Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जब कंधार के तत्तकालीन शासक अमीर अली खान पठान को मजबूर हो कर जैसलमेर राज्य में शरण लेनी पड़ी। तब यहां के महारावल लूणकरण थे। वे महारावल जैतसिंह के जेष्ठ पुत्र होने के कारण उनके बाद यहां के शासक बने। वैसे उनकी कंधार के शासक अमीर अली खान पठान से पहले से ही मित्रता थी और विपत्ति के समय मित्र ही के काम आता है ये सोचते हुए उन्होंने सहर्ष अमीर अली खान पठान को जैसलमेर का राजकीय अतिथि स्वीकार कर लिया।

लम्बें समय से दुर्ग में रहते हुए अमीर अली खान पठान को किले की व्यवस्था और गुप्त मार्ग की सारी जानकारी मिल चुकी थी।उस के मन में किले को जीत कर जैसलमेर राज्य पर अधिकार करने का लालच आने लगा और वह षड्यंत्र रचते हुए सही समय की प्रतीक्षा करने लगा।इधर महारावल लूणकरण भाटी अपने मित्र अमीर अली खान पठान पर आंख मूंद कर पूरा विश्वास करते थे। वो स्वप्न में भी ये सोच नहीं सकते थे कि उनका मित्र कभी ऐसा कुछ करेगा।इधर राजकुमार मालदेव अपने कुछ मित्रों और सामंतों के साथ शिकार पर निकल पड़े।अमीर अली खान पठान बस इस मौके की ताक में ही था। उसने महारावल लूणकरण भाटी को संदेश भिजवाया की वो आज्ञा दे तो उनकी पर्दा नवीन बेगमें रानिवास में जाकर उनकी रानियों और राजपरिवार की महिलाओं से मिलना चाहती है।

फिर क्या होना था? वही जिसका अनुमान पूर्व से ही अमीर अली खान पठान को था। महारावल ने सहर्ष बेगमों को रानिवास में जाने की आज्ञा दे दी।इधर बहुत सारी पर्दे वाली पालकी दुर्ग के महल में प्रवेश करने लगी किन्तु अचानक महल के प्रहरियों को पालकियों के अंदर से भारी भरकम आवाजें सुनाई दीं तो उन्हें थोड़ा सा शक हुआ। उन्होंने एक पालकी का पर्दा हटा कर देखा तो वहां बेगमों की जगह दो-तीन सैनिक छिपे हुए थे।जब अचानक षड्यंत्र का भांडा फूटते ही वही पर आपस में मार-काट शुरू हो गई। दुर्ग में जिसके भी पास जो हथियार था वो लेकर महल की ओर महारावल और उनके परिवार की रक्षा के लिए दौड़ पडा। चारों ओर अफरा -तफरी मच गई किसी को भी अमीर अली खान पठान के इस विश्वासघात की पहले भनक तक नहीं थी।

कोलाहल सुनकर दुर्ग के सबसे ऊंचे बुर्ज पर बैठे प्रहरियों ने संकट के ढोल-नगाड़े बजाने शुरू कर दिए जिसकी घुर्राने की आवाज दस-दस कोश तक सुनाई देने लगी। महारावल ने रानिवास की सब महिलाओं को बुला कर अचानक आए हुए संकट के बारे में बताया। अब अमीर अली खान पठान से आमने-सामने युद्ध करने के सिवाय और कोई उपाय नहीं था। राजकुमार मालदेव और सांमत पता नहीं कब तक लौटेंगे। दुर्ग से बाहर निकलने के सारे मार्ग पहले ही बंद किए जा चुके थे। राजपरिवार की स्त्रियों को अपनी इज्जत बचाने के लिए जौहर के सिवाय कुछ और उपाय नहीं दिखाई दे रहा था। अचानक से किया गया आक्रमण बहुत ही भंयकर था और महल में जौहर के लिए लकड़ियां भी बहुत कम थी। इसलिए सब महिलाओं ने महारावल के सामने अपने अपने सिर आगे कर दियें और सदा सदा के लिए बलिदान हो गई।

महारावल केसरिया बाना पहन कर युद्ध करते हुए रणभूमि में बलिदान हो गए । महारावल लूणकरण भाटी को अपने परिवार सहित चार भाई, तीन पुत्रों के साथ को कई विश्वास पात्र वीरों को खो कर मित्रता की कीमत चुकानी पड़ी। इधर रण दुंन्दुभियों की आवाज सुनकर राजकुमार मालदेव दुर्ग की तरफ दौड़ पड़े।वे अपने सामंतों और सैनिकों को लेकर महल के गुप्त द्वार से किले में प्रवेश कर गए और अमीर अली खान पठान पर प्रचंड आक्रमण कर दिया।अमीर अली खान पठान को इस आक्रमण की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। अंत में उसे पकड़ लिया गया और चमड़े के बने कुड़िए में बंद करके दुर्ग के दक्षिणी बुर्ज पर तोप के मुंह पर बांध कर उड़ा दिया गया।

