Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

रावलपिंडी के समीप हिन्दुओं का एक छोटा सा गांव था। 500 के लगभग व्यसक होंगे। बाकि बच्चे, बुड्ढे। गांव के सरपंच रामलाल एक विशाल बरगद के नीचे बैठे थे। तभी मोहन भागता हुआ आया। बोला सरपंच जी, सरपंच जो। सरपंच जी कहा ,”क्या हुआ मोहन ? ” सरपंच जी मुझे पता लगा है यहाँ से 8 कोस दूर हिन्दुओं ने अपना गांव खाली करना शुरू कर दिया है। सिख भाई भी उनके साथ अमृतसर जाने की तैयारी कर रहे है। सरपंच जी ने एक लम्बी साँस ली और कहा,” मैंने कल ही रेडियो पर सुना था। महात्मा गाँधी जी ने कहा है कि भारत-पाकिस्तान का विभाजन मेरी लाश पर होगा। क्या तुम्हें उनकी बात पर भरोसा नहीं है?” मोहन बोला,” सुना तो मैंने भी है कि जवाहर लाला नेहरू जी ने कहा है कि हिन्दुओं आश्वस्त रहो। भारत के कभी टुकड़े नहीं होंगे। तुम लोग लाहौर और रावलपिंडी में आराम से रहो। पर जिस गांव की मैं बात कर रहा हूँ। उस गांव पर पिछली रात को चारों और के मुसलमान दंगाइयों ने इकट्ठे होकर हमला कर दिया। उनकी संपत्ति लूट ली। दुकानों में आग लगा दी। मैंने तो यह भी सुना की किसी गरीब हिन्दू की लड़की को भी उठा कर ले गए। भय के कारण उन्होंने आज ही पलायन करना शुरू कर दिया हैं।” सरपंच जी बोले,”देखो मोहन। हम यहाँ पर सदियों से रहते आये हैं। एक साथ ईद और दिवाली बनाते आये है। नवरात्र के व्रत और रोज़े रखते आये है। हमें डरने की कोई जरुरत नहीं है। तुम आश्वस्त रहो। ” मोहन सरपंच जी की बात सुनकर चुप हो गया मगर उसके मन में रह रहकर यह मलाल आता रहा कि सरपंच जी को कम से कम गांव के हिन्दुओं को इकट्ठा कर सावधान अवश्य करना चाहिए था। अभी दो दिन ही बीते थे। चारों ओर के गांवों के मुसलमान चौधरी इकट्ठे होकर सरपंच से मिलने आये और बोले। हमें मुस्लिम अमन कमेटी के लिए चंदा भेजना है। आप लोग चंदा दो। न नुकर करते हुए भी सरपंच ने गांव से पचास हज़ार रुपया इकठ्ठा करवा दिया। दो दिन बाद फिर आ गए। बोले की ओर दो। सरपंच ने कहा कि अभी तो दिया था। बोले की, “कम पड़ गया और दो। तुमने सुना नहीं 8 कोस दूर हिन्दुओं के गांव का क्या हश्र हुआ है। तुम्हें अपनी सुरक्षा चाहिए या नहीं?” सरपंच ने इस बार भय से सत्तर हज़ार इकट्ठे कर के दिए। दो दिन बाद बलूच रेजिमेंट की लोरी आई और हिन्दुओं को इकठ्ठा कर सभी हथियार यहाँ तक की लाठी, तलवार सब जमा कर ले गई। बोली की यह दंगों से बचाने के लिए किया है। क़ुराने पाक की कसम खाकर रक्षा का वायदा भी कर गई। नवें दिन गांव को मुसलमान दंगाइयों ने घेर लिया। सरपंच को अचरज हुआ जब उसने देखा कि जो हथियार बलूच रेजिमेंट उनके गांव से जब्त कर ले गई थी। वही हथियार उन दंगाइयों के हाथ में हैं। दंगाइयों ने घरों में आग लगा दी।संपत्ति लूट ली। अनेकों को मौत के घाट उतार दिया गया। हिन्दुओं की माताओं और बहनों की उन्हीं की आँखों के सामने बेइज्जती की गई। सैकड़ों हिन्दू औरतों को नंगा कर उनका जुलुस निकाला। हिन्दू पुरुष मन मन में यही विनती कर रहे थे कि ऐसा देखने से पहले उन्हें मौत क्यों न आ गई। पर बेचारे क्या करते। गाँधी और नेहरू ने जूठे आश्वासन जो दिए थे। गांव के कुछ बचे लोग अँधेरे का लाभ उठाकर खेतों में भाग कर छुप गए। न जाने कैसे वह रात बिताई। अगले दिन अपने ही घर वालों की लाशे कुएं में डाल कर अटारी के लिए रेल पकड़नी थी। इसलिए किसी को सुध न थी। आगे क्या होगा। कैसे जियेंगे। कहाँ रहेंगे। यह कहानी कोई एक घर की नहीं थी। यह तो लाहौर, डेरा गाजी खां, झेलम, सियालकोट, कोहाट, मुलतान हर जगह एक ही कहानी थी। कहानी क्या साक्षात् नर पिशाचों का नंगा नाच था।

तत्कालीन कांग्रेस के अध्यक्ष आचार्य कृपलानी के शब्दों में इस कहानी को पढ़िए

“आठ मास हुए आपने मुझे कांग्रेस का अध्यक्ष चुना था। महात्मा गाँधी ने एक प्रार्थना सभा के भाषण में कहा था कि मुझे फूलों का मुकुट नहीं पहनाया जा रहा है। बल्कि काँटों की सेज पर सुलाया जा रहा है। उनका कहना बिलकुल ठीक है। उनकी घोषणा होने के दो दिन बाद मुझे नोआखली जाना पड़ा। वहां से बिहार और अभी मैं पंजाब होकर आया हूँ। नोआखली में जो देखा वह मेरे लिए नया अनुभव था। लेकिन बिहार में जो मैंने देखा वह और भी नया और पंजाब में जो देखा वह और भी अधिक था। मनुष्य मनुष्य नहीं रहा। स्त्रियां बच्चों को साथ लेकर इज्जत बचाने के लिए कुओं में कूद पड़ीं। उनको बाद में उससे बचाया गया। पूजा के एक स्थान में पचास स्त्रियों को इकठ्ठा करके उनके घर के लोगों ने उनको मार दिया। एक स्थान में 370 स्त्रियों और बच्चों ने अपने को आग को भेंट कर दिया है।-आचार्य कृपलानी”
(सन्दर्भ- श्यामजी पराशर, पाकिस्तान का विष वृक्ष, नवंबर,1947 संस्करण, राष्ट्रनिर्माण ग्रन्थ माला, दिल्ली, पृष्ठ 42)

महात्मा गाँधी और नेहरू जो पहले कहते थे कि पाकिस्तान हमारी लाश पर बनेगा अब कहने लगे कि हमने देश का विभाजन डरकर नहीं किया। जो खून खराबा हर तरफ हो रहा है, उसी को रोकने के लिए किया। जब हमने देखा कि हम किसी तरह भी मुसलमानों को मना नहीं सकते तब ऐसा किया गया। देश को तो 1942 में ही आज़ाद हो जाना था। अंग्रेजों ने देश छोड़ने से पहले मुस्लिम लीग को आगे कर दिया। जिन्नाह ने मांगे रखनी शुरू कर दी। मैं न मानूं की रट लगाए जिन्नाह तानाशाह की स्थिति अर्जित कर कायदे आज़म बन गया। बात बात पर वाक आउट की धमकी देता था। कभी कहता विभाजन कमेटी में सिखों को मत लो। अगर लिया तो मैं बहिष्कार कर दूंगा। कभी कहता सभी सब-कमेटियों का प्रधान किसी मुसलमान को बनाओ। नहीं तो मैं उठ कर चला जाऊंगा। कांग्रेस के लिए जिन्नाह के साथ जीना मुश्किल, जिन्नाह के बिना जीना मुश्किल। फिर जिन्नाह ने दबाव बनाने के लिए अपने गुर्गे सोहरवर्दी के माध्यम से नोआखली और कोलकाता के दंगे करवाए। सीमांत प्रान्त में दंगे करवाए। मेरठ, पानीपत, सहारनपुर, दिल्ली सारा देश जल उठा। आखिर कांग्रेस को विभाजन स्वीकार करना पड़ा। मुसलमानों को उनका देश मिल गया। हिन्दुओं को क्या मिला? एक हिन्दू राष्ट्र के स्थान पर एक सेक्युलर राष्ट्र। जिसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधिकारों से ज्यादा अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकार हैं। पाकिस्तान में बचे हिन्दुओं के अधिकारों की कोई चर्चा नहीं छेड़ता। उसी कांग्रेस का 1947 में विस्थापित एक प्रधानमंत्री आज कहता है कि देश के संसाधनों पर उन्हीं अल्संख्यक मुसलमानों का अधिकार है। हिन्दू धर्मरक्षा के लिए अपने पूर्वजों की धरती छोड़ आये। अमानुषिक यातनायें सही। चित्तोड़ के जौहर के समान ललनाओं की जिन्दा चिताएं जली। राजसी ठाठ ठुकराकर दर दर के भिखारी बने। अपने बेगाने हो गए। यह सब जिन्नाह की जिद्द के चलते हुआ।

