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एक बार चाणक्य का एक परिचित उनसे मिलने आया और बोला – क्या तुम जानते हो कि “मैंने तुम्हारे मित्र के बारे में क्या सुना है?”

चाणक्य ने उसे टोकते हुए कहा – “एक मिनट रुको।”
इसके पहले कि तुम मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताओ, उसके पहले मैं
तीन छलनी परीक्षण करना चाहता हूं।

मित्र ने कहा “तीन छलनी परीक्षण?”

चाणक्य ने कहा – “जी हां मैं इसे तीन छलनी परीक्षण इसलिए कहता हूं क्योंकि जो भी बात आप मुझसे कहेंगे, उसे तीन छलनी से गुजारने के बाद ही कहें।”

“पहली छलनी है “सत्य “।
क्या आप यह विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि जो बात आप मुझसे कहने जा रहे हैं, वह पूर्ण सत्य है?”

“व्यक्ति ने उत्तर दिया – “जी नहीं, दरअसल वह बात मैंने अभी-अभी किसी से सुनी है।”

चाणक्य बोले – “तो तुम्हें इस बारे में ठीक से कुछ नहीं पता है। “

“आओ अब दूसरी छलनी लगाकर देखते हैं।

दूसरी छलनी है “भलाई “।

क्या तुम मुझसे मेरे मित्र के बारे में कोई अच्छी बात कहने जा रहे हो?”

“जी नहीं, बल्कि मैं तो…… “

“तो तुम मुझे कोई बुरी बात बताने जा रहे थे लेकिन तुम्हें यह भी नहीं मालूम है कि यह बात सत्य है या नहीं।”- चाणक्य बोले।

“तुम एक और परीक्षण से गुजर सकते हो।

तीसरी छलनी है “उपयोगिता “।
क्या वह बात जो तुम मुझे बताने जा रहे हो, मेरे लिए उपयोगी है?”

“शायद नहीं…”
यह सुनकर चाणक्य ने कहा
“जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो, न तो वह सत्य है, न अच्छी और न ही उपयोगी। तो फिर ऐसी बात कहने का क्या फायदा?”

निष्कर्ष :—
“जब भी आप अपने परिचित, मित्र, सगे संबंधी, स्वजाति बन्धु के बारे में कुछ गलत बात सुने”,
ये तीन छलनी परीक्षण अवश्य करें।
कुछ सुनने से पहले सामने वाले की नियत को जरूर समझें

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संपूर्ण भारत वर्ष में कथावाचक के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके डोंगरेजी महाराज एकमात्र ऐसे कथावाचक थे जो दान का रूपया अपने पास नही रखते थे और न ही लेते थे।
जिस जगह कथा होती थी लाखों रुपये उसी नगर के किसी सामाजिक कार्य,धर्म व्यवस्था, जनसेवा के लिए दान कर दिया करते थे। उनके अन्तिम प्रवचन में गोरखपुर में कैंसर अस्पताल के लिये एक करोड़ रुपये उनके चौपाटी पर जमा हुए थे।

उनकी पत्नी आबू में रहती थीं। पत्नी की मृत्यु के पांचवें दिन उन्हें खबर लगी । बाद में वे अस्थियां लेकर गोदावरी में विसर्जित करने मुम्बई के सबसे बड़े धनाढ्य व्यक्ति रति भाई पटेल के साथ गये।
नासिक में डोंगरेजी ने रतिभाई से कहा कि रति हमारे पास तो कुछ है ही नही, और इनका अस्थि विसर्जन करना है। कुछ तो लगेगा ही क्या करें ?
फिर खुद ही बोले – “ऐसा करो कि इसका जो मंगलसूत्र एवं कर्णफूल हैं, इन्हे बेचकर जो रूपये मिले उन्हें अस्थि विसर्जन में लगा देते हैं।”

इस बात को अपने लोगों को बताते हुए कई बार रोते – रोते रति भाई ने कहा कि “जिस समय यह सुना हम जीवित कैसे रह गये, बस हमारा हार्ट फैल नही हुआ।”
हम आपसे कह नहीं सकते, कि हमारा क्या हाल था। जिन महाराजश्री के मात्र संकेत पर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, वह महापुरूष कह रहे हैं कि पत्नी के अस्थि विसर्जन के लिये पैसे नही हैं और हम खड़े-खड़े सुन रहे थे ? फूट-फूट कर रोने के अलावा एक भी शब्द मुहँ से नही निकल रहा था।

ऐसे वैराग्यवान और तपस्वी संत-महात्माओं के बल पर ही सनातन धर्म की प्रतिष्ठा बनी है।

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सभ्यता के नाम पर हमारे पास है क्या ?

