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उद्दालक ऋषि के पुत्र का नाम श्‍वेतकेतु था। उद्दालक ऋषि के एक शिष्य का नाम कहोड़ था। कहोड़ को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान देने के पश्‍चात् उद्दालक ऋषि ने उसके साथ अपनी रूपवती एवं गुणवती कन्या सुजाता का विवाह कर दिया। कुछ दिनों के बाद सुजाता गर्भवती हो गई। एक दिन कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे तो गर्भ के भीतर से बालक ने कहा कि पिताजी! आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं। यह सुनते ही कहोड़ क्रोधित होकर बोले कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है इसलिये तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जायेगा।

हठात् एक दिन कहोड़ राजा जनक के दरबार में जा पहुँचे। वहाँ बंदी से शास्त्रार्थ में उनकी हार हो गई। हार हो जाने के फलस्वरूप उन्हें जल में डुबा दिया गया। इस घटना के बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ। पिता के न होने के कारण वह अपने नाना उद्दालक को अपना पिता और अपने मामा श्‍वेतकेतु को अपना भाई समझता था। एक दिन जब वह उद्दालक की गोद में बैठा था तो श्‍वेतकेतु ने उसे अपने पिता की गोद से खींचते हुये कहा कि हट जा तू यहाँ से, यह तेरे पिता का गोद नहीं है। अष्टावक्र को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने तत्काल अपनी माता के पास आकर अपने पिता के विषय में पूछताछ की। माता ने अष्टावक्र को सारी बातें सच-सच बता दीं।

अपनी माता की बातें सुनने के पश्‍चात् अष्टावक्र अपने मामा श्‍वेतकेतु के साथ बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिये राजा जनक के यज्ञशाला में पहुँचे। वहाँ द्वारपालों ने उन्हें रोकते हुये कहा कि यज्ञशाला में बच्चों को जाने की आज्ञा नहीं है। इस पर अष्टावक्र बोले कि अरे द्वारपाल! केवल बाल श्वेत हो जाने या अवस्था अधिक हो जाने से कोई बड़ा व्यक्ति नहीं बन जाता। जिसे वेदों का ज्ञान हो और जो बुद्धि में तेज हो वही वास्तव में बड़ा होता है। इतना कहकर वे राजा जनक की सभा में जा पहुँचे और बंदी को शास्त्रार्थ के लिये ललकारा।

राजा जनक ने अष्टावक्र की परीक्षा लेने के लिये पूछा कि वह पुरुष कौन है जो तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अक्षरों वाली वस्तु का ज्ञानी है? राजा जनक के प्रश्‍न को सुनते ही अष्टावक्र बोले कि राजन्! चौबीस पक्षों वाला, छः ऋतुओं वाला, बारह महीनों वाला तथा तीन सौ साठ दिनों वाला संवत्सर आपकी रक्षा करे। अष्टावक्र का सही उत्तर सुनकर राजा जनक ने फिर प्रश्‍न किया कि वह कौन है जो सुप्तावस्था में भी अपनी आँख बन्द नहीं रखता? जन्म लेने के उपरान्त भी चलने में कौन असमर्थ रहता है? कौन हृदय विहीन है? और शीघ्रता से बढ़ने वाला कौन है? अष्टावक्र ने उत्तर दिया कि हे जनक! सुप्तावस्था में मछली अपनी आँखें बन्द नहीं रखती। जन्म लेने के उपरान्त भी अंडा चल नहीं सकता। पत्थर हृदयहीन होता है और वेग से बढ़ने वाली नदी होती है।