और आज मेरे देश के कुछ राजनेता यह कहते है कि जिन्नाह महान था। वह अंग्रेजों से लड़ा था।

अरे धिक्कार है तुमको जो तुम अपना इतिहास भूल गए। उन अकथनीय अत्याचारों को भूल गए। उन बलिदानों को भूल गए। अपने ही हाथों से अपनी बेटियों के काटे गए सरों को भूल गए। जिन्नाह को महान बताते हो। कुछ तो शर्म करो।

(यह लेख उन अज्ञात लाखों हिन्दू पूर्वजों को समर्पित है जिन्होंने धर्मरक्षा हेतु अपने पूर्वजों की भूमि को पंजाब और बंगाल में त्याग दिया। मगर अपने पूर्वजों के धर्म को नहीं छोड़ा।)

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*अहिल्या *

“माँ, कहानी सुनाओ ना |”

“अरे…सो जा , बहुत रात हो गई | सबेरे तुझे स्कूल भी जाना है |”

“स्कूल ? ओह ! कल रविवार है ! माँ, तुमको कुछ भी याद नहीं रहता ! ना मुझे कल पढाई की चिंता है और ना ही होमवर्क की ! तुम्हारे पास कहानी का खजाना है | रामायण, महाभारत, पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में तुम हमेशा डूबी रहती हो | जल्दी से एक बढिया कहानी सुनाओ |”

“ बड़ा हठी है | कहानी सुने बिना तू सोयेगा नहीं ! ठीक है, अब ध्यान लगा कर सुन ,

……प्राचीन काल की बात है, गौतम ऋषि न्याय दर्शन के महान विद्वान थे | मिथिला के ब्रह्मपुरी में उनका घर था | उस समय मिथिला के राजा ‘जनक’ , स्वयं एक प्रकांड विद्वान तथा बीतरागी थे | इसलिए तो गौतम को जनक ने अपना कुलगुरु बनाया था |

गौतम की पत्नी का नाम था ‘अहिल्या’ और पुत्र का नाम ‘सदानंद’ था | अहिल्या सुन्दर, व्यवहार कुशल और कर्मठ महिला थीं | दोनों पति-पत्नी सुखपूर्वक जीवन यापन कर रहे थे | गौतम की उत्कट इच्छा थी कि वह न्याय दर्शन की एक विद्यापीठ की स्थापना करें | जिसमें देश-विदेश के बच्चे आकर विद्या अध्ययन का लाभ उठा सके | अहिल्या की भी यही इच्छा थी… कि उसके पति का विद्यापीठ स्थापित हो जाय | और ऐसा ही हुआ | कुछ वर्षों बाद विद्यापीठ की स्थापना हुई |

एकदिन उस विद्यापीठ का उद्घाटन समारोह हो रहा था | राजा जनक और देवताओं के राजा, इन्द्र भी उसमें पधारे | अनेक गणमान्य लोगों के बीच वह समारोह सम्मानित हो रहा था | | अतिथिगण के ठहरने और खाने का भी उत्तम प्रबंध था | समारोह सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ |

रात हो गई थी | सभी लोग भोजन करने के बाद सोने चले गये | गौतम और अहिल्या भी थककर विश्राम करने लगें | लेकिन, देवराज इन्द्र को चैन नहीं था | देवता होने के उपरांत भी … वो कामुक विचार के थे | अहिल्या की सुंदरता और निश्छलता को देखकर वह मोहित हो गये | इसी मोहपाश में फंसकर… उन्होंने मेहमानवाजी का नाजायज फायदा उठाने का निश्चय किया और उसी रात्रि में इन्द्र ने छल पूर्वक अहिल्या का शीलहरण कर लिया |

बात,जंगल की आग की तरह फ़ैल गई और चारोंओर हल्ला मच गया | इसी बीच देवराज इन्द्र रातों-रात वहाँ से भाग निकले | लेकिन भागते-भागते उन्होंने उल्टे अहिल्या पर झूठा लांक्षण लगा दिया कि अहिल्या की सहमति से उसने ऐसा करने का साहस किया |

चूँकि, देवराज इन्द्र सर्व शक्तिमान थे, इसलिए उनसे प्रतिवाद और प्रतिरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं हुई | यहाँ तक कि राजा जनक भी कुछ नहीं कर सके ! सब कुछ जानकर भी वो अनजान बने रहे ! ‘

“माँ, यह तो सरासर गलत हुआ ! धर्म की आड़ में गलत काम का बढाबा ?! सरासर अन्याय है | ऐसे धर्मात्मा या न्य्याविद कहलाने से क्या फायदा, जो विरोध न कर सके ! उनलोगों को खुलकर विरोध करना चाहिए था | न्यायपीठ के अंदर अन्याय हो रहा हो …और सभी गणमान्य चुप रहें ! ये कदापि उचित नहीं | “ किशोर वय बेटा झुंझलाकर बोला |

“अरे बेटा, आगे तो सुन | फिर तुझे सब सही से समझ में आ जाएगा |”

माँ फिर से बेटे को कहानी सुनाने लगी |उसकी चेहरे पर एक अलग ही आभा झलक रही थी | शांत भाव से वह कहने लगी “गौतम और अहिल्या के सपने पर कुठाराघात हो गया ! अहिल्या के कथित धर्म भ्रष्टता के कारण … गौतम समाज की नजरों में अब इस लायक नहीं समझे जाने लगे कि वह विद्यापीठ का नेतृत्व कर सके | इसलिय गौतम को अहिल्या का साथ देना, तत्कालीन समाज की नजरों में भीषण दोष माना जाने लगा !

अहिल्या उदास रहने लगी ! उसको अपना जीवन अब व्यर्थ लगने लगा ! उन्हें यह बात बहुत अधिक कचोटती थी कि उसके ही कारण, गौतम का न्यायपीठ बनाने और उसे स्थापित करने का सपना चूरचूर हो गया |

बेटा, ये सारे विचार अहिल्या की पतिव्रता और कर्तव्य निष्ठा के परिचायक हैं | अब, तू गौतम ऋषि के बारे में सुन | इतना होने के बावजूद भी …गौतम, अपनी पत्नी अहिल्या को निष्कलंक तथा निर्दोष समझते रहे | इसलिए सामाजिक बहिष्कार और प्रताड़ना के बाबजूद, गौतम ने अहिल्या का साथ देने का निश्चय किया और देवराज इन्द्र को उनके अपराध की सजा देने हेतु वो दृढ़प्रतिज्ञ हो गए |

इस बात की जानकारी होते ही अहिल्या वेचैन हो गई |तब जाकर अहिल्या ने निश्चय किया कि वह पति तथा पुत्र को सदा के लिए अपने से दूर, मिथिला की राजधानी भेज देगी| तथा स्वयं, वह तपस्या में लीन हो जायेगी | जिससे विद्यापीठ स्थापित होने में कोई सामाजिक अड़चन नहीं आएगी | तब जाकर विद्यापीठ का नेतृत्व करना गौतम के लिए संभव हो जायेगा और साथ-साथ उनके पुत्र की शिक्षा-दीक्षा भी पूरी हो जायेगी | अहिल्या ने ऐसा करने का प्रण ले लिया |

उसने विद्यापीठ और परिवार की शांति के लिए अपने शेष जीवन को तपस्या में व्यतीत करना उचित समझा | गौतम इस बात का पुरजोर विरोध करते रहे | अहिल्या से बारबार मनुहार करते रहे.. हमदोनों को इसतरह छोड़कर..तुम मत जाओ |

पर, गौतम के लाख विरोध करने के बाबजूद, अहिल्या ने इस बात……………….

‘गौतम राजधानी में विद्यापीठ का नेतृत्व करते हुए संचालन करेंगे और अहिल्या अकेले परित्यक्ता की तरह जीवन यापन करते हुए तपस्या करेगी ‘

……………..को गौतम से आखिर मना ही लिया | अहिल्या के दलील के आगे गौतम नतमस्तक हो गये | एक स्त्री जब कुछ ठान लेती है तो वह करके ही दिखाती है | अहिल्या परित्यक्ता की तरह समाज से अलग-थलग, शिलावत होकर अकेली भगवद भक्ति करते हुए जीवन व्यतीत करने लगी |

इधर गौतम ऋषि , मिथिला की राजधानी में न्यायविद्यापीठ का सञ्चालन करने लगे | उनके विद्यापीठ के प्रताप का डंका सम्पूर्ण भारत में बजने लगा | विद्वत परिषद् की बैठक में गौतम ने यह निर्णय किया कि अब से मिथिला में देवराज इन्द्र की पूजा नहीं होगी | उस समय मिथिला का ही व्यवहार सम्पूर्ण भारत में मान्य था | देवराज इन्द्र की पूजा सम्पूर्ण भारत में बंद हो गयी | भारत के सनातन धर्म में देवराज इन्द्र इस प्रकार बहिष्कृत हो गए |

अहिल्या के साथ किये गए अपराध के लिए देवराज इन्द्र को गौतम ने यह भीषण सजा दिलवाई |

इधर दिन, सप्ताह, महीने, बर्ष बीतते गए | अहिल्या को कुछ भी भान नहीं होता था | वह अपनी तपस्या और दिनचर्या में लीन होकर स्थितप्रज्ञ, पत्थर सामान हो गयी थी |

