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फूल

तेरह चौदह साल की वो बच्ची लोगों के घरों में,पूजा के लिए फूल दे जाती है। अपने बाप का हाथ बंटाती और स्कूल जाती है। मुझसे थोड़ा लगाव सा हो गया है
“तू कल फूल क्यूँ नही दे गई? मैं दस बजे तक तेरा इंतजार करती रही”
“बापू बीमार हैं ना,अस्पताल लेकर गई थी कल। और आप बिना फूल के भी पूजा कर लिया करो जब 8 बजे तक मैं ना आऊं, वैसे भी भगवान को तो सिर्फ भक्ति से मतलब होता है ना”
“अच्छा, तो फिर तू फूल क्यूँ दे जाती है?
“क्योंकि इन फूलों को डाली पर ही मुरझाने से अच्छा है कुछ काम आ जाएं, और फिर हमारा घर भी तो इन्हीं फूलों से चलता है ना”
मैं उसकी मीठी बातें सुनने के लिए उसे कुछ ना कुछ टोका करती रहती
“अरे बिन्नी तू आज गुड़हल का फूल नहीं लाई, देवी जी को मैं वही फूल चढ़ाती हूँ”
“इस मौसम में ज्यादा गुड़हल नहीं खिल रहा है आँटी। और फूल तो फूल हैं, सभी तो उसी भगवान की मर्जी से खिलते हैं”
“अच्छा, अच्छा”
वो ऐसे ही प्यारी बातें कभी कह जाती है और मैं मुस्कुरा दिया करती हूँ। एक हफ्ते से वो आ नहीं रही। चिंता इस बात की नहीं है कि मैं भगवान को फूल नहीं चढ़ा पा रही हूँ। पर चिंता हो रही है वो कभी इतने दिन गायब नहीं होती। सच बताऊँ तो पूजा से पहले उसकी मीठी बातों की आदत हो गई है। माँ है नहीं उसकी। अपने बापू और छोटे भाई के साथ रहती है। आज मन बनाकर ख़ास उसे मिलने के लिए पास की ही बस्ती में गई।
उसके घर जा कर देखा तो अपने भाई को अपने हाथों से निवाला खिला रही थी। छोटा भाई रो रहा था। वे उसे चुप करा रही थी। मुझे देखते ही चौक पड़ी और
“आँटी जी आप?’
“हाँ.. ये रो क्यूँ रहा है”
मेरे इस सवाल से उसकी भी आँखें भर आईं
“बापू भी चले गए आँटी जी” वो मुझसे लिपट फूट फूटकर रो पड़ी।उसकी बातें सुन मन धक से बैठ गया। क्या मैं उस भगवान की पूजा करती हूँ जो इन जैसे बच्चों को भी अनाथ और बेसहारा कर देते हैं। उन्हें देख मन व्यथित हो उठा। सामने पालनहार कन्हैया की फ़ोटो टंगी थी। हम तीनों की आँखों में आँसू थे और वे बाँसुरी पकड़े मुस्कुरा रहे थे। अचानक से लगा जैसे कह रहे हो,
“ये अनाथ नहीं हैं, समाज के ये दो फूल अब तुम्हारे दायित्व हैं”

मैं उन बच्चों की उंगली पकड़े बस्ती से अपने घर की ओर चल पड़ी..!

