Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક બીઝનેસમેન ઘણો દેવામાં ડૂબી ગયો અને બહાર આવવાનો કોઈ રસ્તો નહોતો મળતો. જે લોકો તેમને ક્રેડીટ આપતા હતા તે લોકોએ ક્રેડીટ આપવાનું બંધ કરી દીધું હતું. અને સપ્લાયરોએ કડક ઉઘરાણી ચાલુ કરી દીધી હતી.
લેણિયાતોની રોજરોજની ઉઘરાણીથી કંટાળીને તે એક દિવસ બગીચામાં એક બેંચ પર બેઠો હતો અને વિચારતો હતો કે કઈ વસ્તુથી પોતે દેવાળિયો થતા બચે અને પોતાની કંપનીને ફડચામાં જતી રોકે.
અચાનક એક વૃદ્ધ આદમી તેની સામે દ્રશ્યમાન થયો.
“હું જોઈ શકું છું કે તું ખૂબ જ ચિંતા માં ડૂબેલો છે.” વૃદ્ધ માણસે કહ્યું.
બીઝનેસમેન ની આપવીતી સંભાળીને વૃદ્ધ માણસે કહ્યું “હું તને મદદ કરી શકું છું.”
તેમણે તે બીઝનેસમેનનું નામ પૂછ્યું અને એક ચેક લખી આપ્યો અને બીઝ્નેસમેનના હાથમાં આપતા કહ્યું: “આ ચેક રાખ, અને બરાબર આજથી એક વર્ષ પછી અહી જ મને મળજે અને ત્યારે તું આ રકમ મને પાછી આપી શકે છે.” આમ કહી ને વૃદ્ધ માણસ જતો રહ્યો.
બિઝનેસમેને તે ચેક જોયો, તે ચેક $500000 નો હતો અને સાઈન કરેલી હતી John D. Rockefeller (કે જે દુનિયાનો સૌથી ધનાઢ્ય ગણાતા વ્યક્તિઓમાનો એક હતો )ના નામે.
બિઝનેસમેને વિચાર્યું કે હું મારી બધી નાણાકીય ચિંતા નો એક મિનીટમાં સફાયો કરી શકું તેમ છું.
પરંતુ તે બિઝનેસમેને તેમ ન કરતા તેણે તે ચેક વટાવ્યા વગર કોઈ સલામત જગ્યાએ મૂકી રાખવાનો વિચાર કર્યો. તે જાણતો હતો કે આ ચેક ની મદદથી તે ગમે ત્યારે તેની કંપનીને ફડચામાં જતી બચાવી શકે એમ છે.
નવાજ આત્મવિશ્વાસ સાથે તે વધારે સારી બીઝનેસ ડિલ વધારે મુદતની પેમેન્ટ ટર્મ્સ થી કરવા લાગ્યો. અને થોડા મોટા સોદો પડ્યા. અને થોડા જ મહિનાઓમાં તે દેવામાંથી બહાર આવી ગયો અને તેની કંપની નફો કરતી થઇ.
એક વર્ષ પછી નક્કી કરેલા સમયે તે ફરી તે જ બગીચામાં સાચવી રાખેલા ચેક સાથે આવી પહોચ્યો અને તે જ બેંચ પર જઈને બેઠો.
થોડા જ સમયમાં તે વૃદ્ધ માણસ પણ ત્યાં આવી પહોચ્યા. પરંતુ જ્યાં એ બીઝનેસમેન તેમને ચેક પાછો આપી અને પોતાની સફળતાની વાર્તા સંભળાવે તે પહેલા જ એક નર્સ દોડતી આવી અને તે વૃદ્ધ માણસને પકડી લીધા.
નર્સે બીઝનેસમેનને કહ્યું : ” આ વડીલે તમને હેરાન તો નથી કર્યા ને?, Thanks god ! તેઓ મળી ગયા. તેઓ માનસિક બીમાર છે અને ઘર માંથી ભાગી જાય છે અને લોકોને કહેતા ફરે છે કે તેઓ John D. Rockefeller છે.” આટલું કહીને નર્સ તે વૃદ્ધને ત્યાંથી લઈ ગઈ.
પરંતુ આ સંભાળીને પેલા બીઝ્નેસમેનનું માથું ફરી ગયું. તે અવાક થઇ ગયો. છેલ્લા એક વર્ષમાં તેણે જે જોખમી બીઝનેસ ડીલો કરી, જોખમી નિર્ણયો લીધા તે ફક્ત એ જ વિચારે કે કંઈપણ થાય તો તેની પાસે $500000નો ચેક છે.
પછી તેને વિચાર આવ્યો કે હકીકતમાં એ રકમ તેની પાસે ન હતી જે રકમથી તેની જીંદગી બદલાઈ ગઈ. તે ફક્ત તેનો નવો આત્મવિશ્વાસ જ હતો કે જેથી તેને જે જોઈતું હતું તે મેળવવાની શક્તિ મળી.

