Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

देनहार कोई और है
भेजत जो दिन रैन।

राजा भोज बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए✊ हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी 😞नज़रें नीचे झुका लेते थे।

ये बात सभी को अजीब लगती थी कि ये राजा कैसे दानवीर हैं। ये दान भी देते हैं और इन्हें शर्म भी आती है।

ये बात जब तुलसीदासजी तक पहुँची तो उन्होंने राजा को चार पंक्तियाँ लिख भेजीं जिसमें लिखा था –

ऐसी देनी देन जु
कित सीखे हो सेन।
ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ
त्यों त्यों नीचे नैन।।

इसका मतलब था कि राजा तुम ऐसा दान देना कहाँ से सीखे हो? जैसे जैसे तुम्हारे हाथ ऊपर उठते हैं वैसे वैसे तुम्हारी नज़रें तुम्हारे नैन नीचे क्यूँ झुक जाते हैं?

राजा ने इसके बदले में जो जवाब दिया वो जवाब इतना गजब का था कि जिसने भी सुना वो राजा का कायल हो गया।
इतना प्यारा जवाब आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया।

राजा ने जवाब में लिखा –

देनहार कोई और है
भेजत जो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करैं
तासौं नीचे नैन।।

मतलब, देने वाला तो कोई और है वो ईश्वर है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है। परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ राजा दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती हैं।
वो ही करता और वो ही करवाता है, क्यों बंदे तू इतराता है,

एक साँस भी नही है तेरे बस की, वो ही सुलाता और वो ही जगाता है

Posted in आरक्षण

एक प्रश्न ….सोच समझ कर उत्तर दीजियेगा… ..

अच्छा बताइए ब्राह्मणों के अत्याचार काल में शूद्र कहाँ से पानी पीते थे ???

और अगर उनके कुएं थे तो उन्हें ब्राह्मणो के कुएं से पानी क्यों पीना था ???

यदि कुएं नहीं थे तो उन्होंने खोदे क्यों नही ???

और ब्राह्मणों के कुएं किसने खोदे ???

यदि ब्राह्मणों ने खोदे तो ये झूठ फैलाया गया है कि सिर्फ दलितों से मेहनत कराई जाती थी…..!

और यदि दलितों ने खोदे तो भला दलितों ने अपने कुएं क्यों नहीं खोद लिए ???

यदि इतना ही छुआछूत का प्रभाव था तो दलितों द्वारा खोदे कुओं से ब्राह्मण कैसे पानी पी लेते थे ???

उधेड़बुन में न फंसिए इस वामपंथी इतिहास में ……अपनी अक्ल लगाइए !

अंग्रेंजो की नीति थी ‘फूट डालो शासन करो’
और देश का दुर्भाग्य है भाषा से लेकर शिक्षा तक उन्ही की दी जा रही है ….!

किसी दूसरे के बरगलाने में मत आईये … भटकिये मत हम हमेशा से एक दूसरे के पूरक रहे हैं…..जब से ये विदेशी आए हैं तभी से यह भेदभाव साजिशन बढ़ाया गया है ‘फूट डालो राज करो’ की नीति के तहत …!
हम सब हिन्दू एक है….. सभी एकजुट होकर देश व अपने बच्चों का भविष्य बचाने के लिए कार्य करें …..और उस प्राचीन गरिमामयी “भारत देश ” को पुनः जीवंत करें …..!! 👍👍💕💕

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एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था।
अचानक से उसे लगा की,उसकी बहन पीछे रह गयी है।
वह रुका, पीछे मुडकर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।
लडका पीछे आता है और बहन से पुछता है, “कुछ चाहिये तुम्हे ?” लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है।
बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी है।
दुकानदार यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ ….
अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पुछा, “सर, कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?”
दुकानदार एक शांत व्यक्ती है, उसने जीवन के कई उतार चढाव देखे होते है। उन्होने बडे प्यार और अपनत्व से बच्चे से पुछा, “बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो?”
बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोडी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर लायी थी।
दुकानदार वो सब लेकर युं गिनता है जैसे पैसे गिन रहा हो।
सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,”सर कुछ कम है क्या?”
दुकानदार :-” नही नही, ये तो इस गुड़िया की कीमत से ज्यादा है, ज्यादा मै वापिस देता हूं” यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी।
बच्चा बडी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।
यह सब उस दुकान का नौकर देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पुछा, ” मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सिपों के बदले मे दे दी ?”
दुकानदार हंसते हुये बोला,
“हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है। और अब इस उम्र मे वो नही जानता की पैसे क्या होते है ?
पर जब वह बडा होगा ना…
और जब उसे याद आयेगा कि उसने सिपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी, तब ऊसे मेरी याद जरुर आयेगी, वह सोचेगा कि,,,,,,
“यह विश्व कुछ अच्छे मनुष्यों की वजह से बचा हुआ है।”
यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टीकोण बढाने मे मदद करेगी और वो भी अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा।।

आशा गुप्ता

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नशा करता है:

एक शर्माजी हैं, बोलते हैं तो लगता है जैसे शहद टपकता हो. और एक उनका भतीजा है, पता नहीं किस मिट्टी का बना है. माँ-बाप तो बेचारे दिन भर कंपनी में लगे रहते है, दोनों बाईस साल से एक ही जगह अटके हुए हैं. ना ही परमानेन्ट हो पाए और ना ही कुछ ख़ास तरक़्क़ी हुई, तनख़्वाह तो पुछो ही मत, इतनी महंगाई में अपने बच्चों को बड़े स्कूल से पढ़ा पाए वही बहुत है.

लेकिन इतने महँगे स्कूल से पढ़ाने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ, उल्टा नुक़सान ही हुआ. आवारा दोस्तों के साथ गुटका खाते-खाते पता नहीं कब से शराब पीना शुरू कर दिया. अब तो बहाना ढुँढते फिरता है, आज दोस्त का जन्मदिन था, आज पास होने की ख़ुशी में दोस्तों ने पिला दी, आज मैच जीतने की पार्टी थी. माँ के ग़ुस्सा होने से हर बार क़सम खाता की आगे से नशा नहीं करुँगा और हर बार क़सम तोड़ देता.
मोहल्ले में लड़ना गाली-गलौज करना ए सब आम हो गया था, शर्माजी बेचारे सब से माफ़ी माँगते, उनका सीधा-सादा व्यवहार ही था की कोई कुछ नहीं करता.

