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લાખો_વણજારો

લાખો કરીને એક વણજારો હતો.
પૈસેટકે એ સુખી હતો ; પણ એકવાર એને ભીડ પડી.
એ તો ગયો વાણિયાને ત્યાં.

વાણિયો કહે , “જોઈએ એટલા રૂપિયા લઈ જાઓ. તમારા જ છે. ”

જોઈતી રકમ ખાતે મંડાવી લાખો ઊપડ્યો. “લો , રામ રામ શેઠજી ! મહિનો પૂરો થતાં રકમ લઈને આવી પહોંચીશ. ત્યાં સુધી આ ડાઘિયાને (કુતરાને) તમારે ત્યાં મૂકી જાઉં છું. ”

“ એ શું બોલ્યા ? તમારા પૈસા તો દૂધ ધોયેલા છે. ”

“ મોટી મહેરબાની , શેઠ. પણ એમ કાંઈ સાનમાં મૂક્યા વગર મારાથી પાઈ પણ લેવાય નહી.”

લાખાએ ડાઘિયાને ડચકારીને શેઠની પાસે રહેવા હાથ ને આંખથી ઈશારો કર્યો. પછી એણે તરત ડાઘિયા ઉપરથી આંખ વાળી લીધી અને એ રસ્તે પડ્યો.
ડાઘિયો લાખાની પીઠ દેખાઈ ત્યાં સુધી તેના તરફ જોઈ રહ્યો.

પછી તો એવું બન્યું કે શેઠને ઘેર એક રાતે ખાતર પડ્યું. હજારોની ચોરી થઈ. ચારેકોર તપાસ ચાલી. ડાઘિયો બધાની જોડે જ હતો. થોડે આગળ જાય ને પાછો આવે. પણ એના તરફ કોઈનું ધ્યાન જાય તો ને ?
આગળ પગેરું ન મળ્યું એટલે કંટાળીને સૌ પાછા વળતા હતા. ત્યાં ડાઘિયાએ વાણિયાનું ધોતિયું મોઢામાં પકડીને ખેંચવા માંડ્યું. અમરકથાઓ

એક વાડ આગળ આવીને ડાઘિયો ઊભો રહ્યો અને પગથી જમીન ખોતરવા મંડ્યો. ત્યાં ખોદ્યુ તો ચોરાયેલો બધો જ માલ અકબંધ મળી આવ્યો. વાણિયાના હરખનો પાર ન રહ્યો. એને થયું કે આ ડાઘિયાને હવે વહેલો છૂટો કરીને એના ધણી ભેગો કરી દેવો જોઈએ. લાખાને જે પૈસા ધીર્યા છે એથી અનેકગણું ડાઘિયાએ મને બચાવી આપ્યું.

વાણિયાએ આ બધી વાત ચિઠ્ઠીમાં લખી તે કૂતરાની કોટે (ડોકે) બાંધી અને તેને વિદાય કર્યો.

અહીં એવું બન્યું કે લાખા વણજારાને પૈસાની છૂટ થઈ. એને વિચાર થયો કે મહિનો પૂરો થાય ને પૈસા આપવા જાઉં એમાં મેં શું કર્યું ? મહિનામાં દિવસો બાકી હોય ને પૂરા પૈસા દઈ આવું તો હું ખરો. પૈસા લઈને એ નીકળ્યો. અડધે રસ્તે આવ્યો ત્યાં સામેથી એને કંઈ કૂતરા જેવું આવતું દેખાયું. ધારીને જુએ છે તો એનો વહાલો ડાઘિયો !

ડાઘિયાને જોતાં જ લાખાની આંખ ફરી ગઈ. “અરે રામ ! આ કૂતરાએ મારી શાખ ઉપર પાણી ફેરવ્યું ! એ નાસી આવ્યો ! શેઠને હું શું મોં બતાવીશ ?”

ડાઘિયો લાડથી પાસે આવવા જાય છે , ત્યાં લાખાએ આંખ બતાવી એને ફિટકાર આપ્યો અને મોં ફેરવી લીધું.

ઘડીભર ડાઘિયો થંભી ગયો. બીજી જ પળે એ તો ડુંગર તરફ દોડ્યો. ત્યાં એ અબોલ જીવ પથરા પર માથું પછાડી પછાડીને મરી ગયો. લાખો પૈસા આપવા ગયો. ત્યાં એણે શેઠ પાસેથી બધી વાત જાણી. વણજારાના પસ્તાવાનો કંઈ પાર ન રહ્યો. #અમર_કથાઓ

ભારે હૈયે લાખો પાછો વળ્યો. જ્યાં પોતાનો વિશ્વાસુ કૂતરો માથું પછાડીને મરી ગયો હતો ત્યાં એણે એક મોટું સરોવર બંધાવ્યું.