अष्टावक्र के उत्तरों को सुकर राजा जनक प्रसन्न हो गये और उन्हें बंदी के साथ शास्त्रार्थ की अनुमति प्रदान कर दी। बंदी ने अष्टावक्र से कहा कि एक सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है, देवराज इन्द्र एक ही वीर हैं तथा यमराज भी एक है। अष्टावक्र बोले कि इन्द्र और अग्निदेव दो देवता हैं। नारद तथा पर्वत दो देवर्षि हैं, अश्‍वनीकुमार भी दो ही हैं। रथ के दो पहिये होते हैं और पति-पत्नी दो सहचर होते हैं। बंदी ने कहा कि संसार तीन प्रकार से जन्म धारण करता है। कर्मों का प्रतिपादन तीन वेद करते हैं। तीनों काल में यज्ञ होता है तथा तीन लोक और तीन ज्योतियाँ हैं। अष्टावक्र बोले कि आश्रम चार हैं, वर्ण चार हैं, दिशायें चार हैं और ओंकार, आकार, उकार तथा मकार ये वाणी के प्रकार भी चार हैं। बंदी ने कहा कि यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं, यज्ञ की अग्नि पाँच हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं, पंच दिशाओं की अप्सरायें पाँच हैं, पवित्र नदियाँ पाँच हैं तथा पंक्‍ति छंद में पाँच पद होते हैं। अष्टावक्र बोले कि दक्षिणा में छः गौएँ देना उत्तम है, ऋतुएँ छः होती हैं, मन सहित इन्द्रयाँ छः हैं, कृतिकाएँ छः होती हैं और साधस्क भी छः ही होते हैं। बंदी ने कहा कि पालतू पशु सात उत्तम होते हैं और वन्य पशु भी सात ही, सात उत्तम छंद हैं, सप्तर्षि सात हैं और वीणा में तार भी सात ही होते हैं। अष्टावक्र बोले कि आठ वसु हैं तथा यज्ञ के स्तम्भक कोण भी आठ होते हैं। बंदी ने कहा कि पितृ यज्ञ में समिधा नौ छोड़ी जाती है, प्रकृति नौ प्रकार की होती है तथा वृहती छंद में अक्षर भी नौ ही होते हैं। अष्टावक्र बोले कि दिशाएँ दस हैं, तत्वज्ञ दस होते हैं, बच्चा दस माह में होता है और दहाई में भी दस ही होता है। बंदी ने कहा कि ग्यारह रुद्र हैं, यज्ञ में ग्यारह स्तम्भ होते हैं और पशुओं की ग्यारह इन्द्रियाँ होती हैं। अष्टावक्र बोले कि बारह आदित्य होते हैं बारह दिन का प्रकृति यज्ञ होता है, जगती छंद में बारह अक्षर होते हैं और वर्ष भी बारह मास का ही होता है। बंदी ने कहा कि त्रयोदशी उत्तम होती है, पृथ्वी पर तेरह द्वीप हैं।…… इतना कहते कहते बंदी श्‍लोक की अगली पंक्ति भूल गये और चुप हो गये। इस पर अष्टावक्र ने श्‍लोक को पूरा करते हुये कहा कि वेदों में तेरह अक्षर वाले छंद अति छंद कहलाते हैं और अग्नि, वायु तथा सूर्य तीनों तेरह दिन वाले यज्ञ में व्याप्त होते हैं।

इस प्रकार शास्त्रार्थ में बंदी की हार हो जाने पर अष्टावक्र ने कहा कि राजन्! यह हार गया है, अतएव इसे भी जल में डुबो दिया जाये। तब बंदी बोला कि हे महाराज! मैं वरुण का पुत्र हूँ और मैंने सारे हारे हुये ब्राह्मणों को अपने पिता के पास भेज दिया है। मैं अभी उन सबको आपके समक्ष उपस्थित करता हूँ। बंदी के इतना कहते ही बंदी से शास्त्रार्थ में हार जाने के पश्चात जल में डुबोये गये सार ब्राह्मण जनक की सभा में आ गये जिनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे।

अष्टावक्र ने अपने पिता के चरणस्पर्श किये। तब कहोड़ ने प्रसन्न होकर कहा कि पुत्र! तुम जाकर समंगा नदी में स्नान करो, उसके प्रभाव से तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे। तब अष्टावक्र ने इस स्थान में आकर समंगा नदी में स्नान किया और उसके सारे वक्र अंग सीधे हो गये।

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चाणक्य की सीख
चाणक्य एक जंगल में झोपड़ी बनाकर रहते थे। वहां अनेक लोग उनसे परामर्श और ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते थे। जिस जंगल में वह रहते थे, वह पत्थरों और कंटीली झाडि़यों से भरा था। चूंकि उस समय प्राय: नंगे पैर रहने का ही चलन था, इसलिए उनके निवास तक पहुंचने में लोगों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता था। वहां पहुंचते-पहुंचते लोगों के पांव लहूलुहान हो जाते थे।

एक दिन कुछ लोग उस मार्ग से बेहद परेशानियों का सामना कर चाणक्य तक पहुंचे। एक व्यक्ति उनसे निवेदन करते हुए बोला, ‘आपके पास पहुंचने में हम लोगों को बहुत कष्ट हुआ। आप महाराज से कहकर यहां की जमीन को चमड़े से ढकवाने की व्यवस्था करा दें। इससे लोगों को आराम होगा।’ उसकी बात सुनकर चाणक्य मुस्कराते हुए बोले, ‘महाशय, केवल यहीं चमड़ा बिछाने से समस्या हल नहीं होगी। कंटीले व पथरीले पथ तो इस विश्व में अनगिनत हैं। ऐसे में पूरे विश्व में चमड़ा बिछवाना तो असंभव है। हां, यदि आप लोग चमड़े द्वारा अपने पैरों को सुरक्षित कर लें तो अवश्य ही पथरीले पथ व कंटीली झाडि़यों के प्रकोप से बच सकते हैं।’ वह व्यक्ति सिर झुकाकर बोला, ‘हां गुरुजी, मैं अब ऐसा ही करूंगा।’

