Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

धागे रिश्तों के


भतीजी विदा हो चुकी थी अपने भावी जीवन के सपने लिए।भाभी ,भाईसाहब भी अपने घर जाने के लिए सामान बाँध रहे थे।
सोमेश जी के दिलोदिमाग में भतीजी सौम्या की शादी की रिकॉर्डिंग चल रही थी।
“भैया ,इतने बड़े शहर में एक बार सारी व्यवस्था करके सब कुछ कैंसल करना पड़ा।अब फिर से सारी तैयारियां करना कितना मुश्किल होगा।कोरोना का क्या भरोसा ?कब सिर उठा ले।
“क्यों न हम यहाँ बेलापुर से शादी रचा लें।”
सोमेशजी ने बड़े भैया से कहा।
यहाँ से ! सब व्यवस्था हो जाएगी?भैया नेथोड़ा सशंकित होते हुए कहा।
जी भैया ,भले ही छोटा सा नगर है लेकिन यहाँ के सबसे महंगे होटल में सारी व्यवस्था करवा लेते हैं।
ठीक है तुम जो करोगे ,बहुत ही अच्छा करोगे।मुझे पूरा विश्वास है।
सोमेश जी ने उसी दिन से पूरी व्यवस्था हाथ में ले ले कर दिलो जान से तैयारी शुरू कर दी।
शादी के एक दिन पहले सभी मेहमान आ पहुँचे।
शानदार हल्दी ,मेहँदी और लेडीज़ संगीत का कार्यक्रम हुआ।इसके बाद सभी अपने अपने कमरों में आराम करने पहुँच गए।भाभी के पीहर वालों ने अलग अलग कमरों में कब्जा जमा लिया और सोमेश जी और उनकी पत्नी हॉल में खड़े रह गए।

सोमेश जी नाराज़ तो थे लेकिन अपने आपको संयत किये हुए थे लेकिन उनकी पत्नी रिद्धिमा अत्यधिक निराश साथ ही नाराज़ हो रहीं थी। बोलीं
“अभी घर चलिए आप।सुबह वापस आ जाएंगे।”
तभी बड़े भाई और भाभी आ गए।
बोले ,”तुम लोग घर नहीं जाओगे।हमारे कमरे में चले जाओ।”
सोमेश जी मुस्कुराते हुए कहा ,”नहीं ,हम घर नहीं जा रहे,मेरी प्यारी भाभी ! यहीं हॉल में गादी लगा कर बातचीत करते हैं सभी लोग।”
और देखते ही देखते ही गादियां बिछ गईं ,सब बैठ गए और माहौल एकदम हल्का हो गया।

ब्याह हँसी खुशी सम्पन्न हो चुका था।
भैया भाभी अपना सामान ले कर घर जाने तैयार थे।
भाभी की आँखों में कृतज्ञता के आँसू थे।
बोलीं ,”लाला जी ,तुमने पूरा ब्याह सम्हाल लिया बहुत आशीर्वाद तुम्हें।हमेशा खुश रहना।”

“सौम्या मेरी भी बच्ची है भाभी।”
सोमेश जी बस यही बोलते हुए उनके पैरों में झुक गए।आवाज़ भर्रा गई थी।
“रिद्धिमा का गुस्सा जायज़ था लेकिन उसकी बात मान कर गुस्से में यदि घर जाने का निर्णय ले लेता तो रिश्ते के इस रेशमी धागे में भी एक गाँठ तो पड़ ही जाती !”
सोमेश जी सोचते हुए मुस्कुरा उठे।

ज्योति व्यास
स्वलिखित

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“परंतु मैं तो जानता हूं………

  • सुबह सूर्योदय हुआ ही था कि एक वयोवृद्ध ने डॉक्टर के दरवाजे पर आकर घंटी बजाई…..
    सुबह-सुबह कौन आ गया❓ कहते हुए डॉक्टर की पत्नी ने दरवाजा खोला
    वृद्ध को देखते ही डॉक्टर की पत्नी ने कहा:-
    दादा आज इतनी सुबह…❓क्या परेशानी हो गई आपको…
    वयोवृद्ध ने कहा:- अपने अंगूठे के टांके कटवाने आया हूं, डॉक्टर साहब के पास..
    मुझे 8:30 बजे दूसरी जगह पहुंचना होता है, इसलिए जल्दी आया हूं… सॉरी डॉक्टर
    डाक्टर के पड़ोस वाले मोहल्ले में ही वयोवृद्ध का निवास था, जब भी जरूरत पड़ती वह डॉक्टर के पास आते थे ।इसलिए डाक्टर उनसे परिचित था।
    उसने कमरे से बाहर आकर कहा:- कोई बात नहीं दादा,बैठो,बताओ आप का अंगूठा….
    डॉक्टर ने पूरे ध्यान से अंगूठे के टांके खोले और कहा कि
    दादा बहुत बढ़िया है,आपका घाव भर गया है,फिर भी मैं पट्टी लगा देता हूं कि कहीं पर चोंट ना पहुंचे ।
    डाक्टर तो बहुत होते हैं परंतु यह डॉक्टर बहुत हमदर्दी रखने वाले आदमी का रखने वाले और दयालु थे….

डॉक्टर ने पट्टी लगाकर के पूछा:- दादा आपको कहां पहुंचना पड़ता है 8:30 बजे….❓
आपको देर हो गई हो तो मैं चलकर आपको छोड़ आता हूं …

वृद्ध ने कहा:- नहीं नहीं डॉक्टर साहब,अभी तो मैं घर जाऊंगा,नाश्ता तैयार करूंगा,फिर निकलूंगा और बराबर 9:00 बजे पहुंच जाऊंगा…
उन्होंने डॉक्टर का आभार माना और जाने के लिए खड़े हुए…
बिल लेकर के उपचार करने वाले तो बहुत डॉक्टर होते हैं ,परंतु दिल से उपचार करने वाले कम होते हैं….