बर्ट्रेंड रसेल पहली बार एक आदिवासी समाज में गया।
पूरे चांद की रात. और जब आदिवासी नाचने लगे और ढोल बजे और मंजीरे बजे तो रसेल के मन में उठा कि सभ्य आदमी ने कितना खो दिया है!
सभ्यता के नाम पर हमारे पास है क्या?
न ढोल बजते हैं, न मंजीरा बजता है,
न कोई नाचने की क्षमता रह गयी है;
पैर ही नाचना भूल गये हैं।
रसेल ने लिखा है कि उस रात पूरे चांद के नीचे,
वृक्षों के नीचे नाचते हुए आदिवासियों को देखकर मेरे मन में यह सवाल उठा कि हमने पाया क्या है प्रगति के नाम पर?
और उसने यह भी लिखा कि अगर लंदन में लौटकर मैं ट्रेफिलगर स्क्वायर में खड़े होकर नाचने लगा तो तत्क्षण पकड़ लिया जाऊंगा। लोग समझेंगे पागल हो गये।
लोग दुख को तो समझते हैं स्वास्थ्य। और आनंद को समझते हैं विक्षिप्तता। हालतें इतनी बिगड़ गयी
हैं कि इस दुनिया में केवल पागल ही हंसते हैं, बाकी
समझदारों को तो हंसने की फुर्सत कहां है?
समझदारों के हृदय तो सूख गये हैं।
समझदार रुपये गिनने में उलझे हैं।
समझदार महत्वाकांक्षा की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं।
समझदार तो कहते हैं दिल्ली चलो।
फुर्सत कहां है हंसने की,
दो गीत गाने की,
इकतारा बजाने की,
तारों के नीचे वृक्षों की छाया में नाचने की,
सूरज को देखने की,
फूलों से बात करने की,
वृक्षों को गले भेंटने की, फुर्सत किसे है?
ये तो आखिर की बातें हैं, जब सब पूरा हो जायेगा—धन होगा, पद होगा, प्रतिष्ठा होगी, तब बैठ लेंगे वृक्षों के नीचे। लेकिन यह दिन कभी आता नहीं, न कभी आया है, न कभी आयेगा। ऐसे जिंदगी तुम गुजार देते हो रोते—रोते, झींकते—झीकते। ऐसे ही आते हो ऐसे ही चले जाते हो—खाली हाथ आये, खाली हाथ गये।
तो अगर तुम्हें कभी भीतर का रस जन्मने लगे और भीतर स्वाद आने लगे.. और देर नहीं लगती आने में, जरा भीतर मुड़ो कि वहाँ सब मौजूद है…

ओशो – गीता दर्शन

Post – 1339/8839
(Random Collection of Osho’s Thoughts)❤

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मैंने सुना है…….

एक उत्तेजित और पागल रोमन, नंगी तलवार लिए हुए गांव में आया और पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को काट मार कर उसने प्रत्येक को आतंकित कर दिया। झेन मठ के द्वार पर पहुचते हुए उसने तलवार की मूठ से दरवाजा तोड़ दिया, और लम्बे—लम्बे डग भरता हुआ सद्गुरु के निकट आया, जो जाजेन ध्यान में शांत बैठा था, उसने अपनी तलवार ऊपर उठाई थिरता और मौन जैसी कोई चीज उस तक पहुंची। वह क्रोध से चीखते हुए बोला— ‘‘ क्या तुम्हें यह महसूस नहीं होता कि तुम्हारे सामने एक ऐसा व्यक्ति खडा हुआ है, जो बिना पलकें झपकाये ही तुम्हें दो टकड़ों में काट सकता है?‘‘

सद्गुरु ने शांति से उत्तर दिया— ‘‘ क्या तुझे यह अनुभव नहीं होता कि तेरे सामने एक ऐसा व्यक्ति बैठा हुआ है जो बिना पलक झपकाये दो टुकड़ों में कटने के लिए तैयार बैठा है। इसलिए आगे बढ़। मेरे मौन के कारण तू अपने को रोक मत। तू वही कर, जिसको तूने तय कर लिया है।‘‘ लेकिन उस पागल के अन्तर्तम में वह मौन प्रविष्ट हो गया, सद्गुरु की शांति और मौन ने उसके हृदय को स्पर्श कर लिया था, अब उसके लिए मारना असम्भव था।

इसलिए बस अपने हृदय के द्वार खुले रखो।

यदि तुम एक पागल भी हो और खुले हुए हो, तो भी तुम बुद्धत्व को पहचान लोगे, वह कहीं भी किसी भी रूप में प्रकट हुआ हो। और यदि तुम एक महान दार्शनिक बुद्धिजीवी और तर्कनिष्ठ भी हो, यदि तुम स्वयं को मौन और आनंद के मूल तत्व को ग्रहण करने की अनुमति नहीं देते हो, तो तुम चूक जाओगे। तुम्हें अपने को बहुत—बहुत खुला हुआ रखना होगा। तुम्हें स्वीकार भाव में रहना होगा। तुम्हें स्वीकार भाव में रहना होगा और तब बुद्धत्व का प्रमाण इतनी दृढ़ता से तुम तक आता है। यह इतना अधिक निश्चित है कि तुम प्रत्येक चीज से तो इंकार कर सकते हो, लेकिन तुम बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति से इंकार नहीं कर सकते—ऐसा करना असम्भव है। तुम इसे दूसरों को सिद्ध करने में, हो सकता है सफल न हो सको, क्योंकि यहां इसे सिद्ध करने का कोई उपाय नहीं है—

