Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

” सोने के कंगन “

मेरी दादी जमींदार घराने की बेटी थीं , बहुत सारे गहने हैं उनके पास ! सभी गहनों में सबसे सुंदर है सोने का कंगन _ जिसे हमेशा दोनों हाथ में पहनतीं हैं, दूसरा है ” जड़ाऊ सीता हार “। सोना का कंगन है तो बहुत ही भारी , बीस बीस तोले का और सीता हार उससे भी भारी है ।
दादी मुझे बहुत प्यार करती है , मां से कहती रहतीं , प्रिया की शादी में उसको सारा गहना दूंगी, सोने का कंगन छोटी बहू को और सीता हार बड़ी बहू को । ( मेरी मां बड़ी बहू है )
यह बात सुनकर चाची के छाती पर सांप लोटता? , प्रिया भी नहीं फूटी आंख सुहाती है उन्हें ? हमेशा चाचा के कान भरतीं रहती कि जब देखो मां केवल बड़ी भाभी व प्रिया पर सब लुटाना चाहती हैं, हमलोग को एक ढेला नहीं देंगी और बड़े भैया को घर का मालिक बना जाएंगी ।पर चाचा कभी भी चाची के अनर्गल बातों को सुनते , पर सुनकर एक कान से दूसरे कान निकाल देते हैं।
पापा और चाचा में आपसी विश्वास व आपसी सामंजस्य है , चाची कान फोड़ती रही चाचा के ? परंतु वही “ढाक के तीन पात!”
दादी बीमार पड़ गईं है, लकवा मार गया है , उनकी सारी सेवा – सुश्रुषा अकेले मां ही करती है, नहलाना, तेल मालिश , खाना खिलाना, दवा देना वगैरह। दादी के तबियत में सुधार हो रहा है , इधर चाची सशंकित है कि सारा जेवर कहीं भाभी न हथिया ले , ? ।
दादी के पास उनके पिता का दिया हुआ अंग्रेज के जमाने का चांदी की सौ अशर्फियां भी है, जिसमें महारानी विक्टोरिया की तस्वीर अंकित है, बहुत महंगी,•••••• पुरातत्व विभाग के अनुसार ।
एक दिन दादी ने सबको अपने कमरे में बुलवाया ,•••••• पापा , चाचा- चाची, मां , चाचा का बेटा गोलू और मैं। दादी अपने पलंग पर सभी गहने फैलाकर रखी हुईं हैं ••••• आराम से बोली दादी जिसको जो जो चाहिए, उठा ले।
मेरे जीवन का कोई भरोसा नहीं , कब आँखे बंद हों जाए मेरी ? हम सब कुछ समझते इतने में झटपट चाची लपक सोने का कंगन, सीता हार उठा लेती है और चाचा से बोली -‐ आप अशर्फी ले लीजिए जल्दी से , एक अशर्फी का दाम एक लाख से भी ज्यादा है ।
चाची की कुटिल चाल सबके समक्ष आ गई है , लोभ भी प्रत्यक्षत: –
सब कोई हैरान!
दादी बोली , छोटी बहू रोज आती रही है मेरे कमरे में •••• यह कहने कि सब गहनों को आप अपने जीते जी आपस में बांट दीजिए मां ! इसलिए सबको इकट्ठा कर अपने गहनों को बांट रही हूं , यह भी बताने के लिए कि छोटी बहू का आचरण और स्वभाव कितना पानी में है?
अब “दूध का दूध पानी का पानी” करने का क्षण आ गया है, जब बीमार थी मैं तो छोटी बहू जब भी आती , उस समय गहने- पैसे , घर के बंटवारे की बात करती , सेवा करना तो दूर की बात है , ऐसे भी कभी झांकने भी नहीं आई?

खैर !! दादी के माथे पर शिकन झलकी ।
छोटी बहू बता रही हूं एक बात, जब लकवाग्रस्त हो गई थी , मैंने बड़ी बहू से कहा भी कि गहनों को अपने पास रख लो , दो तीन गहने छोटी को दे देना और बाकी तुम रख लेना , पर बड़ी बहु का बड़प्पन देखो जरा -‘ नहीं मां वो भी आपकी बहू है , उसे भी दीजिए । , बल्कि मैं सारा गहना सौंप रही थी बड़ी बहू को पर मना कर दिया ।

अब बोलो रमेश, (छोटे चाचा) क्या कहना है बंटवारा कर देती हूं , पर मेरे मरने के बाद ही आंगन के बीच दीवार खींचना तुमलोग!
जीते जी तो कतई नहीं!
छोटी बहू के लक्ष्ण उसी वक्त ताड़ गई थी मैं , जब पहली बार बहू बनकर आई है। आने के कुछ ही दिन के बाद मुझसे पूछ रही थी कि यह मकान किसके नाम से है? पालने में ही पूत के लक्षण दिखाई देते है न! वही छोटी बहू में देख रही पर रमेश को बरगला न पाई?

हम सब स्तंभित खड़े हैं, बिचारे चाचा शर्म से पानी पानी हो गए ।
चाची के चेहरे पे हवाईयां उड़ रही है।, गहना पलंग पर रखकर जाने लगी है ।कलई जो खुल गई उनकी ?
दादी ने अपनी सूझबूझ से घर का बंटवारा होने से रोक दिया है और चाचा व पापा एक दूसरे के साथ एक छत के नीचे एक साथ ही रहने लगे।
चाची का स्वभाव नहीं बदला है , चाचा कभी भी नहीं सुने , ना अब सुनते हैं।
वो आदत से लाचार हैं?

अंजू ओझा
मौलिक स्वरचित,
२२•८•२१

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