दीर्घ काल के बाद, राम..जब अपने भाई लक्ष्मण के साथ गुरु विश्वामित्र के निर्देशन में मिथिला जा रहे थे, तब अपने गुरु द्वारा अहिल्या के दुखद वृतांत को सुनकर राम उनके आश्रम में गए | अहिल्या का पैर छूकर उन्होंने आशीर्वाद लिया तथा उनके हाथ से जल लेकर श्रीराम ने पान किया |

भारत का सर्वश्रेष्ठ सूर्यवंशी महाप्रतापी राजा ‘दशरथ’ का ज्येष्ठ पुत्र ‘ श्रीराम’…. श्रेष्ठ्तम धनुर्धर तथा अनेक राक्षसों का संघारक…. ने अहिल्या को सम्मान और स्वीकार्यता प्रदान किया | इसतरह अहिल्या की तपस्या सफल हुई और राम के प्रयास से अहिल्या को अपने एकाकी जीवन से त्राण मिला | पति गौतम और पुत्र सदानंद के साथ फिर से रहने लगी | “

इतना कहते-कहते, माँ की आँखें नम हो गईं | उसने अपने बांहों में जकड़कर बेटे को छाती से लगा लिया और बुदबुदाई , “बेटा,जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, वहीँ देवता का वास होता है |

बेटा , माँ के दैदीप्यमान चेहरे को अचरज भरी नजरों से निहारने लगा…जैसे सामने साक्षात दुर्गा-माँ खड़ी हों |
“ आज मैं अच्छी तरह से समझ पाया कि नारी को ‘शक्ति स्वरूपा’ क्यों कहा जाता है !” बुदबुदाते हुए नन्हे शिशु की भांति माँ के छाती से बेटा लिपट गया |

माँ की आँखों से अब झर- झर अमृत रस बरसने लगीं ।

मिन्नी मिश्रा, पटना
स्वरचित/ मौलिक

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कथा … #शीर्षक:

” अपना -घर ” 🥀🥀”

सुखदा बहुत दिनों बाद आज सुबह ही अमरीका में बसे बेटे के घर से अपने घर वसंतपुर लौटी है।
इस वक्त वह थकी हारी बरामदे में बैठी सामने हरे-भरे वृक्ष,करीने से सजी क्यारियां और फूलों से लदी डालियां निहार कर नयन तृप्त कर रही है।
सुखदा के मन में अपने गाँव -घर के लिए बहुत प्यार है।
जिसे वह अपने मन में ही रखती है। खास कर जब से पति मनोहर जी की मृत्यु हुई है। वो इससे एक पल के लिए भी जुदा नहीं होना चाहती है। उसकी आत्मा इस घर में ही बसती है।

लेकिन आज ,अभी इस वक्त उसका मन बहुत भारी हो रहा है। इस बार लगभग डेढ़ साल के पश्चात वे विदेश में बसे अपने बेटे सुदीप के पास से वापस लौट कर आ पाईं हैं।
रास्ते की थकान और बच्चों के बगैर सूना घर काट खाने को दौड़ रहा है।
पिछले मार्च के महीने में ही वो बेटे के साथ अमरीका गई थी। होली की छुट्टी मनाने तभी भँयकर कोरोना काल की शुरुआत हो गई।
वापसी की सभी फ्लाइट कैंसिल हो जाने की वजह से उसे वंही रुक जाना हुआ था।
इस समय उसके दिमाग में उथलपुथल मची हुई है,
” एक तरफ बच्चों से बिछड़ने का गम सता रहा है , तो दूसरी ओर अपनी धरती पर पैर रखने की खुशी “
क्या करे वो, कैसे निपटे अपनी इस उहापोह वाली मनःस्थिति से।
” यों तो सब कुछ अच्छा चल रहा था। आज्ञाकारी बेटा, निशा भी बहुत अच्छी बहुबेटा साबित हुई है” ।
“फिर दो बेहद प्यारे , चुलबुले पोते मुन्नू और बँटी सब कुछ है वहाँ “।
” फिर ऐसा क्या है? जो मुझे वहाँ नहीं मिल पाता है? जिसकी वजह से मैं विदेश की धरती से कभी जुड़ नहीं पातीं हूँ “।

” ओ…अरे… हाँ…बस एक ही वस्तु है। जो वहाँ मुझे चैन से रहने नहीं देती। पति की याद से परिपूर्ण इस घर की महकती-चहकती अपने वतन की’ मीठी सौंधी वाली खुशबू ‘ और मिठास भरी बोली “।

बहरहाल …वहाँ रहते हुए उसे काफी वक्त बीत गए हैं।
उसका मन अब स्वदेश अपने घर जाने को व्याकुल था।
फिर तो जैसे ही विमान सेवा शुरू हुई बेटे सुदीप ने उनकी वापसी की तैयारी कर दी थी।
अभी वे करीब दो दिन की लम्बी यात्रा कर घर पँहुची ही हैं।
आस- पड़ोस से मिलने-जुलने वाले आकर दुआ-सलाम कर वापस लौट चुके हैं। थोड़ी फुर्सत मिलते ही वो जैसे ही बैठी।

आँख के सामने विगत दो दिन पहले के दृश्य सब एक -एक कर सामने आने लगे,
“विदा के समय मुन्नू और बँटी उनसे लिपट गये थे, बहु निशा के गले लग कर तो उसकी रूलाई ही छूट गई “।
” बेटे के घर में सब कुछ अच्छा है। पोतों से भी मन लगा रहता था, मुन्नू उसके साथ दिन में सोता तो बँटी रात में “।

घर तो पंहुच गई है वो पर खाली क्षण मिलते ही उदास हो रही है।
चारो तरफ सन्नाटा और खुला-खुला आसमान। उसे लगा कोई उनके पास आ कर बैठ रहा है।
फिर वे बेचैन हो कर इधर-उधर घूमने लगी।
तभी फोन की घँटी बजी। सामने वीडियो कॉल पर बेटे को देख गला भर आया।
“बच्चे सब राजी-खुशी हैं ” सुखदा ने पूछा ।
” हाँ मां तुम्हें बहुत मिस कर रहे हैं”। बेटे ने मायूस आवाज में कहा
वो सिर्फ हुँकारी भर कर रह गई ; क्या कहती? उनकी भी हालत समान ही है।
” अब आराम कर लो बेटा ” कह कर फोन काट दिया ।
तभी गेट खुलने की आवाज आई।
भरे आँख से सामने देखी तो पड़ोस वाली हीरा की बहु सुगंधा हाँथ में दतुवन और चाय लिए खड़ी है।
वह हँस कर कह रही है,
” क्यों चाची जी रास्ते का हरारत हो गया का ? चेहरा एकदम से उतर गया है।”
चलो हाँथ- मुंह धो लो, हम तुम्हारे लिए गरम-गरम चाय लेकर आएं हैं”।
उसकी मीठी बोली सुन वे हिचक-हिचक कर रोने लगी।
“और सुक्खी तुम्हारे लिए गर्म-गर्म पूरी छान कर सब्जी के साथ जलेबी भी ला रही है “।
हीरा उन्हें इस कदर रोती देख करीब आ कर कंधे पर प्यार से हाँथ रख कर सहलाने लगी।
” हम समझ रहे हैं चाचीजी तुम्हारे मन की हालत “
फिर थोड़ा रुक कर मनुहार करती हुई प्यार से बोल़ी ,
” और हाँ चाची जी तुम्हारे बिना हम सब भी तो यहाँ बिना गईया वाली ‘बछिया ‘ जैसे हो जाते हैं “
” हाँ नहीं तो, देखो अब इतने दिन खातिर हम सब को छोड़ कर कंही मत जाना”।

मुश्किल की इस घड़ी में उसके यह मीठे शब्द!
” जैसे सुखदा के दुखते तन-मन पर बारिश की ठंडी फुहार बरसा रही है “।

अभूतपूर्व दृश्य है , ” बरसती आंखे , मुस्कुराते होठ , एक तरफ अपनों से बिछड़ने का गम तो दूसरी तरफ बांहों में दुनिया सारी “।

स्वरचित …सीमा वर्मा
पटना ( बिहार )

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नमन मंच 🙏🙏
आपके मंच पर मेरी अगली कहानी आप सभी के लिए

“राखी”

“माँ…सुबह-सुबह क्या खटर -पटर कर कर रही हो किचेन में?”
“अरे बेटा कुछ नहीं, तू बहन के घर जा रहा है…सोचा कुछ अच्छा बना देती हूं ले जाने के लिए। दो-दो खुशियां हैं इसीलिए।
“दो दो खुशियां?”
“हाँ और नहीं तो क्या! एक तो राखी का दिन और दूसरा एक साल बाद तू बहन के घर जा रहा है राखी बंधवाने।
“तो तुम अकेले क्यूँ परेशान हो रही हो,कामवाली को बुला लो।”
“उसकी तबियत ठीक नहीं है।”
“अरे तो उसकी बेटी को बुला लो, वह तो बहुत ही कामकाजी है। लॉक-डाउन में उसने हमारे लिए बहुत कुछ किया है, जब अपने भी मुँह मोड़ कर बैठ गये थे।
“सो तो सब ठीक है ,पर कैसे बुला लूँ बेटा!”
उसके जवान भाई को कोरोना खा गया! राखी की तैयारी देखेगी तो बताओ उस बेचारी बहन पर क्या गुजरेगी।
“हाँ माँ तुम शायद सही कह रही हो।”
“बेटा देखो तो दरवाजे पर कोई है क्या?”
“देखता हूं माँ…।”
दरवाज़ा खोला सामने राधिका खड़ी थी, उसने बड़े प्यार से पूछा- “अब कइसन तबियत हैं भईया जी?”
“हाँ ठीक हूँ। तू क्यों आ गयी?”
“वो माई का तबियत ठीक नहीं था तो….।”
“अच्छा ठीक है, जाकर माँ की थोड़ी मदद कर दो।”
वह सीधे माँ के पास गई और बिना कुछ बोले काम में लग गई। माँ कभी उसका मुँह देखती, कभी बेटे का। पूरे लगन से उसने माँ के साथ मिलकर सारे पकवान बनवाये जो जो बहन को पसंद थी। काम निपटाकर वह बरामदे आकर खड़ी हो गई।
माँ ने पूछा-“तुझे घर नहीं जाना?”
“जी माजी जाना है….लेकिन कुछ देना था।”
“क्या है दिखा?”
“जी ये मैं भईया जी के लिए लाई थी….कहीं वो मना तो नहीं करेंगे ना!”

