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यादें शेष …
जैसे जैसे रक्षाबंधन का त्यौहार पास आ रहा है ,वैसे वैसे रूपा का मन बेचैन होता जा रहा था !
अपने मन को बहुत इधर उधर करने कि कोशिश करती, लेकिन मन है कि , यादों में डूबता जा रहा था , जिन्हें अब याद करने से भी दिल का कोना ओर आँखे भीग जाती !
याद आ रहे थे पुराने दिन, जब राखी का त्यौहार मन में उल्लास ओर उमंग भर देता था ।
राखी पर क्या उपहार खरीदना है ,उसे क्या मिठाई पसन्द है ! कैसा शर्ट उस पर खिलेगा ! छोटी बहनों कि भी पूरी जिम्मेदारी रहती थी कि ,पीहर में राखी का त्यौहार इस तरह मनाऐं कि, माँ पिताजी ,बेटियों के जाने के बाद भी महीनों बीते हुए सुंदर पलों को याद कर खुश होते रहें !
पीहर में राखी मनाकर मीठी मीठी यादें ! ले दे कर सब अपने घर चली आती !
तब रूपा और छोटी बहनों ने सोचा भी नही था कि , जिस त्यौहार का कई दिनों पहले से इन्तजार रहता था ! वही त्यौहार इतना सुना और बेरंग हो जाएगा ओर ,पूरे घर की खुशियों में ग्रहण लगा देगा ! वक्त ने ऐसा खेल किया कि, जिस प्यारे राजा भैया जो ,सच मे भी किसी राजकुमार से कम नही था, बहनों की आंखों का तारा !
जिसकी हर फ़रमाइश पूरी करने के लिए माँ पिताजी और बहनें हरदम तैयार रहती , एक दिन घर से ऐसे निकला कि ,घर वापस आ ही नही पाया ! बाईक एक्सीडेंट में रक्षाबंधन के दिन हमेशा के लिए चला गया । और छोड़ गया माँ पिताजी का आँगन ,और सुनी पथराई आँखे। ऐसा सुंदर और पवित्र त्यौहार ! लेकिन , रूपा और छोटी बहनों के लिए अर्थहीन हो गया!
माँ बाबूजी अकेले रहकर दुःखी न हो , वह पीहर जरूर जाती हैं ! बाबूजी कहते हैं ,अभी हम तो जीवित हैं !
भाई के दुर्घटना होने के बाद डॉक्टर ने जब उसके ना बचने कि खबर दी ,तब वह टूट गए थे ,और बड़े ही भारी मन से उन्होंने उसकी आँखे दान करने का मन बना लिया था !
“कि किसी के जीवन में उनके बेटे की आँखो से उजाला हो सके” !
सभी बहनें भाई के साथ जो सुनहरी “यादें” हैं , उन्हें ही उस दिन जीने की कोशिश करती हैं ! और अपने भाई के मरणोपरांत बाबूजी द्वारा किए गए अंग दान से यह सोचकर भावुक हो उठती हैं कि, उनके भाई कि आँखो से कोई तो ईस सुंदर संसार को निहार रहा होगा ! और प्यारे भाई के वजूद को जिंदा रख रहा होगा !!

