Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पत्थर की कीमत
संत सुमति दास की लोकप्रियता देखते हुए तत्कालीन नरेश ने भी उन्हें सत्संग
करने के लिए अपने महल में निमंत्रित किया। उद्देश्य अपना वैभव और
लोकप्रियता दिखाना भी था। अगले दिन संत महल में पहुंच गए। प्रवचन के
पश्चात उन्हें पूरा महल घुमाया गया। नरेश ने उन्हें अपने ख़ज़ाने में जमा
बहुमूल्य पदार्थ, बेशकीमती रत्न और पत्थर आदि दिखाए। संत निर्लिप्त भाव
से सब देखते रहे। महल से चलते हुए उन्होंने भी राजा को अपनी कुटिया पर
आकर सत्संग लाभ लेने के लिए आमंत्रित किया। अगले दिन राजा उनकी
कुटिया पर पहुंचे तो उन्होंने भी राजा को अपना सामान दिखाना प्रारम्भ किया,
जिनमें कुछ जरूरी बर्तन, दो-चार कपड़े और एक पत्थर की चक्की रखी थी।
नरेश अरुचि से सब देखते रहे। जब संत चक्की के बारे में बताने लगे तब नरेश
बोले, ‘इसमें विशेष बात क्या है। हर घर में होती है और चंद रुपयों में कहीं भी
मिल जाती है।’ इस पर संत ने गम्भीरता से समझाया, ‘आपके ख़ज़ाने के रत्न
भी तो पत्थर ही हैं, मगर वह किसी के काम आने के बजाय अपनी सुरक्षा पर
ही अपना धन व्यय करवाते हैं। यह चक्की भी पत्थर की होते हुए भी सदा
लोगों का उपकार करते हुए उनका पेट भरती है। आप ही बताएं कि कौन से
पत्थर अधिक उपयोगी हैं।’
प्रस्तुति : मुकेश कुमार जैन

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☀️ स्वयं को पहचाने ☀️

🔷 एक बार स्वामी विवेकानंद के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला “महाराज! मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूं, मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया। भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा-लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।”

🔶 स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा-सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा ‘‘तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।’’

🔷 आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी-खासी सैर कराकर जब वह व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहूँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था, जबकि कुत्ता हांफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।

🔶 स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा कि “यह कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ-सुथरे और बिना थके दिख रहे हो|”

🔷 तो व्यक्ति ने कहा “मैं तो सीधा-साधा अपने रास्ते पर चल रहा था लेकिन यह कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसलिए यह थक गया है।”

🔶 स्वामी जी ने मुस्करा कर कहा “यही तुम्हारे सभी प्रश्रों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आसपास ही है वह ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पर जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो।”

🔷 यही बात लगभग हम सब पर लागू होती है। प्रायः अधिकांश लोग हमेशा दूसरों की गलतीयों की निंदा-चर्चा करने, दूसरों की सफलता से ईर्ष्या-द्वेष करने, और अपने अल्प ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करने के बजाय अहंकारग्रस्त हो कर दूसरों पर रौब झाड़ने में ही रह जाते हैं।

🔶 अंततः इसी सोच की वजह से हम अपना बहुमूल्य समय और क्षमता दोनों खो बैठते हैं, और जीवन एक संघर्ष मात्र बनकर रह जाता है।

👉 दूसरों से होड़ मत कीजिये, और अपनी मंजिल खुद बनाइये।