दादा खड़े हुए तभी डॉक्टर की पत्नी ने आकर कहा:- दादा नाश्ता यहीं कर लो…
वृद्ध ने कहा:- ना बेन,मैं तो यहां नाश्ता यहां कर लेता ,परंतु उसको नाश्ता कौन कराएगा… ❓

डॉक्टर ने पूछा:- किस को नाश्ता कराना है.. ❓

तब वृद्ध ने कहा:- मेरी पत्नी को
तो वह कहां रहती है❓और 9:00 बजे आपको उसके यहां कहां पहुंचना है….
वृद्ध ने कहा:- डॉक्टर साहब वह तो मेरे बिना रहती ही नहीं थी,परंतु अब वह अस्वस्थ है तो नर्सिंग होम में है….

डॉक्टर ने पूछा:- क्यों उनको क्या तकलीफ है…❓

वृद्ध व्यक्ति ने बताया:- मेरी पत्नी को अल्जाइमर हो गया है,उसकी याददाश्त चली गई है… पिछले 5 साल से वह मेरे को पहचानती नहीं है….
मैं नर्सिंग होम में जाता हूं,उसको नाश्ता खिलाता हूं ,तो वह फटी आंख सेशून्य नेत्रों से मुझे देखती है….

मैं उसके लिए अंजाना हो गया हूं

ऐसा कहते कहते वृद्ध की आंखों में आंसू आ गए,डॉक्टर और उसकी पत्नी की आंखें भी गीली हो गई…
याद रखें
प्रेम निस्वार्थ होता है,प्रेम सब के पास होता है परंतु एक पक्षीय प्रेम❓
यह दुर्लभ है,पर होता जरूर है
कबीर ने लिखा है
प्रेम ना बाड़ी ऊपरी, प्रेम न हाट बिकाय
बाजार में नहीं मिलता है यह
डॉक्टर और उसकी पत्नी ने कहा:-
दादा 5 साल से आप रोज नर्सिंग होम में उनको नाश्ता करने जाते हो❓आप इतने वृद्ध.. आप थकते नहीं हो, ऊबते नहीं हो
उन्होंने कहा:: मैं तीन बार जाता हूं….

डॉक्टर साहब, उसने जिंदगी में मेरी बहुत सेवा की और आज मैं उसके सहारे जिंदगी जी रहा हूं,उसको देखता हूं तो मेरा मन भर आता है…..
मैं उसके पास बैठताहूं तो मुझ में शक्ति आ जाती है, अगर वह न होती तो अभी तक मैं भी बिस्तर पकड़ लेता….

लेकिन उसको ठीक करना है,उसकी संभाल करना है, इसलिए मुझ में रोज ताकत आ जाती है..

उसके कारण ही मुझ में इतनी फुर्ती है…
सुबह उठता हूं तो तैयार होकर के काम में लग जाता हूं,यह भाव रहता है कि उसको मिलने जाना है,उसके साथ नाश्ता करना है,उसको नाश्ता कराना है….

उसके साथ नाश्ता करने का आनंद ही अलग है,मैं अपने हाथ से उसको नाश्ता खिलाता हूं….
डॉक्टर ने कहा:- दादा एक बात पूछूं… ❓

पूछो ना डॉक्टर साहब
डॉक्टर ने कहा:- दादा,वह तो आपको पहचानती नहीं,ना तो आपके सामने बोलती है,ना हंसती है,तो भी तुम मिलने जाते हो❓
तब उस समय वृद्ध ने जो शब्द कहे वह शब्द दुनिया में सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और मार्मिक हैं….
वृद्ध बोले:-
डॉक्टर साहब,वह नहीं जानती कि मैं कौन हूं…❓पर मैं तो जानता हूं ना कि वह कौन है….. ❓🙏
और इतना कहते कहते वृद्ध की आंखों से पानी की धारा बहने लगी….
डॉक्टर और उनकी पत्नी की आंखें भी भर आई…..

कहानी तो पूरी होगी परंतु पारिवारिक जीवन में “स्वार्थ अभिशाप” और प्रेम “आशीर्वाद” है

प्रेम कम होता है तभी परिवार टूटता है….. अपने घर में अपने माता पिता को प्रेम करना…..
जो लोग यह कहते हैं अपने पिता के लिए कि साठी,बुद्धि न्हाटी,उनको यह कथा 10 बार पढ़वाना ।
यह शब्द
“वह नहीं जानती कि मैं कौन हूं परंतु मैं तो जानता हूं “
ये शब्द शायद परिवार में प्रेम का प्रवाह प्रवाहित कर दें…..

अपने वो नहीं,जो तस्वीर में साथ दिखें बल्कि अपने तो वो है,जो तकलीफ में साथ दिखें…..

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🔰अपना कीमती समय निकाल कर इस पोस्ट को जरूर पढ़ियेगा👇

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“बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया नहीं है।” लाचार माता के शब्द है अपने बेटे को समझाने के लिये।

“देख मम्मी! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद वेकेशन में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने प्रोमिस किया था। आज मेरे आखरी पेपर के बाद दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा कक्ष से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।”

एक गरीब घर में बेटे मोहन की जिद्द और माता की लाचारी आमने सामने टकरा रही थी।

“बेटा! तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए एक्सिडेंट ..

मम्मी कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला “मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो बाइक चाहिये ही चाहिये ..!!”

ऐसा बोलकर मोहन अपनी मम्मी को गरीबी एवं लाचारी की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।

12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद ‘भागवत सर’ एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।
हालांकि भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधतासभर ये परीक्षा अचूक देने जाते थे।

इस साल परीक्षा का विषय था मेरी पारिवारिक भूमिका

मोहन परीक्षा कक्ष में आकर बैठ गया।
उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे बाइक लेकर देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा।

भागवत सर के क्लास में सभी को पेपर वितरित हो गया। पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।

मोहन ने पहला प्रश्न पढा और जवाब लिखने की शुरुआत की।

प्रश्न नंबर १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तार बताइये?

