद होगा, प्रतिष्ठा होगी, तब बैठ लेंगे वृक्षों के नीचे। लेकिन यह दिन कभी आता नहीं, न कभी आया है, न कभी आयेगा। ऐसे जिंदगी तुम गुजार देते हो रोते—रोते, झींकते—झीकते। ऐसे ही आते हो ऐसे ही चले जाते हो—खाली हाथ आये, खाली हाथ गये।
तो अगर तुम्हें कभी भीतर का रस जन्मने लगे और भीतर स्वाद आने लगे.. और देर नहीं लगती आने में, जरा भीतर मुड़ो कि वहाँ सब मौजूद है…

ओशो – गीता दर्शन

Post – 1339/8839
(Random Collection of Osho’s Thoughts)❤

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मैंने सुना है…….

एक उत्तेजित और पागल रोमन, नंगी तलवार लिए हुए गांव में आया और पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को काट मार कर उसने प्रत्येक को आतंकित कर दिया। झेन मठ के द्वार पर पहुचते हुए उसने तलवार की मूठ से दरवाजा तोड़ दिया, और लम्बे—लम्बे डग भरता हुआ सद्गुरु के निकट आया, जो जाजेन ध्यान में शांत बैठा था, उसने अपनी तलवार ऊपर उठाई थिरता और मौन जैसी कोई चीज उस तक पहुंची। वह क्रोध से चीखते हुए बोला— ‘‘ क्या तुम्हें यह महसूस नहीं होता कि तुम्हारे सामने एक ऐसा व्यक्ति खडा हुआ है, जो बिना पलकें झपकाये ही तुम्हें दो टकड़ों में काट सकता है?‘‘

सद्गुरु ने शांति से उत्तर दिया— ‘‘ क्या तुझे यह अनुभव नहीं होता कि तेरे सामने एक ऐसा व्यक्ति बैठा हुआ है जो बिना पलक झपकाये दो टुकड़ों में कटने के लिए तैयार बैठा है। इसलिए आगे बढ़। मेरे मौन के कारण तू अपने को रोक मत। तू वही कर, जिसको तूने तय कर लिया है।‘‘ लेकिन उस पागल के अन्तर्तम में वह मौन प्रविष्ट हो गया, सद्गुरु की शांति और मौन ने उसके हृदय को स्पर्श कर लिया था, अब उसके लिए मारना असम्भव था।

इसलिए बस अपने हृदय के द्वार खुले रखो।

यदि तुम एक पागल भी हो और खुले हुए हो, तो भी तुम बुद्धत्व को पहचान लोगे, वह कहीं भी किसी भी रूप में प्रकट हुआ हो। और यदि तुम एक महान दार्शनिक बुद्धिजीवी और तर्कनिष्ठ भी हो, यदि तुम स्वयं को मौन और आनंद के मूल तत्व को ग्रहण करने की अनुमति नहीं देते हो, तो तुम चूक जाओगे। तुम्हें अपने को बहुत—बहुत खुला हुआ रखना होगा। तुम्हें स्वीकार भाव में रहना होगा। तुम्हें स्वीकार भाव में रहना होगा और तब बुद्धत्व का प्रमाण इतनी दृढ़ता से तुम तक आता है। यह इतना अधिक निश्चित है कि तुम प्रत्येक चीज से तो इंकार कर सकते हो, लेकिन तुम बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति से इंकार नहीं कर सकते—ऐसा करना असम्भव है। तुम इसे दूसरों को सिद्ध करने में, हो सकता है सफल न हो सको, क्योंकि यहां इसे सिद्ध करने का कोई उपाय नहीं है—

लेकिन तुम्हारे लिए तो यह अनुभूति स्थायी रूप से तुम्हारे अंतर्तम में उतर गई। और एक बार यह तुम्हारे अंतर्तम में उतर गई, एक बार तुम एक बुद्धपुरुष के सम्पर्क में आ गए तो एक सेतु निर्मित हो गया। अब तुम कभी भी पहले जैसे नहीं रह सकते। यह वास्तविक घटना ही कि तुम एक बुद्ध को पहचान सके, पर्याप्त है, और यह तुम्हारे बुद्धत्व की आधारशिला बन जायेगी। इतना पर्याप्त है कि यह तुमकी एक नई दिशा, एक नया अस्तित्व और एक नया जन्म दे गई।

ओशो