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शीर्षक___
“मायके की टीस “

स्निग्धा चहकती हुई अपने मायके फोन लगाती है , मायके का बेसफोन उठाते हैं स्नेहा के बड़े भैया ……आवाज सुन , हेलो भैया , सादर प्रणाम, स्निग्धा बोल रही हूँ । कैसे हैं आपलोग? माँ – पापा और भाभी का क्या हाल है ?सब ठीक है बहना , तुम अपना कहो। कैसी हो तुम? जी भैया , हम सब ठीक-ठाक हैं । चार दिन के बाद रक्षाबंधन है इसलिये इस बार आ रही हूँ आपको और गौरव को राखी बाँधने ।, मेरी शादी के पुरे नौ बरस के बाद संजोग जुटा है राखी में आने का ! इतनी ज्यादा उतावली हूँ और उत्साहित भी , मेरा वश चलता न तो उड़कर आप सबके पास आ जाती मैं । अच्छा है स्निग्धा आओ न , हम सब भाई बहन राखी का त्योहार एक साथ सेलिब्रेट करते हैं, इधर भैया भी कह रहे हैं फोन पर । ठीक है भैया , पर आप माँ पापा को मत बताईयेगा ? उन्हें मैं आकर सरप्राइज दूंगी अपने आने का ।ओ के कहकर फोन रख दिया गया दोनों की ओर से।

यूँ स्निग्धा को लगा मायके में कुछ ठीक नहीं चल रहा है क्योंकि मेरे आने की खबर से भैया खासा उत्साह नहीं दिखाए हैं? पता नहीं क्यूं उनके आवाज से औपचारिकता का आभास लगा।

राखी के दिन सुबह सुबह ही स्निग्धा पहुंचती है ।

स्निग्धा अपने माँ पापा से मिलने उनके कमरे में जाती है । अरे बेटा तु कब आई? माँ बेटी को देख खुश होती हैं , अभी आयी हूँ , आपको और पापा को सरप्राइज देना चाहती थी इसलिए बताया नहीं? पापा कहाँ हैं ।
पहले बैठ तो सही, पापा भी आ जायेंगे ।

तब तक स्निग्धा की बड़ी भाभी आ जाती हैं , भाभी ननद गले मिलते हैं । भैया कहाँ हैं, वो फल मिठाई लेने बाजार गए हैं आते ही होंगे ।

चलिए भाभी राखी की थाली सजा लेते हैं । हाँ चलो , मैं भी तुम्हारी मदद करती हूँ भाभी बोली।

भाभी छोटे भाई भौजाई नहीं दिख रहे , थाली में राखी कुमकुम दीया मिठाई सजाकर रखते हुए स्निग्धा पूछ बैठी है । वो लोग ऊपर वाले तल्ले में रहते हैं उनके साथ में पापा भी रहते हैं । यह सुनते ही स्निग्धा के हाथ से थाली छूटते छूटते बचा ?

भाभी, ये सब कब हुआ? मतलब आपलोग अलग अलग हो गए हैं , माँ नीचे आपलोग के साथ रहती है और पापा ऊपर छोटे भाई के साथ!

हाँ ,स्निग्धा चार महीने पहले ही ऊपर नीचे फ्लोर को हम दोनों आपस में बाँट लिए हैं ।

यह किसके द्वारा।किया गया है , इसके पीछे आप हैं या छोटी भाभी का किया धरा है ? बाजार से आने दीजिए भैया को , पूछती हूँ कि माँ पापा के जीते जी घर भी बाँट लिया है और दोनों को भी बाँट दिया है ? स्निग्धा जोर जोर से रोने लगी , हे भगवान ! भाभियाँ का तो अलग खून है भिन्न भिन्न घर से संबंधित संस्कार हैं इनके । लेकिन दोनों भाई तो अपने हैं एक ही कोख के जने?