मोहन ने तुरंत से जवाब लिखना शुरू कर दिया।

जवाबः
पापा सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ओटोरिक्शा लेकर निकल जाते हैं। और रात को नौ बजे वापस आते हैं। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।

मम्मी सुबह चार बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार कर, बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है। और सभी लोगों के सो
जाने के बाद वह सोती हैं। लगभग रोज के सोलह घंटे।

दीदी सुबह कालेज जाती हैं, शाम को 4 से 8 पार्ट टाइम जोब करती हैं। और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।

मैं, सुबह छह बजे उठता हूँ, और दोपहर स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।

(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज में औसत सबसे कम है।)

पहले सवाल के जवाब के बाद मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..

प्रश्न नंबर २ :- आपके घर की मासिक कुल आमदनी कितनी है?

जवाबः
पापा की आमदनी लगभग दस हजार हैं। मम्मी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार
जोडते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हजार।

प्रश्न नंबर ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मनपसंद टीवी पर आ रही तीन सीरियल के नाम, शहर के एक सिनेमा होल का पता और अभी वहां चल रही मूवी का नाम बताइये?

सभी प्रश्नों के जवाब आसान होने से फटाफट दो मिनट में लिख दिये ..

प्रश्न नंबर ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी हाल की कीमत क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल की कीमत बताइये? और जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये।

मोहनभाई को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक जरुरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी तो मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मुवी का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम की
जवाबदेही लेने से या तो हाथ बटोर कर साथ देने से हम कतराते रहे हैं।

प्रश्न नंबर ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो?

जवाबः हां, मुझे आलू के सिवा कोई भी सब्जी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी मैं बगैर खाना खायें उठ खडा हो जाता हूँ।
(इतना लिखते ही मोहन को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती हैं। पेट में दर्द होता है, अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने गलती से मम्मी की सब्जी खा ली, और फिर मैंने थूक दिया था। और फिर पूछा कि मम्मी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी जिद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?)
मोहन ने अपनी यादों से बाहर आकर
अगले प्रश्न को पढा

प्रश्न नंबर ६ :- आपने अपने घर में की हुई आखरी जिद के बारे में लिखिये ..

मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन बाइक के लिये जीद्द की थी। पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था, मम्मी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में खाना खाना भी छोड़ दिया है। जबतक बाइक नहीं लेकर दोगे मैं खाना नहीं खाऊंगा। और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला
हूँ।
अपनी जिद का प्रामाणिकता से मोहन ने जवाब लिखा।

प्रश्न नंबर ७ :- आपको अपने घर से मिल रही पोकेट मनी का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं?

जवाब: हर महीने पापा मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं, या अपने दोस्तों की छोटीमोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ।

मेरी दीदी को भी पापा सौ रुपये देते हैं। वो खुद कमाती हैं और पगार के पैसे से मम्मी को आर्थिक मदद करती हैं। हां, उसको दिये गये पोकेटमनी को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई मौजशौख नहीं है, क्योंकि वो कंजूस भी हैं।

प्रश्न नंबर ८ :- आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका को समझते हो?

प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी मोहन ने जवाब लिखा।
परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं मददरूप होना चाहिये और ऐसे अपनी जवाबदेही निभानी चाहिये।

यह लिखते लिखते ही अंतरात्मासे आवाज आयी कि अरे मोहन! तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से जवाब आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!!

प्रश्न नंबर ९ :- आपके परिणाम से
आपके माता-पिता खुश हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे जिद करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?

(इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले हुए मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)
लिखने की शुरुआत की ..

वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जिद नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रोमिस तोडे हैं।
फिर भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।

प्रश्न नंबर १० :- पारिवारिक जीवन में असरकारक भूमिका निभाने के लिये इस वेकेशन में आप कैसे परिवार को मददरूप होंगें?

जवाब में मोहन की कलम चले इससे पहले उनकी आंखों से आंसू बहने लगे, और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई .. बेंच के निचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया।

स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।

“भैया! ये ले आठ हजार रुपये, मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर आना।”
दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।

“कहाँ से लायी ये पैसे?” मोहन ने पूछा।

दीदी ने बताया
“मैंने मेरी ओफिस से एक महीने की सेलेरी एडवांस मांग ली। मम्मी भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और मेरी पोकेटमनी की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।

मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।

दीदी फिर बोली ” भाई, तुम मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगे तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौक हैं, लेकिन अपने शौख से अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पापा को पैर की तकलीफ हैं फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रोमिस को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किये जा रहे हैं। तेरी बाइक के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने प्रोमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। और इसके पीछे उनकी मजबूरी है।
बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रोमिस तोडे ही है न?
मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।

उसी समय उनका दोस्त वहां अपनी बाइक लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।
“ले .. मोहन आज से ये बाइक तुम्हारी, सब बारह हजार में मांग रहे हैं, मगर ये तुम्हारे लिये आठ हजार ।”

मोहन बाइक की ओर टगर टगर देख रहा था। और थोड़ी देर के बाद बोला
“दोस्त तुम अपनी बाइक उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की हाल संभावना भी नहीं है।”

और वो सीधा भागवत सर की केबिन में जा पहूंचा।

“अरे मोहन! कैसा लिखा है पेपर में?
भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।

“सर ..!!, यह कोई पेपर नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु ये जवाब लिखकर नहीं अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।

घर पहुंचते ही, मम्मी पापा दीदी सब उसकी राह देखकर खडे थे।
“बेटा! बाइक कहाँ हैं?” मम्मी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि सोरी! मुझे बाइक नहीं चाहिये। और पापा मुझे ओटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे वेकेशन तक ओटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन आराम करेंगे, और मम्मी आज मैं मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिये तुम अपनी पसंद की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।

मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर मम्मी उसको गले लगा लिया और कहा कि “बेटा! सुबह जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पापा को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।” मोहन ने कहा
“नहीं मम्मी! अब मेरी समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने आखरी जवाब नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मम्मी हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो”और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया। और बोले “वाह! मोहन जो जवाब तुमनें लिखकर नहीं दिये वे प्रेक्टिकल जीवन जीकर कर दोगे

“सर! आप और यहाँ?” मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।

“मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही
और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।”
ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।

मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा….
मेरा सभी सम्माननीय अभिभावकों से आग्रह है कि आप इस पोस्ट को आप भी जरूर पढ़िएगा और अपने बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दें इससे अच्छी पोस्ट मैंने अपनी जिंदगी में आज तक नहीं पढ़ी प्रैक्टिकल जीवन में तो मैंने अनुभव किया है लेकिन सभी लोगों को किस प्रकार से अनुभव कराया जाए इसके लिए मेरा आपसे आग्रह है कि आप स्वयं और अपने बच्चों को इस पोस्ट को जरूर पढ़ने का अवसर प्रदान करें l

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Posted in हिन्दू पतन

चिंतन कीजिए और आज ही निर्णय लीजिये कि आप किसके साथ हैं…

वर्ना
कल आपके पास संभवतः कुछ ना बचे
और
श्रद्धा से पूजने वाले भारत में मातृशक्ति को बिकना पडे, दो दीनार में
अफगानिस्तान की तरह..

बँटवारे के बाद लगभग पंद्रह साल तक मुसलमान भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से भारत आते-जाते रहे । बहुत से लोग तो बरसों तक तय नहीं कर पा रहे थे कि यहाँ रहें या वहाँ रहें । एक थे उनकी महत्वाकांक्षा थी कि वह एयर फोर्स में पायलट बनेंगे, अगर भारत में चयन नहीं हुआ तो पाकिस्तान चले जायेंगे, उनके परिवार के बहुत से लोग पाकिस्तान में बस गये थे ।
एक परिचित ने तो आधे बच्चों के नाम मुस्लिम रखे, आधों के हिंदू, ताकी जिस तरफ फायदा दिखे उधर ही दावा पेश कर दें। मुसलमानों के दोनों हाथ में लड्डू थे । हमारे बरेली के हाशम सुर्मे वाले बताते हैं कि उनके दो ताया कराची चले गये और वहाँ बरेली का मशहूर सुर्मा बेच रहे हैं बचे दो भाई बरेली का कारोबार संभाले हुए हैं । यूनानी दवायें बनानी वाली हमदर्द भी आधी हिंदुस्तान में रह गई आधी पाकिस्तान चली गई और वहाँ भी रूह अफ़्ज़ा पिला रही है ।

साहिर लुधियानवी का पाकिस्तान में वारंट कटा तो रातोरात भारत भाग आये, कुर्रतुल ऐन हैदर भारत से पाकिस्तान गईं थीं जहाँ उन्होंने उर्दू का अमर उपन्यास आग का दरिया लिखा जो लाहौर से छपा । यह उपन्यास प्राचीन भारत से बँटवारे तक के इतिहास के समेटते हुये भारत की संस्कृति को महिमा मंडित करता था जो पाकिस्तानी मुल्लाओं को बर्दाश्त नहीं हुआ और क़ुर्रतुल ऐन हैदर को इतनी धमकियाँ मिलीं कि वह सन ५९ में भारत वापस आ गईं और संयोग से उसी बरस जोश मलीहाबादी पाकिस्तान के लिये हिजरत कर गये । जोश की आत्मकथा यादों की बारात में वह अपने इस निर्णय के लिये पछताते दीख रहे हैं । बड़े गुलाम अली खाँ भी इसी तरह भारत वापस आ गये ।

यह सुविधा मुसलमानों को ही थी कि जब जहाँ चाहे जा के बस जायें । हिंदू एक भी भारत से पाकिस्तान नहीं गया बसने । पाकिस्तान के पहले क़ानून मंत्री प्रसिद्ध दलित नेता जे.एन मंडल बड़ी बेग़ैरती के साथ पाकिस्तान छोड़ने पर मजबूर हुए और भारत में कहीं गुमशुदगी में मर गये ।

पाकिस्तान एक मुल्क नहीं मौलवियों की एक मनोदशा है कि इस्लाम हुकूमत करने के लिये पैदा हुआ है तो वह जहाँ भी रहेगा या तो हुकूमत करेगा या हुकूमत के लिये जद्दोजहद करेगा । मुसलमान कोई नस्ल या जाति नहीं है अपितु दुनिया के किसी कोने का इंसान मुसलमान बन सकता है और धर्म परिवर्तन करते ही उसकी मानसिकता सोच और व्यक्तित्व बदल जाता है और वह स्वयं को उन मुस्लिम विजेताओं के साथ जुड़ा हुआ महसूस करने लगता है जिन्होंने उसके हिंदू पूर्वजों पर विजय पाई थी और मुसलमान बनने पर मजबूर किया था । सच्चाई यही है कि उपमहाद्वीप के लगभग 99% मुसलमान कन्वर्टेड हिंदू हैं । यहाँ तक कि पठान भी ।

आज आज़म ख़ान इस बात को लेकर रंजीदा हैं कि उनके पूर्वज पाकिस्तान नहीं गये इस बात की उन्हें सज़ा दी जा रही है । आज़म ख़ाँ के वोटरों में हिंदू भी शामिल रहे होंगे वरना सिर्फ मुस्लिम वोटों से न वह विधायक बन सकते थे न सांसद । बिना एक पैसा स्टांप शुल्क चुकाये उन्होंने करोड़ों रुपये की ज़मीन जुटा कर उस मुहम्मद अली जौहर के नाम से यूनीवर्सिटी बना ली जिसने इस नापाक मुल्क में न दफ़नाये जाने की वसीयत की थी और आज एक दूसरे मुल्क इज़्राइल में दफ़्न है । इस यूनीवर्सिटी के वह आजीवन कुलपति रहेंगे । और यह मुल्क उनकी क्या ख़िदमत कर सकता है ।