इसके बाद चाणक्य बोले, ‘देखो, मेरी इस बात के पीछे भी गहरा सार है। दूसरों को सुधारने के बजाय खुद को सुधारो। इससे तुम अपने कार्य में विजय अवश्य हासिल कर लोगे। दुनिया को नसीहत देने वाला कुछ नहीं कर पाता जबकि उसका स्वयं पालन करने वाला कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंच जाता है।’ इस बात से सभी सहमत हो गए

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ભગવાને એક ગધેડાનું સર્જન કર્યું અને એને કહ્યું, “તું ગધેડા તરીકે ઓળખાઇશ. તું સુર્યોદય થી લઈને સુર્યાસ્ત સુધી થાક્યા વગર તારી પીઠ પર બોજો ઉઠાવવાનું કામ કરીશ, તું ઘાસ ખાજે, તને બુદ્ધિ નહિ હોય અને તું ૫૦ વર્ષ સુધી જીવીશ.”*
ગધેડો બોલ્યો, “હું ગધેડો થયો એ બરાબર છે. પણ ૫૦ વર્ષ નું આયુષ્ય ઘણું બધું કહેવાય. મને ૨૦ વર્ષ નું આયુષ્ય આપો.” ઈશ્વરે એની અરજ મંજુર કરી.
ભગવાને કુતરાનું સર્જન કર્યું, એને કહ્યું “તું કુતરો કહેવાઇશ. તું મનુષ્યોના ઘરોની ચોકીદારી કરીશ. તું મનુષ્ય નો પરમ મિત્ર કહેવાઈશ. તું એણે નાખેલા રોટલાના ટુકડા ખાઇશ અને તું ૩૦ વર્ષ જીવીશ.
કુતરાએ કહ્યું, “હે પ્રભુ ૩૦ વર્ષ નું આયુષ્ય તો ઘણું કહેવાય ૧૫ વર્ષ રાખો,” ભગવાને મંજુર કર્યું.
ભગવાને વાંદરો બનાવ્યો અને કહ્યું, “તું વાંદરો કહેવાઇશ. તું એક ડાળી થી બીજી ડાળી પર જુદા જુદા કરતબ કરતો કુદાકુદ કરીશ. અને સૌને મનોરંજન પૂરું પાડીશ. તું ૨૦ વર્ષ જીવીશ.” વાંદરો બોલ્યો “૨૦ વર્ષ તો ઘણા કહેવાય. ૧૦ વર્ષ રાખો”. ભગવાને મંજુર કર્યું.
છેલ્લે ભગવાને મનુષ્ય બનાવ્યો અને એને કહ્યું : “તું મનુષ્ય છે, પૃથ્વી પર તું એક માત્ર બુદ્ધિજીવી પ્રાણી હોઇશ. તું તારી અક્કલ નાં ઉપયોગ વડે સર્વે પ્રાણીઓનો સ્વામી બનીશ. તું વિશ્વને તારા તાબામાં રાખીશ અને ૨૦ વર્ષ જીવીશ.”
માણસ બોલ્યો : ” પ્રભુ, હું મનુષ્ય ખરો. પણ ૨૦ વર્ષનું આયુષ્ય ઘણું ઓછું કહેવાય. મને ગધેડાએ નકારેલ ૩૦ વર્ષ, કુતરાએ નકારેલ ૧૫ વર્ષ અને વાંદરાએ નકારેલ ૧૦ વર્ષ પણ આપી દો.” ભગવાને મનુષ્ય ની ઈચ્છા સ્વીકારી લીધી.
*ત્યારથી, માણસ પોતે માણસ તરીકે ૨૦ વર્ષ જીવે છે્ લગ્ન કરીને ૩૦ વર્ષ ગધેડો બનીને જીવે છે. પોતાની પીઠ પર બધો બોજો ઉપાડી સતત કામ કરતો રહે છે. બાળકો મોટા થાય એટલે ૧૫ વર્ષ કુતરા તરીકે ઘરની કાળજી રાખી જે કંઇ મળે તે ખાઈ લે છે. અંતે જ્યારે વૃદ્ધ થાય ત્યારે નિવૃત્ત થઈને વાંદરા તરીકે ૧૦ વર્ષ સુધી એક પુત્રના ઘરથી બીજા પુત્રના ઘરે અથવા એક પુત્રીના ઘરેથી બીજી પુત્રીના ઘરે જઈને જુદા જુદા ખેલ કરીને પૌત્રો અને ભાણીયાંઓને મનોરંજન પૂરું પાડે છે.