मोहल्ले में जब से नया घर बना और उसमें रहने लोग आए हैं तब से डब्बु का ताँक-झाँक बढ़ गया है. आए दिन रंजना को देख कर मुस्कुराता रहता, वो बाज़ार जाती तो उसके पिछे-पिछे जाता और वापस आते समय भी पिछे चलते आता.
रंजना को चलते हुए पिछे से कोई कॉमेंट पास कर देता या फिर कोई भद्दा गाना गाने लगता. कई बार मोहल्ले की औरतों ने कहा था “इस से कोई मतलब ना रखना” “ना ही मुस्कुरा कर बात करना और ना ही मूड कर जवाब देना” नशाखोर है वो, “नशा करता है”.

दिन प्रतिदिन डब्बु की बदतमीज़ी बढ़ने लगी थी, रंजना की बेटी ने कहा भी था “माँ, अगर पापा अभी हमारे साथ रहते ना, तो उस पियक्कड़ को धो कर रख देते”. उसकी बेटी मात्र नौ साल की है लेकिन बिल्कुल अपने पापा पर गई है, एकदम निडर और बहादुर.
रंजना उससे कहती “नहीं बेटा, पापा इन लुच्चों के लिए नहीं बने हैं”, “पापा का अपमान होगा अगर वो इनसे भिड़ेंगे तो”.
तुम बोलो माँ, मैं ही किसी दिन डंडे मार कर उसका सर फोड़ दूँ… चल पगली कहिं की, जब जरुरत होगी तो मैं ही सबक़ सिखा दूँगी, तू पढ़ाई पर ध्यान दें और दादा-दादी के साथ खेल.

14 अगस्त की रात से ही मोहल्ले के लड़के तैयारी करने लगे, लोग हर जगह काग़ज़ की झंडी लगा रहे थे, कोई झंडा फहराने की जगह को साफ़ कर रहा था तो कोई सजाने में लगा था.
अचानक से डब्बु की आवाज़ आने लगी, शुरुआत अंग्रेजों को गाली देने से किया, जी भर कर अंग्रेजों से लोहा लेने के बाद, आपस में ही गाली-गलौज करना शुरु कर दिया, डब्बु हट्टा-कट्ठा होने का पुरा फ़ायदा उठाता था, बाक़ी लडके भी उस से उलझना नहीं चाहते.

उन सब से हो जाने के बाद रंजना के घर के पास आ कर द्विअर्थिए फ़िल्मी गानें गाने लगा, रंजना के बूढे ससुरजी निकल कर समझानें लगे, इतनी रात को परेशान ना करने की गुज़ारिश करने लगे… डब्बु मानने के बजाय कटाक्ष कर हँसने लगे:
“अरे बुड्ढे, कोई जवान नहीं है क्या?”
“उसको भेज बात करने, तू क्या कर पाएगा मेरा?”

डब्बु की बात भी पुरी नहीं हो पाई थी तब तक वो नाली में गीरा पड़ा था, रंजना ने जो राऊँड किक्क मारा था उसके बाद उसका उठना भी मुश्किल हो रहा था. रंजना अपने कंधे ले कर कमर तक अपना दुपट्टा कस कर खड़ी थी:
मंदबुद्धि, तू जवान की बात कर रहा था ना ले मैं आ गई, दिखा अब अपनी गर्मी और नशा.
तू जवान की बात कर रहा है, तुझे पता भी है इस घर का जवान क्या करता है? तुझे नशे की आदत है ना? तू जानता है, इस घर का जवान कौन सा नशा करता है? तू कर पाएगा वैसा नशा?
पड़ोस के बहुत लोग जमा हो कर देख रहे थे… अंजना ग़ुस्से में बोले जा रही थी.

इस घर का जवान अपनी जवानी दिखा रहा है देश की सीमा पर, उसके उपर देशभक्ति का नशा है, वो अपने नशे में इतना चूर है की सियाचिन के माइनस 50 डिग्री में देश की रखवाली करता है, घुटने तक बर्फ रहती है फिर भी शरीर पर तीस किलो का हथियार ले कर चहलक़दमी करता है…
आज तू 15 अगस्त की खुशी में नशा कर के आया है ना? इस घर का जवान भी आज नशे में होगा, जमा देने वाले बर्फ़ में बंदुक की नली उठा कर देख रहा होगा की कोई घुसपैठिया तो नहीं आ रहा?

जवान की बात कर रहा था, बस इतनी ही जवानी है तेरी? रोज़ शराब के नशे में गाली-गलौज करे? अकेली औरत समझ कर छेड़े?
तुझे पता नहीं, जिस घर के जवान को देशभक्ति का नशा चढ़ जाए ना… उसके घरवाले भी हमेशा वही नशे में रहते हैं… तू नशा देखना चाहत है? अगर मैंने अपनी बेटी को आवाज़ दे दी तो वो बच्ची का नशा भी तुझसे ज़्यादा निकलेगा…

आज के बाद अगर तूने इस मोहल्ले में किसी को अपना नशा दिखाया ना तो तैयार रहना हमारा नशा देखने के लिए…
भीड़ को देख कर रंजना ने कहा:
इस धूर्त को सही से खड़ा होने की ताक़त नहीं है और आपलोग कहते हैं ए “नशा करता है”.

  • अनजान लेखक (मुकेश कुमार)
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साहसी कदम