    किरण केशरे ✍
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शेरनी /लघुकथा

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“संध्या दरवाजा खोलो!”
वह दरवाजा पीट रहा था और भीतर से साल भर के चिंटू के रोने की तेज आवाज उसके सीने को चीर रही थी।
ऑफिस से लौटकर घर में प्रवेश करते ही भीतर का मंजर देखकर उसकी रूह तो पहले ही कांप गई थी,..
अधखुला दरवाजा,.हॉल से लेकर किचन तक बिखरा सामान और बेडरूम से आती चिंटू के रोने की तेज आवाज सुन वो कमरे के दरवाजे तक गया लेकिन दरवाजा तो भीतर से लॉक था!
मेनगेट खुला छूट जाने की वजह से दरवाजा पीटने और बच्चे के रोने की आवाज सुनकर पड़ोसी भी उसके दरवाजे पर जमा होने लगे थे और उन्हीं में से किसी शुभचिंतक ने 100 नंबर पर डायल कर पुलिस को भी वहां किसी अनहोनी की आशंका से अवगत करा दिया।
तभी बेडरूम का दरवाजा एक झटके के साथ खुल गया और अस्त-व्यस्त हालत में चिंटू को गोद में उठाए वो सामने खड़ी थी,.पसीने से लथपथ!
“सुबह तो मेरे लाख कहने पर भी तुम ढ़ीठ बने रहे!.फिर अब दरवाजा क्यों पीट रहे हो?” वो उस पर एकदम से बिफर पड़ी।
“मैंने कहा था ना कि,.ऑफिस से लौटकर उसका कुछ ना कुछ इंतजाम कर दूंगा!.फिर भी तुम”..
“अब तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं!.उसका जो होना था वो हो चुका!”
“मतलब?”
“मैंने उसे मार डाला!!”
“लेकिन क्यों??” उसके चेहरे के कठोर भाव देख वह लगभग चीख पड़ा।
“और क्या करती?.तुम्हें तो मेरी परेशानी दिखती नहीं! मेरी जिंदगी तबाह कर रखी थी उसने।”
चिंटू को चुप कराती वह खुद भी फफक कर रो पड़ी।
“हटो!.देखने दो मुझे।” वह आगे बढ़ा।
“खबरदार!.जो सुबूत मिटाने की किसी ने कोशिश की!.पीछे हटो।”
पुलिस अचानक मौका-ए-वारदात पर पहुंची गई थी।
“सर!.ऐसी कोई बात नहीं है!.वो मैंने”…
अचानक अपने घर में वर्दीधारीयों को देख उसकी जुबान लड़खड़ा गई।
“भीतर जाकर लाश को कब्जे में ले लो!”
इंस्पेक्टर ने उसे दरवाजे से पीछे हटने का और अपने साथ आए पुलिसकर्मियों को भीतर जाने का इशारा किया।
पुलिस की उपस्थिति देख कई पड़ोसी किसी अनहोनी की आशंकावश भीतर हॉल तक आकर उसके बेडरूम में झांकने की कोशिश करने लगे।
इंस्पेक्टर के तेवर देख वो चिंटू को गोद में उठाए पत्नी संग बेडरूम का दरवाजा छोड़ एक ओर हो गया और तीन पुलिसकर्मी फुर्ती से भीतर प्रवेश कर गए।
हॉल में पड़ोसियों की भीड़ और बेडरूम में झांकती सवालिया निगाहों का सामना करते पति पत्नी सकपका गए।
तभी पुलिसकर्मियों में से एक कमरे से बाहर आकर इंस्पेक्टर के कान में कुछ फुसफुसाया और इंस्पेक्टर दुगनी फुर्ती से बेडरूम के भीतर भागा।
“सच-सच बताओ!.तुम लोगों में से 100 नंबर पर डायल किसने किया था?”
इंस्पेक्टर बित्ता भर के मोटे ताजे चूहे की लाश को उसकी पूंछ से पकड़ बेडरूम से बाहर हॉल में आकर उसके पड़ोसियों से मुखातिब था।
किसी ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा क्योंकि उसके पड़ोसियों की जुबान पर तो बस उस चूहे को मारने वाली शेरनी के वीरता के चर्चे और एक ही सवाल था..
“आखिर आपने यह महान काम किया कैसे!!”😳

पुष्पा कुमारी “पुष्प”
पुणे (महाराष्ट्र)

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એક સ્થળપર ગણા બધા ઉંદર રહેતા હતા એક દિવસે ત્યાં એક બિલ્ડર આવ્યો તેને ત્યાં મોટી વિશાળ બિલ્ડીંગ બનવાનું શરૂ કર્યું જોત જોતામાં ત્યાં પચાસ માળની બિલ્ડીંગ બની ગઈ ત્યારે બધા ઉંદર ભેગા થઇને વિચાર કરવા લાગ્યા કે આ બિલ્ડીંગ નીચેથી આટલી બધી સુંદર દેખાયછે તો ઉપરથી કેવી દેખાતી હશે તેવું વિચારીને બધા ઉંદર ભેગા થઈને ઉપર જવાનુ નક્કી કર્યું બધા એકી સાથે ઉપર ચડાવા લાગ્યા થોડા ઉપર ગયા પસી ગણા બધા થાકી ગયા અને એક બીજાને કહેવા લાગ્યા કે ઉપર જઈને શુ કરીશુ આપણે તો રહેવાની જગ્યા તો નીચે છે આપણા પૂર્વજો પણ નીચેજ રહેતા હતા આટલી ઊંચાઈએ ક્યારે ગયાજ નથી આવી બધી એક બીજાની કલબલાત સાંભરી બધા ઉંદર નીચે ઉતરી ગયા પણ તેમાનો એક ઉંદર પચાસમા માળે જઈને પાછો આવ્યો અને બધા ઉંદરોએ તેનું સન્માન કર્યું અને બધા ઉંદર વિચાર કરવા લાગ્યા કે આ કેવી રીતે જઈને આવ્યો ત્યારે ખબર પડી કે તે બહેરો હતો અને તેને કોઈનો કલબલાત સાંભર્યોજ નહી અને તે પોતાની મંજિલ સુધી જઈને આવ્યો….. આમાંથી આપણે શુ શીખ મળેછે?