અડવો કડવો

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

17 अगस्त 1909 :
इंग्लैंड की पेंटोविल्ले जेल के बाहर वीर सावरकर एक 25 वर्ष के नवयुवक के शव को लेने की प्रतीक्षा कर रहे थे। फांसी पर लटकाने के बाद वह शव ब्रिटिश सरकार ने किसी को नहीं सौंपा था।
ये शव था महान क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा का..
एक धनी और सम्पन्न परिवार का वह बेटा जिसे उसके ब्रिटिश सरकार में कार्यरत सिविल सर्जन पिता ने इंग्लैंड पढ़ने भेजा था। पर क्रांति की ज्वाला ऐसी थी की वीर सावरकर के साथ मिलकर मदन लाल जी ने 1901 मे भारत पर अत्याचार कर के इंग्लैंड लौटे एक ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर कर्ज़न वाईली को सबक सिखने की सोची।
1 जुलाई 1909 को मदन लाल ढींगरा ने इंपेरियाल इंस्टीट्यूट इंग्लैंड में हो रही एक सभा में कर्ज़न वाईली को गोलियो से भून दिया, जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर के 17 अगस्त 1909 को फांसी दे दी।
मदन लाल में हौंसला और निडरता इतनी थी की जब अदालत में इन पर कार्रवाई हुई तो इन्होंने साफ कह दिया कि ब्रिटिश सरकार को कोई हक़ नहीं है मुझ पर मुकदमा चलाने का… जो ब्रिटिश सरकार भारत में लाखों बेगुनाह देशभक्तों को मार रही है और हर साल 10 करोड़ पाउंड भारत से इंग्लैंड ला रही है, उस सरकार के कानून को वो कुछ नहीं मानते, इसलिए इस कोर्ट में वो अपनी सफाई भी नहीं देंगे, जिसे जो करना है कर लो…”
और जब उन्हे मृत्यु दंड देने के लिए ले जाने लगे तो उन्होंने जज को शुक्रिया अदा करते हुए कहा था “शुक्रिया आपने मुझे मेरी मातृभूमि के लिए जान न्योछावर करने का मौका दिया”।
नमन है इस शूरवीर को।

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

मुंबई के पास एक स्थान है वसई जहाँ समुद्र किनारे पुर्तगालियो द्वारा बनवाया एक किला है,
इस किले पर पहुँचने के लिए आपको एक बस स्टॉप पर उतरना होता है जिसका नाम है चिमाजी अप्पा जंक्शन।

किसी भी स्थान के नाम के पीछे उस जगह का इतिहास छिपा होता है, यह बात थोड़ी जिज्ञासा पैदा करती है कि आखिर पुर्तगालियो के किले का चिमाजी अप्पा से क्या लेना देना होगा।

चिमाजी अप्पा एक ब्राह्मण, पेशवा बाजीराव के छोटे भाई और मराठा सेना के जनरल थे।
उत्सुकता में इस किले का इतिहास निकालना पड़ा और जो सच सामने आया उसने झकझोर कर रख दिया और सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर चिमाजी अप्पा जैसे महापुरुष इतिहास में कहाँ गुमनाम हो गए।

नेहरूजी पर दोषारोपण कर भी दिया जाए तो हिंदूवादियों ने भी इन्हें प्रसिद्धि दिलाने का क्या प्रयास किया??