©️विनय कुमार मिश्रा
Vinay Kumar Mishra

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लघुकथा मैं डरपोक 🙏🙏

एक बार की बात है रक्षाबंधन के दिन मैं अपनी मम्मी के साथ उनके भाई यानी मेरे मामा के घर जा रही थी। हम दोनों बस में बैठे थे और हमें कानपुर जाना था जैसे ही बस आगे बढ़ी हमने देखा एक एक्सीडेंट हो गया है जिसमें एक आदमी जमीन पर नीचे गिरा पड़ा है। बस को रोका गया और देखा गया कि यह व्यक्ति कौन है? मेरे मन में भी आया कि मैं भी उतर कर देखूं कि यह कौन है? लेकिन मैं डरपोक बस से उतर ना पाई और मैंने ईश्वर से प्रार्थना की कि हे! भगवान इस इंसान की मदद कर। पूरे रास्ते भर मेरा मन कचोटता रहा कि मैं बस से क्यों नहीं उतरी?
अपने मामा के यहां पूरा दिन बिताने के बाद हम जब घर लौटे तुम मुझे पता चला कि उसी भीड़ में से एक भले इंसान ने एंबुलेंस बुलाकर उस व्यक्ति की मदद की जिसका एक्सीडेंट हो गया था। मेरे मन को बहुत सुकून मिला और मैंने ईश्वर का धन्यवाद दिया।
लेकिन उस दिन के बाद से मैंने मन में यह ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए अगर किसी व्यक्ति को मेरी सहायता की जरूरत होगी तो मैं बिना डरे उस व्यक्ति के पास जाऊंगी और जो भी संभव सहायता हो सकेगी मैं उसकी करूंगी। इसके लिए चाहे मुझे कितने भी कष्ट क्यों ना उठाने पड़े । मैं सोचती हूं यदि भीड़ में से वह इंसान मेरी तरह डरपोक होता तो शायद उस व्यक्ति की जान ना बच पाती जो आज अपने घर में जीवित है और अपने परिवार के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहा है।
मैं वाकई में बहुत डरपोक बन गई थी न जाने ईश्वर ने मुझे यह शक्ति क्यों नहीं दी कि मैं उस इंसान की सहायता कर पाती।
मुझे अपने पर शर्म आती है कि मैं इतनी डरपोक निकली कि मैं उस इंसान का चेहरा देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकी कि वह कौन है?
मैं वाकई में बहुत डरपोक थी।।।
🙏🙏🙏🙏
मेरी हर रचना मेरे साथ घटित एक सत्य घटना है। हम सभी के जीवन में कभी ना कभी कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो हमें अंदर तक कचोट देता है।
उसी के बाद हमारा हृदय परिवर्तन होने की संभावना बढ़ जाती है। शायद मेरा भी हृदय परिवर्तन हो गया है और आने वाले समय में मैं भी किसी जरूरतमंद की मदद करने को हिम्मत के साथ आगे बढ़ सकूंगी।
ईश्वर मुझे हिम्मत और सद्बुद्धि दे।।
❤️❤️❤️❤️❤️🙏🙏🙏🙏🙏🙏
रंजीता अवस्थी,
शाहजहांपुर

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Jai shree ram ji
Jai shree hanumantaye namah ji
🔥 जीवन के दो पुण्य 🔥

एक विद्वान साधु थे जो दुनियादारी से दूर रहते थे। वह अपनी ईमानदारी,सेवा तथा ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार वह पानी के जहाज से लंबी यात्रा पर निकले।

उन्होंने यात्रा में खर्च के लिए पर्याप्त धन तथा एक हीरा संभाल के रख लिया । ये हीरा किसी राजा ने उन्हें उनकी ईमानदारी से प्रसन्न होकर भेंट किया था सो वे उसे अपने पास न रखकर किसी अन्य राजा को देने जाने के लिए ही ये यात्रा कर रहे थे।

यात्रा के दौरान साधु की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। वे उन्हें ज्ञान की बातें बताते गए। एक फ़क़ीर यात्री ने उन्हें नीचा दिखाने की मंशा से नजदीकियां बढाने लगा।

एक दिन बातों-बातों में साधु ने उसे विश्वासपात्र नेक आदमी समझकर हीरे की झलक भी दिखा दी। उस फ़क़ीर को और लालच आ गया। उसने उस हीरे को हथियाने की योजना बनाई।

रात को जब साधु सो गया तो उसने उसके झोले तथा उसके वस्त्रों में हीरा ढूंढा पर उसे मिला नही ।