उसकी मुट्ठी में कागज की पूरिया थी। माँ किसी आशंका से घबड़ा गई।
उन्होंने बेटे को पुकारा- “देख तो बेटा राधिका तुझे कुछ दिखाना चाहती है।”
“क्या है इसमें?”
कांपते हाथ से राधिका ने पूरिया उसके हाथ में थमाकर बोली- “राखी है भईया जी,भाई तो अब रहा नहीं…इतना कह वह सुबकने लगी।”
राखी देख उसकी भी आँखें भर आई। उसने राधिका के माथे पर हाथ रखकर कहा -“तू रो मत, मैं आज से तेरा भाई होने का फर्ज हमेशा निभाऊंगा,मेरी बहन!”
“तुम यही रुको।”
वह अंदर कमरे में गया और एक पैकेट लेकर आया।
“इसे लो…कल पहनकर आना। मैं सबसे पहले तुमसे राखी बंधवाऊंगा, फिर मैं बहन के घर जाऊँगा।
वह चली गई तो माँ ने कहा- “बेटा तूने बहन वाला “उपहार” का पैकेट उसे क्यों दे दिया?”
“माँ, राधिका ने जो हमारे लिए किया है वह तो मेरी सगी बहन ने भी नहीं किया! जब मुझे बुखार हुआ था तो वह तो देखने भी नहीं आई थी कोरोना का हवाला देकर मना कर दिया था। जबकि इस लड़की ने दिन-रात यहीं रुककर मेरी और तुम्हारी जरूरतों का ख्याल रखा था।
“माँ, राखी ख्याल और स्नेह का बंधन है…खून का नहीं!”

स्वरचित एवं मौलिक
डॉ.अनुपमा श्रीवास्तवा 🙏🙏
मुजफ्फरपुर, बिहार

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बाँसुरी वाला आया

बाँसुरी वाला आया बाँसुरी वाला आया कहती हुई मचलती हुई रीता
दौड़ी दौड़ी अपने घर से निकलकर बाँसुरी वाँले के पास आकर खड़ी हुई, ‘आप मुझे बाँसुरी बजाना सिखाओगे?मुझे बाँसुरी की धुन बहुत अच्छी लगती है, मैं हर रोज़ आपकी बाँसुरी की धुन सुनकर बाहर आ जाती हूँ, मुझे आप बाँसुरी बजाते हुए बहुत अच्छे लगते हो!’सारी बातें रीता ने एक साँस में बाँसुरी वाले विजय को कह डाली! विजय ने अचम्भित होते हुए कहा- हाँ हाँ क्यों नहीं ! यहाँ से आधे किलोमीटर की दूरी पे दाहिनी ओर जाने वाले रास्ते में मेरी छोटी सी कुटिया है, वहाँ तुम चार बजे शाम में आ ज़ाया करना, मैं तुम्हें सिखा दिया करूँगा ।
रीता प्रत्येक दिन स्कूल से लौटते हुए विजय के घर जाने लगी। विजय के किराये का घर एक छोटा सा कमरा, उससे सटे एक बाथरूम था। कमरे में छोटी सी चारपाई, बग़ल में एक पढ़ाई की मेज़, जिसपर कुछ किताबें पड़ी हुई और दूसरी ओर एक थोड़ी सी बड़ी मेज़ जिसपर एक स्टोव और कुछ खाना बनाने की सामग्री पड़ी हुई ।रीता बाँसुरी सीखने लगी…विजय ने उसे कई प्रेम धुन बजाना सिखाया, बीच बीच में वह बातें भी करता, कुछ अपनी कहता कुछ उसकी सुनता।कभी चाय वग़ैरह भी पूछ लिया करता। विजय बारहवीं कक्षा में पढ़ता था और रीता दसवीं में।रीता कभी कभी कभी गणित और भौतिकी की समस्याएँ भी पूछ लिया करती ।विजय पूरी संजीदगी से उसे समझाता… रीता उसे एक टक निहारती….यूँ ही समय बीतता गया। रीता के दसवीं क्लास का परीक्षाफल प्रकाशित हुआ । वों पंचानबे प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण हुई। विजय ने उसे बधाई दी और रसगुल्ले खिलाए। कुछ दिनों बाद बारहवीं का भी परीक्षाफल प्रकाशित हुआ । विजय नब्बे प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण हुआ। रीता की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था! बाँसुरी सीखने का सिलसिला पूर्ववत चलता रहा ।क़रीब दो महीने बाद रीता पूर्व की भाँति बाँसुरी सीखने गई। विजय ने उसे ‘हाँ तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे…जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे तुम भी गुनगुनाओगे..’की धुन सिखाई। जाते वक्त विजय ने उसका हाथ अपने हाथों में लेकर कहा- रीता मैं परसों शहर छोड़ कर जा रहा हूँ..मेरा आई आई टी कानपुर में बी टेक कोर्स हेतु दाख़िला हो गया है!कहकर उसने आँखें बंद कर ली! रीता बुत खड़ी रही….
आठ वर्ष उपरांत रीता एक मल्टीनेशनल कम्पनी माइक्रोसॉफ़्ट में एच आर मैनेजर के रूप में कार्यरत थी।कम्पनी में सीनियर एनालिस्ट के पद पर नियुक्ति हेतु इन्जीनियरों के साक्षात्कार चल रहे थे।उत्तीर्ण परीक्षार्थियों का एच आर राउण्ड साक्षात्कार होना था।रीता एक एक कर साक्षात्कार ले रही थी!दस का साक्षात्कार हो चुका था। ग्यारहवें शख़्स ने जैसे ही प्रकोष्ठ में दाख़िला लिया,उसके आँख फटे के फटे रह गये….उसने किसी तरह साक्षात्कार की औपचारिकताएँ पूरी की और ग्यारहवें परीक्षार्थी को उत्तीर्ण घोषित किया।साथ ही एक पर्ची लिखकर बढ़ा दी। पर्ची में लिखा था शाम आठ बजे फ़ोरम मॉल में मिलें!
विजय 7.30 में ही फ़ोरम मॉल पहुँच कर इन्तज़ार करने लगा! रीता की कैब ठीक आठ बजे फ़ोरम मॉल के पास आकर रूकी…. वही लम्बी छरहरी सी काया… ओजस्वी चेहरा आँखों में अद्भुत आत्मविश्वास लिए वो विजय के सामने खड़ी थी…कुछ क्षणों के लिए दोनों चुपचाप खड़े थे! फिर विजय ने हाय कहकर सहज होने की कोशिश की। रीता ने भी हाय कर फूडकोर्ट की तरफ़ इशारा किया । दोनों टेबल के आमने -सामने बैठते हैं ।रीता ने चुप्पी तोड़ते हुए एक साथ कई प्रश्न दागे-‘आपने इस बीच क्या किया? मुझसे सम्पर्क क्यों नहीं किया? मुझसे सम्पर्क करने की कोशिश क्यों नहीं की?’विजय के पास पहले प्रश्न का जवाब तो था पर दूसरे और तीसरे प्रश्न किस अधिकार से पूछे गये, पूरी तरह उसे समझ नहीं सका। उसने कहा पटना से निकलने के बाद मैंने आई आई टी, कानपुर में कम्प्यूटर साइंस में दाख़िला लिया, जैसा कि तुम जानती हो, फिर कैंपस प्लेसमेंट के तहत अमेजन नाम की कम्पनी में मेरी नियुक्ति हुई और मुझे बंगलोर में पद स्थापित किया गया । तब से मैं यहीं कार्यरत हूँ ।….दूसरे और तीसरे प्रश्न का ज़वाब मैं नहीं जानता रीता! रीता स्तब्ध थी, चुप चाप सुनती रही! विजय ने पूछा.. तुम अपनी सुनाओ!रीता ने तन्द्रा भंग करते हुए कहा -मैंने बारहवीं के बाद पटना कॉलेज से अर्थशास्त्र में बी ए किया, फिर मेरा दाख़िला आई आई एम इंदौर में हुआ। वहाँ से मैंने एच आर में एम बी ए की पढ़ाई पूरी की। फिर कैम्पस प्लेसमेंट के तहत माइक्रोसॉफ़्ट कम्पनी में नियुक्ति हुई , तब से यहीं कार्यरत हूँ।अच्छ… यहाँ कहाँ पे रहती हो? विजय ने पूछा।वहीं ऑफिस के पास ही एक पी जी हॉस्टल में। रीता ने कहा। क्यों अकेली रहती हो?… हाँ… माँ कैंसर की बीमारी में चल बसीं… पापा सहन नहीं कर पाये, एक साल के अन्दर ही ह्रदय आघात में चल बसे! भइया-भाभी लन्दन में नौकरी करते हैं। ओह्ह… विजय ने गहरी साँस ली और फिर पूछा- तुमनें शादी नहीं की?नहीं.. संक्षिप्त सा उत्तर!क्यों रीता आख़िर क्यों?विजय ने पूछा !इसके जवाब में रीता सूनी आँखों से उसे देखती रही…आधे घंटे तक मौन व्याप्त रहा… फिर विजय ने कहा- ‘रीता मैं चलता हूँ… अनन्या को मेरे बग़ैर नींद ही नहीं आती… वो अपनी माँ से अधिक मुझसे जुड़ी हुई है! रात के दस बजने को आए, फिर मिलूँगा ‘ यह कहकर वो लिफ़्ट से नीचे उतर गया! रीता सूनी आँखों से फ़ूड कोर्ट की छत ताकती रही..उसके ह्रदय की धड़कनों के साथ कई सवाल धड़कते रहे…क्या हम लड़कियाँ ही केवल भावनात्मक रूप से स्थिर रह सकती है?…भावनात्मक स्थिरता क्या ग़लत है?…. क्या लड़के हमारी भावनाओं को नहीं समझते? या नहीं समझने का स्वाँग रचते हैं?

