Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

शिक्षाऔर समय

   वो अंकल और आंटी बस अड्डे पर बैठे खामोश लोगो को देखे जा रहे थे ।

मैने कहा अंकल टैक्सी चाहिये ? कहाँ जाना है ?
कम पैसों में मै छोड दूँगा
वे बोले बेटा कोई ऐसी जगह ले चल जहाँ मेरे अपने हो जहाँ अमीर गरीब का नही रिस्तो का सम्मान हो जहाँ पैसे नहीं प्रेम और अपना पन हो |
मै खामोश था क्योकि मेरे पास कोई जवाब नहीं था फिर मैंने कहा आप यहाँ किसका इतंजार कर रहे हैं ?
अंकल और आंटी रो पड़े और थरथराते होठों से सिसकियों के साथ एक ही शब्द निकला अपने भविष्य का इन्तजार ।
अब मेरे से रहा नहीं गया मै पूछ बैठा कि आखिर बात क्या है आप मुझे भी अपना बेटा समझें मुझे बतायें कोई मदद यदि मेरे द्वारा हो सके
अंकल ने कहा बेटा कहाँ रहते हो कितने पढे हो और परिवार में कितने लोग है कितना कमाते हो ? एक साथ कई सवाल ‘
मैने कहा मै गरीब माँबाप के साथ रहता हूँ एक छोटे से घर में अपनी पत्नी व एक बेटी के साथ रोज के 400 500 रु कमा लेता हूं फिर घर चले जाता हूं ।
आंटी और अंकल रोते हुए बोले बेटा हम दोनों स्कूल में शिक्षक थे नजाने कितने बच्चे क्या क्या बन गये होंगे जिन्हे हम ने पढाया मगर क्या वे सभी तुम्हारी तरह होंगे या हमारी औलाद की तरह ?
वे बोले बेटा हमारे दो लड़के व एक लड़की है । या योंकहो की थे ?
मैने कहा ऐसा क्यों अंकल ? आप थे कह रहे हैं कोई अनहोनी हुई है क्या ?अब कहां है ?
अंकल बोले होँ वेटा अनहोनी तो हुई है हमारे सपनो के साथ । जहाँ इन बच्चों के परवरिश में हमने अपने सपने अपनी खुशी अपनी जवानी अपना समय अपना धन अपना मान सम्मान सब कुछ दांव पर लगा दिया उन्हे इतना अधिक पढा दिया कि अबवे माँबाप में भी नफा नुक्सान देखने लगे है ।
और ये आज के समाज की सच्चाई है बेटा अधिक शिक्षित परिवार कभी एक छतके नीचे कभी रह नही सकता । वे हर बार हमसे एक ही जवाब दिया करते हैंकि अब जमाना बदल गया आप अपनी सोच अपने पास रखों और आप ही तो पढ़ाते थे स्कूल में कि खूब पढ़ो आगे बढो तरक्की करो ।
आज मैं और मेरे जैसे शिक्षक यही सोचते हैं। हमने ये तो नही पढाया कि माँबाप को छोड दो
रिस्तों को तोड़ दो अपने घर के दरवाजे अपनो के लिये बंद कर दो हर चीज को पैसे और अपने नफे नुकसान से तोलो किसी का अपमान करो ।
मैने कहा ! अंकल आप कहाँ शिक्षक थे और आपके बच्चे कहाँ पढ़ते थे ?
वे बोले मै सरकारी स्कूल में था और बच्चे अंग्रेजी मीडियम के प्राइवेट स्कूल में पढा करते थे ‘ मैंने कहा बस यहीं गलती हुई है अंकल सरकारी स्कूलों में वही बच्चे पढ़ते है जिन्हे वक्त पर एक पेंसिल तक नसीब नहीं होती और वो पढ लिख कर कुछ अधिक नही कर पाते क्योंकि स्कूल छोडने के बाद बहुत कम होते है जो आगे कुछ कोर्स करें सभी लगभग रोजी रोटी कमाने में जुड जाते है।
और प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढाया तो जाता है मगर एक विजनेस कीतरह उनके पास संस्कार सभ्यता के लिए वक्त नहीं होता वहाँ सब का ध्यान 99% अंक प्राप्त करने पर होता है ।
वहाँ सुविधायें अधिक मिलती है चाहे माँ बाप फीस भरते भरते कंगाल हो जायें । और वहाँ पढें बच्चे लगभग ऊँची सोच का मतलब सिर्फ अपनी तरक्की को समझते हैं ।
शिक्षा वही है अंकल बस उसे देने वाले और लेने वाले लोग बदलें है । ये उसी का परिणाम है । आप किसी वस्तु को किसी व्यक्ति को किसी काम को जिस नजर से देखतें है उसमे वही छवि उभर कर सामने आती है । जैसे मै टेक्सी वाला लोग इज्जत के बजाय ओये फलां जगह चलेगा ? इस तरह कहते है और ये वो लोग होते हैं जो बड़े शहरो में आलीशान बंगले में रहने वाले पढ़े लिखे लोग गिने जाते हैं । क्योकि उन्होने स्कूल से लेकर अब तक सिर्फ किताबे देखी है समाज और ये छोटे लोग उनका रहन सहन कभी देखा ही नहीं और ये उनकी भी गलती नहीं क्योकि प्राइवेट स्कूल और माता पिता ने उन्हे पढ़ाई के अलावा कभी इतना खाली वक्त दिया ही नही कि वे अपनी मर्जी से दुनिया देखें ।
उन्होने गलियाँ नही देखीया गली में खेला ही नहीं उन्होंने देखे तो म्यूजियम स्मारक किले
वे बारिस में नही भीगे कहीं जुखाम न हो वे धूप में नही घूमे कहीं तबीयत बिगड़ी तो कल टेस्ट छूट जायेगा ।
अंकल जब से शिक्षा को व्यापार बनाया है हमने संस्कार सभ्यता रहन सहन अपना पराया सब कुछ खो दिया यहाँ तक की आजादी भी ।
माँबाप कही नही गये कि बच्चों के पेपर है टेस्ट है उसकी तैयारी में इसलिए वे कैद हुये और बच्चा इसलिए कि माँबाप रोज कहते है कि तेरी पढ़ाई में इतना खर्चा हुआ तू पढ बेटा ।
आज वो आपके उन्ही पैसों की उसूली कर रहा है अंकल अपने को बेच कर सिर्फ पैसा कमा रहा है | और ये कहानी हर घर में है ।
संदीप गढ़वाली CR
गाँव बडखोलू पौडी गढवाल
उतराखण्ड15821

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