मुसलमानों में एक कट्टरपंथी मौलानाओं की अलग अन्तर्धारा चलती रहती है जिसके आगे आम मुसलमान बेबस हो जाता है । समय समय पर यह आम मुसलमान भी विक्टिम कार्ड खेलता रहता है । कभी अज़हरुद्दीन भी कहते सुने गये थे कि उन्हें मुसलमान होने के कारण प्रताड़ित किया जा रहा है । मिर्ज़ा मुहम्मद रफी सौदा का एक शेर है जो उन्होंने कभी नवाब अवध के दरबार में अर्ज किया था, बहुत से मुसलमानों की भावनाओं की अभिव्यक्ति इन दो लाइनों में बयाँ है । आज़म ख़ाँ भी उन्हीं में से एक हैं,

हो जाये अगर शाहे ख़ुरासाँ का इशारा,
सजदा न करूँ हिंद की नापाक ज़मीं पर ।

और हम उनसे वंदे मातरम की उम्मीद करते हैं ।

श्रीकृष्ण ने कहा है कि, धर्म-अधर्म के बीच में यदि आप NEUTRAL रहते हैं, अथवा NO POLITICS का ज्ञान देते हैं, तो आप अधर्म का साथ देते हैं

भीम ने गदा युद्ध के नियम तोड़ते हुए दुर्योधन को कमर के नीचे मारा
ये देख बलराम बीच में आए और भीम की हत्या करने की ठान ली।

तब श्रीकृष्ण ने अपने भाई बलराम से कहा..

आपको कोई अधिकार नहीं है इस युद्ध में बोलने का क्योंकि आप न्यूट्रल रहना चाहते थे ताकि आपको न कौरवों का, न पांडवों का साथ देना पड़े।
इसलिए आप चुपचाप तीर्थ यात्रा का बहाना करके निकल गये।

(१) भीम को दुर्योधन ने विष दिया तब आप न्यूट्रल रहे?
(२) पांडवो को लाक्षागृह में जलाने का प्रयास किया गया, तब आप न्यूट्रल रहे ?
(३) द्यूत क्रीड़ा में छल किया गया तब आप न्यूट्रल रहे?
(४) द्रौपदी का वस्त्रहरण किया आप न्यूट्रल रहे?

(५) अभिमन्यु की सारे युद्ध नियम तोड़ कर हत्या की गयी, तब भी आप न्यूट्रल रहे?!

आपने न्यूट्रल रह कर, मौन रह कर, दुर्योधन के हर अधर्म का साथ ही दिया! अब आपको कोई अधिकार नहीं है कि आप कुछ बोलें।

क्योंकि धर्म-अधर्म के युद्ध में अगर आप न्यूट्रल रहते हैं तो आप भी अधर्म का साथ दे रहे हैं..

आज हमारा ये देश 712 ई. से धर्म युद्ध लड़ रहा है और हर नागरिक इसमें एक सैनिक है, राष्ट्र भक्त है !

यदि मैं तटस्थ रह कर अधर्म का साथ देता हूँ तो मुझे भी अधिकार नहीं है शिकायत करने का कि देश में ऐसा वैसा बुरा क्यों हो रहा है, अगर मैं उस बुरे का विरोध नहीं करता।

भाजपा धर्म के साथ है या नहीं, ये मैं नहीं जानता पर दूसरी पार्टियाँ और संग़ठन निःसंदेह अधर्म के साथ हैं।
अब आप स्वयं चिंतन कीजिए कि जो चुप हैं वो किसके साथ हैं…
और
जो बेवजह बोलते हैं, बिना किसी उचित कारण के, जिनको सिर्फ बोलने का ही जाब मिला है, पैसे के लिए…वो सिर्फ पैसे के लिए ही बोलते हैं। उन्हें धर्म-अधर्म या अच्छे बुरे से कोई लेना-देना नहीं..

_यह हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह उसी का साथ दे जो राष्ट्रहित में है।

🙏🏻🇧🇴🚩

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तृष्णा का त्याग
एक व्यक्ति गरीबी से जूझते हुए इतना तंग आ गया कि जंगल की ओर चला
गया। सघन वन में उसने एक कुटिया देखी तो उस ओर चल पड़ा। उसमें एक
संन्यासी रह रहे थे। उनके सामने जाकर वह गिड़गिड़ाया- महाराज,
शरण में आ गया। तंगहाली से परेशान हो चुका हूं। मेरा उद्धार करो। साधु ने
पूछा-क्या चाहिए। तो गरीब बोला-आप मेरी दशा देख रहे हैं। मैं क्या
चाहूंगा गरीबी से तंग होकर मरना अथवा जीने के लिए धन। साधु ने कहा- धन
छोड़कर ही तो मैं यहां आ गया हूं। मेरे पास देने के लिए वही तो नहीं है। लेकिन
गरीब याचक पीछे पड़ गया तो साधु ने सामने नदी की ओर संकेत करके कहा
कि जाओ,उसमें से चमकीला पत्थर उठा लो। याचक ने कहा कि पत्थर तोड़तोड़कर मेरे हाथ घिस गए, कुछ हासिल नहीं हुआ। अब मैं इसका क्या करूंगा।
साधु ने कहा कि पगले वह साधारण पत्थर नहीं, पारस पत्थर है। जिस वस्तु
को छू लेता है, सोना बन जाती है। तुम इसे ले जाओ और सुखपूर्वक रहो। वह
व्यक्ति पत्थर लेकर चल तो पड़ा लेकिन रास्ते में उथल-पुथल होने लगी। पहले
तो सोचा कि गरीबी दूर हो जाएगी। लेकिन मन में दूसरा विचार गंभीर रूप लेने
लगा। उसने वापस साधु के पास जाने का निर्णय किया। उनके पास पहुंचकर
पारसमणि उनके सामने रखी और कहा-इसे वापस ले लो।साधु ने आश्चर्यचकित
होकर उसकी तरफ देखा। उस व्यक्ति ने कहा कि आपने पारस पत्थर होते हुए
भी उसे नहीं रखा तो आपके पास अवश्य उससे मूल्यवान वस्तु है। साधु ने कहामैंने तृष्णा को त्यागकर संतोष को अपने पास रखा है। यदि तुम इसे लेकर खुश
रहते हो तो सुख से बड़ा कोई साधन नहीं है।