भारत को गुलाम बनाने का सपना सबसे पहले पुर्तगालियो ने ही देखा था ये मुगलो से पहले भारत मे आ गए थे।
सन 1738 तक इन्होंने मुंबई और गोवा पर कब्जा कर लिया साथ ही एक अलग राष्ट्र की घोषणा कर दी।
उस समय मराठा साम्राज्य बेहद शक्तिशाली हो चुका था। ठीक एक साल पहले पेशवा बाजीराव दिल्ली और भोपाल में सारे रणबांकुरों को धूल चटाकर लौटे थे।

बाजीराव ने पुर्तगालियो को संदेश भेजा कि आप मुंबई और गोवा में व्यापार करें मगर ये दोनो मराठा साम्राज्य और भारत के अंग हैं इसलिए मुगलो की तरह आप भी हमारी अधीनता स्वीकार करें।
जब पुर्तगाली नही माने तो बाजीराव ने अपने छोटे भाई और मराठा जनरल श्री चिमाजी अप्पा को युद्ध का आदेश दिया।
चिमाजी अप्पा ने पहले गोवा पर हमला किया और वहाँ के चर्चो को तहस नहस कर दिया इससे पुर्तगालियो की आर्थिक कमर टूट गयी।
फिर वसई आये जहाँ ये किला है।

चिमाजी अप्पा ने 2 घंटे लगातार किले पर बमबारी की और पुर्तगालियो ने सफेद झंडा दिखाया, चिमाजी अप्पा ने किले पर मराठा ध्वज फहराया और पुर्तगालियो ने समझौता किया कि वे सिर्फ व्यापार करेंगे और अपने लाभ का एक चौथाई हिस्सा मराठा साम्राज्य को कर के रुप में देंगे।

चिमाजी अप्पा ने सारे हथियार, गोला, बारूद जब्त कर लिए।
इस युद्ध ने पुर्तगालियो की शक्ति का अंत कर दिया और भारत पर राज करने का सपना आखिर सपना ही बनकर रह गया।

हिन्दू धर्म मे यह बेहद दुर्लभ है कि किसी व्यक्ति को शस्त्र के साथ शास्त्र का भी ज्ञान हो, चिमाजी अप्पा उन्ही लोगो मे से एक थे।
वसई का किला खण्डहर हो चुका है कुछ सालो में शायद खत्म भी हो जाये मगर उस बस स्टॉप का नाम हमेशा भारत के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराता रहेगा कि एक भरतवंशी योद्धा इस जगह आया था जिसने मातृभूमि को पराधीनता में जकड़े जाने से पहले ही आज़ाद कर लिया और इतिहास में अमर हो गया।

नीचे किले में बनी चिमाजी अप्पा की मूर्ति है।
चिमाजी अप्पा अपनी विजयी मुद्रा में खड़े आज अपने अस्तित्व का युद्ध भी लड़ रहे है क्योकि राष्ट्रवादी व्यस्त है अपनी राजनीति में।।
✍🏻परख सक्सेना

कोलाचेल युद्ध में डचों को हराने वाले राजा मार्तण्ड वर्मा : इतिहास की पुस्तकों से गायब