गौरव गौरव!उच्च स्वर से पुकार रही है स्निग्धा,
अरे दीदी , आप कब आईं ? ,
आज राखी के दिन दीदी के दर्शन हो गए , खुशी से गौरव बोल पड़ा है । स्निगधा के आवाज की गुंज से पापा और गौरव की पत्नी भी आ जाती है ।

पापा को देख कर स्निग्धा की आंखें नम हो गई हैं, ये वही पापा हैं जिनके छांव के तले हम पले बढ़े हैं।पापा के गले लग फफक कर रो पड़ी है स्निग्धा , ये सब क्या हो गया है पापा ? आपका घर है ये , यह निर्णय आपका है कौन कहाँ रहेगा ? ये सब कैसे होने दिया आपने ।

बेटा , तू बैठ तो सही !थोड़ी देर सांस ले ले , फिर बात करते हैं । पापा स्निग्धा को अपने ही समीप बिठा लेते हैं और उसके सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ फेरने लगते हैं।

देख बेटा , तू पूरे दो साल पर आयी है मायके । जब से गौरव की शादी हुई है बड़ी बहू को ऐसा लगने लगा कि हमने छोटी बहू को ज्यादा गहना कपड़ा लत्ता दिया है । बड़ी बहू पिछले चौदह साल से इस घर की बहू है , इतने सालों में यदि हमने तुम्हारे माँ के लिए पांच हजार की साड़ी खरीदी है तो बड़ी बहू के लिए भी खरीदी है। समभाव से सब कुछ किया है , फिर कौन सी कमी रही है उसके लिए ?

कुछ महीनों से गौरव की वाइफ का जीना हराम कर रखा था इसने । इसलिए घर की शांति सुकून के लिए हम लोग ऊपर नीचे शिफ्ट हो गए हैं । रोज की कलह से तेरी माँ का बी पी बढ़ जाता था ।

यह सुनकर स्तब्ध रह गई स्निग्धा ! भैया भी आ गए, भैया आप भी भाभी के गलत सोच पर चल रहे हैं , पर भैया चुप खड़े हैं!

आज राखी का त्योहार है और मैं अपने दोनों भाई के कलाई पर राखी नहीं बांध सकती जब तक आपदोनों माँ पापा को तकलीफ देने के लिए माफी नहीं मांगते?

फिर पापा बोल पड़े कि एक और फैसला किया है मैंने कि इस घर का तीन हिस्सा होगा , एक तुमदोनों का और एक हिस्सा स्निग्धा का है ।

पापा के निर्णय से दोंनो भाई सकते में है और अपनी अपनी बीबी के चेहरे देख रहे हैं मतलब बड़े भैया भाभी के चेहरे पर हवाईयाँ उड़ रही है !

जो फैसला करना है आज ही कर लो दोनों भाई मेरे सामने ,
माँ पापा को इस तरह अलग थलग रखकर वापस नहीं जा सकती । यह घर पापा के मेहनत की कमाई का है और माँ ने भी एक एक पाई जोड़ा तब जाके यह मकान बना ।

,मेरा दोनों भाई में से जो मेरे साथ निष्छल स्नेह जतलाएगा , उसे मैं अपना हिस्सा सौंप दूंगी ।

पापा ने अल्टीमेटम देकर भाई यों के नाक में नकेल डाला है । अपनी बेटी को देख हिम्मत बंधी है पापा में , कहते हैं न कि बेटी परायी होती है लेकिन बेटा भी शादी के बाद पराया बन रोबोट पति बन जाते हैं ।

खैर !मुझे क्या करना है संपति का ? जिसके हृदय में माँ पापा के सेवा करने की श्रद्धा है , उसे ही मैं अपना भाई मानती हूँ और राखी भी बाँधूगी। गौरव आगे बढ़ अपना कलाई बढ़ाता है , राखी बाँध देती है स्निग्धा । भैया मौनी बाबा बने खड़े हैं जैसा बीबी ने नचाया वैसा नाचते रहे ।अभी भी इगो है इनमें कि बड़ा हूँ , छोटी है बहन, खुद आकर बाँधे मुझे।

खैर !

भैया आप भाभी से ही राखी बंधवा लो , ठीक है न! तंज कसते हुए स्निग्धा बोल पड़ी है और भैया मेरे पास आकर अपनी कलाई बढ़ा देते हैं और आज हमारा भाई बहन का अनमोल रिश्ता रक्त का जीत जाता है ।राखी बाँधने के बाद भैया उपहार स्वरूप पाँच हजार रूपया मेरे हाथ में रख देते हैं और छोटा भाई भी दो हजार का नोट थमाता है । दोनों भाई भावविहल हो बोल पड़ते हैं बहना ऐसे ही हरेक साल राखी में आती रहना।