लेकिन तुम्हारे लिए तो यह अनुभूति स्थायी रूप से तुम्हारे अंतर्तम में उतर गई। और एक बार यह तुम्हारे अंतर्तम में उतर गई, एक बार तुम एक बुद्धपुरुष के सम्पर्क में आ गए तो एक सेतु निर्मित हो गया। अब तुम कभी भी पहले जैसे नहीं रह सकते। यह वास्तविक घटना ही कि तुम एक बुद्ध को पहचान सके, पर्याप्त है, और यह तुम्हारे बुद्धत्व की आधारशिला बन जायेगी। इतना पर्याप्त है कि यह तुमकी एक नई दिशा, एक नया अस्तित्व और एक नया जन्म दे गई।

ओशो

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हास्य रचना-अनर्थ हो गया
आंगन में बैठी सास ने बहू को सामने से मुस्कुराते और गुनगुनाते हुए आते देखा तो बोली,”बहू, आज गाना ही गाती रहोगी या चाय भी पिलाओगी?”
बहू-“आप, आप तो नहाने जा रही थी, मैंने तो बाल्टी में गरम पानी भी मिला दिया था।”
सास-“बहू, प्रकाश को ऑफिस जाने में देर हो रही थी इसलिए पहले वह नहाने चला गया। मैं उठ कर कमरे में चली गई, अभी अभी तो आंगन में आई हूं।”
अचानक बहू जोर से चीखी,”यह क्या हो गया, मां जी बहुत बड़ा अनर्थ हो गया।”ऐसा कहकर वह स्नान घर की तरफ भागी। सास भी बहू के पीछे पीछे भागी। स्नान घर का दरवाजा खुला हुआ था और वहां एक मेंढक उछल कूद कर रहा था।
बहू ने मेंढक को हाथों में उठा लिया और रोने लगी।
सास-“बहू, रो क्यों रही हो और इसे हाथों में क्यों उठाया है?”
बहू-मां जी, ये,वो,वो।
सास-वो,वो करती रहेगी या आगे भी कुछ बोलेगी।”
बहू-मां जी ,आप मुझे माफ कर देंगी ना।”
सास-“बता तो सही हुआ क्या है?”
बहू-मां जी, यह मेंढक नहीं है आपका बेटा है यानी कि मेरे वो।”
सास-“पागल हो गई है क्या, क्या बोल रही है?”
बहू-मांजी, दरअसल मैं आपकी टोका टोकी की आदत से बहुत परेशान हो गई थी। कल मैं एक बाबा जी के पास गई तो उन्होंने मुझे एक सफेद रंग का पाउडर दिया और आपके नहाने के पानी में मिलाने को कहा। उन्होंने कहा कि आप उस पानी से नहा कर मेंढकी बनकर टर्र टर्र करती हुई चली जाओगी। मैंने आपके लिए पानी में पाउडर मिलाया था और उससे मेरे पति ने नहा लिया और मेंढक बनकर कूद रहे हैं। “ऐसा कहकर बहू जोर जोर से रोने लगी
सास को विश्वास नहीं आया, कहने लगी,”माना कि तुम से गलती हुई है पर कभी इंसान भी मेंढक बन सकता है क्या?”
बहू,”आपके सामने ही तो है। “
सास-चल ,फिर जल्दी चल, बाबा के पास उससे मेंढक को वापस इंसान बनाने के बारे में पूछते हैं।”
दोनों झटपट बाबा जी के पास पहुंची और पूरी बात बताई।
बाबाजी स्वयं अपने चमत्कार पर मन ही मन हैरान हो रहे थे। सोच रहे थे नमक और मीठा सोडा मिलाकर दिया था, इतना बड़ा चमत्कार कैसे हो गया? दोनों कह रही हैं तो सच ही होगा। स्वयं को मन में शाबाशी देने लगे और उपाय पूछने पर बड़ा इतराते हुए बोले,”मेंढक को वापस इंसान बनाने की हमारी साधना अभी पूरी नहीं हुई है। थोड़ा समय और बहुत पैसा लगेगा, तब तक तुम इस मेंढक को संभाल कर रखो।”
दोनों बाबा के आगे बहुत गिड़गिड़ाई और बाबा को ₹500 देकर रोते-धोते शाम को घर वापस आ गई, मेंढक के साथ।
घर में कदम रखते ही प्रकाश की आवाज सुनाई दी। दोनों सास और बहू कमरे की तरफ भागी। देखा सामने सोफे पर प्रकाश बैठा अपने दोस्त सोहन से बातें कर रहा है।
दोनों -“आप/तू ठीक तो हो?/है”
प्रकाश-हां मैं तो ठीक हूं पर तुम दोनों कहां चली गई थी? पता भी है आज क्या हुआ? जब मैं नहाने गया था उसी समय बहुत जोर जोर से किसी के चीखने की आवाज आई, गिर गया गिर गया। मैं फटाफट कपड़े पहनकर गली में भागा तो देखा कि सोहन का बेटा सोनू पतंग उड़ाने के चक्कर में छत से गिर गया है। हम उसे तुरंत अस्पताल ले गए, सुबह से शाम तक वही थे। अच्छा हुआ कि अब सोनू खतरे से बाहर है। इसीलिए मैंने सोहन को चाय पीने के लिए यहां बुला लिया।”
दोनों सास बहू एक दूसरे को देख रही थी और सोहन के जाने के बाद प्रकाश को पूरी बात बताई। पहले तो प्रकाश हंसते हंसते लोटपोट हो गया और फिर बाद में अपनी पत्नी को बहुत डांटा।
सब मिलकर बाबा जी के पास गए और लोगों को धोखा देने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
गीता वाधवानी दिल्ली