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🥸जीवन में कष्ट है तो ध्यान को लाइए….!!!!

मैंने सुना है एक आदमी रात शराबघर गया . वहां लोग जाते ही इसीलिए हैं कि किसी तरह कष्टों को भूल जाएं . थोड़ी देर के लिए ही सही , नशे में डूब जाएं . खुद डूबेंगे तो कष्ट भी डूब जाएंगे , थोड़ी देर को ही सही , राहत तो मिलेगी . खूब पिया उसने , डटकर पिया उसने . जब घर से चला था तो खयाल करके चला था कि लौटते वक्त अंधेरा | हो जाएगा . रात है अंधेरी , अमावस , तो लालटेन साथ ले गया था . लेकिन खूब डटकर पी गया . चारों खाने चित्त पड़ा था . अब अपनी लालटेन टटोल रहा है . किसी का पैर हाथ में आ जाए , कुर्सी का पाया जाए , टेबल का पाया हाथ में आए , लालटेन का पता न चले . फिर लालटेन मिल गई . ली लालटेन और चल पड़ा . बाहर निकला ही था , एक भैंस से टकरा गया . फिर एक नाली में गिर पड़ा . फिर एक ट्रक ने धक्का मार दिया . सुबह जब पाया गया तो एक नाली में पड़ा था . उसे उठाकर घर पहुंचाया गया . दोपहर को शराबघर का मालिक आया और उसने कहा महानुभाव , यह आपकी लालटेन लो . उस आदमी ने कहा , अरे ! क्या लालटेन मैं आपके यहां ही भूल आया ? मैं तो लेकर चला था . उस शराबघर के मालिक ने कहा , आप जरूर लेकर चले थे , वह मेरे तोते का | पिंजरा है . मेरा तोता मुझे वापस करो . बह लालटेन अपनी सम्हालो . बेहोश आदमी लालटेनों की जगह तोतों के पिंजरे लेकर चले जाते हैं . फिर भैंसों से टकराते हैं . फिर ट्रक का धक्का लग गया , फिर नाली में पड़े . और फिर तुम पूछते हो , जीवन में कष्ट ही कष्ट क्यों हैं ? जरा गौर से देखो , तुम्हारे हाथ में तोतों के पिंजरे हैं , लालटेन नहीं . तुम खुद ही तोते हो गए हो . तुम खुद ही तोते हो जो पिंजरे में बंद हैं . तुम सिर्फ दोहरा रहे हो कोई गीता , कोई कुरान , कोई बाइबल . यह दोहराना बंद करो . इस दोहराने से रोशनी नहीं होगी . दीये की बातें करने से दीये नहीं जलते , दीये जलाने पड़ेंगे . ज्योति अपने भीतर उठानी पड़ेगी . और जब तुम्हारे भीतर ज्योति होगी और चारों तरफ प्रकाश पड़ेगा , तुम्हारे कष्ट ऐसे ही तिरोहित हो जाएंगे जैसे कि अंधकार तिरोहित हो जाता है . जीवन में कष्ट है यह इस बात का सबूत है कि तुम्हारे जीवन में ध्यान का दीया नहीं है . तुम्हारे जीवन में प्रार्थना और प्रेम नहीं है और प्रकाश नहीं है और परमात्मा नहीं है . कष्टों से इशारा लो , समझो कुछ . कष्ट इतना ही कह रहे हैं : तुम भटक गए हो , राह पर आओ .
ओशो👼

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दोस्तों एक निवेदन है, पुरा पढना वर्ना बिना पढे डिलीट कर दो 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

