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एक गाज़ी और लौंडी का अफसाना है तैमूर और जहांगीर


आज कल सैफ अली खान और करीना खान(कपूर) के दूसरे बेटे के जहांगीर नामकरण को लेकर बड़ी चर्चा है। मुझे सैफ द्वारा पहला तैमूर और दूसरा जहांगीर निकालना समझ आता है क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदुओं का शासक होना और हिंदुओ को गुलाम समझना, यह सैफ अली खान के डीएनए में है। उसकी विरासत गज़वा-ए-हिन्द की जेहनियत से जुड़ी है। उसकी नसों में वह अफगानी इस्लामिया खून आज भी दौड़ रहा है जिसके के लिए हिन्दू काफिरों पर अपना धर्म मुसल्लत करना व उन पर हुक्म करना, आसमानी फरमान है। सैफ के पूर्वज क्वेटा(उस वक्त अफगानिस्तान में) के थे और इस्लाम के प्रसार में लगे थे। आज के भारत मे इनका आना 15 वी शताब्दी में हुआ था जब दिल्ली के अफगानी सुल्तान बहालुल लोदी ने उसके पूर्वज, सलामत खान भड़ैंच को दिल्ली के आसपास के मेवाती लोगों को काबू करने के लिए बुलाया था।

अफगानों के बाद जब मुगल आये तो इस सलामत खान ने मुगलों को चढ़ता सूरज समझ, अफगानियों से किनारा कर लिया और बाबर की बादशाहत कबूल कर ली। उसके बाद से ही इस परिवार का एक ही मूल मंत्र रहा है की जो भी शक्तिशाली है या जो भी दिल्ली पर बैठा है उसको अपनी सेवा देना।

19 वी शताब्दी के आते आते इस परिवार ने यह समझ लिया था कि भारत मे नई शक्ति अंग्रेज है और देर सबेर दिल्ली पर अंग्रेज हुक्मरान ही बैठेंगे, इसलिये इनके एक पूर्वज अलफ खान, मैं परिवार के, तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के कमांडर इन चीफ लार्ड जेरार्ड लेक को सलामी बजा आये और अपने परिवार की सेवाएं समर्पित कर दी। इस परिवार ने अग्रेजो की तरफ से होलकर और मराठों से युद्ध किया और इसके इनाम स्वरूप लॉर्ड जेरार्ड लेक ने 1804 में उनके बेटे फैज तलब खान को पटौदी की जागीर दी। ऊसी के बाद से ही 137 वर्ग किलोमीटर की यह जागीर पटौदी में नवाब पैदा होने लगे।

जब भारत 1947 मे स्वतंत्र हुआ तब पटौदी के नवाब इफ्तिखार अली खान थे जो की क्रिकेट के मशहूर खिलाड़ी थे और भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान भी थे। इस पटौदी रियासत का 1948 में जब भारत मे विलय हो गया तब भी इस परिवार ने अपनी खानदानी परिपाटी नही छोड़ी और दिल्ली के नए शासक भूरे अंग्रेज जवाहर लाल नेहरू को शीशे में उतारने में पीछे नही रहे। गंगा जमुनी तहजीब और सेक्युलरिज़्म की नई परिभाषा गढ़ते हुये भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तो विशेष रूप से मुस्लिम अशरफिया वर्ग के प्रति संवेदनशील थे और वे इस पटौदी परिवार से कितना करीब थे इसका पता इस बात से लगता है कि जब जनवरी 1952 में इफ्तिखार अली खान की सिर्फ 42 वर्ष की ही आयु में पोलो के खेल में घायल हो कर अकाल मृत्यु हो गई थी तो हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री भूरे अंग्रेज जवाहर लाल नेहरू ने, इफ्तिखार अली खान की सिर्फ 37 वर्ष में विधवा हुई साजिदा सुल्तान, जो नवाब भोपाल की बेटी भी थी, को लुटियंस दिल्ली में, एक ‘समाजसेविका’ के रूप में त्यागराज मार्ग पर एक बंगला आवंटित कर दिया था। इसके बाद से इस परिवार का केंद्रबिंदु 2003 तक, जब तक साजिदा सुल्तान ज़िंदा रही, यही लुटियंस बंगला रहा।