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गंभीर मजाक 😜

मैं सरकारी अस्पताल में किसी के साथ कुछ टेस्ट करवाने गया-
फुरसत मिलने पर उधर मौजूद कैंन्टीन से समोसा और जूस खरीदा और मज़े से वहीं खड़े खड़े खाना पीना शुरू कर दिया-

ऐन उसी वक़्त मेरी नज़र कुर्सी पर बैठे एक छोटे बच्चे पर पड़ी जो बड़ी हसरत से मुझे ही देख रहा था- मैंने इंसानी हमदर्दी में जल्दी से उस बच्चे के लिए भी समोसा और जूस खरीदे जो बच्चे ने बिना ना किये ले लिए और जल्दी जल्दी खाने लगा।

बेचारा पता नहीं कब से भूखा होगा- ये सोचकर मैंने ऊपर वाले का शुक्र अदा किया जिसने मुझे एक भूखे को खाना खिलाने का मौका दिया।

इतनी देर में उस बच्चे की मां, जो उसकी पर्ची बनवाने के लिए खिड़की पर खड़ी थी, वापस आई और बच्चे को समोसे का आखिरी टुकड़ा खाते देखा!!!
🧐
फिर अचानक पता नहीं उसे क्या हुआ कि वो दोनों हाथ उठा कर, जोर जोर से चिल्लाने लगी जिसने उसके बच्चे को ये चीज़ें दी उसे गालियां देने लगी ।

कह तो वो बहुत कुछ रही थी, मगर मैंने वहां से फरार होते हुए जो चंद बातें सुनीं वो ये थीं:-

कौन है वो “कमीना” जिसने मेरे बच्चे को समोसा खिला दिया, मैं 25 किलोमीटर दूर से किराया लगा कर उसके खाली पेट टेस्ट करवाने लाई थी” ।