कल रात youtube पर एक विडियो देखा ….कोई 14 साल पुराना विडियो था ….अटल जी प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे ….उनके ठीक बगल में एक घनी दाढ़ी वाला एक इंसान बैठा था जिसे गुजरात का मुख्यमंत्री बने कोई 4 या 5 महीने हुवे थे की तभी गुजरात मे 59 कारसेवकों को ट्रेन में जिन्दा जला दिया गया …इस घटना के बाद गुजरात सहित पुरे देश के हिन्दुवों का पारा सातवें आसमान पर पहुच गया ….पुरे गुजरात में खोज खोज कर अल्लाह के बन्दों की कुटाई हुई ….पुरे गुजरात में खौफ का ये अलाम था की हमेशा बुरका पहनने वाली औरतें भी घर से निकलती तो बिना बुरका पहने सिंदूर लगा कर ही निकलतीं
लेकिन अटल जी को मोदी का ये अंदाज पसंद नहीं आया ..उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेस बुलाई ..मोदी जी को भी बुलाया बगल में बिठाया ,,उनके शब्द थे “राजा के लिए प्रजा प्रजा में भेद नहीं हो सकता …मै मोदी जी कोई यही कहूँगा की वो #राजधर्म का पालन करें …….
पिछले एक महीने से लोग मोदी को पानी पी पी के गरिया रहे हैं ..फेकू ..जुमलेबाज ..भ्रष्टाचारी नौटंकीबाज़ जैसे शब्दों से उन्हें नवाज़ा जा रहा हैं ….नोटबंदी पर पुरे सत्र संसद नहीं चलने दी गयी .भारत बंद का असफल प्रयास किया गया …देश भर में हो रही हर छोटी बड़ी घटना को मोदी से जोड़ा जाने लगा ….अगर दिल्ली से हज़ारों km दूर कन्याकुमारी के किसी सुदूर गाँव में कोई इंसान खेत में हगने के उपरांत अपना पिछवाडा धोने नदी के किनारे जाए और उसका पैर फिसल जाय और वो डूब के मर जाए …और संयोग वश उसकी जेब में 500 और 1000 रूपये का एक भी नोट मिल जाय ..तो देश का सेकुलरवादी वामपंथी वर्ग ये साबित कर देगा की उस व्यक्ति ने मोदी की नोटबंदी से व्यथित हो कर आत्महत्या की है ..और अगर साथ में मरने वाला दलित हो ये डबल पालिटिकल माइलेज दिलाने वाली आत्महत्या साबित होगी ..मरने वाला दलित …यानी मोदी सरकार दलित विरोधी है ….इसके बाद राहुल गाँधी और युग्पुरुस दिल्ली से हजारों km दूर कन्याकुमारी पहुच जायेंगे और मरने वाले को शहीद का दर्जा मिलेगा ..मुलायम सिंह उसे 3 लाख रूपये की सहायता राशि प्रदान करेंगें …….
मोदी जी ..मुझे समझ में नहीं आता किसके लिए कर रहें आप ये सब कुछ ???ना तो आपकी पत्नी है ना बेटा है ..भाइयों से कोई मतलब नहीं ..माँ 95 साल की हो गयी है ..आप खुद 67 के हो गए हैं ..तो क्यों कर रहें हैं आप हमारे लिए ये सब कुछ ???…अरे हम भारतीय जनता है …..
हम कीचड़ में लोटने के आदि हो चुके हैं ..हममे भ्रष्टाचार कूट कूट के भरा है ….ट्रेफिक सिग्नल से लेकर सरकार के हर विभाग में बिना घूस दिए हम कोई भी काम नहीं करना चाहते …क्यों अपनी जान के दुश्मन बन रहे हैं आप …..???…..हम दुनिया की सबसे डरपोक और निराशावादी कौम है …शायद यही कारण है की सदियों तक हम पर मुसलमानों अंग्रेजों यवनों हूणों ने राज किया …..हम वही है जिनके परिजनों को कुछ आतंकियों ने बंधक बना लिया तो हम पीएमओ के बाहर विधवा विलाप करने लगे …हम वही हैं जो प्याज और दाल के महंगी होने पर सरकारें गिरा देतें हैं ..हम वही हैं जो दिन भर महंगाई का रोना रोते हैं लेकिन एक दो कौड़ी की फिल्म को 400 करोड़ की कमाई करवा देते हैं ..हम वही जाहिल कौम है जो हर काम में रिश्वत देकर जल्द से जल्द करवा लेना चाहते हैं ….हम वही अनपढ़ गवार कौम है जो एक बोतल शराब और 500 रूपये लेकर अपना वोट बेच देते हैं ……तो आप कौन होते हैं हमे इस कीचड़ से निकालने वाले ??…हम तो इसी में लोटेंगे ..हमे इसी में आनन्द आता है ….हमे जब गाली और मार में आनन्द आ रहा है तो आप क्यों हमे रबड़ी मलाई खिलाने पर तुलें हैं ???जब हम खुद ही हिन्दू मुस्लिम भाई भाई का नारा लगा कर अपनी कबर खोद रहें हैं तो आप क्यों isis और पाकिस्तान के पीछे पड़े है ??…..अरे हम तो इतनी बेबस कौम हैं की हमे हमारे कश्मीर से लात मार कर भगा दिया और हमने उफ़ तक नहीं की ..तो आप क्यों हमे वापस उसी कश्मीर में बसाने पे तुले हैं ??
मोदी जी …..हम महा लतखोर लोग हैं …कृपया हमारा खोया सम्मान हमे वापस हमे मत दिलवाइए ..हम लतखोर ही ठीक है ..हमे असम में मारा जाता है ..हमे मालदा और पुरनिया में मारा जाता है हमे मुजफरनगर में मारा जाता है ..हमे मेरठ में मारा जाता है ..हमे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी मारा जाता है ..फिर भी हम तो मजबूर हैं माया और मुलायम को वोट देने के लिए…. क्या करें ??..वो हमारे जाति के जो ठहरे…….मोदी जी हमे हमारे हाल पर छोड़ दीजिये ……हमे आदत है बिना बिजली रहने की ..हमे आदत है रोड पे लेट्रिन जाने की ..आप क्यों हमारे लिए क्यों बिजली और शौचालय बना रहे हैं ??…..हमे तो आदत है मीट्टी के चूल्हे पर दमघोटू धुवें में खाना बनाने की ….आप हमारे लिए क्यों गैस सिलेंडर का इंतजाम कर रहे हैं ??….
मोदी जी हम महा जाहिल कौम है ..आप राजधर्म का पालन हम पर मत कीजिये …..