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स्नेहिल छाँव

“सुनों बहू ,इतनें सालों से खूब संभाल ली इस गृहस्थी को अब मेरे बस की बात नहीं …”
रमा ने बड़े ही तल्खी के साथ कहा था। नेहा को सुनकर थोड़ा अजीब तो लगा पर उसनें बड़े ही प्यार से कहा,
“जी मम्मी आप समझा दीजिएगा जैसा आप कहेंगी मैं वैसा कर लूँगी”
और उस दिन के बाद नेहा घर की अमूमन सारी जिम्मेदारी बखूबी निभाने लगी।
एक दिन नेहा ने कहा,

” मम्मी जी को मैं शिर्डी सांई बाबा के दर्शन करवा लाती हूँ साथ ही नासिक त्रयम्बकेश्वर आदि भी घूम आएँगे “

चूँकि रमा सांई बाबा को बहुत मानतीं थी उनपर अटूट विश्वास व आस्था थी इसलिए परिवार में सब सहमत हो गए। नेहा ने फ्लाईट की टिकिट बुक की। नियत दिन एयरपोर्ट पहुँचने पर बोर्डिंग पास में गोवा पढ़कर, रमा ने आश्चर्य से नेहा की ओर देखकर पूछा,
“हम गोवा जा रहें है “
नेहा ने अनुरोध करतें हुए कहा,
” जी मम्मी,प्लीज़ अभी आप किसी से ना कहना ” हम गोवा होकर शिर्डी जाएँगे।
कुछ घण्टे बाद दोनों गोवा के एक रिसोर्ट में थे।
मम्मी आप यहाँ जितना चाहे स्पॉ व जकूजी में जाएँ,स्विमिंग पूल पर स्विमिंग करें जो मर्जी सो करें… सुनकर विस्मय से रमा, बहू नेहा को देखती रही…
नेहा ने रमा को इन सब चीजों का अच्छा खासा अनुभव भी करवा दिया । साथ ही वे स्कूटर किराये पर लेकर आसपास की सैर करतें ,रोज सी- बीच पर समुद्र की लहरों में घण्टों भीगतें रहतें ।
एक दिन शाम को रमा बोली,
” बहू तू सच सच बता ,अचानक से गोवा की सैर सपाटा का ख़्याल तेरे मन में क्यों आया “
“पहले आप बताएं आपकों मज़ा आ रहा है या नहीं “

“अरे तुम तो सवाल के जवाब में सवाल पूछनें लगीं…” मेरी बात का जवाब तो दे ।

मम्मी दरअसल मेरे दादाजी व पापा भी डॉक्टर रहें, हम दोनों बहनें भी डॉक्टर बन गईं…मेरी माँ गृह गृहस्थी में ही फँसी रही। हमनें कभी उनकें मन को समझा ही नहीं। हमें लगता सब समान्य ही तो है। पर वो हम सबके साथ रहकर भी मानों अकेली ही थी।धीरे धीरे डिप्रेशन और कई सारी बीमारियों ने उन्हें जकड़ लिया । उनके इस दुनियाँ से चले जानें के बाद उनकी लिखी डायरी मुझे मिली। जिसमें उन्होंने अपनें मन की व्यथा लिख रखी थी। पढ़कर मेरा मन बहुत आहत हुआ, हमनें अपनीं माँ को सच में अकेला सा कर दिया था।

यहाँ अपनें घर में भी मैं, पापाजी व गौरव डॉक्टर हैं। हम तीनों भी अक्सर अपनें प्रोफेशन की ही बातें करतें रहतें हैं । इस घर में जब से ब्याह करके आई ,आपको चुप चुप ही देखा तो लगा आपकों कम बोलनें की आदत है थोड़ा रिजर्व सा नेचर होगा। पर पिछले कई दिनों से आपके व्यवहार में काफी परिवर्तन दिखे तो मुझे आपकी चिन्ता होनें लगी ….इसलिए सोंचा आपके साथ क्वॉलिटी टाईम स्पेंड करूँ और सबसे जरुरी बात , एकबार अपनीं माँ को खो चुकी हूँ दूसरी बार….
कहते कहते रो पड़ी नेहा…रमा का रीता मन, बहू की बात सुन भर आया वो भी रोने लगीं… खुद को संयत करतें हुए रमा ने बताया ,ये तो व्यस्त रहते ही थे, बेटा गौरव बचपन में मेरी साड़ी का पल्लू पकड़ कर घूमता था । पूरे समय माँ माँ चिल्लाता रहता,हर काम में उसे मेरी ज़रूरत होती। पर बड़ा होते होते ,फिर मेडिकल की पढ़ाई में उलझकर वो मुझसे कब दूर होता चला गया पता ही नहीं चला…
अब हर चीज में उसे अपनें पापा की जरूरत होती,उन्हीं से सलाह मशविरा करता। तुम ब्याह करकें आयीं, डॉक्टर होने से तुम भी अपनीं ज़िंदगी में व्यस्त होती जा रही थी…
मैं एक सरीखी ज़िन्दगी जी जीकर उकताने सी लगी। मेरे अंदर छटपटाहट, पीड़ा, अवसाद बढ़ता जा रहा था। लगता किसी से कोई बात ही ना करूँ, तो कभी लगता जी भरकर मन की भड़ास निकालूँ… अजीब सी कशमकश में थी….
तुम मुझे यहाँ ले आयीं, तुम्हारें साथ मैं खुलकर हँसी,बोलीं, तुम्हारा वो स्पॉ भी बड़ा चमत्कारी था, गजब असर किया, पूरी तरह से रिलैक्स हो गई। सच कहूँ तो बरसों बाद मुझे बड़ा सुकून मिला…..
” अच्छा सुन, माँ को याद कर अब दुःखी ना होना “
” ये तेरी माँ है न तेरे पास “
साईं बाबा की कृपा से बहू के रूप में मुझे तुझ जैसी प्यारी समझदार बेटी मिल गई… कहकर रमा ने नेहा को गले लगा लिया…दोनों बड़ी देर तक यूँ ही रोती रहीं सिसकतीं रही…. खिड़की के बाहर आकाश में सूरज ढ़लता दिखा…. जिसे देखकर रमा बोली,
” चल अब बहुत हुआ रोना धोना जल्दी से सी- बीच में छपछप कर आएँ “
फिर कल सुबह शिर्डी के लिए निकलना भी तो हैं ना…सुनकर, हाँ माँ कहकर नेहा भी हँसने लगी….