मुझे सैफ अली खान के परिवार के इतिहास को इतना विस्तार से इसलिये बताना पड़ा ताकि लोग, सैफ अली खान की मानसिकता व अपने बेटों का नाम तैमूर व जहांगीर नाम रखने के उसके मनोविज्ञान को समझ सके। वो आज भी अफगानिस्तान से उतर, भारत को लूटने और काफिरों(हिंदुओं) पर राज करने की इस्लामिक कबीलाई मानसिकता को ओढ़े हुये है। उसके अवचेतन मन मे यह बात जड़ पकड़े हुए है कि हिंदुओं का स्त्रीवर्ग उनकी लौंडी है और उनको गुलाम बना उनपर राज करना, उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।

यहां यह उत्सुकता अवश्य होती है कि सैफ की मानसिकता और उसके अवचेतन मन के मनोविज्ञान को तो समझा जासकता है लेकिन करीना कपूर का तैमूर और जहांगीर की माँ बनने का मनोविज्ञान क्या है? कोई हिन्दू स्त्री स्वतः एक बांदी, एक लौंडी बन, अपने बेटों के हिंदुहन्ता प्रतीकों से हुये नामकरण से सहज हो सकती है?

मैने इसपर काफी विचार किया और पाया कि हिंदुओं में यह करीना कपूर कोई अपवाद नही है बल्कि यह हिन्दू मुस्लिम का झालमेल बहुत पुराना है। भारत मे हिंदुओं को मुसलमान बनाना या फिर दिल्ली में मुगलों का जब तक ह्रास नही होगया, शासकों के प्रश्रय में जबरन धर्मांतरण कराया जाना होता रहा है लेकिन भारत की मुख्यभूमि में यह कभी भी सामाजिक स्तर पर स्थापित नही हो पाया था। लेकिन इसके विपरीत भारत का वह भाग, जहां से हिन्दू स्वयं शनय शनय विस्थापित हुआ है, वहां इसका समाजीकरण जरूर हुआ है।मेरा अनुभव रहा है की अखंडित भारत के पश्चिमोत्तर भाग व उत्तर में काश्मीर के हिंदुओं में, अपने इस्लामिक हंताओ के प्रति विशेष अनुराग और उनके साथ सहज रूप से सहभागिता से रहने की कल्पना का रोमांस ज्यादा पाया जाता रहा है। भारत के बंटवारे के बाद विस्थापित हुये हिंदुओं में एक ऐसा वर्ग भी रहा है जो अपनी जड़ों को पाकिस्तान के गांवो, कस्बों और शहरो में सिर्फ ढूंढता ही नही है, बल्कि उसके रोमांस में कैद, गंगा जमुनी तहजीब को वहां उतारता भी है। वो शताब्दियों से स्वयं को अफगानिस्तान से सिमटते सिमटते, पूर्व दिशा की ओर खिसकते खिसकते, अपनी खोई मिट्टी का दोष, अंग्रेज़ो और चंद राजनीतिज्ञों पर डाल देता है लेकिन वह कभी अपने हंताओ पर प्रश्न नही करता है।

1970/80 के दशकों में एक से एक बुद्धजीवियों को पढा व सुना है जो अपना बचपन, अपनी जवानी को पाकिस्तान की खुशनुमा वादियों में ढूंढते थे। वे अपनी पुरानी यादों में खो, न जाने कौन कौन से जुम्मन चाचाजानो, फरीदा चाचीजानो, तबस्सुम आपाओं और बाज़ीयों को फरिश्ता बना देते थे। उनकी बातों से यही लगता था कि जैसे वे स्वर्ग में थे और 1918 से 1947 के बीच हुए वहां हिंदुओं के विरुद्ध हुये अत्याचार, दंगे और इस आक्रमकता के कारण हिंदुओं का धीरे धीरे विस्थापित होना, कोई वास्तविकता न हो कर बस कोई दुर्घटना थी। यही सब कश्मीरी पंडितों का भी हुआ है। जबतक 1991 से घाटी से भगाए नही गये तब तक 370 का समर्थन करते रहे। जो इनके पूर्वजो के हन्ता थे और बाद में उनके स्वयं के हुये, उन्ही के साथ खान पान बोली पर गलबहियां करते रहे और शेष भारत के हिंदुओं पर श्रेष्ठता का भाव रखते रहे। आज भी कई कश्मीरी पंडित मिल जाएंगे जो अपने हंताओ पर कभी उंगली नही उठाते है, उनका आज भी रोमांस, उसी काल खंड में अटका हुआ है।