कमलेश सिसोदिया

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श्री संकट मोचन मंदिर वाराणसी ।

यही वह जंगल का स्थान था जहा गोस्वामी तुलसीदास जी को श्री हनुमान जी का प्रत्यक्ष दर्शन हुए ।आज भी जंगल को बाउन्ड्री मे वैसे ही सुरक्षित रखा गया है । यह प्रतिमा पूज्य गोस्वामी जी महाराज के हाथो गढ़ी गई ।यहा दर्शन करने की महिमा है कि मनुष्य के सभी संकट दूर हो जाते है ।

देश के ऐतिहासिक मंदिरों में शामिल काशी के संकट मोचन मंदिर का इतिहास करीब 400 साल पुराना है। इसी मंदिर में हनुमान ने राम भक्त गोस्वामी तुलसीदास को दर्शन दिए थे, जिसके बाद बजरंगबली मिट्टी का स्वरूप धारण कर यहीं स्थापित हो गए। बताया जाता है कि संवत 1631 और 1680 के बीच इस मंदिर को बनवाया गया। इसकी स्थापना तुलसीदास ने कराई थी। मान्यता है कि जब वे काशी में रह कर रामचरितमानस लिख रहे थे, तब उनके प्रेरणा स्त्रोत संकट मोचन हनुमान थे। कहा जाता है कि यहां आने वाले भक्तों के सभी कष्‍ट हनुमान के दर्शन मात्र से ही दूर हो जाते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, तुलसीदास स्नान-दान के बाद गंगा के उस पार जाते थे। वहां एक सूखा बबूल का पेड़ था। ऐसे में वे जब भी उस जगह जाते, एक लोटा पानी डाल देते थे। धीरे-धीरे वह पेड़ हरा होने लगा। एक दिन पानी डालते समय तुलसीदास को पेड़ पर भूत मिला। उसने कहा- ‘क्या आप राम से मिलना चाहते हैं? मैं आपको उनसे मिला सकता हूं।’ इस पर उन्होंने हैरानी से पूछा- ‘तुम मुझे राम से कैसे मिला सकते हो?’ उस भूत ने बताया कि इसके लिए आपको हनुमान से मिलना पड़ेगा। काशी के कर्णघंटा में राम का मंदिर है। वहां सबसे आखिरी में एक कुष्ठ रोगी बैठा होगा, वो हनुमान हैं। यह सुनकर तुलसीदास तुरंत उस मंदिर में गए।

बजरंगबली ने तुलसीदास को दिए थे दर्शन…

बताया जाता है कि जैसे ही तुलसीदास उस कुष्ठ रोगी से मिलने के लिए उसके पास गए, वो वहां से चला गया। तुलसीदास भी उनके पीछे-पीछे चलते रहे। आज जिस क्षेत्र को अस्सी कहा जाता है, उसे पहले आनद कानन वन कहते थे। यहां पहुंचने पर उन्होंने सोचा कि अब तो जंगल आ गया है, पता नहीं यह व्यक्ति कहां तक जाएगा। ऐसे में उन्होंने उसके पैर पकड़ लिए और कहा कि आप ही हनुमान हैं, कृप्या मुझे दर्शन दीजिए। इसके बाद बजरंग बली ने उन्हें दर्शन दिया और उनके आग्रह करने पर मिट्टी का रूप धारण कर यहीं स्थापित हो गए, जो आज संकट मोचन मंदिर के नाम से जाना जाता है।

नाराज होकर लिख डाला हनुमान बाहुक…

तुलसीदास के बारे में कहा जाता है कि वे हनुमान के अभिन्न भक्त थे। एक बार तुलसीदास के बांह में पीड़ा होने लगी, तो वे उनसे शिकायत करने लगे। उन्होंने कहा कि ‘आप सभी के संकट दूर करते हैं, मेरा कष्ट दूर नहीं करेंगे।’ इसके बाद नाराज होकर उन्होंने हनुमान बाहुक लिख डाली। बताया जाता है कि यह ग्रंथ लिखने के बाद ही उनकी पीड़ा खुद ही समाप्त हो गई।

।।जय श्री संकट मोचन हनुमान जी महाराज।।

।। जय सिया राम ।।

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एक बार एक नौजवान आदमी एक किसान की बेटी से शादी की इच्छा लेकर उसके पास गया.