आज अवनी आई बहुत खुश लग रही थी । आकर मेरे से लिपट गयी । मैने कहा कैसी हो बेटा वह हंस कर बोली आपके सामने खड़ी हूँ ना । मै बीते दिनो में पहुंच गयी एक प्यारी सी मनमोहक छवि की मालकिन अवनी मेरी सबसे अधिक करीबी थी । मेरे ही पड़ोस में मि. शर्मा रहते हैं। उनकी ही तीन बेटो में सबसे छोटी अवनि थी । वह पढाई के साथ साथ कुछ अलग से भी सीखना चाहती थी । जबकि आजकल लड़कियां सिलाई ,कढ़ाई ,बुनाई आदि में कोई सीखना नहीं चाहती । मुझे इन चीजों का बहुत शौक था । मै भी कालिज से आकर फ्री रहती थी । बच्चे दोनों बाहर थे । पति अपने कामों में व्यस्त । जब भी समय मिलता अवनी मेरे पास आजाती थी । मै भी उसको कुछ ना कुछ सिखाती रहती थी ।
अवनी अब 21 साल की हो गयी थी । शर्मा जी और उनकी पत्नी दोनों को ही उसकी शादी की चिन्ता थी । लगातार प्रयास करने पर शहर में ही एक अच्छा परिवार मिल गया । अच्छा व्यापार था दीक्षित साहब का उनके तीन बेटे थे । दो बेटों की शादी हो गयी थी । तीसरे बेटे प्रतुल के लिये वह भी अच्छी लड़की चाह रहे थे । जब शर्मा जी अवनि का सम्बन्ध प्रतुल के लिये लेकर गये और बातें आगे बढी तब अवनी को देखने का प्रोग्राम बना । एक ही नजर में अवनी सबको पसंद आगयी । मै भी बहुत खुश थी पर कहीं थोड़ी उदासी भी थी कि अब उसका चहकना सुनाई नहीं देगा पर बस वह खुश रहे यही इच्छा थी और वह दिन भी आगया अवनी दुल्हन बन कर ससुराल चली गयी । जब भी वह आती मिलकर जाती बहुत खुश थी । धीरे धीरे एक साल बीत गया ।
एक दिन सुबह ही शर्मा जी के यहाँ रोने की आवाजें आने लगी ‌। मै और मेरे पतिदेव दोनों उनके यहाँ पहुँचे पता लगा प्रतुल ने रात को कोई जहरीली दवा खाकर आत्महत्या कर ली । मै तो एकदम से जड़ होगयी कि ये कैसे हुआ अवनी को कौन संभाल रहा होगा । पूरा परिवार अवनी के यहाँ चला गया । मै पूरे दिन परेशान रही । जब शर्मा परिवार लौट कर आया मैने पूछा ऐसा कैसे हुआ तब पता लगा कि प्रतुल ने किसी को 10 लाख रु . उधार दिये वह लौटा नहीं रहा था उसी बात पर भाईयों ने कुछ अधिक ही कठोर शब्द बोल दिये बस उसी तनाव में उसने अपने को खत्म ही कर लिया ।
धीरे धीरे समय बीत रहा था पहली बार प्रतुल के बिना अवनी आई । मैं उससे मिलने गयी लिपट कर बहुत रोई मै केवल उसकी पीठ सहलाती रही ‌। कुछ दिन बाद पता चला अवनी की सास ने घोषणा करदी कि शादी के बाद वह मेरी बेटी बन कर आई थी । अब मै उसकी माँ हूँ और मै उसकी शादी करूगी और उसका कन्या दान भी क्योंकि मेरे कोई बेटी नहीं है। सब परिवार वाले विरोध में थे पर वह अपनी बात पर अडिग थी । उन्होंने बोल इसकी इतनी लम्बी जिन्दगी को समाज की मान्यताओं पर बलि नहीं चढ़ाऊंगी । मुझे लकीर का फकीर नहीं बनना । मैं इस लकीर को मिटाऊंगी और उन्होंने अपने भतीजे आलोक से ही उसकी शादी करा दी क्योंकि उनके भाई का बहुत पहले देहान्त हो गया था । विधवा भाभी इस दर्द को समझती थी उन्होंने तुरन्त अपनी ननद की बात मान ली । आज दूसरी शादी के बाद अवनी पहली बार आई थी । मेरा रोम रोम उसे आशीर्वाद दे रहा था हे ईश्वर इस बच्ची की मुस्कराहट ऐसे ही खिलती रहे । दाद देनी पड़ेगी अवनी की सास को जिन्होंने समाज को साहसी कदम उठा कर आईना दिखाया ।
स्व रचित
डा. मधु आंधीवाल

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ये कथा घर मे सबको जरूर सुनाएं।🙏

कमल किशोर सोने और हीरे के जवाहरात बनाने और बेचने का काम करता था। उसकी दुकान से बने हुए गहने दूर-दूर तक मशहूर थे। लोग दूसरे शहर से भी कमल किशोर की दुकान से गहने लेने और बनवाने आते थे। चाहे हाथों के कंगन हो, चाहे गले का हार हो, चाहे कानों के कुंडल हो उसमें हीरे और सोने की बहुत सुंदर मीनाकारी होती कि सब देखने वाले देखते ही रह जाते।

इतना बड़ा कारोबार होने के बावजूद भी कमल किशोर बहुत ही शांत और सरल स्वभाव वाला व्यक्ति था। उसको इस माया का इतना रंग नहीं चढ़ा हुआ था।

एक दिन उसका कोई मित्र उसकी दुकान पर आया जो कि अपने पत्नी सहित वृंदावन धाम से होकर वापस आ रहा था तो उस मित्र ने सोचा कि चलो थोड़ा सा प्रसाद अपने मित्र कमल किशोर को भी देता चलूं।

उसकी दुकान पर जब वह पहुंचा तब कमल किशोर का एक कारीगर एक सोने और हीरे जड़ित बहुत सुंदर हार बना कर कमल किशोर को देने के लिए आया था।

कमल किशोर उस हार को देख ही रहा था कि उसका मित्र उसकी दुकान पर पहुंचा। कमल किशोर का मित्र अपने साथ वृंदावन से एक बहुत सुंदर लड्डू गोपाल जिसका सवरूप अत्यंत मनमोहक था साथ लेकर आया था।

जब उसका मित्र दुकान पर बैठा तो उसकी गोद में लड्डू गोपाल जी विराजमान थे। कमल किशोर लड्डू गोपाल जी के मनमोहक रुप सोंदर्य को देखकर अत्यंत आंनदित हुआ। उसने अपने हाथ में पकड़ा हुआ हार उस लड्डू गोपाल के गले में पहना दिया और अपने मित्र को कहने लगा कि देखो तो सही इस हार की शोभा लड्डू गोपाल के गले में पढ़ने से कितनी बढ़ गई है।

उसका मित्र और कमल किशोर आपस में बातें करने लगे बातों बातों में ही उसका मित्र लड्डू गोपाल को हार सहित लेकर चला गया। दोनों को ही पता ना चला कि हार लड्डू गोपाल के गले में ही पड़ा रह गया है।
कमल किशोर का मित्र अपनी पत्नी सहित एक टैक्सी में सवार होकर अपने घर को रवाना हो गया। जब वह टैक्सी से उतरे तो भूलवश लड्डू गोपाल जी उसी टैक्सी में रह गए।

टैक्सी वाला एक गरीब आदमी था जिसका नाम बाबू था जो कि दूसरे शहर से यहां अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए टैक्सी चलाता था और वह टैक्सी लेकर काफी आगे निकल चुका था। आज उसको अपने घर वापस जाना था जो कि दूसरे शहर में था। जब टैक्सी लेकर बाबू अपने घर पहुंचा तो उसने जब अपनी टैक्सी की पिछली सीट पर देखा तो उसका ध्यान लड्डू गोपाल जी पर पड़ा जो के बड़े शाही तरीके से पिछली सीट पर गले में हार धारण करके सुंदर सी पोशाक पहनकर हाथ में बांसुरी पकड़े हुए पसर कर बैठे हुए हैं।