डच वर्तमान नीदरलैंड (यूरोप) के निवासी हैं. भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से इन लोगों ने 1605 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी बनायीं और ये लोग केरल के मालाबार तट पर आ गए. ये लोग मसाले, काली मिर्च, शक्कर आदि का व्यापार करते थे.
धीरे धीरे इन लोगों ने श्रीलंका, केरल, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा और सूरत में अपना व्यवसाय फैला लिया. इनकी साम्राज्यवादी लालसा के कारण इन लोगों ने अनेक स्थानों पर किले बना लिए और सेना बनायीं. श्रीलंका और ट्रावनकोर इनका मुख्य गढ़ था. स्थानीय कमजोर राजाओं को हरा कर डच लोगों ने कोचीन और क्विलोन (quilon) पर कब्ज़ा कर लिया.
उन दिनों केरल छोटी छोटी रियासतों में बंटा हुआ था. मार्तण्ड वर्मा एक छोटी सी रियासत वेनाद का राजा था. दूरदर्शी मार्तण्ड वर्मा ने सोचा कि यदि मालाबार (केरल) को विदेशी शक्ति से बचाना है तो सबसे पहले केरल का एकीकरण करना होगा. उसने अत्तिंगल, क्विलोन (quilon) और कायामकुलम रियासतों को जीत कर अपने राज्य की सीमा बढाई.
अब उसकी नज़र ट्रावनकोर पर थी जिसके मित्र डच थे. श्रीलंका में स्थित डच गवर्नर इम्होफ्फ़ (Gustaaf Willem van Imhoff) ने मार्तण्ड वर्मा को पत्र लिख कर कायामकुलम पर राज करने पर अप्रसन्नता दर्शायी. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने जबाब दिया कि ‘राजाओं के काम में दखल देना तुम्हारा काम नहीं, तुम लोग सिर्फ व्यापारी हो और व्यापार करने तक ही सीमित रहो’.
कुछ समय बाद मार्तण्ड वर्मा ने ट्रावनकोर पर भी कब्ज़ा कर लिया. इस पर डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने कहा कि मार्तण्ड वर्मा ट्रावनकोर खाली कर दे वर्ना डचों से युद्ध करना पड़ेगा. मार्तण्ड वर्मा ने उत्तर दिया कि ‘अगर डच सेना मेरे राज्य में आई तो उसे पराजित किया जाएगा और मै यूरोप पर भी आक्रमण का विचार कर रहा हूँ’. [‘I would overcome any Dutch forces that were sent to my kingdom, going on to say that I am considering an invasion of Europe’- Koshy, M. O. (1989). The Dutch Power in Kerala, 1729-1758) ]
डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने पराजित ट्रावनकोर राजा की पुत्री स्वरूपम को ट्रावनकोर का शासक घोषित कर दिया. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने मालाबार में स्थित डचों के सारे किलों पर कब्ज़ा कर लिया.
अब डच गवर्नर इम्होफ्फ़ की आज्ञा से मार्तण्ड वर्मा पर आक्रमण करने श्रीलंका में स्थित और बंगाल, कोरमंडल, बर्मा से बुलाई गयी 50000 की विशाल डच जलसेना लेकर कमांडर दी-लेननोय कोलंबो से ट्रावनकोर की राजधानी पद्मनाभपुर के लिए चला. मार्तण्ड वर्मा ने अपनी वीर नायर जलसेना का नेतृत्व स्वयं किया और डच सेना को कन्याकुमारी के पास कोलाचेल के समुद्र में घेर लिया.