         स्वरचित 
         रंजना बरियार
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मैंने सुना है, एक बड़ी प्राचीन, तिब्बत में कहानी है। एक आदमी यात्रा से लौटा है–लंबी यात्रा से। अपने मित्र के घर ठहरा और उसने मित्र से कहा , रात, यात्रा की चर्चा करते हुए, कि एक बहुत अनूठी चीज मेरे हाथ लग गई है।

और मैंने सोचा था कि जब मैं लौटूंगा तो अपने मित्र को दे दूंगा, लेकिन अब मैं डरता हूं, तुम्हें दूं या न दूं। डरता हूं इसलिए कि जो भी मैंने उसके परिणाम देखे वे बड़े खतरनाक हैं।

मुझे एक ऐसा ताबीज मिल गया है कि तुम उससे तीन आकांक्षायें मांग लो, वे पूरी हो जाती हैं। और मैंने तीन खुद भी मांग कर देख लीं। वे पूरी हो गई हैं और अब मैं पछताता हूं कि मैंने क्यों मांगीं?

मेरे और मित्रों ने भी मांग कर देख लिए हैं, सब छाती पीट रहे हैं, सिर ठोक रहे हैं। सोचा था तुम्हें दूंगा, लेकिन अब मैं डरता हूं, दूं या न दूं।

मित्र तो दीवाना हो गया। उसने कहा, ‘तुम यह क्या कहते हो; न दूं? कहां है ताबीज? अब हम ज्यादा देर रुक नहीं सकते। क्योंकि कल का क्या भरोसा?’ पत्नी तो बिलकुल पीछे पड़ गई उसके कि निकालो ताबीज। उसने कहा कि ‘भई, मुझे सोच लेने दो। क्योंकि जो परिणाम, सब बुरे हुए।’ उसके मित्र ने कहा, ‘तुमने मांगा ढंग से न होगा। गलत मांग लिया होगा।’

हर आदमी यही सोचता है कि दूसरा गलत मांग रहा है, इसलिए मुश्किल में पड़ा। मैं बिलकुल ठीक मांग लूंगा।

लेकिन कोई भी नहीं जानता कि जब तक तुम ठीक नहीं हो, तुम ठीक मांगोगे कैसे? मांग तो तुमसे पैदा होगी। नहीं माना मित्र, नहीं मानी पत्नी। उन्होंने बहुत आग्रह किया तो ताबीज देकर मित्र उदास चला गया। सुबह तक ठहरना मुश्किल था।

दोनों ने सोचा, क्या मांगें? बहुत दिन से एक आकांक्षा थी कि घर में कम से कम एक लाख रुपया हो। तो पहला लखपति हो जाने की आकांक्षा थी। और लखपति तिब्बत में बहुत बड़ी बात है। तो उन्होंने कहा, वह पहली आकांक्षा तो पूरी कर ही लें, फिर सोचेंगे। तो पहली आकांक्षा मांगी कि लाख रुपया।

जैसे ही कोई आकांक्षा मांगोगे, ताबीज हाथ से गिरता था झटक कर। उसका मतलब था कि मांग स्वीकार हो गई। बस, पंद्रह मिनट बाद दरवाजे पर दस्तक पड़ी।

खबर आई कि लड़का जो राजा की सेना में था, वह मारा गया और राजा ने लाख रुपये का पुरस्कार दिया। पत्नी तो छाती पीट कर रोने लगी कि यह क्या हुआ?

उसने कहा कि दूसरी आकांक्षा इसी वक्त मांगो कि मेरा लड़का जिंदा किया जाए। बाप थोड़ा डरा। उसने कहा कि यह अभी जो पहली का फल हुआ…पर पत्नी एकदम पीछे पड़ी थी कि देर मत करो कहीं वे दफना न दें, कहीं लाश सड़-गल न जाए, जल्दी मांगो।

तो दूसरी आकांक्षा मांगी कि लड़का हमारा वापिस लौटा दिया जाए। ताबीज गिरा। पंद्रह मिनट बाद दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। लड़के के पैर की आहट थी। उसने जोर से कहा, ‘पिताजी।’ आवाज भी सुनाई पड़ी, पर दोनों बहुत डर गये। इतने जल्दी लड़का आ गया? बाप ने बाहर झांक कर देखा, वहां कोई दिखाई नहीं पड़ता। खिड़की में से देखा, वहां कोई दिखाई नहीं पड़ता, कोई चलता-फिरता मालूम होता है।

वह लड़का प्रेत होकर वापिस आ गया। क्योंकि शरीर तो दफना दिया जा चुका था। पत्नी और पति दोनों घबड़ा रहे हैं, कि अब क्या करें? दरवाजा खोलें कि नहीं? क्योंकि तुमने भला कितना ही लड़के को प्रेम किया हो, अगर वह प्रेत होकर आ जाए तो हिम्मत पस्त हो जायेगी।

बाप ने कहा, ‘रुक अभी एक आकांक्षा और मांगने को बाकी है।’ और उसने ताबीज से कहा, ‘कृपा कर और इस लड़के से छुटकारा। नहीं तो अब यह सतायेगा जिंदगी भर।
यह प्रेत अगर यहां रह गया घर में…इससे छुटकारा करवा दे।’ और पति आधी रात गया ताबीज देने अपने मित्र को वापिस। और कहा कि, ‘इसे तुम कहीं फेंक ही दो। अब किसी को भूल कर मत देना।’

तुम्हारी पूरी जिंदगी की कथा इस ताबीज की कथा में छिपी है। जो तुम मांगते हो वह मिल जाता है। नहीं मिलता है तो तुम परेशान होते हो। मिल जाता है, फिर तुम परेशान होते हो। गरीब दुखी दिखता है, अमीर और भी दुखी दिखता है।

जिसकी शादी नहीं हुई वह परेशान है, जिसकी शादी हो गई है वह छाती पीट रहा है, सिर ठोंक रहा है। जिसको बच्चे नहीं हैं वह घूम रहा है साधु-संतों के सत्संग में, कि कहीं बच्चा मिल जाए। और जिनको बच्चे हैं, वे कहते हैं, कैसे इनसे छुटकारा होगा। यह क्या उपद्रव हो गया।

तुम्हारे पास कुछ है तो तुम रो रहे हो; तुम्हारे पास कुछ नहीं है तो तुम रो रहे हो। और मौलिक कारण यह है कि तुम गलत हो। इसलिए तुम जो भी चाहते हो, वह गलत ही चाहते हो।

इसलिए समझदार व्यक्ति परमात्मा से यह नहीं कहता कि मेरी प्रार्थना पूरी करना, वह उससे कहता है, ‘जो तेरी मर्जी, वह तू पूरी करना।

क्योंकि हम तो यह भी नहीं जानते, क्या मांगें? हम तो गलत ही मांगेंगे, क्योंकि हम गलत हैं। हमारी तो मांग भी उपद्रव होगी।’

और तुम्हारे पूरे जीवन की कथा यही है कि जो तुमने मांगा, वह तुम्हें मिल गया। फिर तुम उससे परेशान हो रहे हो। न मिलता तो रोते; मिल गया तो रो रहे हो। और तुम कभी गौर करके नहीं देखते।

🌹🌹ओशो 🌹🌹
दीया तले अंधेरा–(सूफी-कथा)

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐भगवान् का साथ💐💐

एक बुजुर्ग दरिया के किनारे पर जा रहे थे। एक जगह देखा कि दरिया की सतह से एक कछुआ निकला और पानी के किनारे पर आ गया।

