Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷{सत्रह साल}÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
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कैसी हो कुसुम ? सत्रह बरस व्यतीत हो गए तुमसे बिछड़ कर …… आखरी बार तुम्हें दुल्हन के रुप में देखा था । तुम्हे किसी और की दुल्हन बनते देखने की हिम्मत नहीं थी मुझमें और यह शहर ही छोड़ कर चला गया था । काफी समय पश्चात आज ही वापस लौट कर आया हूं ।
आज शाम नदी किनारे उसी मंदिर के पास जहां हम हमेशा मिला करते थे जाऊंगा उन्हीं पुरानी यादों से मिलने। और कल ही वापस लौट जाऊंगा । तुम्हे देखने का मन तो बहुत कर रहा है । मगर जानता हूं तुम पर अब मेरा कोई अधिकार नहीं है
अब तुम किसी और की पत्नी हो । और नहीं कोई आरज़ू …… फिर भी यदि तुम एक बार मिल सको तो अच्छा लगेगा ।
खत पढ़ते पढ़ते कबीर के साथ बीते लम्हे किसी चलचित्र की तरह निगाहों से गुजर गए । और बरसों से दबा दर्द का गुबार फट पड़ा ।
सत्रह बरसों का इंतजार जितना लम्बा न था शाम तक का इंतजार उससे कहीं ज्यादा लम्बा लगने लगा ।
शाम होते ही कुसुम के कदम बढ़ चले । जैसे ही उस जगह पर पहुंची दूर से ही कबीर नज़र आ गया एक पल के लिए तो पहचान ही न सकी उसे इन सत्रह सालों में काफी बदल चूका था । नहीं बदला था तो उसका अपने आप में मुस्कुराना ।
कुसुम ने बरसों पहले उससे कहा भी था ” तुम अपने आप से बातें करते हुए कैसे मुस्कुरा लेते हो ? मगर ये मुस्कुराहट ही तुम्हारे व्यक्तित्व को और आकर्षक बनाती है इसे कभी अपने आप से अलग न होने देना…. मेरी तरह। कुसुम ने सारा जोर” मेरी तरह” पर डालते हुए कहा था।
कबीर ने भी उसे दूर से ही देख लिया था नजरें तो उसी राह पर ही टिकी हुई थी जहां से कुसुम को आना था और तुरंत उठकर खड़ा हो गया ।
” कैसी हो कुसुम ” तुम बिल्कुल नहीं बदली आज भी वैसी ही हो सिर्फ बालों में थोड़ी चांदी आ गई है ….. तुमहार पति बच्चे व और लोग कैसे हैं ।
” बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम छोड़ कर गए थे “
कुसुम ने व्यंगात्मक लहजे में जवाब दिया ।
और क्या करता ….. तुम्हारे नाम के साथ मेरी बजाय कोई और नाम जुड़ने जा रहा था ….. कैसे देख पाता ….. मुझमें नहीं थी हिम्मत ये सब देखने की ….. इस लिए तुम्हारे पापा का जवाब ना सुनकर मैंने उसी दिन यह शहर छोड़ दिया। कबीर ने भी बातों में छिपे व्यंग को महसूस कर कहा ।
हां मैं जानती हूं पापा ने अपना फैसला सुना दिया था और मैंने सर झुका लिया था । मगर मैंने तो तुमसे ना नहीं की थी । कम से कम मेरी बात का तो इंतजार करते ।
मैंने उन्हें आखिरी दम तक मनाने की कोशिश की नहीं माने …. मगर मैंने अपनी जान देने की कोशिश की तो उन्हें मानना ही पड़ा ।और हमारी शादी के लिए मान गए फिर मैं भाग कर तुम्हारे घर आई …. तब तक तुम जा चुके थे । पापा ने बारात आने से पहले ही उनसे माफी मांग कर मना कर दिया ।
तो क्या तुम्हारी शादी नहीं हुई कबीर ने आश्चर्य और खुशी से पुछा ।
अब मंडप से तो मेरी शादी हो नहीं सकती थी जाहिर है नहीं हुई । कुसुम का दर्द आंखों से छलकने लगा ।
सच जानकर कबीर भी सर पकड़कर बैठ गया । कुसुम मेरी वजह से जिंदगी के सत्रह साल गंवा दिए वह तो मैं वापस नहीं कर सकता पर वादा करता हूं की उन बिछडे लम्हों का सारा प्यार तुम्हें लौटाने की कोशिश करुंगा क्या तुम अब भी मुझसे शादी करोगी ?
शिकवे शिकायत तो बहुत थी गुस्सा भी बहुत था फट पड़ने को भी तैयार थी मगर कबीर के एक ही वाक्य ने उन पर पानी फेर दिया ।
कबीर ने भी बाहें फैला दी और तन्हाई मिलन के आगोश में हमेशा के लिए समा गई ।
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© गौतम जैन ®

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