किसान ने उसकी ओर देखा और कहा, ” युवक, खेत में जाओ. मैं एक एक करके तीन बैल छोड़ने वाला हूँ. अगर तुम तीनों बैलों में से किसी भी एक बैल की पूँछ पकड़ लो तो मैं अपनी बेटी की शादी ख़ुशी ख़ुशी तुमसे कर दूंगा.”

नौजवान खेत में बैल की पूँछ पकड़ने की तीव्र इच्छा लेकर खड़ा हो गया.

उसके बाद किसान ने अपने घर का दरवाजा खोला और एक बहुत ही बड़ा और खतरनाक बैल उस घर से निकला.

नौजवान ने ऐसा बैल पहले कभी नहीं देखा था. बैल से डर कर नौजवान ने निर्णय लिया कि वह अगले बैल का इंतज़ार करेगा और वह एक तरफ हो गया जिससे बैल उसके पास से होकर निकल जाए .

घर का दरवाजा फिर खुला. आश्चर्यजनक रूप से इस बार पहले से भी बड़ा और भयंकर बैल निकला.

नौजवान ने सोचा कि इससे तो पहला वाला बैल ही ठीक था. बेकार में मैंने एक अच्छा अवसर गवां दिया । फिर उसने एक ओर होकर बैल को निकल जाने दिया.

उसके बाद तीसरी औऱ आख़री बार दरवाजा खुला.

नौजवान के चहरे पर मुस्कान आ गई. इस बार उसमें से एक छोटा और मरियल सा बैल निकला.

जैसे ही बैल नौजवान के पास नज़दीक आने लगा, नौजवान ने उसकी पूँछ पकड़ने के लिए मुद्रा बना ली ताकि उसकी पूँछ सही समय पर पकड़ ले.
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पर उस बैल की पूँछ थी ही नहीं………!!

……जिन्दगी अवसरों से भरी हुई है. कुछ सरल हैं तो कुछ कठिन , पर अगर हमनें एक बार अच्छा अवसर गवां दिया तो फिर शायद वह अवसर जीवन में दुबारा नहीं मिलेगा. अतः हमेशा प्रथम अवसर को ही अंतिम अवसर मानकर उसे हासिल करने का प्रयास करना समझदारी है ।

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शीर्षक_“नवीन पीढी”

मैं बैंगलोर गया बेटे पास ! हवाई जहाज से उतरते ही मैंने बेटा को फोन किया कि आ गया हूं, कहां हो? पापा, मैं ऑफिस में हूं , आपके कैब बुक किया है , एयरपोर्ट के बाहर होगा ।जाकर बैठ जाईये ,घर का पता कैब वाले को दिया हुआ है वो घर तक आपको पहुंचा देगा।

मैं टैक्सी में बैठ गया और बेटे के घर पहुंचा और घर का ताला खोल दाखिल हुआ। ड्राइंगरूम में सोफे पे पसर गया , थोङी देर में कालबेल बजी। दरवाजे पे डिलीवरी बाॅय खङा था कुछ खाने के पैकेट लिए।

पैकेट लिया ही था कि बेटे आकाश का फोन आया__ पापा आपका लंच भिजवाया है ,खा लीजिए और आराम करिए, शाम को मिलता हूं आपसे! खाना खाकर सो गया मैं, बहुत थक चूका था व सुबह चार बजे ही पटना से बैंगलोर की फ्लाइट पकङने के लिए रात दो बजे से ही जगा था।

गहरी नींद आ गई थी।बेटे की आवाज आई, पापा ! कैसे हो आप आप? हाल चाल लेता रहा और बार बार मोबाइल पर भी ध्यान दे रहा था ।आकाश बहुत खुश था क्योंकि पापा पहली बार बैंगलोर आए थे।

दूसरे दिन सुबह उठा तो चाय की तलब हुई, आदत थी मुझे सुबह सुबह उठकर चाय पीने की!।। पूछा कि किचन में दूध- चायपती है , चाय बना लेता हूं।हंसकर आकाश बोला; पापा मैं चाय कहां पीता हूं? सोफा पे लेटे हुए मोबाइल पर उसकी उँगली तेजी से घूम रही थी। मैं चुपचाप बैठ गया , क्या करू! यहां का कुछ आइडिया भी नहीं कि बाहर जाकर चाय पी ले।