बाबू यह देखकर एकदम से घबरा गया कि यह लड्डू गोपाल जी किसके हैं, लेकिन अब वह दूसरे शहर से अपने शहर जा चुका था जो कि काफी दूर था और वह सवारी का घर भी नहीं जानता था तो वह दुविधा में पड़ गया कि वह क्या करें लेकिन फिर उसने बड़ी श्रद्धा से हाथ धो कर लड्डू गोपाल जी को उठाया और अपने घर के अंदर ले गया जैसे ही उसने घर के अंदर प्रवेश किया उसकी पत्नी ने उसके हाथ में पकड़े लड्डू गोपाल जी को जब देखा को इतनी सुंदर स्वरूप वाले लड्डू गोपाल जी को देखकर उसकी पत्नी ने झट से लड्डू गोपाल जी को अपने पति के हाथों से ले लिया।

उसकी पत्नी जिसकी 8 साल शादी को हो चुके थे उसके अभी तक कोई संतान नहीं थी। लेकिन गोपाल जी को हाथ में लेते ही उसका वात्सालय भाव जाग उठा उसकी ममतामई और करुणामई आंखें झर झर बहने लगी। ममता वश और वात्सल्य भाव के कारण ठाकुर जी को गोद में उठाते ही उसको ऐसे लगा उसने किसी अपने ही बच्चे को गोद में उठाया है उसके स्तनों से अपने आप दूध निकलने लगा।

अपनी ऐसी दशा देखकर बाबू की पत्नी मालती बहुत हैरान हुए उसने कसकर गोपाल जी को अपने सीने से लगा लिया और आंखों में आंसू बहाती बोलने लगी अरे बाबू तुम नहीं जानते कि आज तुम मेरे लिए कितना अमूल्य रत्न लेकर आए हो।

बाबू कुछ समझ नहीं पा रहा था कि मेरी पत्नी को अचानक से क्या हो गया है लेकिन उसकी पत्नी तो जैसे बांवरी सी हो गई थी वह गोपाल जी को जल्दी-जल्दी अंदर ले गई और उससे बातें करने लगी।

अरे लाला…. इतनी दूर से आए हो तुम्हें भूख लगी होगी और उसने जल्दी जल्दी मधु और घी से बनी चूरी बनाकर और दूध गर्म करके ठाकुर जी को भोग लगाया।

उधर कमल किशोर ने जब अपनी दुकान पर हार को ना देखा तो उसको याद आया कि हार तो ठाकुर जी के गले में ही रह गया है तो उसने अपने मित्र को संदेशा भेजा तो मित्र ने आगे से जवाब दिया। अरे मित्र! वह माखन चोर और चित् चोर; हार सहित खुद ही चोरी हो गया है। मैं तो खुद इतना परेशान हूं।

कमल किशोर अब थोड़ा सा परेशान हो गया कि ईतना कीमती हार ना जाने कहां चला गया। मुझे तो लाखों का नुकसान हो गया लेकिन फिर भी अपने सरल स्वभाव के कारण उसने अपने मित्र को कुछ नहीं कहा और उसने अपने मन में सोचा कि कोई बात नहीं मेरा हार तो ठाकुर जी के ही अंग लगा है अगर मेरी भावना सच्ची है तो ठाकुर जी उसको पहने रखें।

उधर बाबू और उसकी पत्नी मालती दिन-रात ठाकुर जी की सेवा करते अब तो मालती और बाबू को लड्डू गोपाल जी अपने बेटे जैसे ही लगने लगे।

लड्डू गोपाल जी की कृपा से अब मालती के घर एक बहुत ही सुंदर बेटी ने जन्म लिया। इन सब बातों का श्रेय वह लड्डू गोपाल जी को देते कि यह हमारा बेटा है और अब हमारी बेटी हुई है अब हमारा परिवार पूरा हो गया।

मालती लड्डू गोपाल जी को इतना स्नेह करती थी कि रात को उठ उठ कर देखने जाती थी कि लड्डू गोपाल जी को कोई कष्ट तो नहीं है।

ऐसे ही एक दिन कमल किशोर व्यापार के सिलसिले में दूसरे शहर आना पड़ा, जहां पर बाबू रहता था।

लेकिन दुर्भाग्यवश जब वो उस शहर में पहुंचा तो अचानक से इतनी बारिश शुरू हो गई कि कमल किशोर को जहां पहुंचना था वहां पहुंच ना सका।

और तब वहां बाबू अपनी टैक्सी लेकर आ गया और उसने परेशान कमल किशोर को पूछा बाबूजी आप यहां क्यों खड़े हो बारिश तो रुकने वाली नहीं और सारे शहर में पानी भरा हुआ है। आप अपनी मंजिल तक ना पहुंच पाओगे और ना ही कहीं और रुक पाओगे मेरा घर पास ही है अगर आप चाहो तो मेरे घर आ सकते हो।

कमल किशोर जिसके पास सोने और हीरे के काफी गहने थे वह अनजान टैक्सी वाले के साथ जाने के लिए थोड़ा सा घबरा रहा था। लेकिन उसके पास और कोई चारा भी नहीं था और वह बाबू के घर उसके साथ टैक्सी में बैठ कर चला गया।

घर पहुंचते ही बाबू ने मालती को आवाज दी कि आज हमारे घर मेहमान आए हैं उनके लिए खाना बनाओ।

कमल किशोर ने देखा कि बाबू का घर एक बहुत छोटा सा लेकिन व्यवस्थित ढंग से सजा हुआ है। घर में अजीब तरह के इत्र की खुशबू आ रही है जो कि उसके हृदय को आनंदित कर रही थी।

जब मालती ने उनको भोजन परोसा तो कमल किशोर को उसमें अमृत जैसा स्वाद आया।

उसका ध्यान बार-बार उस दिशा की तरफ जा रहा था,जहां पर ठाकुर जी विराजमान थे वहां से उसको एक अजीब तरह का प्रकाश नजर आ रहा था तो हार कर कमल किशोर ने बाबू को पूछा कि अगर आपको कोई एतराज ना हो तो क्या आप बता सकते हो कि उस दिशा में क्या रखा है? मेरा ध्यान उसकी तरफ आकर्षित हो रहा है।

तो बाबू और मालती ने एक दूसरे की तरफ मुस्कुराते हुए कहा कि वहां पर तो हमारे घर के सबसे अहम सदस्य लड्डू गोपाल जी विराजमान है। तो कमल किशोर ने कहा क्या मैं उनके दर्शन कर सकता हूं। तो मालती उनको उस कोने में ले गई जहां पर लड्डू गोपाल जी विराजमान थे।