इतिहास की कई सैकड़ों ऐसी घटनाएं है जिससे हम वर्तमान में बहुत कुछ सीख सकते है। आज अफगान संकट को देखते हुए कई लोग ये कह रहे हैं हमें इन्हें यहां शरण देनी चाहिए, पर उससे क्या होगा? कल ये ही अगर यहां कहते हुए हमें दिखाई दे कि हिन्दुस्तान तुम्हारे बाप का नहीं तो हमे कोई आश्चर्य नहीं होना।

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐माँ और सब्जी वाली💐💐

जब मैं छोटा था तो मेरी माँ, घर के लिए सब्जियाँ, एक सब्जी बेचने वाली से खरीदती थीं, जो रोज हमारे घर सब्जी बेचने आती थी।

रविवार को वह सब्जी बेचने वाली पालक के बंडल लेकर आई। उनकी कीमत उसने एक रुपये प्रति बंडल बोली। मेरी माँ की कीमत प्रस्ताव उसकी बोली हुई कीमत से ठीक आधी थी: हालाँकि माँ ने उससे वादा किया था कि वह उस कीमत पर उससे चार बंडल खरीदेगी। कुछ देर तक दोनों अपनी-अपनी कीमत पर अड़े रहे। सब्जी वाली ने विनम्रता से कहा की वह उस कीमत पर अपनी लागत भी नहीं वसूल कर पायेगी। उसने सिर पर टोकरी लादी और चली गई।

चार कदम आगे बढ़ने के बाद, सब्जी वाली पीछे मुड़ी और चिल्ला कर बोली,” चलिए इसे 75 पैसे बंडल का तय कर देते हैं।” मेरी माँ ने ना में अपना सिर हिलाया और अपने मूल प्रस्ताव 50 पैसे बंडल पर अटकी रही। सब्जी वाली चली गई।

वे दोनों एक-दूसरे की रणनीतियों को भली-भांति जानते थे। सब्जी वाली मुड़ी और हमारे घर तक वापस आई। मेरी माँ दरवाजे पर उसका जैसे इंतज़ार ही कर रही थी। उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी।

यह सौदा मेरी माँ के प्रस्ताव बोली पर ही हुआ था। सब्जी वाली वहाँ स्थिर बैठ गई जैसे कि वह एक समाधि में हो। मेरी माँ ने प्रत्येक बंडल को अपने हाथ से धीरे धीरे उछालकर वजन और गुणवत्ता की पैनी जाँच की।

बंडलों की प्रारंभिक छंटनी के बाद उन्होंने अंततः अपनी संतुष्टि के चार बंडल छांट लिए और छोटे सिक्को से उनका पूरा भुगतान कर दिया।

सब्जी वाली ने बिना गिने पैसे ले लिए। जैसे ही वह उठी, वह चक्कर आने के कारण लड़खड़ा गई। मेरी माँ ने उसका हाथ पकड़ कर पूछा कि क्या उसने सुबह से खाना नहीं खाया क्या? सब्जी वाली ने कहा, “नहीं, आज की कमाई से ही, मुझे कुछ चावल खरीदना है और घर जाकर खाना बनाना है।”

मेरी माँ ने उसे बैठने के लिए कहा। माँ जल्दी से अंदर चली गई और कुछ चपातियों और सब्जियों के साथ तेजी से वापस आई और सब्जी वाली को खाने को दी। माँ ने पानी की बोतल भी उसे दी और उसके के लिए चाय बनाने लगी। सब्जी वाली ने भूख और कृतज्ञतापूर्वक खाना खाया, पानी पिया और चाय पी। उसने मेरी माँ का तहेदिल से शुक्रिया अदा करते हुए, अपनी सब्जी की टोकरी सिर पर रखी और अपने काम पर चली गई।

मैं हैरान था। मैंने अपनी माँ से कहा, आप दो रुपये के सामान के लिए मोलभाव करने में होशियारी दिखा रही थीं, लेकिन उस सब्जी वाली को महंगा भोजन देने में उदार थी, ऐसा क्यों?

मेरी माँ मुस्कुराई और बोली, “मेरे प्यारे बच्चे, व्यापार में कोई दया नहीं होती और दयालुता में कभी कोई व्यापार नहीं होता।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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