  • सपना शिवाले सोलंकी ✍️
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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐सीताराम की जोड़ी💐💐

‘भगवान राम’ को जब पिता दशरथ वन जाने की आज्ञा देतें हैं तो वो पिता के आदेश का अनुपालन करते हुये वन जाने को प्रस्तुत हो जातें हैं और अपने सभी गुरुजनों, मंत्रिपरिषद के लोग, प्रजाजनों तथा परिजनों से मिलने और अंतिम आज्ञा लेने जातें हैं।

इस क्रम में राम सबसे पहले अपनी जननी कौशल्या के पास जातें हैं और माता से अपने वनगमन की बात कहतें हैं। माँ शोकमग्न हो जातीं हैं।
उसी समय अनुज लक्ष्मण भी वहां उपस्थित होतें हैं और दोनों राम से कहतें हैं, वन न जाओ। लक्ष्मण तो ये तक कह देतें हैं कि आप मेरी सहायता से राज्य का शासन बलपूर्वक अपने हाथ में ले लीजिये।
शोक में डूबी माँ कौशल्या लक्ष्मण की बातों का अनुमोदन करती हैं और दोनों श्रीराम को उनके धर्म का पालन करने से रोकतें हैं। राम किसी तरह उन्हें समझा-बुझाकर वहां से निकल जाते हैं तो पुनः लक्ष्मण उनको कई तरह से समझाने की कोशिश करतें हैं ।
मगर धर्म का पालन करने और कराने हेतू धरती पर अवतरित भगवान उनकी बात नहीं मानते। राम वन जाने से पूर्व जिस-जिस के पास भी जातें हैं सब राम से यही कहतें हैं कि राम ! तुम वन न जाओ और अयोध्या का शासन अपने हाथों में ले लो। सारी प्रजा, सारे गुरुजन, सारे मंत्रियों में से कोई भी नहीं था जिसने राम से ये कहा हो कि तुम अयोध्या के महाराज दशरथ की इस आज्ञा का अनुपालन करो और पिता की आज्ञा का पालन कर धर्म के रक्षक बनो।

वनवास पूर्व श्रीराम को उनके धर्मपथ और कर्तव्य-पथ से विरत न करने वालों में एक ही नाम है और वो नाम है उनकी भार्या “जानकी” का।

प्रभु जब अपनी पत्नी को अपने वन जाने की आज्ञा के बारे में बताते हैं तो वो एक बार भी उनसे नहीं कहतीं कि आप पिता और माता की आज्ञा का उल्लंघन कर दो और बलपूर्वक शासक बन जाओ। धर्म-मार्ग और कर्तव्य-पथ की ओर कदम बढ़ा चुके श्रीराम को एक बार भी वो अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को नहीं कहतीं बल्कि सीधा उनसे कहतीं हैं ,

“आर्यपुत्र ! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू – सब पुण्यादि कर्मों का भोग भोगते हुये अपने-अपने भाग्य के अनुसार जीवन-निर्वाह करतें हैं।

हे पुरुषवर ! केवल पत्नी ही अपने पति के भाग्य का अनुसरण करती है; अतः आपके साथ ही मुझे भी वन में रहने की आज्ञा मिल गई है।

हे रघुनंदन ! यदि आप आज ही दुर्गम वन की ओर प्रस्थान कर रहें हैं तो मैं रास्ते के कुश और काँटों को कुचलती हेई आपके आगे-आगे चलूंगी।”

उस समय के दो महान साम्राज्य जनकपुर और अयोध्या की बेटी और बहू ‘सीता’ वनवासी वस्त्र धारण कर नंगे पांव पति की सहचारिणी बनकर वनवासिनी हो गई और दुनिया में स्वयं का नाम श्रीराम के साथ अमर कर लिया।

जानकी ने केवल अपने पति के लिये वनवासी जीवन को चुना था जबकि श्रीराम, दशरथ और सारे अयोध्यावासी उनसे अयोध्या के राजमहलों में रहने के लिये कह रहे थे। जानकी ने केवल अपने पति के लिये असीम दुःख उठाये। जानकी धर्म रक्षण का संकल्प लिये अपने पति के राह की बाधा नहीं बनी बल्कि उनकी मजबूती बनकर उठीं।
किसी मजबूरी में राम को सीता का परित्याग करना पड़ा पर जानकी ने न तो अपने पति के लिये और न ही अपने किसी ससुराल वाले के लिये कभी कटु वचन कहे बल्कि अपने पुत्रों लव और कुश को राम का पावन चरित ही सुनाया।

आज जानकी के इस धरती को छोड़े हुये लाखों साल बीत गये हैं पर ‘पत्नी रूप में नारी’ की अन्यत्र मिसाल विश्व ‘सीता’ के अलावा खोज नहीं पाया है।