कमल किशोर लड्डू गोपाल जी को और उनके गले में पड़े हार को देखकर एकदम से हैरान हो गया यह तो वही लड्डू गोपाल है और यह वही हार है,जो मैंने अपने मित्र के लड्डू गोपाल जी को डाला था।

कमल किशोर ने बड़ी विनम्रता से पूछा कि यह गोपाल जी तुम कहां से लाए? बाबू जिसके मन में कोई छल कपट नहीं था उसने कमल किशोर को सारी बात बता दी कि कैसे उसको सोभाग्य से गोपाल जी मिले और उनके हमारे घर आने से हमारा दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल गया।

तो कमल किशोर ने कहा क्या तुम जानते हो कि जो हार ठाकुर जी के गले में पड़ा है उसकी कीमत क्या है? तो बाबू और मालती ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा कि जो चीज हमारे लड्डू गोपाल जी के अंग लग गई हम उसका मूल्य नहीं जानना चाहते और हमारे लाला के सामने किसी चीज किसी हार का कोई मोल नहीं है तो कमल किशोर एकदम से चुप हो गया और उसने मन में सोचा कि चलो अच्छा है मेरा हार ठाकुर जी ने अपने अंग लगाया हुआ है।

अगले दिन जब वह चलने को तैयार हुआ और बाबू उनको टैक्सी में लेकर उनके मंजिल तक पहुंचाने गया।

जब कमल किशोर टैक्सी से उतरा और जाने लगा तभी बाबू ने उनको आवाज लगाई कि ज़रा रुको यह आपका कोई सामान हमारी टैक्सी में रह गया है। लेकिन कमल किशोर ने कहा मैंने तो वहां कुछ नहीं रखा, लेकिन बाबू ने कहा कि यह बैग तो आपका ही है जब कमल किशोर ने उसको खोलकर देखा तो उसमें बहुत सारे पैसे थे।

कमल किशोर एकदम से हक्का-बक्का रह गया कि यह तो इतने पैसे हैं जितनी कि उस हार की कीमत है। उसकी आंखों में आंसू आ गए कि जब तक मैंने निश्छल भाव से ठाकुर जी को वह हार धारण करवाया हुआ था तब तक उन्होंने पहने रखा। मैंने उनको पैसों का सुनाया तो उन्होंने मेरा अभिमान तोड़ने के लिए पैसे मुझे दे दिए हैं।

वह ठाकुर जी से क्षमा मांगने लगा लेकिन अब हो भी क्या सकता था?🙏🙏

राधे राधे❤️🙏

साक्षी भल्ला

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✍️✍️✍️✍️✍️ – इंतकाम –✍️✍️✍️✍️✍️

कॉलेज के कम्पाउंड में कभी मैंने भी किसी को गुलाब देने की गुस्ताखी की थी।

एक घुटना ज़मीन पर टिका कर,दूसरा उसके घुटने से मिला कर,बायाँ हाथ अपने सीने से लगा कर,पलके झुकाकर, दाहिने हाथ से सुर्ख गुलाब उसे पेश किया था।
उसने झपट कर गुलाब मेरे हाथों से छीन लिया था।

तड़ाक।
एक जोरदार तमाचा मेरे गाल से टकराया था फिर मेरे सामने ही गुलाब फेक कर वह एडिया ठक-ठकाती हुई गुस्से से चली गयी थी।
क्या कहूँ।
14 फरवरी का दिन था।आशिकों के लिये बड़ा मुक़द्दश दिन।
बहुत सोच समझ कर मैंने प्रपोज करने के लिये ये दिन तय किया था।
कमबख्त भले ही इंकार कर देती। यूँ बेइज़्ज़त तो न करती।
अपमान से मेरा तन-बदन सुलग उठा था।
आँख और गाल लाल हो चुके थे।
लोगों के लिये मैं तमाशा बन चुका था।
लोग मुँह छुपा कर हँस रहे थे।

मैंने खामोशी से गुलाब का फूल उठाया। उसे कचरा पेटी में डालने ही वाला था कि मुझें तमाचा मारने वाली की बॉस गिरिजा दिखी।
गिरिजा इस जैसी कई लड़कियों की ग्रुप लीडर थी।
मेरे अंतर्मन से आवाज़ उठी।कोशिश करने वालो की हार नहीं होती।
बेइज़्ज़ती तो हो ही चुकी थी।
एक गाल लाल भी हो चूका था।
या तो दूसरा गाल भी लाल होता या तमाचे वाली से मेरा इंतकाम पूरा हो जाता।
शाहरुख खान की तरह सारी ड्रील दुहरायी।
हसीना ने उठाकर गले से तो न लगाया पर ठोकर भी न मारी।
गुलाब के बदले में मुझें कैडबरी का खूब बड़ा चॉक्लेट अपने बैग में से निकाल कर दी।

ज़रूर किसी पट्ठे ने मोहतरमा को गुलाब के साथ ये चॉकलेट भी दी होगी।

मैं असमंजस्य भाव से उसकी तरफ देखा।
हकलाते हुवे बोला–“म – म – मैं ई-इसका क्या करूँ।”

“लोग हमारी तरफ देख रहे है। शाम को फला मॉल में इतने बजे मिलना। इस चॉकलेट को दोनो मिल कर खायेंगे।” –वह दांत भींच कर बोली थी।

मैं सकते की हालत में वहीं खड़ा रह गया और वह दुपट्टा संभालती हुई वहाँ से चली गयी।

ह्रदय की धड़कन बढ़ा कर – अनजान सा कोई खुशबू मेरे नथुनों में बसा कर – वह मुझसे दूर होती गयी फिर आँखों से ओझल भी हो गयी।
मेरे ज़ेहन में कई सवाल भी थे।
शाम को वहाँ जाऊ या नहीं?
वहाँ कोई जाल तो नहीं फैलाया हुआ होगा?
अगर पड़ी तो ! कितना पड़ेगी?
अगर पटी तो!!!
खतरा था मगर लालच भी।
मैं निर्धारित समय-स्थान पर चॉकलेट लेकर मॉल के पास पहुँच गया।