उसी किनारे से एक बड़े ही जहरीले बिच्छु ने दरिया के अन्दर छलांग लगाई और कछुए की पीठ पर सवार हो गया। कछुए ने तैरना शुरू कर दिया। वह बुजुर्ग बड़े हैरान हुए।

उन्होंने उस कछुए का पीछा करने की ठान ली। इसलिए दरिया में तैर कर उस कछुए का पीछा किया।

वह कछुआ दरिया के दूसरे किनारे पर जाकर रूक गया। और बिच्छू उसकी पीठ से छलांग लगाकर दूसरे किनारे पर चढ़ गया और आगे चलना शुरू कर दिया।

वह बुजुर्ग भी उसके पीछे चलते रहे। आगे जाकर देखा कि जिस तरफ बिच्छू जा रहा था उसके रास्ते में एक भगवान् का भक्त ध्यान साधना में आँखे बन्द कर भगवान् की भक्ति कर रहा था।

उस बुजुर्ग ने सोचा कि अगर यह बिच्छू उस भक्त को काटना चाहेगा तो मैं करीब पहुँचने से पहले ही उसे अपनी लाठी से मार डालूँगा।

लेकिन वह कुछ कदम आगे बढे ही थे कि उन्होंने देखा दूसरी तरफ से एक काला जहरीला साँप तेजी से उस भक्त को डसने के लिए आगे बढ़ रहा था। इतने में बिच्छू भी वहाँ पहुँच गया।

उस बिच्छू ने उसी समय सांप डंक के ऊपर डंक मार दिया, जिसकी वजह से बिच्छू का जहर सांप के जिस्म में दाखिल हो गया और वह सांप वहीं अचेत हो कर गिर पड़ा था। इसके बाद वह बिच्छू अपने रास्ते पर वापस चला गया।

थोड़ी देर बाद जब वह भक्त उठा, तब उस बुजुर्ग ने उसे बताया कि भगवान् ने उसकी रक्षा के लिए कैसे उस कछुवे को दरिया के किनारे लाया, फिर कैसे उस बिच्छु को कछुए की पीठ पर बैठा कर साँप से तेरी रक्षा के लिए भेजा।

वह भक्त उस अचेत पड़े सांप को देखकर हैरान रह गया। उसकी आँखों से आँसू निकल आए, और वह आँखें बन्द कर प्रभु को याद कर उनका धन्यवाद करने लगा,

तभी “”प्रभु”” ने अपने उस भक्त से कहा, जब वो बुजुर्ग जो तुम्हे जानता तक नही, वो तुम्हारी जान बचाने के लिए लाठी उठा सकता है। और फिर तू तो मेरी भक्ति में लगा हुआ था तो फिर तुझे बचाने के लिये मेरी लाठी तो हमेशा से ही तैयार रहती है…!