સંકલિત
કર્દમ મોદી
પાટણ

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एक लघु वार्ता जो सबको पढ़ना और समझना चाहिए

एक वरिष्ठ वकील 46 दोषियों को मौत की सजा (फांसी) से बचाने के लिए बहस कर रहा था…,

तभी उसका सहायक अंदर आया और उसे एक छोटा सा कागज दिया,

वकील ने इसे पढ़ा और अपनी जेब के अंदर रखा और अपनी बहस जारी रखी…,,

लंच ब्रेक के दौरान,
न्यायाधीश ने उससे पूछा “आपको पर्ची पर क्या जानकारी मिली थी”

वकील ने कहा “मेरी पत्नी मर गई”

जज चौंक गया और बोला “फिर तुम यहाँ क्या कर रहे हो…., अपने घर क्यों नहीं गए”

वकील ने कहा….,
“मैं अपनी पत्नी के जीवन को वापस नहीं ला सकता, लेकिन इन 46 स्वतंत्रता सेनानियों को जीवनदान देने और उन्हें मरने से रोकने में मदद कर सकता हुँ”।

न्यायाधीश, जो एक अंग्रेज था, उसने सभी 46 पुरुषों को रिहा करने का आदेश दिया।

वकील कोई और नहीं बल्कि महान सरदार वल्लभभाई पटेल थे।

3300 करोड़ क्या यदि 33000 करोड़ की प्रतिमा भी उनकी लगे तो वह कम ही होगी…🙏

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बस बहुत हो गया-

आज सुनीता बहुत खुश थी क्योंकि कल उसके इकलौते बेटे संचित की शादी थी । वह तो भाग भाग कर सबको बता रही थी कि सबको बहू प्राची का स्वागत किस तरह करना है। उसके पति मोहन लाल उसकी प्रसन्नता को महसूस कर रहे थे । वह रात को सब इन्तजाम और मेहमानो के आराम की व्यवस्था करके अपने कमरे में आई । बहुत थकी हुई थी । मोहन लाल ने कहा तुम आराम करो अभी बहुत काम करना है। सुनीता बोली हां अभी एक जरूरी काम रह गया वह आप करोगे वह है दोनों बच्चों के मिलन की प्रथम रात्रि के लिए अच्छे होटल में व्यवस्था । कल सुबह सबसे पहले कमरा बुक कराना और दूसरे दिन उसकी बहुत सुन्दर सजावट और यह कह कर वह अपनी बीती हुई जिन्दगी के उन पन्नों को खगालने लगी जो दर्द भरे थे ।
सुनीता की शादी छोटी उम्र में हुई । पति की उम्र भी अधिक नहीं थी । सुनीता शहर में पली थी । ससुराल छोटे कस्बे में थी । घर में कोई अधिक शिक्षित नहीं था सिवा पति के क्योंकि वह शहर में पढ़े थे और वहीं सर्विस करते थे । बहुत मधुर सपने लेकर ससुराल पहुँची । कार से उतर भी नहीं पाई थी कि पति से छोटी ननद एक दम बोलीं अरे मुंह खोल कर आई हो घूंघट करो वह एकदम सकपका गयी मायेके में बहुत लाडली और बिन्दास जीने वाली लड़की । उसके बाद गृह प्रवेश हुआ । बक्सा खोलने की रस्म होनी थी । सबकी साड़ियां नाम लगा कर रखी थी पर ननदों कॊ तो उसकी साडि़यां पसंद आई जिनको उसके भाई बड़े प्यार से उसके लिये लाये थे । वह मन ही मन डर गयी थी । आंखो में चुपचाप आंसू लिये घूंघट में से देख रही थी । वह बस अपने प्रियतम से मिलने की प्रतीक्षा में थी कि कैसे भी उनसे मिल कर अपना मन हल्का करे । जैसे जैसे रात होने लगी बड़ी ननद और बुआ सास ने फरमान जारी कर दिया की अभी पांच दिन तक ये सबके पास सोयेगी जब तक पूजा ना हो जाये ।
मोहन लाल ने देखा रात के 2बजे हैं पर सुनीता जगी हुई विचारों में खोई हुई है। वह बोले सो जाओ कल बहुत काम है। सुबह से ही घर में बहुत चहल पहल थी । आज का दिन बहुत हर्षदायक था उसके लिये बस कल उसके घर की रौनक आजायेगी ।
फेरे होगये थे विदा होकर प्राची घर आगयी । बस उसकी दोनों ननद शुरू हो गयी कि अरे पल्लू सर पर नहीं है। वह फिर भी चुप रही। जब बक्सा खुलने की रस्म की बात आई तब सुनीता ने कहा कोई जरूरी नहीं सबकी साड़ियां पहले ही आगयी हैं । जब रात को उसने होटल भेजने का इन्तजाम किया तब सब कहने लगी कि जरा भी शर्म नहीं रही थोड़ा तो बड़े लोगों का लिहाज करो । बस सुनीता एक दम चिल्ला पड़ी ” बस बहुत हो गया “
मेरी बहू वह सब नहीं झेलेगी जो मैने झेला था ।
स्व रचित
डा. मधु आंधीवाल