कई दिनों के भीषण समुद्री संग्राम के बाद 31 जुलाई 1741 को मार्तण्ड वर्मा की जीत हुई. इस युद्ध में लगभग 11000 डच सैनिक बंदी बनाये गए, शेष डच सैनिक युद्ध में हताहत हो गए.
डच कमांडर दी-लेननोय, उप कमांडर डोनादी तथा 24 डच जलसेना टुकड़ियों के कप्तानो को हिन्दुस्तानी सेना ने बंदी बना लिया और राजा मार्तण्ड वर्मा के सामने पेश किया. राजा ने जरा भी नरमी न दिखाते हुए उनको आजीवन कन्याकुमारी के पास उदयगिरी किले में कैदी बना कर रखा.
अपनी जान बचाने के लिए इनका गवर्नर इम्होफ्फ़ श्रीलंका से भाग गया. पकडे गए 11000 डच सैनिकों को नीदरलैंड जाने और कभी हिंदुस्तान न आने की शर्त पर वापस भेजा गया, जिसे नायर जलसेना की निगरानी में अदन तक भेजा गया, वहां से डच सैनिक यूरोप चले गए.
कुछ वर्षों बाद कमांडर दी-लेननोय और उप कमांडर डोनादी को राजा ने इस शर्त पर क्षमा किया कि वे आजीवन राजा के नौकर बने रहेंगे तथा उदयगिरी के किले में राजा के सैनिकों को प्रशिक्षण देंगे. इस तरह नायर सेना यूरोपियन युद्ध कला में निपुण हुई. उदयगिरी के किले में कमांडर दी-लेननोय की मृत्यु हुई, वहां आज भी उसकी कब्र है.
केरल और तमिलनाडु के बचे खुचे डचों को पकड़ कर राजा मार्तण्ड सिंह ने 1753 में उनको एक और संधि करने पर विवश किया जिसे मवेलिक्कारा की संधि कहा जाता है. इस संधि के अनुसार डचों को इंडोनेशिया से शक्कर लाने और काली मिर्च का व्यवसाय करने की इजाजत दी जायेगी और बदले में डच लोग राजा को यूरोप से उन्नत किस्म के हथियार और गोला बारूद ला कर देंगे.
राजा ने कोलाचेल में विजय स्तम्भ लगवाया और बाद में भारत सरकार ने वहां शिला पट्ट लगवाया.
मार्तण्ड वर्मा की इस विजय से डचों का भारी नुकसान हुआ और डच सैन्य शक्ति पूरी तरह से समाप्त हो गयी. श्रीलंका, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा एवं सूरत में डचो की ताकत क्षीण हो गयी.
राजा मार्तण्ड वर्मा ने छत्रपति शिवाजी से प्रेरणा लेकर अपनी सशक्त जल सेना बनायीं थी.
तिरुवनन्तपुरम का प्रसिद्द पद्मनाभस्वामी मंदिर राजा मार्तण्ड वर्मा ने बनवाया और अपनी सारी संपत्ति मंदिर को दान कर के स्वयं भगवान विष्णु के दास बन गए. इस मंदिर के 5 तहखाने खोले गए जिनमे बेशुमार संपत्ति मिली. छठा तहखाना खोले जाने पर अभी रोक लगी हुई है.
यह दुख की बात है कि महान राजा मार्तण्ड वर्मा और कोलाचेल के युद्ध को NCERT की इतिहास की पुस्तकों में कोई जगह न मिल सकी.
1757 में अपनी मृत्यु से पूर्व दूरदर्शी राजा मार्तण्ड वर्मा ने अपने पुत्र राजकुमार राम वर्मा को लिखा था – ‘जो मैंने डचों के साथ किया वही बंगाल के नवाब को अंग्रेजों के साथ करना चाहिए. उनको बंगाल की खाड़ी में युद्ध कर के पराजित करें, वर्ना एक दिन बंगाल और फिर पूरे हिंदुस्तान पर अंग्रेजो का कब्ज़ा हो जाएगा’.