😉😜🤪😁😀😆😄😝😂🤣
इसलिये दया करो मगर सोच समझकर । ।

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प्रेशर कुकर

शिखा सब्जी फल लेने मार्केट गयी थी, ख़रीददारी कर स्कूटी पर थैली टांग ही रही थी, तभी एक मोटर सायकिल वाले ने स्कूटी में टक्कर मार दी । स्कूटी सहित वह गिर पड़ी, पैर में जमकर चोट आई ।
दो तीन महिलाओं ने सहारा देकर उसे पास की एक दुकान में बिठा दिया। उसनें पति नीरज को कॉल कर बताया तो उसे लेने आया। हॉस्पिटल जाने पर पता चला उसके पैर में फ्रैक्चर आया है, उसे प्लास्टर चढ़ा दिया गया।
घर पहुँचने पर, उसे सहारा देकर बेड पर लिटाते हुए नीरज बोला, आज बहुत जरूरी मीटिंग थी, पर हॉस्पिटल में अच्छा खाँसा वक्त निकल गया। क्या जरूरत थी सब्जी लेने जानें की। रोज तो सब्जी का ठेला घूमता है मोहल्ले में। शिखा ने कोई जवाब ना दिया।
रात में सासू माँ ने कमरें में प्रवेश कर कहा, बहू आज तो मैंने खिचड़ी चढ़ा ली, पर कल सुबह की चाय नाश्ता, बच्चों का टिफिन, दिन और रात का खाना, मुझसे इतना कुछ तो ना हो पायेगा। तुम किसी मेड की व्यवस्था करो।जी माँ जी ,कहकर,उसनें पड़ोसन रीमा को कॉल किया। जैसे तैसे उसकी मेड सुबह आने को राजी हुई, शाम को आने से तो साफ इंकार कर दिया।
अगले दिन ही, घर की जैसे व्यवस्था ही लड़खड़ा गयी। मेड लेट आयी, बच्चों का समय पर टिफिन रेडी ना हो सका तो नीरज ने ब्रेड बटर रख दिया। सासू माँ पूजा करनें बैठी ,दूध उफ़न गया। बिना बोर्नविटा दूध पिये ही बच्चों को स्कूल जाना पड़ा। नीरज ऑफ़िस जाने में लेट हो गया । मेड ने खाना बनाया व शिखा को परोसा, सब्जी में मिर्च तेज थी , उसनें तो जैसे तैसे खा लिया। सासू माँ ने दूध रोटी खाई। बच्चों को सब्जी पसन्द नहीं आयी, दादी से मैगी बनवाकर खाई।
रात को सासू माँ ने फिर खिचड़ी बनाई। नीरज ने तो खा ली पर बच्चों ने हंगामा कर दिया, दादी रोज रोज खिचड़ी नहीं खा सकतें। “पापा आप होटल से मंगवा दो कुछ”
नीरज ने सख्ती से कहा , “जो बना है चुपचाप खाओ” तो बच्चों ने चुपचाप खिचड़ी खा ली।
अगले दिन मेड को शिखा ने समझाया, मिर्च मसाले हिसाब से डालना ,तो उसनें एकदम फ़ीकी सब्जी बना दी। किसी को पसंद नहीं आयी । पर मजबूरी में सब चुप रहे। बच्चों की यूनिफॉर्म प्रेस नहीं हुई, बेटे आरव को टाई नहीं मिली, सासू माँ को कुछ सामान मिलता तो कुछ ना मिलता, वे अपनीं बी पी की दवा खाना भूल गई।
बेटा आरव शिखा से झुँझलाते हुए कहनें लगा, “मम्मी आप स्कूटी से मार्केट क्यों गयीं,ऑटो से चली जातीं “
“हाँ न मम्मी, देखो कितना परेशान हो रहे हम” बिटिया ने कहा। तभी नीरज बोल पड़ा, ताजी सब्जियों व फल का तुम्हारी मम्मी को शौक जो ठहरा , जबकि मोहल्ले में रोज ठेले घूमते रहते है…
शिखा की डबडबाई आँख से आँसू बहने लगे….खीझती हुई बोली, ताजी सब्जियाँ ,फल क्या सिर्फ मैं खाती हूँ ?
स्कूटी से तो अक्सर ही जाती हूँ, किसी ने टक्कर मार दी, तो उसमें मेर क्या कसूर ??
तुम फुटबॉल खेलतें हुये गिरे, तब तो मैने तो कुछ ना कहा, उल्टा तुम्हारी ख़िदमत में जुटी रही।
रोज मशीन की तरह सुबह से शाम तक खटती रहतीं हूँ ,चाहे बीमार रहूँ कभी उफ्फ ना किया और अब दो तीन दिन में ही मानों भूचाल आ गया…?
किसी ने एक बार भी पास आकर पूछा, तबियत कैसी है? तकलीफ़ तो नहीं हो रही? कुछ मदद चाहिए?? इतनें मतलबी कैसे हो सकतें हैं आप लोग??

प्रेशर कुकर में अब पूरी तरह उबाल आ चुका था…
शिखा जैसे मन का सारा गुबार निकाल देना चाहती थी….

बच्चों की आँखे छलकनें लगीं, सॉरी मम्मी कहकर वे सुबकनें लगें….नीरज भी चुपचाप ज़मीन को ताँकता रहा…. सासू माँ तो कमरें से कब नदारत हुई पता ही ना चला….