अगले दिन उसने दोपहर की भोजन के समय साधु से कहा कि इतना कीमती हीरा है, आपने संभाल के रक्खा है न।
साधु ने अपने झोले से निकलकर दिखाया कि देखो ये इसमे रखा है। हीरा देखकर फ़क़ीर को बड़ी हैरानी हुई कि ये उसे कल रात को क्यों नही मिला। आज रात फिर प्रयास करूंगा ये सोचकर उसने दिन काटा और सांझ होते ही तुंरन्त अपने कपड़े टांगकर, सामान रखकर, स्वास्थ्य ठीक नही है कहकर जल्दी सोने का नाटक किया।

निश्चित समय पर संध्या पूजा अर्चना के पश्चात जब साधु कमरे में आये तो उन्होंने फ़क़ीर को सोता हुआ पाया ।

सोचा आज स्वास्थ्य ठीक नही है इसलिए फ़क़ीर जल्दी सो गया होगा। उन्होंने भी अपने कपड़े तथा झोला उतारकर टांग दिया और सो गए।

आधी रात को फ़क़ीर ने उठकर फिर साधु के कपड़े तथा झोला झाड़कर झाड़कर देखा। उसे हीरा फिर भी नही मिला।

अगले दिन उदास मन से फकीर ने साधु से पूछा -“इतना कीमती हीरा संभाल कर तो रखा है ना साधुबाबा,यहां बहुत से चोर है”।

साधु ने फिर अपनी पोटली खोल कर उसे हीरा दिखा दिया।

अब हैरान परेशान फ़क़ीर के मन में जो प्रश्न था उसने साधु से खुलकर कह दिया उसने साधु से पूछा कि-” मैं पिछली दो रातों से आपके कपड़े तथा झोले में इस हीरे को ढूंढता हूं मगर मुझे नहीं मिलता, ऐसा क्यों , रात को यह हीरा कहां चला जाता है ।

साधु ने बताया- ” मुझे पता है कि तुम कपटी हो, तुम्हारी नीयत इस हीरे पर खराब थी और तुम इसे हर रात अंधेरे में चोरी करने का प्रयास करते थे इसलिए पिछले दो रातों से मैं अपना यह हीरा तुम्हारे ही कपड़ों में छुपा कर सो जाता था और प्रातः उठते ही तुम्हारे उठने से पहले इसे वापस निकाल लेता था”

मेरा ज्ञान यह कहता है कि व्यक्ति अपने भीतर नहीं झांकता, नहीं ढूंढता। दूसरे में ही सब अवगुण तथा दोष देखता है। तुम भी अपने कपड़े नही टटोलते थे।”

फकीर के मन में यह बात सुनकर और ज्यादा ईर्ष्या और द्वेष उत्पन्न हो गया । वह मन ही मन साधु से बदला लेने की सोचने लगा। उसने सारी रात जागकर एक योजना बनाई।

सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘हाय मैं मर गया। मेरा एक कीमती हीरा चोरी हो गया।’ वह रोने लगा।

जहाज के कर्मचारियों ने कहा, ‘तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।’

यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब साधु बाबा की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा,

आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो अविश्वास करना ही अधर्म है।’यह सुन कर साधु बोले, ‘नहीं, जिसका हीरा चोरी हुआ है उसके मन में शंका बनी रहेगी इसलिए मेरी भी तलाशी ली जाए।’बाबा की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला।

दो दिनों के बाद जब यात्रा खत्म हुई तो उसी फ़क़ीर ने उदास मन से साधु से पूछा, ‘बाबा इस बार तो मैंने अपने कपड़े भी टटोले थे, हीरा तो आपके पास था, वो कहां गया?

साधु ने मुस्करा कर कहा, ‘उसे मैंने बाहर पानी में फेंक दिया था।

साधु ने पूछा – तुम जानना चाहते हो क्यों?