कॉलेज कम्पाउंड से बाहर।
कॉलेज की यूनिफार्म के बिना।
सामान्य से लिबास में भी परी लग रही थी वह।
मैंने चॉकलेट पेश किया।
वह मुस्करायी– रैपर फाड़ी और चॉकलेट को दो बराबर हिस्से में तक़सीम कर – एक हिस्सा मुझें लौटा दी।
“थैंक्यू।”मैं अभिभूत होता हुआ बोला।
“थैंक्यू बट वाई ?”
“आ –आप — यहाँ आयीं।”
“फिर तो थैंक्यू मुझें कहना चाहियें क्योंकि, यहाँ आने का प्रपोजल तुम्हारा नहीं मेरा था।”
मैं खामोश रह गया।
चॉकलेट खत्म करने के बाद वह कुछ चीज़ें खरीदी।आखिर इसी खरीददारी के लिये तो वह घर से बाहर निकली थी।
मॉल से बाहर निकल कर वह दो आइसक्रीम कोन ली फिर एक बेंच पर मेरे साथ बैठ गयी।
“ऐसा क्यों किया तुमनें?” – एकाएक वह बोली।
मैं जो सातवें आसमान पर उड़ रहा था। झटके में भू-तल पर गिरा।
” तुम बहुत खूबसूरत हो। “
” वो तो मैं हूँ – पर तुममें ऐसी क्या खूबी है कि तुम भी मुझें स्मार्ट लगो। मैं तुम्हें सबसे अलग समझूँ। मेरे लिये तुम खास हो जाओं।”
“मैं समझा नहीं!”
“मैं तुम्हें इसलिये पसन्द हूँ क्योंकि मैं खूबसूरत हूँ पर तुम कब इतने काबिल बनोगे कि मैं भी तुम पर – यानी मेरी पसंद पर नाज़ कर सकूं। गणेश अगले साल हम दोनों का ग्रेजुएशन पूरा हो जाएगा – फिर मेरे घर वाले मेरी शादी करवा देंगे।मैं भले ही तुमसे कितना भी प्यार क्यों न करुँ। शादी तो तभी होगी जब तुम शादी की ज़िम्मेदारी संभालने के लिये तैयार होंगे।”

अभी इश्क हुआ भी नहीं था कि शहजादी शादी का ख्वाब देखने लगी थी पर चूंकि उसकी बात सही थी। बिना उद्देश्य के कोई एक कदम नहीं बढ़ाता वह इश्क की पींगे कैसे बढ़ाती ?

उस रोज के बाद हम उस तरह कभी नहीं मिले। मुलाकात लगभग रोज़ होती थी। पर कोई खतोकिताबत नहीं। कोई फोन नहीं। एकांत में न मेल-मुलाकात न कोई बातचीत।उसकी चमची ने थप्पड़ वाला किस्सा उसे बता दिया था।मुझसे सवाल हुआ तो मैं मुकरा भी नहीं बल्कि दोष उस चमची पर ही मढ़ दिया कि उसके उतावलेपन के कारण कन्फ्यूजन पैदा हुआ। मैं उससे रिकवेस्ट कर रहा था कि गुलाब मेरी ओर से तुम्हें दे दे–पर उसने अपनी शक्ल नहीं देखी ! सदाचारी बनने के चक्कर मे मुझें थप्पड़ मार दी।
गिरिजा ने भी न जिरह की न ज़्यादा हुज़्ज़त की।

कॉलेज के दिन बितने लगे थे।
गिरिजा की आँखों में मेरे लिये चेलेंज था।
वह मेरी थी पर उसे पाने के लिये मुझें बहुत संघर्ष करना था। दिनों-दिन जैसे मेरी विनिंग ट्राफी और खूबसूरत होती जा रही थी। मेरा चेलेंज मुझें और ललकार रहा था।
उसे पाने की ज़िद थी या मेरा सौभाग्य या चमची के थप्पड़ का कमाल। मैं वह लकीर पार कर गया जिसे विनिंग लाइन कहते है।
ग्रेजुएशन की डिग्री के साथ-साथ मेरे पास कन्फर्म परमानेंट जॉब था।
मैं एक सलेक्शन पास कर चुका था। मुझे बैंक में कैशियर कम क्लर्क की नोकरी मिल गयी थी।
मेरे सभी दोस्तों ने मुझसे पार्टी माँगी। यहाँ तक कि चमची ने भी।
मैं कॉलेज की कैंटीन में पार्टी देने के लिये तैयार भी हो गया।पर गिरिजा बोली-“चाय समोसे की पार्टी से काम नहीं चलेगा।शहर के सबसे शानदार रेस्टोरेंट में ग्रेंड पार्टी होगी जिसका पेमेन्ट मैं करूंगी।”
कोई हैरान न हुआ चमची भी नहीं।बीते दिनों में सबको हमारे प्रेम और अनुशासन के विषय में भान हो चुका था।
शाम को वायदे के मुताबिक पार्टी हुयी। मैं पेमेंट करना चाहता था पर गिरिजा ने साफ मना कर दिया। उस रोज पार्टी के बाद जब सभी अपने-अपने घर जाने लगे तब गिरिजा बोली -” मुझें मेरे घर छोड़ दोगे गणेश?”
“क्यों नहीं!”
सभी के जाने के बाद जब सिर्फ मैं और गिरिजा रह गए तब मैंने गिरिजा की आँखों में आँसू देखे।
वह भर्राए हुए कंठ से मुश्किल से बोल पायी -“अब क्या इरादा है?”
“मैं मेरे इनाम पर कब्ज़ा पाना चाहता हूँ।”
“मतलब?”
“कभी तुमनें कहा था कि मैं तुम्हारी पसन्द के काबिल बनूँ।अगर बन चुका हूँ तो मैं तुम्हें पाना चाहता हूँ।”
“मेरी तरफ से कोई बंदिश नहीं। अब तुम किसी की भी पसन्द बन सकते हो, मेरी तरफ से तुम आज़ाद हो।”
“ये बैंक की जॉब मेरे लिये पड़ाव हो सकता है मंज़िल नहीं।मेरी मंज़िल तुम हो। सिर्फ तुम। भले ही उस वक़्त मैने किसी लड़की से दोस्ती करने के लिये बचपना किया था या यूँ कहो छिछोरापन किया था पर तुम्हारें व्यवहार और अनुशासन ने मुझें तुम्हारा कायल बना दिया। मेरी सोच थी कि न तो मुझें मजनू की तरह रेगिस्तान की खाक छाननी है न फरहाद की तरह दूध की नहर बनानी है। आजीविका के लिये एक जॉब ढूंढनी है। वो तो तन्हा रहने की ज़िद हो तब भी ढूंढनी पड़ती ही।”