अंजूओझा पटना
मौलिक स्वरचित
१७•८•२१

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खामोश निर्णय

बारिश शुरु हो गयी थी राजीव ने स्कूटर की गति तेज कर दी ताकि तेज बारिश आने के पहले घर पहुंच जाए। पुलिया संकरी थी सामने से दूसरी गाड़ी को आते देख ब्रेक लगाया पर गाड़ी फिसल गई और वह पुलिया से जा टकराया सिर में गंभीर चोट आने से अस्पताल में लाया गया राजीव की पत्नी दिव्या से डॉ ने कहा देखिए स्थिति काफी गंभीर है हम पूरी कोशिश करेगें पर कुछ कह नहीं सकते।
अपने आपको संभालते हुए जी आप आपरेशन की फार्मेलिटी पूरी कीजिए।
बच्चे और रिश्तेदार भी अस्पताल पहुंच गए थे।आपरेशन थियेटर से निकलते ही डॉ बोले सॉरी हम उन्हें नहीं बचा पाए।और पुनः आपरेशन थियेटर के अंदर चले गये।
अचानक हुए हादसे से सभी सकते में थे।दिव्या को राजीव की स्थिति देखते हुए यह अनुमान तो लग ही गया था वह शांत थी।बाहर बारिश अभी भी हो रही थी पर वह अपने अंदर की बारिश को रोके थी।
माँ पापा ने देहदान का फार्म भरा था तो क्यों न हम इसी अस्पताल में देहदान कर दे।
वह फार्म मैंने कैसिंल कर दिया।दिव्या ने कहा ।
इस समय माँ से बहस नहीं कर सकते थे।आपस में ही बाते करते हुए।
पापा की अंतिम इच्छा भी नहीं मानी माँ ने
भैया हो सकता है माँ सोच रही हो दाहसंस्कार बिना पापा की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।
अगर ऐसा था तो फार्म भरते समय माँ ने पापा को क्यों नहीं रोका।
दो घंटे से ज्यादा हो गये अभी तक बॉडी नहीं दी।तभी वार्ड वॉय आपरेशन थियेटर से सफेद कपड़े से ढ़की बॉडी देते हुए बोला आप इसे ले जा सकते हैं।
बच्चों ने एक बार पुनः माँ की ओर देखा।तभी डॉ ने माँ से कहा आपकी वजह से आज चार लोगों को जीवनदान मिल गया आँखे आई बैंक में रख दी गई है।जल्दी ही दो लोग आपके पति की आँखों से दुनिया देखेंगे।
डॉ आप किसकी क्या बात कर रहे हम समझ नहीं पाये बच्चों ने कहा
आपकी माँ ने देहदान को अंगदान में बदल दिया था लेकिन क्यों।
देहदान तब ठीक है जब आपके दूसरे अंग ठीक काम न कर रहे हो।पर आपके पापा तो यंग थे सबसे अच्छी बात उनके सभी अंग पूरी तरह स्वस्थ थे।ऐसा बहुत कम लोग सोचते हैं जबकि इस समय अंगों की जरूरत ज्यादा है। वो मरकर भी छःलोगों में जीवित रहेंगे.

मधु जैन जबलपुर

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बापू

“काम वाली से सारा काम करवा लेना खबरें मत सुनते रहना” गुरनाम की पत्नी ने स्कूटर स्टार्ट करते हुए कहा ।

“दोपहर को बच्चों को भी ले आना स्कूल से कहीं भूल मत जाना”