छत्रपति संभाजी महाराज ने शस्त्र युक्त नौ जहाज का निर्माण किया यह कहना गलत नही होगा संभाजी महाराज नौ वैज्ञानिक तो थे ही साथ में शस्त्र विशेषज्ञ भी थे उन्हें ज्ञात था कौनसा नौके में कितने वजन का तोप ले जा सकता हैं ।
छत्रपति शिवाजी महाराज नौसेना के जनक थे केवल भारत ही नही अपितु पुरे विश्व को नौ सेना बनाने का विचार सूत्र दिया नौका को केवल वाहन रूप में इस्तेमाल किया जाता था शिवाजी महाराज प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने साधारण नौका को समंदर का रक्षक का रूप दे दिया शस्त्रयुक्त लड़ाकू जहाज बनाकर । शिवपुत्र संभाजी महाराज समंदर के अपराजय योद्धा थे समंदर की रास्ता उन्हें अपनी हथेलियों की लकीर जैसी मालूम थी , इसलिए पुर्तगालियों के पसीने छूटते थे संभाजी महाराज के नाम से केवल।

पुर्तगाली साथ युद्ध-:
‘छत्रपति संभाजी महाराजने गोवामें पुर्तगालियों से किया युद्ध राजनीतिक के साथ ही धार्मिक भी था । हिंदुओं का धर्मांतरण करना तथा धर्मांतरित न होनेवालों को जीवित जलाने की शृंखला चलानेवाले पुर्तगाली पादरियों के ऊपरी वस्त्र उतार कर तथा दोनों हाथ पीछे बांधकर संभाजी महाराज ने गांव में उनका जुलूस निकाला ।’ – प्रा. श.श्री. पुराणिक (ग्रंथ : ‘मराठ्यांचे स्वातंत्र्यसमर (अर्थात् मराठोंका स्वतंत्रतासंग्राम’ डपूर्वार्ध़) छत्रपति संभाजी महाराज अत्यंत क्रोधित हुए क्योंकि गोवा में पुर्तगाली हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन के साथ साथ मंदिरों को ध्वंश भी कर रहे थे। छत्रपति संभाजी महाराज द्वारा किये जा रहे हमले से अत्यंत भयभीत होगे थे जो पोर्तुगाली के लिखे चिट्ठी में दर्शाता हैं : “ संभाजी आजके सबसे पराक्रमी व्यक्ति हैं और हमें इस बात का अनुभव हैं” ।
यह रहा पोर्तुगाली इसाई कसाइयों द्वारा लिखा हुआ शब्द-: (The Portuguese were very frightened of being assaulted by Sambhaji Maharaj, and this reflects in their letter to the British in which they wrote, ‘Now-a-days Sambhaji is the most powerful person and we have experienced it’. )

संभाजी महाराज गोवा की आज़ादी एवं हिन्दुओ के उप्पर हो रहे अत्याचारों का बदला लेने के लिए 7000 मावले इक्कट्ठा किया और पुर्तगालीयों पर आक्रमण कर दिया पुर्तगाली सेना जनरल अल्बर्टो फ्रांसिस के पैरो की ज़मीन खिसक गई महाराज संभाजी ने 50,000 पुर्तगालीयों सेना को मौत के घाट उतार दिया बचे हुए पुर्तगाली अपने सामान उठाकर चर्च में जाकर प्रार्थना करने लगे और कोई चमत्कार होने का इंतेज़ार कर रहे थे संभाजी महाराज के डर से समस्त पुर्तगाली लूटेरे पंजिम बंदरगाह से 500 जहाजों पर संभाजी महाराज के तलवारों से बच कर कायर 25000 से अधिक पुर्तगाली लूटेरे वापस पुर्तगाल भागे ।

संभाजी महाराज ने पुरे गोवा का शुद्धिकरण करवाया एवं ईसाइयत धर्म में परिवर्तित हुए हिंदुओं को हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया ।

पुर्तगाली सेना के एक सैनिक मोंटिरो अफोंसो वापस पुर्तगाल जाकर किताब लिखा (Drogas da India) लिखता हैं संभाजी महाराज को हराना किसी पहाड़ को तोड़ने से ज्यादा मुश्किल था महाराज संभाजी के आक्रमण करने की पद्धति के बारे में से ब्रिटिश साम्राज्य तक भयभीत होगया गया था अंग्रेजो और हम (पुर्तगाल) समझ गए थे भारत को गुलाम बनाने का सपना अधुरा रह जायेगा।
संभाजी महाराज की युद्धनिति थी अगर दुश्मनों की संख्या ज्यादा हो या उनके घर में घुसकर युद्ध करना हो तो घात लगा कर वार करना चाहिए जिसे आज भी विश्व के हर सेना इस्तेमाल करती हैं जिसे कहते हैं Ambush War Technic। पुर्तगाल के सैनिक कप्तान अफोंसो कहता हैं संभाजी महाराज के इस युद्ध निति की कहर पुर्तगाल तक फैल गई थी संभाजी महाराज की आक्रमण करने का वक़्त होता था रात के ८ से ९ बजे के बीच और जब यह जान बचाकर पुर्तगाल भागे तब वहा भी कोई भी पुर्तगाली लूटेरा इस ८ से ९ बजे के बीच घर से नहीं निकलता था in लूटेरो को महाराज संभाजी ने तलवार की वह स्वाद चखाई थी जिससे यह अपने देश में भी डर से बहार नहीं निकलते थे घर के ।

हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया गया :
हम सभी जानते हैं छत्रपति शिवाजी महाराज के निकट साथी, सेनापति नेताजी पालकर जब औरंगजेब के हाथ लगे और उसने उनका जबरन धर्म परिवर्तन कर उसका नाम मोहम्मद कुलि खान रख दिया । शिवाजी महाराज ने मुसलमान बने नेताजी पालकर को ब्राम्हणों की सहायता से पुनः हिन्दू बनाया और उनको हिन्दू धर्म में शामिल कर उनको प्रतिष्ठित किया।
हालांकि, यह ध्यान देने की बात हैं संभाजी महाराज ने हिंदुओं के लिए अपने प्रांत में एक अलग विभाग स्थापित किया था जिसका नाम रखा गया ‘पुनः परिवर्तन समारोह’ दुसरे धर्म में परिवर्तित होगये हिन्दुओ के लिए इस समारोह का आयोजन किया गया था ।
हर्षुल नामक गाँव में कुलकर्णी ब्राह्मण रहता था संभाजी महाराज पर लिखे इतिहास में इस वाकया का उल्लेख हैं कुलकर्णी नामक ब्राह्मण को ज़बरन इस्लाम में परिवर्तित किया था मुगल सरदारों ने कुलकर्णी मुगल सरदारों की कैद से रिहा होते ही संभाजी महाराज के पास आकर उन्होंने अपनी पुन: हिन्दू धर्म अपनाने की इच्छा जताई संभाजी महाराज ने तुरंत ‘पुनः धर्म परिवर्तन समारोह का योजन करवाया और हिन्दू धर्म पुनःपरिवर्तित किया ।
✍🏻मनीषा सिंह

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આજે ટોપ 10 ધનાઢ્ય પેઢીઓમાં અંબાણી કે અદાણીના નામ આવવા એ કઈ નવી વાત નથી.

અંબાણી ( વૈષ્ણવ ) અને અદાણી (જૈન ) સિવાય 1650-1690 ના વર્ષોમાં આવી જ એક જૈન-વૈષ્ણવ ઉદ્યોગપતિઓ હતા જેઓના નામ હતા.

ભીમજી પારેખ ( વૈષ્ણવ ) , વિરજી વોહરા ( જૈન ) અને શાંતિદાસ ઝવેરી ( જૈન ). સોળમી સદીમાં આ ત્રણ ઉદ્યોગપતિઓ દુનિયાના સૌથી ધનાઢ્ય વ્યક્તિઓમાં શામેલ હતા. આ ત્રણ ઉદ્યોગપતિઓ પાસેથી તે સમયે બ્રિટિશરો અને પોર્ટુગીઝ કંપનીઓ વ્યાજે ઉધાર લઈ જતાં અને તેઓના જહાજો વાપરતા.

જ્યારે ઔરંગઝેબના સમયમાં સુરતના વેપારીઓ ઉપર જેહાદી જાનવરોએ દમન ગુજાર્યો અને સુરતના બંદરો ઉપર ઈસ્લામિક નીતિ મુજબ રાજ ચલાવવામાં આવ્યું.