फिर पहली बार मैंने उसका हाथ पकड़ा। अपने घुटनों पर बैठा उसकी उंगलियां अपने होठों से लगाया , लगभग काँपते हुए स्वर में बोला– ” विल यू मेरी मी ?”
“यस,आई विल।” उसके होठों से लरजता हुआ स्वर निकला।
दोनो की आँखें डबडबा गयी थी।
फिर वह अपने आँसू पोछ कर आवाज़ सयंत करती हुई बोली– “OK, तुम बैंक में जॉइन करने की तैयारी करो। मैं यहाँ घर वालों को सेट करती हूँ।”

नोकरी करते हुवे छः महीने भी न बीते होंगे कि एक दिन मोबाइल पर माँ का फोन आया कि मेरे साथ ही पढ़ने वाली एक लड़की – जिसका नाम गिरिजा है से मेरी शादी तय हो गयी है। जल्दी से छुट्टी ले कर घर पहुँच जाऊ ताकि आगे का कार्यक्रम तय किया जा सके।

बाद में गिरिजा ने मुझें बताया कि वह सीधे अपनी माँ से मेरे बारे में बतायी थी। मेरी और अपनी जिद की बात भी बतायी थी। उसकी माँ ने उसके पिता को मेरे पिता के पास भेजा था।
फिर एक दिन गाजे बाजे बारात के साथ मैं गिरिजा को लेने पहुँच गया।
जयमाला के समय गिरिजा कई सहेलियों के साथ घिरी हुई मंच पर उपस्थित थी।
चमची आज भी साथ थी। फूल मेकअप में दुल्हन से ज़्यादा चमकती हुईं।
अनायास ही मेरा हाथ सेहरे के अंदर मेरे गाल को सहला गया।
इच्छा हुई कि आज उस थप्पड़ का बदला घुसें और लात मार कर ले लूँ फिर खुद का ही ख्याल आया कि इसमें भी मेरी ही बेइज़्ज़ती होनी थी।
सब्र गणेश सब्र – मैंने खुद को समझाया।

इंतकाम वह पकवान है जो ठंडा होने पर ही जायकेदार लगता है।

शादी की रश्में हो रही थी और चमची बार-बार जीजाजी जीजाजी भज रही थी।
मेरे सब्र का पैमाना छलकने लगा था।
जूते छुपाई के नाम पर वह पैसे की ज़िद करने लगी।
अब मैं भी कमीनेपन पर उतर आया।
“चाहो तो जूते पास रख लो मैं करीब हूँ इसका अहसास रहेगा। नहीं रखना तो दुपट्टे से पोछ कर वापस कर दो पूरा एक रुपया दूँगा।” –कह कर मैं एक रुपये का सिक्का उसकी ओर उछाल दिया।
गिरिजा अवाक रह गयी।
बड़े भाई साहब मुझसे नाराज़ भी हुवे पर धीरे से मैंने उन्हें सॉरी बोल दिया।
चमची को काटो तो खून नहीं।
थोड़ी देर तक वह स्तब्ध खड़ी रही फिर दुपट्टा मुँह में ठूस कर रुआंसी सी वहाँ से भाग गयी।
भले ही किसी को कुछ भी लगा हो पर मुझें बहुत तसल्ली हुई।

लगा वर्षो से तप रहे रेगिस्तान में झमाझम बारिश हो गयी हो।
मेरे ह्रदय में ठंड पड़ गयी थी।
बाद में गिरिजा ने मुझसे पूछा भी कि ऐसा क्यों किया?
मेरा जबाब था – जब मैं तुमसे किया प्रेम नहीं भूल सका,अपना वादा न भूल सका तो उसका थप्पड़ कैसे भूल सकता था।

                                         अरुण कुमार अविनाश
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शिक्षाऔर समय