क्योंकि मैंने जीवन में दो ही पुण्य कमाए थे – एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास।

अगर मेरे पास से हीरा मिलता और मैं लोगों से कहता कि ये मेरा ही हैं तो शायद सभी लोग साधु के पास हीरा होगा इस बात पर विश्वास नही करते यदि मेरे भूतकाल के सत्कर्मो के कारण विश्वास कर भी लेते तो भी मेरी ईमानदारी और सत्यता पर कुछ लोगों का संशय बना रहता।

“मैं धन तथा हीरा तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को खोना नहीं चाहता, यही मेरे पुण्यकर्म है जो मेरे साथ जाएंगे।”

उस फ़क़ीर ने साधु से माफी मांगी और उनके पैर पकड कर गिड़गिड़ाने लगा।

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🙏जय श्री राम 🙏

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Jai maa saraswati ji ki jai ho ji
Sadbuddi pradayini maa Sharde Jai ho

एक नन्हा परिंदा अपने परिवारजनों से बिछड़ गया। बिछड़ कर अपने आशियाने से बहुत दूर आ गया था। उस नन्हे परिंदे को अभी उड़ान भरना अच्छे से नहीं आता था। उसने उड़ना सीखना अभी शुरू ही किया था। इधर नन्हे परिंदे के परिवार वाले बहुत परेशान थे और उसके आने की राह देख रहे थे। इधर नन्हा परिंदा भी समझ नहीं पा रहा था कि वह अपने आशियाने तक कैसे पहुंचे? वह उड़ान भरने की काफी कोशिश कर रहा था पर बार-बार कुछ ऊपर उठकर गिर जाता। कुछ दूर से एक अनजान परिंदा अपने मित्र के साथ ये सब बड़े गौर से देख रहा था। कुछ देर देखने के बाद वह दोनों परिंदे उस नन्हें परिंदे के करीब आ पहुंचे। नन्हा परिंदा उन्हें देख कर पहले घबरा गया फिर उसने सोचा शायद ये उसकी मदद करें और घर तक पहुंचा दें।

अनजान परिंदा – क्या हुआ नन्हे परिन्दे, काफी परेशान हो?

नन्हा परिंदा – मैं रास्ता भटक गया हूं और मुझे शाम होने से पहले अपने घर लौटना है। मुझे उड़ान भरना अभी अच्छे से नहीं आता। मेरे घर वाले बहुत परेशान हो रहे होंगे। आप मुझे उड़ान भरना सिखा सकते हैं? मैं काफी देर से कोशिश कर रहा हूं पर कामयाबी नहीं मिल रही है।
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अनजान परिंदा (थोड़ी देर सोचने के बाद) – जब उड़ान भरना सीखा नहीं तो इतना दूर निकलने की क्या जरूरत थी?

वह अपने मित्र के साथ मिलकर नन्हे परिंदे का मजाक उड़ाने लगा उन लोगों की बातों से नन्हा परिंदा बहुत क्रोधित हो रहा था।

अनजान परिंदा हंसते हुए बोला – देखो हम तो उड़ान भरना जानते हैं और अपनी मर्जी से कहीं भी जा सकते हैं।

इतना कहकर अनजान परिंदे ने उसके सामने पहली उड़ान भरी। वह फिर थोड़ी देर बाद लौटकर आया और 2-4 कड़वी बातें बोल उड़ गया।

ऐसा उसने 5-6 बार किया और जब इस बार वो उड़ान भर कर वापस आया तो नन्हा परिंदा वहां नहीं था।

अनजान परिंदा अपने मित्र से – नन्हें परिंदे ने उडान भर ली ना? उस समय अनजान परिंदे के चेहरे पर खुशी झलक रही थी।

मित्र परिंदा – हां नन्हें परिंदे ने तो उड़ान भर ली, लेकिन तुम इतना खुश क्यों हो रहे हो मित्र? तुमने तो नन्हें परिंदे का कितना मजाक बनाया।

अनजान परिंदा – मित्र तुमने मेरी केवल नकारात्मकता पर ध्यान दिया लेकिन नन्हा परिंदा मेरी नकारात्मकता पर कम और सकारात्मक पर ज्यादा ध्यान दे रहा था। इसका अर्थ यह है कि उसने मेरे मज़ाक को अनदेखा करते हुए मेरी उड़ान भरने वाली चाल पर ज्यादा ध्यान दिया और वह उड़ान भरने में सफल हुआ।

मित्र परिंदा – जब तुम्हें उसे उड़ान भरना सिखाना ही था तो उसका मजाक बनाकर क्यों सिखाया?