‘स्वामी विवेकानन्द’ कहते थे कि भारत की हर बालिका को सीता जैसे बनने का आशीर्वाद दो। हिन्दू जाति को सबसे अधिक गौरवशाली वो इसलिये मानते थे क्योंकि हममें सीता पैदा हुई थी।

श्रीराम को ऐसी ही पत्नी तो मिली थी जो अपने पति के मन को पढ़ने वाली, उनके इच्छा के अनुरूप आचरण करने वाली और उनके मन के अनुकूल खुद को ढ़ालने वाली थी। धर्मपालक श्रीराम वन जायेंगें ही और उनको उनके इस निश्चय से डिगाया नहीं जा सकता ये बात जानकी के सिवा कोई नहीं जानता था इसलिये जानकी ने उन्हें एक बार भी रुकने को नहीं कहा बल्कि स्वयं उनके साथ वन के कष्टों को सहने को प्रस्तुत हो गईं।

इसलिये “सीता-राम की जोड़ी” लाखों साल से ‘दाम्पत्य के सबसे सुखद जोड़े’ का पर्याय बनी हुई है और जानकी भारत की महान नारियों में अग्रगण्य है जिनके सम्मान की रक्षा के लिए नर से लेकर वानर और वनवासी से लेकर जटायु जैसे पक्षी तक बलिदान को प्रस्तुत हो गये थे

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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एक बादशाह अपने गुलाम से बहुत प्यार करता था।
एक दिन दोनों जंगल से गुज़र रहे थे, वहां एक वृक्ष पर
एक ही फल लगा था। हमेशा की तरह बादशाह ने एक
फांक काटकर गुलाम को खाने के लिये दी।
गुलाम को स्वाद लगी, उसने धीरे-धीरे सारी फांक
लेकर खाली और आखरी फांक भीझपट कर खाना
चाहता था। बादशाह बोला, हद हो गई। इतना स्वाद।
गुलाम बोला, हाँ बस मुझे ये भी दे दो। बादशाह से ना
रहा गया, उसने आखरी फांक मुह में डाल ली। वो
स्वाद तो क्या होनी थी, कडवी जहर थी। बादशह
हैरान हो गया और गुलाम से बोला, “तुम इतने कडवे
फल को आराम से खा रहे थे और कोई शिकायत भी
नहीं की।” गुलाम बोला, “जब अनगिनत मीठे फल
इन्ही हाथो से खाये और अनगिनत सुख इन्ही हाथो से
मिले तो इस छोटे से कडवे फल के लिये शिकायत
कैसी।” मालिक मैने हिसाब रखना बंद कर दिया है,
अब तो मै इन देने वाले हाथों को ही देखता हूँ बादशाह
की आँखों में आंसू आ गए। बादशाह ने कहा, इतना
प्यार और उस गुलाम को गले से लगा लिया।
Moral- हमे भी परमात्मा के हाथ से भेजे गये दुःख
और सुख को खुशी खुशी कबूल करना चाहिये।
परमात्मा से शिकायत नहीं करनी चाहिये….

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

“एक सुनार था, उसकी दुकान से मिली हुई
एक लोहार की दुकान थी।
सुनार जब काम करता तो उसकी दुकान से
बहुत धीमी आवाज़ आती, किन्तु जब लोहार
काम करता तो उसकी दुकान से कानों को
फाड़ देने वाली आवाज़ सुनाई देती।
एक दिन एक सोने का कण छिटक कर लोहार
की दुकान में आ गिरा। वहाँ उसकी भेंट लोहार
के एक कण के साथ हुई।
सोने के कण ने लोहे के कण से पूछा- भाई
हम दोनों का दुख एक समान है, हम दोनों को
ही एक समान आग में तपाया जाता है और
समान रूपये हथौड़े की चोट सहनी पड़ती है।
मैं ये सब यातना चुपचाप सहता हूँ, पर तुम
बहुत चिल्लाते हो, क्यों?
लोहे के कण ने मन भारी करते हुऐ कहातुम्हारा कहना सही है, किन्तु तुम पर चोट
करने वाला हथौड़ा तुम्हारा सगा भाई नहीं है।
मुझ पर चोट करने वाला लोहे का हथौड़ा मेरा
सगा भाई है।
परायों की अपेक्षा अपनों द्वारा दी गई चोट
अधिक पीड़ा पहुचाँती है।

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🥸सप्रेम नमन आत्मन्

एक बार एक नौजवान लड़के ने बुजुर्ग से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है?

बुजुर्ग ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो। वो मिले, फिर बुजुर्ग ने नौजवान से उसके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक बुजुर्ग ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया।

लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा, लेकिन बुजुर्ग ताकतवर था और उसे तब तक डुबोये रखा जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा, फिर बुजुर्ग ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना।

बुजुर्ग ने पूछा, “जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”

लड़के ने उत्तर दिया, “सांस लेना”

बुजुर्ग ने कहा, “यही सफलता का रहस्य है, जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना चाहते थे तो वो तुम्हें मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है।

दोस्तों, जब आप सिर्फ और सिर्फ एक चीज चाहते हैं तो वो चीज आपको मिल जाती है।

जैसे छोटे बच्चों को देख लीजिये वे न भूतकाल में जीते हैं न भविष्य में, वे हमेशा वर्तमान में जीते हैं और जब उन्हें खेलने के लिए कोई खिलौना चाहिए होता है या खाने के लिए कोई टॉफ़ी चाहिए होती है… तो उनका पूरा ध्यान, उनकी पूरी शक्ति बस उसी एक चीज को पाने में लग जाती है और वे उस चीज को पा लेते हैं।

शिक्षा:-
सफलता पाने के लिए एकाग्रता बहुत ज़रूरी है, सफलता को पाने की जो चाहत है उसमें ईमानदारी होना बहुत ज़रूरी है और जब आप वो एकाग्रता और वो ईमानदारी पा लेते हैं तो सफलता आपको मिल ही जाती है।

आज का दिन शुभ मंगलमय हो।

महाकाल

संजीव सुकला