   वो अंकल और आंटी बस अड्डे पर बैठे खामोश लोगो को देखे जा रहे थे ।

मैने कहा अंकल टैक्सी चाहिये ? कहाँ जाना है ?
कम पैसों में मै छोड दूँगा
वे बोले बेटा कोई ऐसी जगह ले चल जहाँ मेरे अपने हो जहाँ अमीर गरीब का नही रिस्तो का सम्मान हो जहाँ पैसे नहीं प्रेम और अपना पन हो |
मै खामोश था क्योकि मेरे पास कोई जवाब नहीं था फिर मैंने कहा आप यहाँ किसका इतंजार कर रहे हैं ?
अंकल और आंटी रो पड़े और थरथराते होठों से सिसकियों के साथ एक ही शब्द निकला अपने भविष्य का इन्तजार ।
अब मेरे से रहा नहीं गया मै पूछ बैठा कि आखिर बात क्या है आप मुझे भी अपना बेटा समझें मुझे बतायें कोई मदद यदि मेरे द्वारा हो सके
अंकल ने कहा बेटा कहाँ रहते हो कितने पढे हो और परिवार में कितने लोग है कितना कमाते हो ? एक साथ कई सवाल ‘
मैने कहा मै गरीब माँबाप के साथ रहता हूँ एक छोटे से घर में अपनी पत्नी व एक बेटी के साथ रोज के 400 500 रु कमा लेता हूं फिर घर चले जाता हूं ।
आंटी और अंकल रोते हुए बोले बेटा हम दोनों स्कूल में शिक्षक थे नजाने कितने बच्चे क्या क्या बन गये होंगे जिन्हे हम ने पढाया मगर क्या वे सभी तुम्हारी तरह होंगे या हमारी औलाद की तरह ?
वे बोले बेटा हमारे दो लड़के व एक लड़की है । या योंकहो की थे ?
मैने कहा ऐसा क्यों अंकल ? आप थे कह रहे हैं कोई अनहोनी हुई है क्या ?अब कहां है ?
अंकल बोले होँ वेटा अनहोनी तो हुई है हमारे सपनो के साथ । जहाँ इन बच्चों के परवरिश में हमने अपने सपने अपनी खुशी अपनी जवानी अपना समय अपना धन अपना मान सम्मान सब कुछ दांव पर लगा दिया उन्हे इतना अधिक पढा दिया कि अबवे माँबाप में भी नफा नुक्सान देखने लगे है ।
और ये आज के समाज की सच्चाई है बेटा अधिक शिक्षित परिवार कभी एक छतके नीचे कभी रह नही सकता । वे हर बार हमसे एक ही जवाब दिया करते हैंकि अब जमाना बदल गया आप अपनी सोच अपने पास रखों और आप ही तो पढ़ाते थे स्कूल में कि खूब पढ़ो आगे बढो तरक्की करो ।
आज मैं और मेरे जैसे शिक्षक यही सोचते हैं। हमने ये तो नही पढाया कि माँबाप को छोड दो
रिस्तों को तोड़ दो अपने घर के दरवाजे अपनो के लिये बंद कर दो हर चीज को पैसे और अपने नफे नुकसान से तोलो किसी का अपमान करो ।
मैने कहा ! अंकल आप कहाँ शिक्षक थे और आपके बच्चे कहाँ पढ़ते थे ?
वे बोले मै सरकारी स्कूल में था और बच्चे अंग्रेजी मीडियम के प्राइवेट स्कूल में पढा करते थे ‘ मैंने कहा बस यहीं गलती हुई है अंकल सरकारी स्कूलों में वही बच्चे पढ़ते है जिन्हे वक्त पर एक पेंसिल तक नसीब नहीं होती और वो पढ लिख कर कुछ अधिक नही कर पाते क्योंकि स्कूल छोडने के बाद बहुत कम होते है जो आगे कुछ कोर्स करें सभी लगभग रोजी रोटी कमाने में जुड जाते है।
और प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढाया तो जाता है मगर एक विजनेस कीतरह उनके पास संस्कार सभ्यता के लिए वक्त नहीं होता वहाँ सब का ध्यान 99% अंक प्राप्त करने पर होता है ।
वहाँ सुविधायें अधिक मिलती है चाहे माँ बाप फीस भरते भरते कंगाल हो जायें । और वहाँ पढें बच्चे लगभग ऊँची सोच का मतलब सिर्फ अपनी तरक्की को समझते हैं ।
शिक्षा वही है अंकल बस उसे देने वाले और लेने वाले लोग बदलें है । ये उसी का परिणाम है । आप किसी वस्तु को किसी व्यक्ति को किसी काम को जिस नजर से देखतें है उसमे वही छवि उभर कर सामने आती है । जैसे मै टेक्सी वाला लोग इज्जत के बजाय ओये फलां जगह चलेगा ? इस तरह कहते है और ये वो लोग होते हैं जो बड़े शहरो में आलीशान बंगले में रहने वाले पढ़े लिखे लोग गिने जाते हैं । क्योकि उन्होने स्कूल से लेकर अब तक सिर्फ किताबे देखी है समाज और ये छोटे लोग उनका रहन सहन कभी देखा ही नहीं और ये उनकी भी गलती नहीं क्योकि प्राइवेट स्कूल और माता पिता ने उन्हे पढ़ाई के अलावा कभी इतना खाली वक्त दिया ही नही कि वे अपनी मर्जी से दुनिया देखें ।
उन्होने गलियाँ नही देखीया गली में खेला ही नहीं उन्होंने देखे तो म्यूजियम स्मारक किले
वे बारिस में नही भीगे कहीं जुखाम न हो वे धूप में नही घूमे कहीं तबीयत बिगड़ी तो कल टेस्ट छूट जायेगा ।
अंकल जब से शिक्षा को व्यापार बनाया है हमने संस्कार सभ्यता रहन सहन अपना पराया सब कुछ खो दिया यहाँ तक की आजादी भी ।
माँबाप कही नही गये कि बच्चों के पेपर है टेस्ट है उसकी तैयारी में इसलिए वे कैद हुये और बच्चा इसलिए कि माँबाप रोज कहते है कि तेरी पढ़ाई में इतना खर्चा हुआ तू पढ बेटा ।
आज वो आपके उन्ही पैसों की उसूली कर रहा है अंकल अपने को बेच कर सिर्फ पैसा कमा रहा है | और ये कहानी हर घर में है ।
संदीप गढ़वाली CR
गाँव बडखोलू पौडी गढवाल
उतराखण्ड15821

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एक बार संत सूरदास को किसी ने भजन के लिए आमंत्रित किया..भजन कार्यक्रम के बाद उस व्यक्ति को सूरदास जी को अपने घर तक पहुँचाने का ध्यान नही रहा और वह अन्य अतिथियों की सेवा में व्यस्त हो गया।सूरदास जी ने भी उसे तकलीफ नहीं देना चाहा और खुद लाठी लेकर ,”गोविंद–गोविंद” करते हुये अंधेरी रात मे पैदल घर की ओर निकल पड़े । रास्ते मे एक कुआं पड़ता था । वे लाठी से टटोलते–टटोलते भगवान का नाम लेते हुये बढ़ रहे थे और उनके पांव और कुएं के बीच मात्र कुछ इंच की दूरी रह गई थी कि…..उन्हे लगा कि किसी ने उनकी लाठी पकड़ ली है,
तब उन्होने पूछा -” तुम कौन हो ?” उत्तर मिला – “बाबा, मैं एक बालक हूँ । मैं भी आपका भजन सुन कर लौट रहा हूँ । देखा कि आप गलत रास्ते जा रहे हैं, इसलिए मैं इधर आ गया । चलिये, आपको घर तक छोड़ दूँ…!”

सूररदास ने पूछा- “तुम्हारा नाम क्या है बेटा ?”

“बाबा, अभी तक माँ ने मेरा नाम नहीं रखा है।‘’

“तब मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ ?”
“कोई भी नाम चलेगा बाबा…!”

सूरदास ने रास्ते में और कई सवाल पूछे। उन्हें लगा कि हो न हो, यह कन्हैया ही है!वे समझ गए कि आज गोपाल खुद मेरे पास आए हैं । क्यो नहीं मैं इनका हाथ पकड़ लूँ ?यह सोच उन्होने अपना हाथ उस लकड़ी पर कृष्ण की ओर बढ़ाने लगे ।
भगवान कृष्ण उनकी यह चाल समझ गए ।सूरदास का हाथ धीरे–धीरे आगे बढ़ रहा था । जब केवल चार अंगुल अंतर रह गया, तब श्री कृष्ण लाठी को छोड़ दूर चले गए । जैसे उन्होने लाठी छोड़ी, सूरदास विह्वल हो गए, आंखो से अश्रुधारा बह निकली ।

बोले – “मैं अंधा हूँ ,ऐसे अंधे की लाठी छोड़ कर चले जाना क्या कन्हैया तुम्हारी बहादुरी है ?”

और.. उनके श्रीमुख से वेदना के यह स्वर निकल पड़े

“हाथ छुड़ाये जात हो, निर्बल जानि के मोय ।
हृदय से जब जाओगे, तो सबल जानूँगा तोय ।।”

मुझे निर्बल जानकार मेरा हाथ छुड़ा कर जाते हो, पर मेरे हृदय से जाओ तो मैं तुम्हें मर्द कहूँ ।

भगवान कृष्ण ने कहा,”बाबा, अगर मैं ऐसे भक्तों के हृदय से चला जाऊं तो फिर मैं कहाँ रहूँ ??”

भज गोविंदम्… !!जय श्री राधेगोविंद!!

सुचेन्द्र कुमार