अनजान परिंदा – मित्र, नन्हा परिंदा अपने जीवन की पहली उड़ान भर रहा था और मैं उसके लिए अजनबी था। अगर मैं उसको सीधे तरीके से उड़ना सिखाता तो वह पूरी जिंदगी मेरे एहसान के नीचे दबा रहता और आगे भी शायद ज्यादा कोशिश खुद से नहीं करता। मैंने उस परिंदे के अंदर छिपी लगन देखी थी जब उसको कोशिश करते हुए देखा था तभी समझ गया था। उसे बस थोड़ी सी दिशा देने की जरूरत है और जो मैंने अनजाने में उसे दी और वो अपनी मंजिल को पाने में कामयाब हुआ। अब वो पूरी जिंदगी खुद से कोशिश करेगा और दूसरों से कम मदद मांगेगा। इसी के साथ उसके अंदर आत्मविश्वास भी ज्यादा बढ़ेगा।

मित्र परिंदा अनजान परिंदे की तारीफ करते हुए बोला – तुम बहुत महान हो। जिस तरह से तुमने उस नन्हें परिंदे की मदद की, वही सच्ची मदद है।

सच्ची मदद वही है, जो मदद पाने वाले को यह महसूस ना होने दे कि उसकी मदद की गई है। बहुत बार लोग मदद तो करते हैं पर उसका ढिंढोरा पीटने से नहीं चूकते ऐसी मदद किस kam ki
Jai maa saraswati ji jai ho

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सिग्नल / लघुकथा

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सिग्नल पर लाल बत्ती देख कार फिर से रुक गई और हिचकोले खाता डैश-बोर्ड पर पड़ा वह लाल गुलाब अचानक स्थिर हो गया!.लेकिन दोनों अभी भी चुप थे।
तभी उसकी नजर कार से बाहर उस बच्चे पर पड़ी और अभी-अभी वहां से आधे किलोमीटर पीछे वाले सिग्नल पर घटित वह घटना उसके आंखों के सामने चलचित्र की तरह उभर आया…
“आंटी खरीद लो ना!”
आवाज सुन उसने सिग्नल पर रुकी अपनी कार से बाहर झांका..लगभग आठ-दस साल का लड़का कई रंग के गुलाब हाथ में लिए खड़ा था।
“ले लो ना आंटी!”
बच्चे ने उसे मनुहार किया था और उसे भी उस बच्चे की मुस्कान ने आकर्षित किया था..
“कितने के हैं?”
“दस रुपए।”
उसने अपने पर्स में झांका था पचास के दो नोट पड़े थे।
“एक लाल गुलाब दे दो।”
बच्चे से एक लाल गुलाब ले उसे पचास का नोट थमा उसने मुस्कुराकर गुलाब अपने पति की ओर बढ़ा दिया था।
“आंटी छुट्टे दे दो ना!”
बच्चा पचास का नोट हाथ में लिए उसकी ओर देखा था।
“बेटा!.मेरे पास छुट्टे नहीं है।”
बच्चा उदास हुआ लेकिन अगले ही पल मुस्कुरा कर बोल उठा था..
“आंटी!.मैं बस अभी देता हूंँ!”
ऐसा कहते हुए वह भागकर सड़क किनारे एक गुमटी की ओर गया था।
कार में बैठे दोनों पति-पत्नी उसे देख रहे थे तभी सिग्नल हरा हो गया था और गाड़ियों के हार्न से आसपास का माहौल गूंज उठा था।
“इन लोगों का यही धंधा है।”
ऐसा कहते हुए उसके पति ने हाथ में थामा वह लाल गुलाब डैश-बोर्ड पर रख स्टेयरिंग संभाल लिया था।
कार एक रफ्तार से चलती हुई वहां से लगभग आधी किलो मीटर दूर अभी-अभी दूसरे सिग्नल पर लाल बत्ती देख रुक गई थी और अब वही बच्चा हाथ में चार दस के नोट लिए सामने खड़ा था।
“आंटी!.आपके चालिस रूपए।”
बच्चा हांफ रहा था,..उसकी सांस उखड़ रही थी।
उसने वह रूपए उसे खुद के पास रखने का इशारा कर हाथ बढ़ा उस बच्चे के दूसरे हाथ में पकड़े गुलाबों में से और चार लाल गुलाब ले वहीं सामने डैश-बोर्ड पर पड़ी बिसलरी की बोतल उसकी ओर बढ़ा उसके माथे को सहला दिया..
तभी उस सिग्नल की बत्ती भी हरी हो गई और उसके पति ने अपनी कार आगे बढ़ा दिया लेकिन उसका ध्यान अभी भी उस बच्चे ने अपनी और खींच रखा था। वह मन ही मन सोच रही थी कि….
“बड़ी गाड़ियों में बैठे लोग पैदल चलने वालों के बारे में अक्सर कितना गलत सोचते हैं।”