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पाराशर जी के घर में मृत्यु सा सन्नाटा पसरा है, कभी कभी मिसेज पाराशर और बेटी प्रार्थना की सिसकियों की आवाज गूँज जाती है। आज राखी का पर्व है परन्तु उनके घर में तो खाना भी नहीं बना।
सबकी ऑखों में पिछली राखी की स्मृतियॉ कौंध रही थीं। विपुल और प्रार्थना की मीठी नोंक झोक की यादें हृदय को और अधिक कष्ट दे रही हैं। सात महीने हो गये विपुल को गये।
बी0टेक0 के बाद चेन्नई में विपुल को नौकरी मिली तो घर में खुशी के साथ उसकी जुदाई के दुख की लहर भी दौड़ गई। परिवार से बिछुड़कर एक अनजान भाषा और परिवेश में सामंजस्य करने की परेशानी विपुल को भी थी लेकिन नौकरी मिलने से वह खुश भी था।
” क्या मम्मी, जब से नियुक्ति पत्र आया है रोनी सूरत बना रखी है, आपको तो खुश होना चाहिये कि मुझे इतनी अच्छी नौकरी मिल गई है।”
” वह तो ठीक है भइया लेकिन आप उतनी दूर चले जाओगे।”
” तो क्या हुआ, आज के संचार युग में जब हर समय बात हो सकती है, वीडियो काल एक दूसरे से आमने सामने बात की जा सकती है तब ये दूरियॉ कोई माने नहीं रखती।”
” एक बात और है भइया।” प्रार्थना ने मॉ की ओर देखकर कहा – ” मम्मी को डर है कि कहीं आप किसी मद्रासन को बहू बनाकर न ले आओ। कश्मीर में नौकरी मिलती तो मम्मी निश्चिन्त रहतीं कि बेटे के कदम बहकें भी तो काश्मीरी सेब जैसी बहू आयेगी।”
” मॉ बनोगी तब मॉ के दिल की पीड़ा समझ पाओगी। अभी तो सब मजाक ही लगता है।” कहते हुये मिसेज मंजू पाराशर की ऑखों के ऑसू गालों पर फिसल आये।
” ओ…. मम्मी…..।” विपुल ने मॉ के गले में बॉहें डाल दीं -” प्रार्थना तो आपकी उदासी को दूर करने के लिये ऐसा कह रही है और आप उसी से नाराज हो रही हैं।”
विपुल चला गया लेकिन रोज वीडियो काल से बात करता और काफी देर तक सबसे बात करता। दूर रहकर भी वह घर का बराबर ख्याल रखता। मम्मी, पापा, प्रार्थना का जन्म दिन हो या मम्मी-पापा की वैवाहिक वर्षगॉठ को विपुल के भेजे उपहार, भोजन पहुँच जाता।
प्रार्थना जरा भी कुछ खाने को कह देती, आधे घंटे के अन्दर घर के बाहर आर्डर आ जाता। वैसे भी वह कई बार फोन करके कह देता – ” मम्मी खाना मत बनाइये, मैं भिजवा रहा हूँ।”
छुट्टी में पहली बार आया तो उसने उपहारों से घर भर दिया। मिस्टर और मिसेज पाराशर घर में बहू के सपने देखने लगीं।
अभी विपुल को गये एक महीना ही हुआ था कि विपुल के रूममेट का फोन आया कि विपुल का एक्सीडेन्ट हो गया है, आप लोग तुरन्त आ जाइये।
पत्नी और बेटी को लेकर पाराशर जी तुरन्त चेन्नई पहुँच गये। बेटे की हालत देखकर उन लोगों का मस्तिष्क सुन्न हो गया। समय बीतने लगा लेकिन विपुल की स्थिति में कोई सुधार न हुआ आखिर डाक्टर ने उसे Brain Dead घोषित कर दिया। अब तो किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये?