એ સરોવર તે ડાઘાસર. ઉત્તર ગુજરાતમાં રાધનપુર પાસે એ આવેલું છે.
———–અમર કથાઓ ————

નોંધ- હાલમા આ પાઠ ધો.-૪ ગુજરાતી પાઠ્યપુસ્તકમા સમાવેશ થયેલ છે. નિચેના બે ફોટા શૈલેષભાઇ પંચાલની વોલ પરથી લીધેલા છે.

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐गुरु दक्षिणा💐💐

एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा- ‘गुरु जी,कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं | इनमें कौन सही है?’

गुरु जी ने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया-पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं, मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं|

यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था।गुरु जी को इसका आभास हो गया ।वे कहने लगे-‘लो, तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ

एक बार किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए |गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए, ला सकोगे?
वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे |सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी,जैसी आपकी आज्ञा |’

अब वे तीनों शिष्य एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे |लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं ,उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा |
वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा?
इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया |वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे |

अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए कहा कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था ।
अब तीनों पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके |

वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी|

पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी |अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये |गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो,ले आये गुरुदक्षिणा ?’तीनों ने सर झुका लिया |गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव,हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये |हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं

’गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले- ‘निराश क्यों होते हो ?प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो |’तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये |

वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था,अचानक बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं |आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं? चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है |

गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र,मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना,सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके |

दूसरे,यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप,स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें |’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था |

💐💐शिक्षा💐💐

यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी |सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है |वस्तुतः,हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’ पुरुषार्थ ही होता है-ऐसा विद्वानों का मत है |

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम💐💐

          एक समय की बात है कि श्री गुरू नानक देव जी महाराज और उनके 2 शिष्य बाला और मरदाना किसी गाँव में जा रहे थे। चलते चलते रास्ते में एक मकई का खेत आया। बाला स्वभाव से बहुत कम बोलता था। मगर जो मरदाना था वो बात की नीँव उधेडता था।

मकई का खेत देख कर मरदाने ने गुरू महाराज से सवाल किया “कि बाबा जी इस मकई के खेत में जितने दाने हैं क्या वे सब पहले से ही निर्धारित कर दिये गए हैं कि कौन इसका हकदार है और ये किस किस के मुँह में जाऐंगे। इस पर गुरू नानक जी महाराज ने कहा बिल्कुल मरदाना जी इस संसार मे कहीं भी कोई भी खाने योग्य वनस्पति है उस पर मोहर पहले से ही लग गई है और जिसके नाम की मोहर होगी वही जीव उसका ग्रास करेगा। गुरू जी की इस बात ने मरदाने के मन के अन्दर कई सवाल खड़े कर दिए। मरदाने ने मकई के खेत से एक मक्का तोड़ लिया और उसका एक दाना निकाल कर हथेली पर रख लिया और गुरू महाराज से यह पूछने लगा बाबा जी कृपा करके मुझे बताएं कि इस दाने पर किसका नाम लिखा है। इस पर गुरू महाराज ने जवाब दिया कि इस दाने पर एक मुर्गी का नाम लिखा है। मरदाने ने गुरू जी के सामने बड़ी चालाकी दिखाते हुए मकई का वो दाना अपने मुँह मे फेंक लिया और गुरू जी से कहने लगा कि कुदरत का यह नियम तो बड़ी आसानी से टूट गया।

मरदाने ने जैसे ही वो दाना निगला वो दाना मरदाने की श्वास नली मे फंस गया। अब मरदाने की हालत तीर लगे कबूतर जैसी हो गई। मरदाने ने गुरू नानक देव जी से कहा कि बाबा जी कुछ कीजिए नहीं तो मैं मर जांऊगा। गुरू नानक देव जी महाराज ने कहा मरदाना जी  मैं क्या करूँ कोई वैद्य या हकीम ही इसको निकाल सकता है। पास के गाँव मे चलते हैं। वहाँ किसी हकीम को दिखाते हैं । मरदाने को लेकर वे पास के एक गाँव में चले गए। वहाँ एक हकीम मिला। उस हकीम ने मरदाने की नाक में नसवार डाल दी। नसवार बहुत तेज थी। नसवार सूंघते ही मरदाने को छींके आनीं शुरू हो गईं। मरदाने के छीँकने से मकई का वो दाना गले से निकल कर बाहर गिर गया। जैसे ही दाना बाहर गिरा पास ही खड़ी मुर्गी ने झट से वो दाना खा लिया। मरदाने ने गुरू नानक देव जी से क्षमा माँगी और कहा बाबा जी मुझे माफ कर दीजिए। मैने आपकी बात पर शक किया ।

इसी लिये कहते है जिसके भाग्य में ईश्वर ने जितना लिख दिया उसको उतना ही मिलता है।

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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