पुष्पा कुमारी “पुष्प”
पुणे (महाराष्ट्र)

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💐💐क्रोध से भिड़ो नहीं, उसे मोड़ो💐💐

एक बार सात्यकि, बलराम एवं श्रीकृष्ण यात्रा कर रहे थे । यात्रा करते-करते रात हुई तो उन्होंने जंगल में पड़ाव डाला और ऐसा तय किया कि दो लोग सोयें तथा एक जागकर पहरा दे क्योंकि जंगल में हिंसक प्राणियों का भय था ।

पहले सात्यकि पहरा देने लगे और श्रीकृष्ण तथा बलराम सो गये । इतने में एक राक्षस आया और उसने सात्यकि को ललकारा : ‘‘क्या खड़ा है ? कुछ दम है तो आ जा । मुझसे कुश्ती लड़ ।’’ सात्यकि उसके साथ भिड़ गया । दोनों बहुत देर तक लड़ते रहे । सात्यकि की तो हड्डी-पसली एक हो गयी । सात्यकि का पहरा देने का समय पूरा हो गया तो वह राक्षस भी अदृश्य हो गया ।

फिर बलरामजी की बारी आयी । जब बलरामजी पहरा देने लगे तो थोड़ी देर में वह राक्षस पुनः आ धमका और बोला : ‘‘क्या चौकी करते हो ? दम है तो आ जाओ।’’ बलरामजी एवं राक्षस में भी कुश्ती चल पड़ी । ऐसी कुश्ती चली कि बलरामजी की रग-रग दुखने लगी । श्रीकृष्ण का पहरा देने का समय आया तो वह राक्षस दृश्य हो गया ।

बलरामजी श्रीकृष्ण को कैसे बताते कि मैं कुश्ती हारकर बैठा हूँ ?
श्रीकृष्ण पहरा देने लगे तो वह राक्षस पुनः आ खड़ा हुआ और बोला :
‘‘क्या चौकी करते हो ?’’ यह सुनकर श्रीकृष्ण खिल-खिलाकर हँस पड़े। वह राक्षस पुनः श्रीकृष्ण को उकसाने की कोशिश करने लगा तो श्रीकृष्ण पुनः हँस पड़े और बोले : ‘‘मित्र ! तु तो बड़ी प्यारभरी बातें करते हो !’’
राक्षस : ‘‘कैसी प्यारभरी बातें ? तु डरपोक हो ।’’ श्रीकृष्ण : ‘‘यह तो तु भीतर से नहीं बोलते, ऊपर-ऊपर से बोल रहे हो, यह हम जानते हैं ।’’ जब राक्षस ने सात्यकि एवं बलरामजी को ललकारा था तो दोनों क्रोधित हो उठे थे और राक्षस भी बड़ा हो गया था, अतः उससे भिड़ते-भिड़ते दोनों थककर चूर हो गये लेकिन जब उसने श्रीकृष्ण को ललकारा तो वे हँस पड़े और हँसते-हँसते जवाब देने लगे तो राक्षस छोटा होने लगा । राक्षस ज्यों-ज्यों श्रीकृष्ण को
उकसानेवाली बात करता, त्यों-त्यों श्रीकृष्ण सुनी-अनसुनी करके, उस पर प्यार की निगाह डालकर हँस देते । ऐसा करते-करते वह जब एकदम नन्हा हो गया तो श्रीकृष्ण ने उसे अपने पीताम्बर में बाँध लिया ।