तभी विपुल का रूममेट आकर पाराशर जी को अपने साथ ले गया, उसने पाराशर जी के कन्धे पर हाथ रख दिया – ” अंकल, विपुल को हम सबने खो दिया है लेकिन एक बात कहनी थी आपसे, समझ में नहीं आ रहा कि कैसे कहूँ? पता नहीं आप क्या समझे?”
” बोलो बेटा, हमारे खोटे भाग्य को तुम कैसे बदल सकते थे, जब हम कुछ नहीं कर पाये।”
” अंकल ! मुझे गलत मत समझियेगा लेकिन आपको बताना बहुत जरूरी है, समझ लीजिये कि विपुल की अन्तिम इच्छा यही थी।”
तभी विपुल के और भी दोस्त आ गये। उन्होंने बताया कि विपुल सहित उन सबने देहदान कर दिया है। सुनकर अवाक रह गये पाराशर जी। ये जरा जरा से बच्चे जिन्हें कहा जाता है कि आजकल का गैर जिम्मेदार पीढ़ी इस उम्र में इतने आगे का सोंच लेते हैं?
” अंकल, देहदान तो स्वाभाविक या बीमारी से शिथिल अंगों का भी हो सकता है लेकिन हमारा विपुल तो ऊर्जा से भरपूर एक स्वस्थ युवक है, उसके सभी अंग सही काम कर रहे हैं ।” कहकर वह चुप हो गया। पाराशर जी के मुँह से आवाज नहीं निकली।
तभी एक दूसरे लड़के ने कहा – ” अंकल, विपुल तो वापस नहीं आ सकता लेकिन आप चाहें तो विपुल की इच्छा पूरी करके आप कई लोगों को जीवन दे सकते हैं।”
” नहीं, मैं अपने बेटे के शरीर की और दुर्दशा नहीं होने दूँगा। सनातन धर्म के अनुसार यह गलत है, ऐसा करना पाप है। ऐसा करने से उसकी आत्मा भटकती रहेगी।”
” नहीं पापा, भइया की अन्तिम इच्छा यदि न पूरी की गई तो उनकी आत्मा भटकती रहेगी। उन्होंने जिस देह का दान कर दिया है, उस पर आपका अधिकार नहीं है। मुझे गर्व है अपने भाई पर। यहॉ से चलकर मैं भी देह दान कर दूँगी।”
” प्रार्थना, तुम क्या कह रही हो बेटा।”
” सही कह रही हूँ पापा, बचपन से दान की महिमा सुनी है लेकिन अगर आपके बेटे ने स्वेच्छा से कुछ दान किया है तो आप क्यों उसके पुण्य में बाधा डाल रहे हैं?” प्रार्थना ने पाराशर जी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा – ” पापा जो अंग चिता की राख में जलकर भस्म हो जायेंगे, उनसे कई लोगों को जीवन मिल जायेगा, आपका बेटा कई लोगों के भीतर जिन्दा रहेगा।”
पाराशर जी ने अंग दान की अनुमति दे दी। ऑखों में ऑसू और हृदय में हाहाकार लेकर तीनों खाली हाथ लौट आये। कितना खुश था विपुल इस नौकरी से। कितनी आशायें लेकर उन्होंने विपुल को इस महानगर में भेजा था और इस महानगर ने उनके घर की खुशियों को ही लील लिया।
सात महीने हो गये इस घर को वीरान हुये, खुशियॉ रूठ गईं हैं इस घर से। अचानक दरवाजे की घंटी बजी – ” पृथु, देख बेटा कौन है?” लेकिन कोई हलचल न होती देख खुद उठकर दरवाजा खोलने चले गये। दरवाजे पर खड़ी चार कारें देखकर हतप्रभ रह गये। इतने सारे अनजान लोग क्यों आये हैं उनके घर?
” क्या हम लोग अंदर आ सकते हैं?” प्रार्थना से थोड़ी बड़ी एक विवाहित लड़की ने कहा।
