Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

लघुकथा -सफेद फरिश्ता
मीनाक्षी देवी एक छोटे से शहर में रहती थी। उनके दोनों बच्चे बेटा और बेटी कनाडा में बस गए थे और मीनाक्षी देवी के पति जगमोहन 6 महीने पहले बीमारी के कारण चल बसे।
मीनाक्षी देवी अकेली रह गई थी। बच्चे कभी कभार फोन करके बात कर लेते थे। मां कैसी हो, अपना ध्यान रखना वगैरा-वगैरा सिर्फ औपचारिकता
निभाते थे। 1 दिन में मीनाक्षी देवी निकट बाजार में सब्जी लेने गई, वापस आते समय एक छोटा सा सफेद रंग का पपी,उनके पीछे पीछे घर तक आ गया। मीनाक्षी देवी को जानवर पालना पसंद नहीं था, लेकिन उनको उस पपी पर दया आ गई और उन्होंने अपने आंगन में एक गत्ते का डिब्बा, उसे बैठने के लिए दे दिया।
वह दिन और आज का दिन, पूरे 4 महीने हो चुके हैं ये पपी उनका पीछा ही नहीं छोड़ता। अब तो मोहल्ले के बच्चों का भी लाडला बन चुका है। बच्चे इसे वहाइटी कह कर पुकारते हैं। मीनाक्षी देवी को भी इससे अब बहुत लगाव हो गया था। समय-समय पर उसे खाना देती ,कभी नहलाती, साथ में बाजार ले जाती। वहाइटी बहुत समझदार था।
बारिश होने के कारण आंगन में फिसलन हो गई थी। एक दिन मीनाक्षी देवी वहां फिसल कर गिर पड़ी और अचेत हो गई। व्हाइटी भौंक भौंक कर सारे बच्चों को वहां ले आया। बच्चों ने आंटी के गिरने की बात जाकर अपने मां बाप को बताई, तब पड़ोसियों ने मीनाक्षी देवी को तुरंत अस्पताल पहुंचा दिया। सिर में चोट लगने के कारण वह कोमा में चली गई। पड़ोसियों ने उनके बच्चों को फोन किया लेकिन वे नहीं आ पाए।
वहाइटी, रोज मीनाक्षी देवी को मिलने अस्पताल जाता था, उनके कंधों पर अपने पंजे रखता था और थोड़ी देर उनके सिरहाने जमीन पर बैठ जाता था। थोड़ी देर बाद उठकर वापस चला जाता था। अस्पताल वाले भी उसका प्यार देखकर उसे रोकते नहीं थे। वह कभी किसी को परेशान नहीं करता था।
पूरे 15 दिन बाद मीनाक्षी देवी को होश आया। उन्होंने बताया कि ,”जब मैं कोमा में थी तब मुझे रोज ऐसे लगता था कि एक सफेद फरिश्ता मेरे कंधों पर हाथ रख कर कह रहा हो कि तुम बहुत जल्दी ठीक हो जाओगी, बहुत जल्दी, चिंता मत करना।”
तब उन लोगों ने उन्हें बताया कि रोज वहाइटी
किस तरह उनके कंधों पर अपने पंजे रखता था और उनक सिरहाने बैठा रहता था।
जब मीनाक्षी देवी को लगा कि यही वह सफेद फरिश्ता है जो मेरे मन में कोमा से बाहर निकलने की आशा जगाता था। उन्होंने ममता से भर कर वहाइटी को गोद में उठाया और अपने ह्रदय से लगा लिया। उनकी आंखें आंसुओं से भरी हुई थी।
स्वरचित काल्पनिक सर्वाधिकार सुरक्षित
गीता वाधवानी दिल्ली

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