કનૈયાલાલ મુન્શી એ એવો પણ દાવો કર્યો હતો કે ભીમજી પારેખના શિવાજી સાથે ખૂબ સારા સંબંધો હતા અને ભારતનું પ્રથમ પ્રિન્ટિંગ પ્રેસ તેઓએ શિવાજી સાથે મળીને શરૂ કર્યું હતું અને તેનો મુખ્ય આશય હિન્દુ શાસ્ત્રોને કાગળ સ્વરૂપે છાપવાનો હતો કેમકે પોર્ટુગીઝ દ્વારા બાઇબલ ગોવામાં છપાવી અને લોકોમાં વહેંચવાની શરૂઆત કરી દેવામા આવી હતી . પરંતુ ભીમજી પારેખનું પ્રિન્ટિંગ પ્રેસનું કામ આગળ જતાં પડી ભાંગ્યું.

જેના થકી જેહાદીઓએ સુરતમાં બે-ત્રણ મોટા જૈન-હિન્દુ વેપારીઓને જબરદસ્તી મુસ્લિમ બનાવ્યા અને જેના લીધે કેટલાક વેપારીઓએ ઇસ્લામ ધર્મ અંગીકાર કરવા કરતાં આત્મહત્યા કરવાનું પસંદ કર્યું. મંદિરો અને દેરાસરોનો ધ્વંસ કરવામાં આવ્યો.

જેની સામે ભીમજી પારેખ, શાંતિદાસ ઝવેરી અને વિરજી વોહરાએ સમગ્ર ગુજરાતનાં વેપારીઓ/મહાજનો/પંચો સાથે ઔરંગઝેબ સામે આંદોલન કર્યું.

1669 મા સમગ્ર ગુજરાત બંધનું એલાન આપ્યું. બધા બંદરો/પેઢીઓ/ફેક્ટરીઓ/ટ્રાન્સપોર્ટ બધુ 3 મહિના સુધી બંધ રહ્યું.

લંડન ઈસ્ટ ઈન્ડિયા કંપનીના ગવર્નરે જે નોંધ્યું તે મુજબ,
“.. સમગ્ર સુરતમાં અંધાધૂંધી પ્રવર્તે છે ભારતના પ્રદેશોમાં શાકભાજી અને કરિયાણું ની કિલલત પડી છે ડચ અને અંગ્રેજો અને મુસ્લિમોનો ધંધો પડી ભાંગ્યો છે અને આ નરાધમો નમતું જોખતા નથી.
..”

અત્યંત જુલ્મો ગુજારવા છતાં ગુજરાત 3 મહિના બંધ રહ્યું અને કોઈ પેઢી ખૂલી નહીં. અને એક સાથે 8000 વેપારીઓએ સુરતથી ભરૂચ હિજરત કરી.

ભરૂચના જે વહીવટકર્તાએ ઔરંગઝેબને પત્ર લખ્યો કે, જો આ જેહાદી આડંબર બંધ ના થયા તો મુગલોની બધી સત્તા ખતમ થઈ જશે.

આ હડતાળે એટલું ઉગ્ર સ્વરૂપ પકડયું કે આર્થિક માર સહન ના થતાં ઔરંગઝેબ એ સુરતના વેપારીઓને પત્ર લખ્યો કે, હડતાળ પાછી લો અને તમે બધા સુખચેનથી રહો હવે પછી આવી ભૂલ હું કદી નહીં કરું.

ગાંધીજી પ્રથમ સત્યાગ્રહ કર્યો હતો પણ તેઓના પ્રથમ સત્યાગ્રહના 250 વર્ષ પહેલા સુરતના વૈષ્ણવ અને જૈન વેપારીઓએ સત્યાગ્રહની તાકાત બતાવી દીધી હતી.

જે ઇતિહાસનું વણવખણાયેલું પાનું છે.

આ આખો ઇતિહાસ ખૂબ સરસ રીતે ઇતિહાસના પાનાઓમાં લખાયેલો છે.
અને આમા કોઈ મીનમેખ નથી.

આવાતો કઈક ઈતિહાસો ને કોગ્રેસી આકાઓ એ જનતા સુધી પહોચવાજ ન દીધા
બધી ઠેકાણે એકજ નેહરૂ ખાનદાન મુકી દીધુ😬