” क्षमा कीजियेगा, मैंने आप लोगों को पहचाना नहीं है।”
” हम अंदर आकर सब बताते हैं।” आवाजें सुनकर प्रार्थना और मंजू पाराशर भी आकर पाराशर जी के पीछे खड़ी हो गईं।
” आइये।” अपने ऑसू छिपाते हुये मंजू और प्रार्थना ने सबका स्वागत किया।
” भाई साहब ” अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने बैठने के बाद पाराशर जी को संबोधित किया – ” मेरा नाम जीवन रंधावा है। ये सब वो बच्चे हैं जिन्हें आपके बेटे के अंगों ने जीवन दान दिया है।” पाराशर जी, मंजू और प्रार्थना के कंठ से सिसकियॉ फूट पड़ीं।
जीवन रंधावा ने पाराशर को गले लगा दिया – ” आज रक्षा बंधन है। आज रक्षा का वचन दिया जाता है लेकिन आपके परिवार ने तो इन बच्चों के जीवन की रक्षा की है। आपका विपुल कहीं नहीं गया है, इन बच्चों के रूप में जीवित है और हमेशा रहेगा क्योंकि इन सबने भी अपने अंगों के दान का संकल्प लिया है।”
कुछ देर सन्नाटा रहा फिर जीवन रंधावा ने ही कहा -” आज ये सब आप तीनों को राखी बॉधने आये हैं।”
वे तीनों एक दूसरे का मुँह देखने लगे। ये कैसा रक्षा बंधन है? ऐसे रक्षा बंधन की तो किसी ने आज तक कल्पना भी नहीं की होगी – “लेकिन…..।”
प्रार्थना के बोलने से पहले ही एक लड़की आगे आ गई – ” बहन, आपने ही सबसे पहले अपने भाई की अंतिम इच्छा पूरी करने की दृढ़ता दिखाई थी, वरना किडनी फेल्योर हो जाने के कारण मेरे दो छोटे छोटे बच्चे बिना मॉ के हो जाते।”
” मुझे पहले से पता होता तो मैं कुछ तैयारी कर लेती। आज तो हमारे घर में……।” कहते कहते सकुचा कर चुप हो गईं मंजू पाराशर।
” अगली बार कर लीजियेगा आंटी, अब तो हम सब हर राखी पर आयेंगे।”
फिर सबने मिलकर मिस्टर और मिसेज पाराशर के साथ प्रार्थना को बैठाया। इसके बाद तिलक करके राखी बॉधी, सबके ऑसू रुक नहीं रहे थे। फिर सबने साथ बैठकर खाना खाया। खाने का आर्डर उन लोगों ने पहले से ही दे रखा था।
जब शकुन के रूप में मंजू पाराशर कुछ देने लगीं तो जीवन रंधावा ने रोंक दिया – ” अगली बार खरीदकर रखियेगा, अब ये सब आपके बेटे बेटियॉ हैं, हमेशा आपके पास आयेंगे। अपने आप को अकेला मत समझियेगा।”
” नहीं भाई साहब, राखी छूँछे हाथों नहीं बँधवाई जाती, अपशकुन होता है और फिर आज तो मैंने एक विपुल को खोकर इतने सारे विपुल पाये हैं।” मंजू पाराशर के कहने पर सबने उनसे एक एक रुपया शकुन के रूप में ले लिया।
सबके जाने के बाद मिस्टर और मिसेज पाराशर ने प्रार्थना को गले से लगा लिया – ” पृथु, अगर उस समय तुमने इतनी दृढ़ता न दिखाई होती तो आज इतने जीवनों को बचाने की खुशी हमें कैसे मिलती?”
” मैं भी आज बहुत खुश हूँ कि हमने भइया को खोकर भी इतने भाई बहन पा लिये हैं।”
” सचमुच मंजू, किसने सोंचा होगा कि आज हम ऐसा अनोखा रक्षा बंधन मनायेंगें।”
तीनों के चेहरे आत्म सन्तुष्टि से दमक रहे थे।

बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

कल #रक्षाबंधन पर सुबह पूजा के समय माँ ने कहा, ” द्वार पर श्रवण कुमार तो बनाया ही नहीं, न उसको राखी ही बांधी “, तो मैंने पूछा कि श्रवण कुमार का रक्षा बंधन से क्या सम्बंध , वो कारण तो बता न पायीं किन्तु बोली पुरखों के समय की रीति है अब तक चल रही है ! बहन सुरेखा पूनम और आशा ही इस कार्य को करती थीं तो उनसे पूछा, उन्होंने वे चित्र भेज दिए, तब ध्यान आया कि उनके बड़े होने से पहले मै भी यह कार्य कर चुका हुँ ?

अब शुरू हुई खोज कि रक्षा बंधन में #श्रवण_कुमार कहाँ से आ गए तो अनेक प्रकार के key word Google में डाले तब मिला वास्तविक कारण चूँकि कारण थोड़ा दुःखद है तो शायद लोक परम्परा ने कारण को भुला दिया किंतु वचन को जिंदा रखा !
तो मूल घटना इस प्रकार है

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को नेत्रहीन माता पिता का एकमात्र पुत्र श्रवण कुमार अपने माता पिता को कांवड में बिठा कर तीर्थ यात्रा कर रहे थे, मार्ग में प्यास लगने पर वे एक बार रात्रि के समय जल लाने गए थे, वहीं कहीं हिरण की ताक में #दशरथ जी छुपे थे। उन्होंने घड़े के में पानी भरने से हवा के बुलबुलों के निकलने के शब्द को पशु का शब्द समझकर शब्द भेदी बाण छोड़ दिया, जिससे श्रवण की मृत्यु हो गई।

श्रवण कुमार ने मरने से पहले दशरथ से वचन लिया कि वे ही अब उनके बदले माता पिता को जल पिलाएँगे। दशरथ ने जब यह कार्य करना चाहा तो नेत्रहीन माता पिता ने अपने पुत्र के अनुपस्थित रहने का कारण पूछा तो दशरथ ने उन्हें सत्य बताया। यह सुनकर उनके माता-पिता बहुत दुखी हुए। तब दशरथ जी ने अज्ञान वश किए हुए अपराध की क्षमा याचना की।

श्रवण कुमार के माता पिता ने अपने एक मात्र पुत्र के मर जाने पर अपना वंश नष्ट हो जाने का शोक व्यक्त किया तब दशरथ ने श्रवण के माता-पिता को आश्वासन दिया कि वे श्रावणी को श्रवण पूजा का प्रचार प्रसार करेंगे। अपने वचन के पालन में उन्होंने श्रावणी को श्रवण पूजा का सर्वत्र प्रचार किया।

उस दिन से संपूर्ण सनातनी श्रवण पूजा करते हैं और उक्त रक्षा सूत्र सर्वप्रथम श्रवण को अर्पित करते हैं।

भारतीय लोक परम्परा पर प्रश्न उठाने वाले अनेक इतिहास कार अक्सर यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि यह सत्य है तो प्रमाण क्या है।राम जन्म भूमि के संदर्भ में न्यायालय में यह प्रश्न बार बार उठा विद्वान वकीलों ने मुक़द्दमा जीतने के लिए यहाँ तक घोषणा कर डाली कि राम कभी हुए ही नहीं !

कल दिन भर के प्रयास मात्र से मिली यह कथा बताती है कि
मुख और कान से ज़िंदा रखा गया इतिहास कितना शक्ति शाली है कि राम जन्म से पूर्व एक साधारण ग़रीब पितृभक्त बालक की गाथा को कितने चतुराई से ज़िंदा रखा है ।

आज यह स्केच मुझे एक प्रतिष्ठित वेब साइट से मिला है
हमारे द्वारा बनाए जाने वाला चित्र भी लगभग ऐसा ही है किंतु यह अधिक श्रेष्ठ है। इसे गेरू और रुई लिपटी सींक से द्वार के ओर बनाते हैं और इसे ही तिलक पूजा कर राखी अभिमंत्रित कलावा बांधा चिपकाया जाता है। इसके बाद वही पूजा की थाली भाई को राखी बांधने के लिए प्रयुक्त होती है।

इसमें अधिक ध्यान देने की बात यह है कि इसे सरल ज्यामितिक figure त्रिकोण, आयत वर्ग और वृत द्वारा ही बनाया गया ताकि चित्रकारी विशेषज्ञ की आवश्यकता न हो रंगोली बनाने वाली गृहणी ही आसानी से इसे बना सके !

एक प्रकार से देखा जाए तो यही कार्टून कला का प्रारम्भ भी कहा जा सकता है। भारत के हर प्रदेश में हर उत्सव पर रंगोली,मंडवा, गणगौर, सांझी आदि अनेक चित्र बनाए जाते हैं ,दिए गए वेब site पर मध्य प्रदेश मालव क्षेत्र में बनाए जाने वाले रेखा चित्र दिए गए हैं

सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा और बच्चों को संस्कारी करने के लिए उपयोगी परम्परा है। भाई दीर्घायु हो इतना ही काफ़ी नहीं है। वह माता पिता की सेवा करने वाला भी हो।

राजा दशरथ का धर्म और वचन निभाने का उदाहरण देखिए कि मुझे जानें या न जाने लेकिन श्रवण कुमार को सब जानें !
आइए इस धरोहर को पुष्पित पल्लवित करें