— सपना शिवाले सोलंकी ✍️

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÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷{सत्रह साल}÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
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कैसी हो कुसुम ? सत्रह बरस व्यतीत हो गए तुमसे बिछड़ कर …… आखरी बार तुम्हें दुल्हन के रुप में देखा था । तुम्हे किसी और की दुल्हन बनते देखने की हिम्मत नहीं थी मुझमें और यह शहर ही छोड़ कर चला गया था । काफी समय पश्चात आज ही वापस लौट कर आया हूं ।
आज शाम नदी किनारे उसी मंदिर के पास जहां हम हमेशा मिला करते थे जाऊंगा उन्हीं पुरानी यादों से मिलने। और कल ही वापस लौट जाऊंगा । तुम्हे देखने का मन तो बहुत कर रहा है । मगर जानता हूं तुम पर अब मेरा कोई अधिकार नहीं है
अब तुम किसी और की पत्नी हो । और नहीं कोई आरज़ू …… फिर भी यदि तुम एक बार मिल सको तो अच्छा लगेगा ।
खत पढ़ते पढ़ते कबीर के साथ बीते लम्हे किसी चलचित्र की तरह निगाहों से गुजर गए । और बरसों से दबा दर्द का गुबार फट पड़ा ।
सत्रह बरसों का इंतजार जितना लम्बा न था शाम तक का इंतजार उससे कहीं ज्यादा लम्बा लगने लगा ।
शाम होते ही कुसुम के कदम बढ़ चले । जैसे ही उस जगह पर पहुंची दूर से ही कबीर नज़र आ गया एक पल के लिए तो पहचान ही न सकी उसे इन सत्रह सालों में काफी बदल चूका था । नहीं बदला था तो उसका अपने आप में मुस्कुराना ।
कुसुम ने बरसों पहले उससे कहा भी था ” तुम अपने आप से बातें करते हुए कैसे मुस्कुरा लेते हो ? मगर ये मुस्कुराहट ही तुम्हारे व्यक्तित्व को और आकर्षक बनाती है इसे कभी अपने आप से अलग न होने देना…. मेरी तरह। कुसुम ने सारा जोर” मेरी तरह” पर डालते हुए कहा था।
कबीर ने भी उसे दूर से ही देख लिया था नजरें तो उसी राह पर ही टिकी हुई थी जहां से कुसुम को आना था और तुरंत उठकर खड़ा हो गया ।
” कैसी हो कुसुम ” तुम बिल्कुल नहीं बदली आज भी वैसी ही हो सिर्फ बालों में थोड़ी चांदी आ गई है ….. तुमहार पति बच्चे व और लोग कैसे हैं ।
” बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम छोड़ कर गए थे “
कुसुम ने व्यंगात्मक लहजे में जवाब दिया ।
और क्या करता ….. तुम्हारे नाम के साथ मेरी बजाय कोई और नाम जुड़ने जा रहा था ….. कैसे देख पाता ….. मुझमें नहीं थी हिम्मत ये सब देखने की ….. इस लिए तुम्हारे पापा का जवाब ना सुनकर मैंने उसी दिन यह शहर छोड़ दिया। कबीर ने भी बातों में छिपे व्यंग को महसूस कर कहा ।
हां मैं जानती हूं पापा ने अपना फैसला सुना दिया था और मैंने सर झुका लिया था । मगर मैंने तो तुमसे ना नहीं की थी । कम से कम मेरी बात का तो इंतजार करते ।
मैंने उन्हें आखिरी दम तक मनाने की कोशिश की नहीं माने …. मगर मैंने अपनी जान देने की कोशिश की तो उन्हें मानना ही पड़ा ।और हमारी शादी के लिए मान गए फिर मैं भाग कर तुम्हारे घर आई …. तब तक तुम जा चुके थे । पापा ने बारात आने से पहले ही उनसे माफी मांग कर मना कर दिया ।
तो क्या तुम्हारी शादी नहीं हुई कबीर ने आश्चर्य और खुशी से पुछा ।
अब मंडप से तो मेरी शादी हो नहीं सकती थी जाहिर है नहीं हुई । कुसुम का दर्द आंखों से छलकने लगा ।
सच जानकर कबीर भी सर पकड़कर बैठ गया । कुसुम मेरी वजह से जिंदगी के सत्रह साल गंवा दिए वह तो मैं वापस नहीं कर सकता पर वादा करता हूं की उन बिछडे लम्हों का सारा प्यार तुम्हें लौटाने की कोशिश करुंगा क्या तुम अब भी मुझसे शादी करोगी ?
शिकवे शिकायत तो बहुत थी गुस्सा भी बहुत था फट पड़ने को भी तैयार थी मगर कबीर के एक ही वाक्य ने उन पर पानी फेर दिया ।
कबीर ने भी बाहें फैला दी और तन्हाई मिलन के आगोश में हमेशा के लिए समा गई ।
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© गौतम जैन ®

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क्या मंदी इसे ही कहा जा रहा है ?

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एक छोटे से शहर मे एक बहुत ही मश्हूर बनवारी लाल सामोसे बेचने वाला था। वो ठेला लगाकर रोज दिन में 500 समोसे खट्टी मीठी चटनी के साथ बेचता था रोज नया तेल इस्तमाल करता था और कभी अगर समोसे बच जाते तो उनको कुत्तो को खिला देता। बासी समोसे या चटनी का प्रयोग बिलकुल नहीं करता था, उसकी चटनी भी ग्राहकों को बहुत पसंद थी जिससे समोसों का स्वाद और बढ़ जाता था। कुल मिलाकर उसकी क्वालिटी और सर्विस बहुत ही बढ़िया थी।

उसका लड़का अभी अभी शहर से अपनी MBA की पढाई पूरी करके आया था।

          एक दिन लड़का बोला पापा मैंने न्यूज़ में सुना है मंदी आने वाली है, हमे अपने लिए कुछ cost cutting करके कुछ पैसे बचाने चाहिए, उस पैसे को हम मंदी के समय इस्तेमाल करेंगे।

समोसे वाला: बेटा में अनपढ़ आदमी हु मुझे ये cost cutting wost cutting नहीं आता ना मुझसे ये सब होगा, बेटा तुझे पढ़ाया लिखाया है अब ये सब तू ही सम्भाल।