सुबह उठकर जब तीनों आगे की यात्रा के लिए चले तो सात्यकि ने श्रीकृष्ण के पीताम्बर में कुछ बँधा हुआ देखकर पूछा : ‘‘यह क्या है ?’’
श्रीकृष्ण : ‘‘जिसने तुम्हारा ऐसा बुरा हाल कर दिया वही राक्षस है यह ।’’ ऐसा कहकर श्रीकृष्ण ने पीताम्बर की गाँठ खोली तो वह नन्हा-सा राक्षस निकला ।
सात्यकि : ‘‘रात को जो दैत्य आया था वह तो बड़ा विशालकाय था ! इतना छोटा कैसे हो गया ?’’
श्रीकृष्ण : ‘‘यह क्रोध रूपी राक्षस है । यदि तुम क्रोध करते जाते हो तो यह बढ़ता जाता है और तुम प्रसन्नता बढ़ाते जाते हो तो यह छोटा होता जाता है । मैं इसकी बात बार-बार सुनी-अनसुनी करता गया तो यह इतना नन्हा हो गया । तुमको सीख देने के लिए ही मैंने इसे पीताम्बर के छोर में बाँध दिया था ।’’

…तो क्षमा, प्रसन्नता एवं विचार से व कामना और अहंकार के त्याग से क्रोध नन्हा हो जाता है।

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रामकृष्ण कभी पूजा करते थे, कभी नहीं करते थे। और कभी दो—दो, चार—चार दिन तक मंदिर का दरवाजा बंद ही रहता। और कभी चौबीस घंटे नाचते रहते। मंदिर के अधिकारियों ने समिति बुलायी। उन्होंने कहा कि यह पुजारी तो ढंग का नहीं है। यह कैसी पूजा? रामकृष्ण को बुलाया, पूछा कि यह कैसी पूजा? रामकृष्ण ने कहा कि जब होती है तब होती है, जब नहीं होती तब नहीं होती। झूठी नहीं करूँगा। जब मेंरा हृदय नहीं पुकार रहा है, तब मैं कैसे पुकारूँ? मेरे होंठ कुछ कहें और मेरा हृदय कुछ कहे, यह मुझसे नहीं होगा। अपनी नौकरी सँभालो!

नौकरी भी क्या थी! चौदह रुपये महीने मिलते थे। खैर, उन दिनों चौदह रुपये बहुत थे। ट्रस्टी ज़रा हैरान हुए, क्योंकि कोई इतनी आसानी से नौकरी नहीं छोड़ देता। लेकिन रामकृष्ण ने कहा कि पूजा जब होगी तब होगी, हाँ कभी—कभी जब पूजा होती है तो आधी रात में भी फिर मैं यह थोड़े ही सोचता हूँ कि यह कोई वक्त है! आधी रात को धुन बँध जाती है, आधी रात तार जुड़ जाते हैं, तो आधी रात दरवाजा खोल लेता हूँ। अब इससे पास—पड़ोस के लोग भी परेशान थे कि आधी रात पूजा होने लगी!

कभी दिन—भर पूजा नहीं होती। यह क्या पूजा का ढंग है? असल में पूजा का ढंग होता ही नहीं। जब पूजा ढंग से होती है, तो झूठी होती है। पूजा की तो एक सरलता होती है, एक सहजता होती है। एक हृदय की उमंग है। एक हवा का झोंका है। अज्ञात से आता है, नचा जाता है, तब एक सचाई है। उस सचाई में परमात्मा से मिलन है। लेकिन तुम्हारे सब आचार झूठे हैं, नियोजित हैं, व्यवस्थित हैं। तुमने सब भाँति उनका अभ्यास कर लिया है। अभ्यास से बचना। अभ्यास से आदमी झूठा हो जाता है अभ्यास से आदमी पाखंडी हो जाता है। अभ्यास से मत जीना, सहजता से जीना, सरलता से जीना।

ओशो