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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(((( गजेन्द्र मोक्ष महात्म्य एवं स्तोत्र ))))
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क्षीरसागर में स्थित त्रिकूट पर्वत पर लोहे, चांदी और सोने की तीन विशाल चोटियां थीं. उनके बीच विशाल जंगल में गजेंद्र हाथी अपनी असंख्य पत्नियों के साथ रहता था.
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एक बार गजेंद्र अपनी पत्नियों के साथ प्यास बुझाने के लिए एक तालाब पर पहुंचा. प्यास बुझाने के बाद गजेंद्र की जल-क्रीड़ा करने की इच्छा हुई. वह पत्नियों के साथ तालाब में क्रीडा करने लगा.
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दुर्भाग्यवश उसी समय एक अत्यंत विशालकाय ग्राह (मगरमच्छ) वहां पहुंचा. उसने गजेंद्र के दाएं पैर को अपने दाढ़ों में जकड़कर तालाब के भीतर खींचना शुरू किया.
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गजेंद्र पीड़ा से चिंघाड़ने लगा. उसकी पत्नियां तालाब के किनारे अपने पति के दुख पर आंसू बहाने लगीं. गजेंद्र अपने पूरे बल के साथ ग्राह से युद्ध कर रहा था.
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परंतु वह ग्राह की पकड़ से मुक्त नहीं हो पा रहा था. गजेंद्र अपने दाँतों से मगरमच्छ पर वार करता तो ग्राह उसके शरीर को अपने नाखूनों से खरोंच लेता और खून की धारा निकल आतीं.
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ग्राह और हाथी के बीच बहुत समय तक युद्ध हुआ. पानी के अंदर ग्राह की शक्ति ज़्यादा होती है. ग्राह गजेंद्र का खून चूसकर बलवान होता गया जबकि गजेंद्र के शरीर पर मात्र कंकाल शेष था.
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गजेंद्र दुखी होकर सोचने लगा- मैं अपनी प्यास बुझाने यहां आया था. प्यास बुझाकर मुझे चले जाना चाहिए था. मैं क्यों इस तालाब में उतर पड़ा? मुझे कौन बचायेगा?
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उसे अपनी मृत्यु दिख रही थी. फिर भी मन के किसी कोने में यह विश्वास था कि उसने इतना लंबा संघर्ष किया है, उसकी जान बच सकती है.
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उसे ईश्वर का स्मरण हुआ तो नारायण की स्तुति कर उन्हें पुकारने लगा.
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सारा संसार जिनमें समाया हुआ है, जिनके प्रभाव से संसार का अस्तित्व है, जो इसमें व्याप्त होकर इसके रूपों में प्रकट होते हैं, मैं उन्हीं नारायण की शरण लेता हूं. हे नारायण मुझ शरणागत की रक्षा करिए.
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विविधि लीलाओं के कारण देवों, ऋषियों के लिए अगम्य अगोचर बने जिन श्रीहरि की महिमा वर्णन से परे है. मैं उस दयालु नारायण से प्राण रक्षा की गुहार लगाता हूं.
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नारायण के स्मरण से गजेंद्र की पीड़ा कुछ कम हुई. प्रभु के शरणागत को कष्ट देने वाले ग्राह के जबड़ों में भयंकर दर्द शुरू हुआ फिर भी वह क्रोध में जोर से उसके पैर चबाने लगा.
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छटपटाते गजेंद्र ने स्मरण किया- मुझ जैसे घमण्डी जब तक संकट में नहीं फंसते, तब तक आपको याद नहीं करते. यदि दुख न हो तो हमें आपकी ज़रूरत का बोध नहीं होता.
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आप जब तक प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते, तब तक प्राणी आपका अस्तित्व तक नहीं मानता लेकिन कष्ट में आपकी शरण में पहुंच जाता है. जीवों की पीड़ा को हरने वाले देव आप सृष्टि के मूलभूत कारण हैं.
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गजेंद्र ने श्रीहरि की स्तुति जारी रखी- मेरी प्राण शक्ति जवाब दे चुकी हैं. आंसू सूख गए हैं. मैं ऊंचे स्वर में पुकार भी नहीं सकता. आप चाहें तो मेरी रक्षा करें या मेरे हाल पर छोड़ दें.
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सब आपकी दया पर निर्भर है. आपके ध्यान के सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं. मुझे बचाने वाला भी आपके सिवाय कोई नहीं है. यदि मृत्यु भी हुई तो आपका स्मरण करते मरूंगा.
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पीड़ा से तड़पता गजेंद्र सूंड उठाकर आसमान की ओर देखने लगा. मगरमच्छ को लगा कि उसकी शक्ति जवाब देती जा रही है. उसका मुंह खुलता जा रहा है.
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भक्त की करूणाभरी पुकार सुनकर नारायण आ पहुंचे. गजेंद्र ने उस अवस्था में भी तालाब का कमलपुष्प और जल प्रभु के चरणों में अर्पण किया. प्रभु भक्त की रक्षा को कूद पड़े.
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उन्होंने ग्राह के जबड़े से गजेंद्र का पैर निकाला और चक्र से ग्राह का मुख चीर दिया. ग्राह तुरंत एक गंधर्व में बदल गया. दरअसल वह ग्राह हुहू नामक एक गंधर्व था.
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एक बार देवल ऋषि पानी में खड़े होकर तपस्या कर रहे थे. गंधर्व को शरारत सूझी. उसने ग्राह रूप धरा और जल में कौतुक करते हुए ऋषि के पैर पकड़ लिए.
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क्रोधित ऋषि ने उसे शाप दिया कि तुम मगरमच्छ की तरह इस पानी में पड़े रहो किंतु नारायण के प्रभाव से वह शापमुक्त होकर अपने लोक को चला गया.
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श्रीहरि के दर्शन से गजेंद्र भी अपनी खोई हुई ताक़त और पूर्व जन्म का ज्ञान भी प्राप्त कर सका. गजेंद्र पिछले जन्म में इंद्रद्युम्न नामक एक विष्णुभक्त राजा थे.
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श्रीविष्णु के ध्यान में डूबे राजा ने एक बार ऋषि अगस्त्य के आगमन का ख़्याल न किया. राजा ने युवावस्था में ही गृहस्थ आश्रम को त्यागकर वानप्रस्थ ले लिया.
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राजा ब्रह्मा द्वारा प्रतिपादित आश्रम व्यवस्था को भंग कर रहा था, ऋषि इससे भी क्षुब्ध थे. उन्होंने शाप दिया- तुम किसी व्यवस्था को नहीं मानते इसलिए अगले जन्म में मत्त हाथी बनोगे.
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राजा ने शाप स्वीकार करते हुए ऋषि से अनुरोध किया कि मैं अगले जन्म में भी नारायण भक्त रहूं. अगस्त्य उसकी नारायण भक्ति से प्रसन्न हुए और तथास्तु कहा.
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श्रीहरि की कृपा से गजेंद्र शापमुक्त हुआ. नारायण ने उसे अपना सेवक पार्षद बना लिया.
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गजेंद्र ने पीड़ा में छटपटाते हुए नारायण की स्तुति में जो श्लोक कहे थे उसे गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र कहा जाता है।
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कर्ज से मुक्ति पाने के लिए गजेन्द्र-मोक्ष स्तोत्र का सूर्योदय से पूर्व प्रतिदिन पाठ करना चाहिए। यह ऐसा अमोघ उपाय है जिससे बड़ा से बड़ा कर्ज भी श‍ीघ्र उतर जाता है।
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गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत्र हिंदी अनुवाद सहित श्रीमद्भागवतान्तर्गत गजेन्द्र कृत भगवान का स्तवन
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श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहा
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एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥
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बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने लगा ॥
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गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा –
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ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥१॥
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जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भांति व्यवहार करने लगते हैं), ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥
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यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥
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जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह निकला है , जिन्होने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप – बिना किसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूं ॥
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यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम ।
अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोवतु मां परात्परः ॥४॥
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अपने संकल्प शक्ति के द्वार अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र प्रसिद्ध कार्य कारण रूप जगत को जो अकुण्ठित दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं उनसे लिप्त नही होते, वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥
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कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।
तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥
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समय के प्रवाह से सम्पूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादि लोकपालों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी परमकरुणारूप प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥
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न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥
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भिन्न भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रधान देवता तथा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नही जानते , फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है – वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें ।
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दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥
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आसक्ति से सर्वदा छूटे हुए , सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले , सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रह कर अखण्ड ब्रह्मचार्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गति हैं ।
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न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यः
स्वमायया तान्युलाकमृच्छति ॥८॥
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जिनका हमारी तरह कर्मवश ना तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ।।
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तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥
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उन अन्नतशक्ति संपन्न परं ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । उन प्राकृत आकाररहित एवं अनेको आकारवाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारंबार नमस्कार है
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नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥
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स्वयं प्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं, बार बार नमस्कार है ॥
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सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥
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विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणविशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष सुख की अनुभूति रूप प्रभु को नमस्कार है ॥
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नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥
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सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त , रजोगुण को स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके मूढ से प्रतीत होने वाले, भेद रहित, अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥
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क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥
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शरीर इन्द्रीय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी रूप आपको नमस्कार है । सबके अन्तर्यामी , प्रकृति के भी परम कारण, किन्तु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥
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सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः ॥१४॥
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सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण रूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥
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नमो नमस्ते खिल कारणाय
निष्कारणायद्भुत कारणाय ।
सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥
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सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण, अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है । सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है ॥
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गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥
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जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानरूप अग्नि हैं, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य वृत्ति जागृत हो उठती है तथा आत्म तत्त्व की भावना के द्वारा विधि निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥
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मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥
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मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्याधिक दयालू एवं दया करने में कभी आलस्य ना करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है । अपने अंश से संपूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्व नियन्ता अनन्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥
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आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥
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शरीर, पुत्र, मित्र, घर, संपंत्ती एवं कुटुंबियों में आसक्त लोगों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाले तथा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित ज्ञानस्वरूप , सर्वसमर्थ भगवान को नमस्कार है ॥
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यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम ॥१९॥
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जिन्हे धर्म, अभिलाषित भोग, धन तथा मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं अपितु जो उन्हे अन्य प्रकार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्ती से सदा के लिये उबार लें ॥
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एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥
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जिनके अनन्य भक्त -जो वस्तुतः एकमात्र उन भगवान के ही शरण है-धर्म , अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नही चाह्ते, अपितु उन्ही के परम मंगलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥
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तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम।
अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥
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उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादि के भी नियामक, अभक्तों के लिये प्रकट होने पर भी भक्तियोग द्वारा प्राप्त करने योग्य, अत्यन्त निकट होने पर भी माया के आवरण के कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होने वाले , इन्द्रियों के द्वारा अगम्य तथा अत्यन्त दुर्विज्ञेय, अन्तरहित किंतु सबके आदिकारण एवं सब ओर से परिपूर्ण उन भगवान की मैं स्तुति करता हूँ ॥
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यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥
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ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा संपूर्ण चराचर जीव नाम और आकृति भेद से जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥
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यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः ।
तथा यतोयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥
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जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि से लपटें तथा सूर्य से किरणें बार बार निकलती है और पुनः अपने कारण मे लीन हो जाती है उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीर – यह गुणमय प्रपंच जिन स्वयंप्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और पुनः उन्ही में लीन हो जात है ॥
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स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४॥
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वे भगवान न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक (मनुष्य से नीची – पशु , पक्षी आदि किसी) योनि के प्राणी है। न वे स्त्री हैं न पुरुष और नपुंसक ही हैं। न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश हो सके। न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही। सबका निषेध हो जाने पर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ है। ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिये आविर्भूत हों॥
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जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥
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मैं इस ग्राह के चंगुल से छूट कर जीवित नही रहना चाहता; क्योंकि भीतर और बाहर – सब ओर से अज्ञान से ढके हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है । मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान की निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका कालक्रम से अपने आप नाश नही होता , अपितु भगवान की दया से अथवा ज्ञान के उदय से होता है ॥
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सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम ॥२६॥
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इस प्रकार मोक्ष का अभिलाषी मैं विश्व के रचियता, स्वयं विश्व के रूप में प्रकट तथा विश्व से सर्वथा परे, विश्व को खिलौना बनाकर खेलने वाले, विश्व में आत्मरूप से व्याप्त , अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्त्य वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्री भगवान को केवल प्रणाम ही करता हूं, उनकी शरण में हूँ ।।
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योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम ॥२७॥
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जिन्होने भगवद्भक्ति रूप योग के द्वारा कर्मों को जला डाला है, वे योगी लोग उसी योग के द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदय में जिन्हे प्रकट हुआ देखते हैं उन योगेश्वर भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ ॥
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नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥
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जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप ) शक्तियों का रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे हैं, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयों में ही रची पची रहती हैं-ऐसे लोगों को जिनका मार्ग भी मिलना असंभव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपारशक्तिशाली आपको बार बार नमस्कार है ॥
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नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम ॥२९॥
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जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढंके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नही पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण आया हूँ ॥
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श्री शुकदेव उवाच – श्री शुकदेवजी ने कहा –
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एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत ॥३०॥
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जिसने पूर्वोक्त प्रकार से भगवान के भेदरहित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था , उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नही आये, जो भिन्न भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब सक्षात श्री हरि- जो सबके आत्मा होने के कारण सर्वदेवस्वरूप हैं-वहाँ प्रकट हो गये ॥
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तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि : ।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान –
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥
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उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुःखी देख कर तथा उसके द्वारा पढी हुई स्तुति को सुन कर सुदर्शनचक्रधारी जगदाधार भगवान इच्छानुरूप वेग वाले गरुड जी की पीठ पर सवार होकर स्तवन करते हुए देवताओं के साथ तत्काल उस स्थान अपर पहुँच गये जहाँ वह हाथी था ।
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सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरि ख उपात्तचक्रम ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा –
न्नारायण्खिलगुरो भगवान नम्स्ते ॥३२॥
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सरोवर के भीतर महाबली ग्राह के द्वारा पकडे जाकर दुःखी हुए उस हाथी ने आकाश में गरुड की पीठ पर सवार चक्र उठाये हुए भगवान श्री हरि को देखकर अपनी सूँड को -जिसमें उसने (पूजा के लिये) कमल का एक फूल ले रक्खा था-ऊपर उठाया और बडी ही कठिनाई से “सर्वपूज्य भगवान नारायण आपको प्रणाम है” यह वाक्य कहा ॥
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तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
ग्राहाद विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम ॥३३॥
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उसे पीडित देख कर अजन्मा श्री हरि एकाएक गरुड को छोडकर नीचे झील पर उतर आये । वे दया से प्रेरित हो ग्राहसहित उस गजराज को तत्काल झील से बाहर निकाल लाये और देवताओं के देखते देखते चक्र से मुँह चीर कर उसके चंगुल से हाथी को उबार लिया॥
((((((( जय जय श्री राधे )))))))
RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI
VERY GOOD MORNING JI

रानी बंसल

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om namo bhagavate vasudevaye namah ji Om namo narayan ji 🚩दो अनमोल रत्न🚩

एक साधु घाट किनारे अपना डेरा डाले हुए था. वहाँ वह धुनी रमा कर दिन भर बैठा रहता और बीच-बीच में ऊँची आवाज़ में चिल्लाता, “जो चाहोगे सो पाओगे!”

उस रास्ते से गुजरने वाले लोग उसे पागल समझते थे. वे उसकी बात सुनकर अनुसना कर देते और जो सुनते, वे उस पर हँसते थे.