“हां मैं देख लूंगा सब तुम जाओ ध्यान से जाना” गुरनाम ने अपनी पत्नी को तसल्ली देते हुए कहा ।
गुरनाम की पत्नी शहर से दस किलोमीटर दूर गांव में सरकारी स्कूल में टीचर थी ।गुरनाम खुद भी सरकारी मुलाजिम था । उसके दो बच्चे थे दोनों ही अच्छे स्कूल में पढ़ते थे ।सुबह बच्चे स्कूल बस पर स्कूल जाते लेकिन दोपहर को गुरनाम खुद उन्हें स्कूल से ले आता था। क्योंकि स्कूल बस काफी लेट आती थी । गुरनाम की पत्नी सुबह जल्दी उठती वह पहले सबके लिए नाश्ता बनाती और साथ में ही दोपहर का खाना बनाती। अपना और गुरनाम का खाना टिफिन में पैक कर देती । बच्चों का दोपहर का खाना पैक करके ओवन में रख देती । बच्चे स्कूल से वापस आ के उसे खा लेते । उसके बाद वह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करती। गुरनाम अपनी पत्नी का टिफन और पानी की बॉटल उसके स्कूटर में रख देता। फिर वो बच्चों को स्कूल बस में छोड़ने चला जाता। उसके वापस आते आते उसकी पत्नी भी स्कूल के लिए तैयार हो जाती और वह अपने स्कूटर पर स्कूल चली जाती। उसके जाने के बाद गुरनाम कामवाली से रसोई और घर की सफाई करवाता और फिर वो अपने दफ्तर के लिए निकल जाता। दोपहर को वो बच्चों को घर छोड़ जाता बच्चे खाना गर्म करके खा लेते । उसकी पत्नी तीन बजे स्कूल से वापस आती थी ।आकर वो थोड़ा आराम करती इतने में गुरनाम भी वापस आ जाता। गुरनाम की पत्नी बच्चों का होमवर्क करवाती और साथ साथ रात का खाना बनाती । यह उनका हर रोज का कार्यक्रम था । उनकी ज़िंदगी बहुत व्यस्त थी । सुबह से शाम तक मशीन की तरह काम करते। गुरनाम अपने मां बाप का अकेला बैठा था ।उसके बापू खेतीबाड़ी का काम करते थे ।उनके पास जमीन बहुत कम थी । पर वह बहुत कठिन परिश्रम करते। गुरनाम की मां भी उसके बापू के साथ खेती के काम में हाथ बंटाती। घर में काफी गरीबी थी फिर भी गुरनाम के माँ बाप ने उसे पढ़ाया । वह भी पढ़ने में बहुत होशियार था ।उसने अच्छे नंबरों में डिग्री पास की और उसे सरकारी नौकरी मिल गई । उसने नौकरी पेशा लड़की से ही शादी की ता जो घर का गुजारा अच्छी तरह चल सके। गुरनाम ने बैंक से लोन लेकर अपना मकान खरीद लिया । मकान खरीदने के बाद उसने घर का जरुरी सामान भी किश्तों पर ले लिया। उसके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ते थे इसीलिए उनकी फीस भी ज्यादा थी ।अच्छे स्कूलों के फीस के अलावा और भी बहुत खर्च होते हैं । उन दोनों की आधी तनख्वाह तो किश्तों में ही निकल जाती थी । ऊपर से बच्चों की पढ़ाई का खर्च वो दोनों नौकरी करते थे । इसीलिए ज़्यादा कपड़ों की ज़रुरत भी पढ़ती थी।उनका महीना बड़ी मुश्किल से निकलता था । गुरनाम अपने मां बाप की कोई भी माली मदद नहीं करता था।=क्योंकि उसका अपना गुजारा ही बड़ी मुश्किल से चलता था। एक बार गुरनाम की मां ने उसे कुछ पेैसे देने को कहा था।पर गुरनाम ने अपनी मज़बूरी मां को बता दी थी । इसी डर से उसने अपने गाँव जाना कम कर दिया। एक दिन अचानक गुरनाम के बापू शहर आ गए । बापू को अचानक आए देकर गुरनाम की पत्नी लाल पीली हो गई। “लगता है बूढ़ा पेैसे मांगने आईअा हैं” “अपना गुजारा तो मुश्किल से होता है अब इनको पेैसे कहां से दें” गुरनाम की पत्नी बढ़ बढ़ा रही थी।
बापू ने हाथ मुंह धोए और आराम करने बैठ गए। गुरनाम भी मन ही मन बातें कर रहा था
“इस बार मेरा भी हाथ कुछ ज़्यादा ही तंग है। बच्चों के स्कूल वाले जूते नए लेने है ।”
“उधर पत्नी की के स्कूटर की भी बैटरी नई लेने वाली है । स्कूटर स्टार्ट होने में दिक्कत होती है। अगर स्कूटर रास्ते में बंद हो गया तो बहुत मुश्किल हो जाएगी ।”
“बापू को भी अभी आना था”
घर में गहरी चुप थी। खाना खाने के बाद बापू ने गुरनाम को पास बैठने को कहा। गुरनाम को लग रहा था कि बापू अब पेैसे मांगे गे। पर बापू बड़े बेफिक होकर कुर्सी भी बैठे थे।
“बात सुन”उन्होंने गुरनाम से कहा।
वह साहस रोककर उनकी तरफ देख रहा था । उसकी नसनस बापू का अगला वाक्य सुनने से डर रही थी।
बापू ने कहा “खेती के काम में बिल्कुल भी फुर्सत नहीं है”
“मैंने शाम को ही वापस जाना है । पिछले तीन महीने से तेरी कोई चिट्ठी नहीं आई जब तू परेशान होता है तभी ऐसा करता है।”
बापू ने जेब से पाच पाच सो के दस नोट निकाले और गुरनाम की तरफ बढ़ाते हुए बोले । “ले पकड़ इस बार फसल अच्छी हो गई थी। हमें कोई मुश्किल नहीं है।तू बहुत कमज़ोर लग रहा । तू अपनी और अपने परिवार की सेहत का ख्याल रखा कर । हम गाँव में बिल्कुल ठीक ठाक है।”
“तेरी मां एक टाइम सब्जी बना लेती है। हम दोनों टाइम वहीं खा लेते हैं चूंकि बार बार तेरी माँ को बनाना मुश्किल होता है ।हमारी भैंस भी अच्छा दूध दे देती हैं । हम थोड़ा दूध अपने पास रख के बाकी का दूध डेयरी में डाल देते हैं। तेरी माँ के ब्लड प्रेशर की दवाई तो गाँव की डिस्पेंसरी से फ्री मिल जाती हैं । मैंने भी पिछली बार आंखों के कैम्प में आंख का ऑपरेशन करवाया था । एक भी पेैसा नहीं देना पड़ा। इस बार तेरी माँ का ऑपरेशन भी कैम्प में ही करवा देना है । तुम हमारी बिल्कुल फिक्र मत करना।” बापू बोले जा रहा था ।
मगर गुरनाम के मुंह में से शब्द नहीं निकल रहे थे । इससे पहले के गुरनाम कुछ बोलता बापू ने उसे डांट लगाई
” ले पकड़ ये पेैसे बच्चों के काम आएंगे”
“नई बापू ” गुरनाम ने बस इतना ही कहा पर बापू ने जबर्दस्ती पेैसे उसके हाथ में दे दिए।
बरसों पहले बापू इसी तरह उसे स्कूल छोड़ते समय पेैसे उसके हाथ में दे देता था । उस टाइम गुरनाम की नज़रें आज की तरह नीचे नहीं होती थी
लखविंदर सिंह संधू
8725824036