बेटा: ठीक है पिताजी आप रोज रोज ये जो फ्रेश तेल इस्तमाल करते हो इसको हम 80% फ्रेश और 20% पिछले दिन का जला हुआ तेल इस्तेमाल करेंगे।

अगले दिन समोसों का टेस्ट हल्का सा चेंज था पर फिर भी उसके 500 समोसे बिक गए और शाम को बेटा बोलता है देखा पापा हमने आज 20% तेल के पैसे बचा लिए और बोला पापा इसे कहते है COST CUTTING।

समोसे वाला: बेटा मुझ अनपढ़ से ये सब नहीं होता ये तो सब तेरे पढाई लिखाई का कमाल है।

लड़का:पापा वो सब तो ठीक है पर अभी और पैसे बचाने चाहिए। कल से हम खट्टी चटनी नहीं देंगे और जले तेल की मात्रा 30% प्रयोग में लेंगे।

अगले दिन उसके 400 समोसे बिक गए और स्वाद बदल जाने के कारन 100 समोसे नहीं बिके जो उसने जानवरो और कुत्तो को खिला दिए।

लड़का: देखा पापा मैंने बोला था ना मंदी आने वाली है आज सिर्फ 400 समोसे ही बिके हैं।

समोसे वाला: बेटा अब तुझे पढ़ाने लिखाने का कुछ फायदा मुझे होना ही चाहिए। अब आगे भी मंदी के दौर से तू ही बचा।

लड़का: पापा कल से हम मीठी चटनी भी नहीं देंगे और जले तेल की मात्रा हम 40% इस्तेमाल करेंगे और समोसे भी कल से 400 हीे बनाएंगे।

अगले दिन उसके 400 समोसे बिक गए पर सभी ग्राहकों को समोसे का स्वाद कुछ अजीब सा लगा और चटनी ना मिलने की वजह से स्वाद और बिगड़ा हुआ लगा।

शाम को लड़का अपने पिता से: देखा पापा, आज हमे 40% तेल , चटनी और 100 समोसे के पैसे बचा लिए। पापा इसे कहते है cost कटाई और कल से जले तेल की मात्रा 50% करदो और साथ में टिशू पेपर देना भी बंद करदो।

अगले दिन समोसों का स्वाद कुछ और बदल गया और उसके 300 समोसे ही बीके।

शाम को लड़का अपने पिता से: पापा बोला था ना आपको की मंदी आने वाली है।

समोसे वाला: हा बेटा तू सही कहता है मंदी आगई है अब तू आगे देख क्या करना है कैसे इस मंदी से लड़ें।

लड़का : पापा एक काम करते हैं, कल 200 समोसे ही बनाएंगे और जो आज 100 समोसे बचे है कल उन्ही को दोबारा तल कर मिलाकर बेचेंगे।

अगले दिन समोसों का स्वाद और बिगड़ गया, कुछ ग्राहकों ने समोसे खाते वक़्त बनवारी लाल को बोला भी और कुछ चुप चाप खाकर चले गए। आज उसके 100 समोसे ही बिके और 100 बच गए।

शाम को लड़का बनवारी लाल से: पापा देखा मैंने बोला था आपको और ज्यादा मंदी आएगी। अब देखो कितनी मंदी आगई है।

समोसे वाला: हाँ, बेटा तू सही बोलता है तू पढ़ा लिखा है समझदार है। अब् आगे कैसे करेगा?

लड़का: पापा कल हम आज के बचे हुए 100 समोसे दोबारा तल कर बेचेंगे और नए समोसे नहीं बनाएंगे।
अगले दिन उसके 50 समोसे ही बीके और 50 बच गए। ग्राहकों को समोसा का स्वाद बेहद ही ख़राब लगा और मन ही मन सोचने लगे बनवारी लाल आजकल कितने बेकार समोसे बनाने लगा है और चटनी भी नहीं देता कल से किसी और दुकान पर जाएंगे।

शाम को लड़का बोला, पापा देखा मंदी आज हमनें 50 समोसों के पैसे बचा लिए। अब कल फिर से 50 बचे हुए समोसे दोबारा तल कर गरम करके बचेंगे।

अगले दिन उसकी दुकान पर शाम तक एक भी ग्राहक नहीं आया और बेटा बोला देखा पापा मैंने बोला था आपको और मंदी आएगी और देखो आज एक भी ग्राहक नहीं आया और हमने आज भी 50 समोसे के पैसा बचा लिए। इसे कहते है Cost Cutting।

बनवारी लाल समोसे वाला : बेटा खुदा का शुक्र है तू पढ़ लिख लिया वरना इस मंदी का मुझ अनपढ़ को क्या पता की cost cutting क्या होता है।

और अब एक बात और सुन…..

बेटा : क्या…..????

बनवारी लाल समोसे वाला : कल से चुपचाप बर्तन धोने बैठ जाना यहाँ पर…… मंदी को मैं खुद देख लुंगा…..