एक दिन एक बेरोजगार युवक उस रास्ते से गुजर रहा था. साधु की चिल्लाने की आवाज़ उसके कानों में भी पड़ी – “जो चाहोगे सो पाओगे!

” “जो चाहोगे सो पाओगे!”
ये वाक्य सुनकर वह युवक साधु के पास आ गया और उससे पूछने लगा, “बाबा! आप बहुत देर से जो चाहोगे सो पाओगे चिल्ला रहे हो. क्या आप सच में मुझे वो दे सकते हो, जो मैं पाना चाहता हूँ?”
साधु बोला, “हाँ बेटा, लेकिन पहले तुम मुझे ये बताओ कि तुम पाना क्या चाहते हो?”

“बाबा! मैं चाहता हूँ कि एक दिन मैं हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनूँ. क्या आप मेरी ये इच्छा पूरी कर सकते हैं?” युवक बोला.“बिल्कुल बेटा!

मैं तुम्हें एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने चाहे हीरे-मोती बना लेना.” साधु बोला. साधु की बात सुनकर युवक की आँखों में आशा की ज्योति चमक उठी.

फिर साधु ने उसे अपनी दोनों हथेलियाँ आगे बढ़ाने को कहा.
युवक ने अपनी हथेलियाँ साधु के सामने कर दी. साधु ने पहले उसकी एक हथेली पर अपना हाथ रखा और बोला,

“बेटा, ये इस दुनिया का सबसे अनमोल हीरा है. इसे ‘समय’ कहते हैं. इसे जोर से अपनी मुठ्ठी में जकड़ लो. इसके द्वारा तुम जितने चाहे उतने हीरे बना सकते हो. इसे कभी अपने हाथ से निकलने मत देना.”

फिर साधु ने अपना दूसरा हाथ युवक की दूसरी हथेली पर रखकर कहा, “बेटा, ये दुनिया का सबसे कीमती मोती है.
इसे ‘धैर्य’ कहते हैं. जब किसी कार्य में समय लगाने के बाद भी वांछित परिणाम प्राप्त ना हो, तो इस धैर्य नामक मोती को धारण कर लेना. यदि यह मोती तुम्हारे पास है, तो तुम दुनिया में जो चाहो, वो हासिल कर सकते हो.”

युवक ने ध्यान से साधु की बात सुनी और उन्हें धन्यवाद कर वहाँ से चल पड़ा. उसे सफ़लता प्राप्ति के दो गुरुमंत्र मिल गए थे.

उसने निश्चय किया कि वह कभी अपना समय व्यर्थ नहीं गंवायेगा और सदा धैर्य से काम लेगा.

कुछ समय बाद उसने हीरे के एक बड़े व्यापारी के यहाँ काम करना प्रारंभ किया. कुछ वर्षों तक वह दिल लगाकर व्यवसाय का हर गुर सीखता रहा और एक दिन अपनी मेहनत और लगन से अपना सपना साकार करते हुए हीरे का बहुत बड़ा व्यापारी बना.

सीख – लक्ष्य प्राप्ति के लिए सदा ‘समय’ और ‘धैर्य’ नाम के हीरे-मोती अपने साथ रखें.

अपना समय कभी व्यर्थ ना जाने दें और कठिन समय में धैर्य का दामन ना छोड़ें. सफ़लता अवश्य प्राप्त होगी.

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🙏om namo bhagavate vasudevaye namah🙏

माधव गोयल

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🌸सोच क्या है-सच क्या है🌸

🌼” माँ, मुझे कुछ महीने के लिये विदेश जाना पड़ रहा है। तेरे रहने का इन्तजाम मैंने करा दिया है।”*
तक़रीबन 32 साल के , अविवाहित डॉक्टर सुदीप ने देर रात घर में घुसते ही कहा।
” बेटा, तेरा विदेश जाना ज़रूरी है क्या ?” माँ की आवाज़ में चिन्ता और घबराहट झलक रही थी।
” माँ, मुझे इंग्लैंड जाकर कुछ रिसर्च करनी है। वैसे भी कुछ ही महीनों की तो बात है।” सुदीप ने कहा।
” जैसी तेरी इच्छा।” मरी से आवाज़ में माँ बोली।
और छोड़ आया सुदीप अपनी माँ ‘प्रभा देवी’ को पड़ोस वाले शहर में स्थित एक वृद्धा-आश्रम में।
वृद्धा-आश्रम में आने पर शुरू-शुरू में हर बुजुर्ग के चेहरे पर जिन्दगी के प्रति हताशा और निराशा साफ झलकती थी। पर प्रभा देवी के चेहरे पर वृद्धा-आश्रम में आने के बावजूद कोई शिकन तक न थी।
एक दिन आश्रम में बैठे कुछ बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे। उनमें दो-तीन महिलायें भी थीं। उनमें से एक ने कहा, ” डॉक्टर का कोई सगा-सम्बन्धी नहीं था जो अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया।”
तो वहाँ बैठी एक महिला बोली, ” प्रभा देवी के पति की मौत जवानी में ही हो गयी थी। तब सुदीप कुल चार साल का था।पति की मौत के बाद, प्रभा देवी और उसके बेटे को रहने और खाने के लाले पड़ गये। तब किसी भी रिश्तेदार ने उनकी मदद नहीं की। प्रभा देवी ने लोगों के कपड़े सिल-सिल कर अपने बेटे को पढ़ाया। बेटा भी पढ़ने में बहुत तेज था, तभी तो वो डॉक्टर बन सका।”
वृद्धा-आश्रम में करीब 6 महीने गुज़र जाने के बाद एक दिन प्रभा देवी ने आश्रम के संचालक राम किशन शर्मा जी के ऑफिस के फोन से अपने बेटे के मोबाईल नम्बर पर फोन किया, और कहा, ” सुदीप तुम हिंदुस्तान आ गये हो या अभी इंग्लैंड में ही हो ?”
” माँ, अभी तो मैं इंग्लैंड में ही हूँ।” सुदीप का जवाब था।

  तीन-तीन, चार-चार महीने के अंतराल पर प्रभा देवी सुदीप को फ़ोन करती उसका एक ही जवाब होता, " मैं अभी वहीं हूँ, जैसे ही अपने देश आऊँगा तुझे बता दूँगा।"
        इस तरह तक़रीबन दो साल गुजर गये। अब तो वृद्धा-आश्रम के लोग भी कहने लगे कि देखो कैसा चालाक बेटा निकला, कितने धोखे से अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया। आश्रम के ही किसी बुजुर्ग ने कहा, *" मुझे तो लगता नहीं कि डॉक्टर विदेश-पिदेश गया होगा, वो तो बुढ़िया से छुटकारा पाना चाह रहा था।"*

तभी किसी और बुजुर्ग ने कहा, ” मगर वो तो शादी-शुदा भी नहीं था।”
” अरे होगी उसकी कोई ‘गर्ल-फ्रेण्ड’ , जिसने कहा होगा पहले माँ के रहने का अलग इंतजाम करो, तभी मैं तुमसे शादी करुँगी।”
दो साल आश्रम में रहने के बाद अब प्रभा देवी को भी अपनी नियति का पता चल गया। बेटे का गम उसे अंदर ही अंदर खाने लगा। वो बुरी तरह टूट गयी।
तीन साल आश्रम में और रहने के बाद एक दिन प्रभा देवी की मौत हो गयी। उसकी मौत पर आश्रम के लोगों ने आश्रम के संचालक शर्मा जी से कहा, ” इसकी मौत की खबर इसके बेटे को तो दे दो। हमें तो लगता नहीं कि वो विदेश में होगा, वो होगा यहीं कहीं अपने देश में।”
” इसके बेटे को मैं कैसे खबर करूँ । उसे मरे तो तीन साल हो गये।”
शर्मा जी की यह बात सुन वहाँ पर उपस्थित लोग सनाका खा गये।
उनमें से एक बोला, ” अगर उसे मरे तीन साल हो गये तो प्रभा देवी से मोबाईल पर कौन बात करता था।”
” वो मोबाईल तो मेरे पास है, जिसमें उसके बेटे की रिकॉर्डेड आवाज़ है।” शर्मा जी बोले।
“पर ऐसा क्यों ?” किसी ने पूछा।
तब शर्मा जी बोले कि करीब चार साल पहले जब सुदीप अपनी माँ को यहाँ छोड़ने आया तो उसने मुझसे कहा, ” शर्मा जी मुझे ‘ब्लड कैंसर’ हो गया है। और डॉक्टर होने के नाते मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि इसकी आखिरी स्टेज में मुझे बहुत तकलीफ होगी। मेरे मुँह से और मसूड़ों आदि से खून भी आयेगा। मेरी यह तकलीफ़ माँ से देखी न जा सकेगी। वो तो जीते जी ही मर जायेगी। मुझे तो मरना ही है पर मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण मेरे से पहले मेरी माँ मरे। मेरे मरने के बाद दो कमरे का हमारा छोटा सा ‘फ्लेट’ और जो भी घर का सामान आदि है वो मैं आश्रम को दान कर दूँगा।”

🙏सदैव प्रसन्न रहिये🙏
🌷जो प्राप्त है-पर्याप्त है🌷

वी डी शर्मा