खैर!अभी इसी उधेङबुन में था कि दरवाजे की घंटी बजी ।बेटा बोला , देखो न पापा कौन है? बिचारा बेटा नींद में था और मेरे चलते जल्दी उठ गया था।दरवाजे पर गर्मा-गर्म चाय के साथ इडली सांभर बङा का पैकेट लेकर डिलीवरी बाॅय खङा था ।

फिर हमदोनों ने नाश्ता किया ।बेटा बोला , कुछ भी जरूरत है, आप मोबाइल से ऑडर कर मंगा सकते हैं ।आपको चाय पीने की आदत है , मै जानता था , इसलिए मंगा दिया। अपने बेटे की नवीनतम तकनीकी सुविधाजनक मोबाइल फोन ने मुझे अपनी पीढी की याद दिलाई, कि जब पापा ऑफिस से आते तो दौङकर हम सब भाई बहन खातिर दारी में लग जाते थे ।कोई दौङकर पानी लाता,कोई नाश्ता देता, कोई जूठा बर्तन उठाता।

हमारे बीते हुए दौर में व आज की पीढी में कितना बदलाव आया है ।हमारे पिता के लिए मन में आदर तो था परंतु एक डर भी रहता था कि वो नाराज न हो जाए? आज की पीढी प्रैक्टिकल है व तकनीकी दुनिया में सांस ले रही है । याद आया कि मेरा टिकट भी मोबाइल से ही बुक किया था बेटे ने! अपने बेटे का मेरा ख्याल रखना बहुत स्वाभाविक लगा।
ऐसा नहीं कि हमारे बच्चे हमारा आदर नहीं करते! बहुत प्यार करते हैं हमें ! बस तरीका बदल गया है।

(मेरी पहली कहानी , फलक के मंच पर पोस्ट किया था ।)

अंजूओझा पटना
मौलिक स्वरचित
2•4•21

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बंद मुट्ठी की कीमत
एक राज्य में राजा ने घोषणा की कि वह राज्य के मंदिर में पूजा-अर्चना
करने के लिए अमुक दिन जाएगा। मंदिर के पुजारी ने मंदिर की रंगरोगन और सजावट के लिए छह हजार का कर्ज लिया। राजा ने अमुक
दिन मंदिर में दर्शन एवं पूजा-अर्चना की और आरती की थाली में चार
आने दक्षिणा स्वरूप रखे और अपने महल प्रस्थान कर गये। यह
| देखकर पुजारी बड़ा दुखी हुआ कि कर्ज कैसे चुका पाएगा, इसलिए
उसने एक उपाय सोचा ! गांव भर में ढिंढोरा पिटवाया कि राजा की दी हुई
वस्तु को वह नीलाम कर रहा है। नीलामी वाले दिन उसने अपनी मुट्ठी में
चार आने रखे और किसी को दिखाई नहीं। लोग समझे कि राजा की दी
हुई वस्तु बहुत अमूल्य होगी इसलिए बोली शुरू हुई। यह बात राजा के
कानों तक पहुंची। राजा ने अपने सैनिकों से पुजारी को बुलवाया और
पुजारी से निवेदन किया कि वह मेरी वस्तु को नीलाम न करे। मैं तुम्हें
इसके बदले कई गुणा धन दूंगा। इस प्रकार राजा ने कई गुणा धन देकर
अपनी इज्जत को बचाया। तब से यह कहावत बनी बंद मुट्ठी सवा लाख
की खुल गई तो खाक की। प्रस्तुति : सुभाष बुड़ावनवाला

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ऊंची जाति का भिखारी था सर

“`एक बड़े मुल्क के राष्ट्रपति के बेडरूम की खिड़की सड़क की ओर खुलती थी। रोज़ाना हज़ारों आदमी और वाहन उस सड़क से गुज़रते थे। राष्ट्रपति इस बहाने जनता की परेशानी और दुःख-दर्द को निकट से जान लेते।

राष्ट्रपति ने एक सुबह खिड़की का परदा हटाया। भयंकर सर्दी। आसमान से गिरते रुई के फाहे। दूर-दूर तक फैली सफ़ेद चादर। अचानक उन्हें दिखा कि बेंच पर एक आदमी बैठा है। ठंड से सिकुड़ कर गठरी सा होता हुआ ।

राष्ट्रपति ने पीए को कहा -उस आदमी के बारे में जानकारी लो और उसकी ज़रूरत पूछो।

दो घंटे बाद पीए ने राष्ट्रपति को बताया – सर, वो एक भिखारी है। उसे ठंड से बचने के लिए एक अदद कंबल की ज़रूरत है।

राष्ट्रपति ने कहा -ठीक है, उसे कंबल दे दो।

अगली सुबह राष्ट्रपति ने खिड़की से पर्दा हटाया। उन्हें घोर हैरानी हुई। वो भिखारी अभी भी वहां जमा है। उसके पास ओढ़ने का कंबल अभी तक नहीं है।

राष्ट्रपति गुस्सा हुए और पीए से पूछा – यह क्या है? उस भिखारी को अभी तक कंबल क्यों नहीं दिया गया?