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐दामाद💐💐

रेनू की शादी हुयें, पाँच साल हो गयें थें, उसके पति थोड़ा कम बोलतें थे पर बड़े सुशील और संस्कारी थें। माता_पिता जैंसे सास, ससुर और एक छोटी सी नंनद, और एक नन्ही सी परी, भरा पूरा परिवार था, दिन खुशी से बित रहा था।

      आज रेनू बीतें दिनों को लेकर बैठी थी, कैंसे उसके पिताजी नें बिना माँगे 30 लाख रूपयें अपने दामाद के नाम कर दियें, जिससे उसकी बेटी खुश रहे, कैसे उसके माता_पिता ने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की, बहुत ही आनंदमय तरीके से रेनू का विवाह हुआ था।

    खैर बात ये नही थी, बात तो ये थी, रेनू  के बड़े भाई ने, अपने माता_पिता को घर से निकाल दिया था, क्यूकि पैसें तो उनके पास बचें नही थें, जितने थें उन्होने रेनू की शादी में लगा दियें थें, फिर भला_ बच्चें माँ_बाप को क्यू रखने लगें, रेनू के माता पिता एक मंदिर मे रूके थें।

रेनू आज उनसे मिल के आयी थी, और बड़ी उदास रहने लगी थी, आखिर लड़की थी, अपने मातापिता के लिए कैसे दुख नही होता, कितने नाजों से पाला था, उसके पिताजी ने बिल्कुल अपनी गुडिया बनाकर रखा था, आज वही मातापिता मंदिर के किसी कोने में भूखें प्यासें पड़ें थे।

     रेनू अपने पति से बात करना चाहती थी, वो अपने माता_पिता को घर ले आए, पर वहाँ हिम्मत नही कर पा रही थी, क्यूकि उनके पति कम बोलते थे, अधिकतर चुप रहते थे, जैंसे तैंसे रात हुई रेनू के पति और पूरा परिवार खाने के टेबल पर बैठा था, रेनू की ऑखे सहमी थी, उसने डरते हुये अपने पति से कहा,