माल की गुणवत्ता से खिलवाड़ करोगे तो भयानक और स्थाई मंदी की चपेट में चले जाओगे
जहां गुणवत्ता ,आज भी बरकरार है वहां कोई मंदी, आज भी नही है💐

ऐसी Cost Cutting वाले ही आजकल मंदी का रोना ज्यादा रो रहे हैं
मंदी, लालची मन की over smart ness में है
Cost Cutting My Foot

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार की बात है रमन ने राज का बड़ी बेदर्दी के साथ कत्ल कर दिया। जिस वक्त वह कत्ल कर रहा था उसे एहसास भी न था कि कोई उसे देख रहा है। रघु ने छिपकर इस सारी वारदात को देखा। रघु कालेज में पढ़ने वाला एक साधारण लड़का था। वह देख कर समझ ही नहीं पाया कि वह कैसे इस गुनाह को दुनिया और पुलिस के सामने लाए। वह बहुत डर गया था। कई दिन वह बहुत सहमा-सा रहा लेकिन वक्त ऐसा मरहम है जो हर जख्म को भर देता है। रघु भी कुछ समय बाद इस बात को ऐसे भूल गया जैसे कुछ हुआ ही न हो।

कई सालों तक राज के कत्ल का केस कोर्ट में चलता रहा। रमन का समाज में अच्छा प्रभाव था। बड़े-बड़े लोगों से उसका उठना-बैठना था तो उसने अपने आप को बड़ी सरलता से इस केस से दूर कर लिया लेकिन पुलिस पर दबाव आने लगा और इस केस को सुलझाना जरूरी हो गया। फिर क्या था, एक व्यक्ति जिसका नाम अमन था, उसे इस कत्ल का जिम्मेदार बना दिया गया। सारे सबूत भी अमन के ही खिलाफ बना दिए गए और कोर्ट में पेश कर दिए गए। अमन को सजा मिलनी तय थी। जिस दिन अमन को सजा मिलनी थी उस दिन उस कोर्ट में नए जज का तबादला हुआ था। जब केस जज के सामने रखा गया तो सारी दलीलें और सबूत देखने-सुनने के बाद जज ने अमन को कुछ देर के लिए अपने कैबिन में मिलने के लिए बुलाया।

यह जज और कोई नहीं, रघु ही था जो राज के कत्ल का एकमात्र चश्मदीद गवाह था लेकिन उस केस का जज होने के कारण उसकी गवाही मान्य नहीं थी। रघु यह बात बिल्कुल सहन नहीं कर पा रहा था कि उसे एक निर्दोष को सजा सुनानी पड़ेगी। रघु ने अमन को अपने कैबिन में बिठाकर कहा, ‘‘मुझे पता है कि तुमने यह कत्ल नहीं किया है लेकिन सभी सबूतों में ये तुम्हारा गुनाह स्पष्ट प्रतीत हो रहा है। क्या मैं जान सकता हूं कि तुमने कभी कोई ऐसा संगीन जुर्म किया है जिसकी तुम्हें आज तक सजा नहीं मिली।’’

अमन भावुक हो गया और उसने बताया कि कुछ वर्ष पहले गुस्से में उसने एक व्यक्ति का खून कर दिया था, जिसका आज तक किसी को नहीं पता। तब रघु ने कोर्ट में वापसी की और अमन को उसके गुनाह की इस गुनाह के माध्यम से सजा सुनाई। उसे 7 वर्ष की कैद हो गई। अब रघु निश्चिंत था कि उसने कोई गलत निर्णय नहीं किया। अब रघु ने रमन की तलाश शुरू कर दी जिसने राज को मारा था क्योंकि रमन का समाज में अच्छा नाम था तो उसे ढूंढने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। गुप्त सूत्रों से पता चला कि उसे कई साल पहले कैंसर की बीमारी हो गई थी और अब तक वह दिन-रात उस बीमारी से जूझ रहा है। मौत एक बार पीड़ा देकर प्राण हर लेती है लेकिन उसकी इतनी बुरी हालत है कि वह हर रोज मौत के लिए प्रार्थना कर रहा है।

रघु एक जज था और वह भगवान के सच्चे निर्णय से बहुत प्रभावित हुआ। भगवान द्वारा एक ही जैसा जुर्म करने वालों को अलग-अलग सजा दी गई। रमन को हर दिन जान लेने वाली बीमारी और अमन को 7 वर्ष की कैद क्योंकि भगवान हर प्राणी के एक-एक कर्म का हिसाब रखता है। भगवान हर प्राणी को उसके कर्मों के हिसाब से निर्णय देता है। सबसे बड़ी अदालत उस ईश्वर की है जहां से कभी भी कोई नहीं बच सकता। भगवान के यहां देर है लेकिन अंधेर नहीं। हमें अपने अच्छे कर्मों का ईनाम और बुरे कर्मों की सजा इसी जीवन में मिलती है।

जयश्रीराम