पीए ने कहा -मैंने आपका आदेश सेक्रेटरी होम को बढ़ा दिया था। मैं अभी देखता हूं कि आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ।

थोड़ी देर बाद सेक्रेटरी होम राष्ट्रपति के सामने पेश हुए और सफाई देते हुए बोले – सर, हमारे शहर में हज़ारों भिखारी हैं। अगर एक भिखारी को कंबल दिया तो शहर के बाकी भिखारियों को भी देना पड़ेगा और शायद पूरे मुल्क में भी। अगर न दिया तो आम आदमी और मीडिया हम पर भेदभाव का इल्ज़ाम लगायेगा।

राष्ट्रपति को गुस्सा आया – तो फिर ऐसा क्या होना चाहिए कि उस ज़रूरतमंद भिखारी को कंबल मिल जाए।

सेक्रेटरी होम ने सुझाव दिया -सर, ज़रूरतमंद तो हर भिखारी है। आपके नाम से एक ‘कंबल ओढ़ाओ, भिखारी बचाओ’ योजना शुरू की जाये। उसके अंतर्गत मुल्क के सारे भिखारियों को कंबल बांट दिया जाए।

राष्ट्रपति खुश हुए। अगली सुबह राष्ट्रपति ने खिड़की से परदा हटाया तो देखा कि वो भिखारी अभी तक बेंच पर बैठा है। राष्ट्रपति आग-बबूला हुए। सेक्रेटरी होम तलब हुए।

उन्होंने स्पष्टीकरण दिया -सर, भिखारियों की गिनती की जा रही है ताकि उतने ही कंबल की खरीद हो सके।

राष्ट्रपति दांत पीस कर रह गए। अगली सुबह राष्ट्रपति को फिर वही भिखारी दिखा वहां। खून का घूंट पीकर रहे गए वो।
सेक्रेटरी होम की फ़ौरन पेशी हुई।

विनम्र सेक्रेटरी ने बताया -सर, ऑडिट ऑब्जेक्शन से बचने के लिए कंबल ख़रीद का शार्ट-टर्म कोटेशन डाला गया है। आज शाम तक कंबल ख़रीद हो जायेगी और रात में बांट भी दिए जाएंगे।

राष्ट्रपति ने कहा -यह आख़िरी चेतावनी है। अगली सुबह राष्ट्रपति ने खिड़की पर से परदा हटाया तो देखा बेंच के इर्द-गिर्द भीड़ जमा है। राष्ट्रपति ने पीए को भेज कर पता लगाया।

पीए ने लौट कर बताया -कंबल नहीं होने के कारण उस भिखारी की ठंड से मौत हो गयी है।

गुस्से से लाल-पीले राष्ट्रपति ने फौरन से सेक्रेटरी होम को तलब किया।

सेक्रेटरी होम ने बड़े अदब से सफाई दी -सर, खरीद की कार्यवाही पूरी हो गई थी। आनन-फानन में हमने सारे कंबल बांट भी दिए। मगर अफ़सोस कंबल कम पड़ गये।

राष्ट्रपति ने पैर पटके -आख़िर क्यों? मुझे अभी जवाब चाहिये।

सेक्रेटरी होम ने नज़रें झुकाकर बोले: श्रीमान पहले हमने कम्बल अनुसूचित जाती ओर जनजाती के लोगो को दिया. फिर अल्पसंख्यक लोगो को. फिर ओ बी सी … करके उसने अपनी बात उनके सामने रख दी. आख़िर में जब उस भिखारी का नंबर आया तो कंबल ख़त्म हो गए।

राष्ट्रपति चिंघाड़े -आखिर में ही क्यों?

सेक्रेटरी होम ने भोलेपन से कहा -सर, इसलिये कि उस भिखारी की जाती ऊँची थी और वह आरक्षण की श्रेणी में नही आता था, इसलिये उस को नही दे पाये ओर जब उसका नम्बर आया तो कम्बल ख़त्म हो गये.

नोट : वह बड़ा मुल्क भारत है जहाँ की योजनाएं इसी तरह चलती थीं/हैं और कहा जाता है कि भारत में सब समान हैं सबका बराबर का हक़ है ।