सुनिये जी, भाईयाभाभी ने मम्मीपापा को घर से निकाल दिया हैं, वो मंदिर में पड़े है, आप कहें तो उनको घर ले आऊ,
रेनू के पति ने कुछ नही कहा, और खाना खत्म कर के अपने कमरें में चला गया, सब लोग अभी तक खाना खा रहें थे, पर रेनू के मुख से एक निवाला भी नही उतरा था, उसे बस यही चिंता सता रही थी अब क्या होगा, इन्होने भी कुछ नही कहा, रेनू रूहासी सी ऑख लिए सबको खाना परोस रही थी,

    थोड़ी देर बाद रेनू के पति कमरें से बाहर आए, और रेनू के हाथ में नोटो का बंडल देते हुये कहा, इससे मम्मी, डैडी के लिए एक घर खरीद दो, और उनसे कहना, वो किसी बात की फ्रिक ना करें मैं हूं,  

रेनू ने बात काटते हुये कहा, आपके पास इतने पैसे कहा से आए जी??
रेनू के पति ने कहा, ये तुम्हारे पापा के दिये गये ही पैसे हैं,
मेरे नही थे, इसलिए मैंने हाथ तक नही लगाए, वैसे भी उन्होने ये पैसे मुझे जबरदस्ती दिये थे, शायद उनको पता था एक दिन ऐसा आयेगा,
रेनू के सासससुर अपने बेटे को गर्व भरी नजरों से देखने लगें, और उनके बेटे ने भी उनसे कहा, अम्मा जी बाबूजी सब ठीक है ना?? उसके अम्मा बाबूजी ने कहा बड़ा नेक ख्याल है बेटा, हम तुम्हें बचपन से जानते हैं, तुजे पता है, अगर बहू अपने मातापिता को घर ले आयी, तो उनके माता पिता शर्म से सर नही उठा पायेंगे, की बेटी के घर में रह रहें, और जी नही पाएगें, इसलिए तुमने अलग घर दिलाने का फैसला किया हैं, और रही बात इस दहेज के पैसे की, तो हमें कभी इसकी जरूरत नही पड़ी, क्यूकि तुमने कभी हमें किसी चीज की कमी होने नही दी, खुश रहो बेटा कहकर रेनू और उसके पति को छोड़ सब सोने चले गयें,

  रेनू के पति ने फिर कहा, अगर और तुम्हें पैसों की जरूरत हो तो मुजे बताना, और अपने माता_पिता को बिल्कुल मत बताना घर खरीदने को पैसे कहा से आए, कुछ भी बहाना कर देना, वरना वो अपने को दिल ही दिल में कोसते रहेंगें, चलो अच्छा अब मैं सोने जा रहा, मुजे सुबह दफ्तर जाना हैं, रेनू का पति कमरें में चला गया,

         और रेनू खुद को कोसने लगी, मन ही मन ना जाने उसने क्या_क्या सोच लिया था, मेरे पति ने दहेज के पैसें लिए है, क्या वो मदद नही करेंगे करना ही पड़ेगा, वरना मैं भी उनके माँ_बाप की सेवा नही करूगी, 

रेनू सब समझ चुकी थी, की उसके पति कम बोलते हैं, पर उससे जादी कही समझतें हैं,
रेनू उठी और अपने पति के पास गयी, माफी मांगने, उसने अपने पति से सब बता दिया,
उसके पति ने कहा कोई बात नही होता हैं, तुम्हारे जगह मैं भी होता तो यही सोचता, रेनू की खुशी का कोई ठिकाना नही था, एक तरफ उसके माँ_बाप की परेशानी दूर दूसरी तरफ, उसके पति ने माफ कर दिया,
रेनू ने खुश और शरमाते हुये अपने पति से कहा,
मैं आपको गले लगा लूं, उसके पति ने हट्टहास करते हुये कहा, मुजे अपने कपड़े गंदे नही करने, दोनो हंसने लगें,
और शायद रेनू को अपने कम बोलने वालें पति का जादा प्यार समझ आ गया,,,,,,,,,,

🌷 *प्रेषक अभिजीत चौधरी🌷

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

Posted in संस्कृत साहित्य

अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे होता है…? 👏🏻

बहुत सुन्दर प्रश्न है ,यदि हमसे अनजाने में कोई पाप हो जाए तो क्या उस पाप से मुक्ती का कोई उपाय है।

श्रीमद्भागवत जी के षष्ठम स्कन्ध में , महाराज राजा परीक्षित जी ने ,श्री शुकदेव जी से ऐसा प्रश्न कर लिए ।

बोले भगवन – आपने पञ्चम स्कन्ध में जो नरको का वर्णन किया ,उसको सुनकर तो गुरुवर रोंगटे खड़े जाते
हैं।
प्रभूवर मैं आपसे ये पूछ रहा हूँ की यदि कुछ पाप हमसे अनजाने में हो जाते हैं ,जैसे चींटी मर गयी,हम लोग स्वास लेते हैं तो कितने जीव श्वासों के माध्यम से मर जाते हैं। भोजन बनाते समय लकड़ी जलाते हैं ,उस लकड़ी में भी कितने जीव मर जाते हैं । और ऐसे कई पाप हैं जो अनजाने हो जाते हैं तो उस पाप से मुक्ती का क्या उपाय है भगवन ।

आचार्य शुकदेव जी ने कहा -राजन ऐसे पाप से मुक्ती के लिए रोज प्रतिदिन पाँच प्रकार के यज्ञ करने
चाहिए ।

महाराज परीक्षित जी ने कहा, भगवन एक यज्ञ यदि कभी करना पड़ता है तो सोंचना पड़ता है ।आप
पाँच यज्ञ रोज कह रहे हैं ।

यहां पर आचार्य शुकदेव जी हम सभी मानव के कल्याणार्थ कितनी सुन्दर बात बता रहे हैं ।

बोले राजन पहली यज्ञ है -जब घर में रोटी बने तो पहली रोटी गऊ ग्रास के लिए निकाल देना चाहिए।

दूसरी यज्ञ है राजन -चींटी को दस पाँच ग्राम आटा रोज वृक्षों की जड़ो के पास डालना चाहिए।

तीसरी यज्ञ है राजन्-पक्षियों को अन्न रोज डालना चाहिए ।

चौथी यज्ञ है राजन् -आँटे की गोली बनाकर रोज जलाशय में मछलियो को डालना चाहिए ।

पांचवीं यज्ञ है राजन्- भोजन बनाकर अग्नि भोजन, रोटी बनाकर उसके टुकड़े करके उसमे घी चीनी
मिलाकर अग्नि को भोग लगाओ।

राजन् अतिथि सत्कार खूब करें, कोई भिखारी आवे तो उसे जूठा अन्न कभी भी भिक्षा में न दे ।

राजन् ऐसा करने से अनजाने में किये हुए पाप से मुक्ती मिल जाती है। हमे उसका दोष नहीं लगता ।उन पापो का फल हमे नहीं भोगना पड़ता।

राजा ने पुनः पूछ लिया ,भगवन यदि
गृहस्त में रहकर ऐसी यज्ञ न हो पावे तो और कोई उपाय हो सकता है क्या।
तब यहां पर श्री शुकदेव जी कहते हैं
राजन्

कर्मणा कर्मनिर्हांरो न ह्यत्यन्तिक इष्यते।
अविद्वदधिकारित्वात् प्रायश्चितं विमर्शनम् ।।

नरक से मुक्ती पाने के लिए हम प्रायश्चित करें। कोई व्यक्ति तपस्या के द्वारा प्रायश्चित करता है। कोई ब्रह्मचर्य पालन करके प्रायश्चित करता है।कोई व्यक्ति यम, नियम, आसन के द्वारा प्रायश्चित करता है।लेकिन मैं तो ऐसा मानता हूँ राजन्!

केचित् केवलया भक्त्या वासुदेव
परायणः ।

राजन् केवल हरी नाम संकीर्तन से ही जाने और अनजाने में किये हुए को नष्ट करने की सामर्थ्य है ।

इस लिए हे राजन् !—– सुनिए

स्वास स्वास पर कृष्ण भजि बृथा स्वास जनि खोय।
न जाने या स्वास की आवन होय न होय। ।

राजन् किसी को पता नही की जो स्वास अंदर जा रही है वो लौट कर वापस आएगी की नही ।
इस लिए सदैव हरी का जपते रहो ।

मैं तो जी माहराज आप सबसे यह निवेदन करना चाहूंगी कि भगवान राम और कृष्ण के नाम को जपने
के लिए कोई भी नियम की जरूरत नही होती है कहीं भी कभी भी किसी भी समय सोते जागते, उठते बैठते गोविन्द का नाम रटते रहो।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

🌹🌿🌹 श्री राधे कृष्ण 🌹🌿🌹
जय श्री सीता राम