मुझे ऐसा ही कुछ, करीना कपूर को विरासत में मिला लगता है। वह जिस कपूर खानदान से है, उसकी जड़े ब्रिटिश राज में जमी थी। भारत मे तो इस खानदान की पहचान पृथ्वीराज कपूर से बनी, जो अखंड भारत के शहर लायलपुर, पंजाब (आज का पाकिस्तान का फैसलाबाद शहर) में पैदा हुए थे और वही उनकी पढ़ाई लिखाई हुई थी। उनके परदादा को दीवान की पदवी मिली थी और दीवान मुरली माल कपूर के नाम से जाने जाते थे। उनके दादा दीवान केशवमल कपूर वहां तहसीलदार थे और उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर, इंडियन इम्पीरियल पुलिस में अधिकारी थे। पिता के पेशावर स्थांतरण के बाद परिवार, पेशावर चला आया, जहां आज भी उनकी हवेली खड़ी है। यह कपूर परिवार, ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभावी व प्रतिष्ठित सेवक थे जो धन सम्पदा व सामाजिक प्रतिष्ठा से परिपूर्ण थे। लेकिन उसके बाद भी वहां, भारत के उस हिस्से में हिन्दू मुस्लिम को लेकर समाज मे ऐसी स्थितियां बनने लगी थी कि 1928 में पृथ्वीराज कपूर को वह सब छोड़ कर, फ़िल्म और थियेटर में काम करने के लिए मुम्बई चले आये थे। उनके विस्थापन के बाद धीरे धीरे पूरा खानदान अपना घर जयदाद छोड़ कर मुम्बई आगया था।

पृथ्वीराज कपूर के घर वालो के साथ ससुराल के लोग भी मुम्बई चले आये थे और उसमे उनके साले जुगुल किशोर मेहरा भी थे। जो फ़िल्म में अभिनेता थे लेकिन फिर बाद में मुम्बई रेडियो( बॉम्बे रेडियो) के स्टेशन डायरेक्टर बन गए थे। यह साले साहब जुगल किशोर मेहरा, जो राजकपूर के सगे मामा थे, ने तीन शादियां की और वे सब मुस्लिम थी। उनमें से एक नाम अल्लाहरखी था, उनसे हुई बेटी 1940-50 की मशहूर अभिनेत्री मुन्नवर राणा थी। जुगल किशोर मेहरा ने तीसरी शादी उस ज़माने की मशहूर अभिनेत्री और गायिका अनवरी बेगम से की थी। 1947 में जब बंटवारा हुआ तो जुगलकिशोर मेहरा ने अनवरी बेगम के साथ रिज़र्व माइग्रेशन किया और लाहौर, पाकिस्तान चले गए। वहां, पृथ्वीराज कपूर के साले और राज कपूर के मामा, जुगल किशोर ने हिन्दू धर्म छोड़ कर इस्लाम अपना लिया और अपना नया नाम अहमद सुल्तान रख लिया। पाकिस्तान में, मेहरा उर्फ सुल्तान अहमद, पाकिस्तान रेडियो जॉइन कर लिया और वहां वह मे डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद तक पहुंचे। उसके बाद वोउच्च पद पर पाकिस्तान एयरलाइन्स में चले गये।

मेहरा उर्फ अहमद सुल्तान की बीवी अनवरी बेगम की एक बेटी जरीना थी और उसने बाद में नसरीन नाम से हिंदी और पाकिस्तानी फिल्मो में काम किया था। यह ज़रीन, राज कपूर की ममेरी बहन थी जिसकी बाद में शादी करांची के कालीन व्यापारी लियाकत गुल आगा से शादी हुई। उस काल मे पाकिस्तान में यह बहुत मशहूर था कि राज कपूर की बहन की शादी करांची में आगा परिवार में हुई है। इसी ज़रीन और आगा की बेटी सलमा आगा है, जो 80 के दशक में बी आर चोपड़ा की फ़िल्म की नायिका थी। सलमा आगा का राजकपूर से भांजी का रिश्ता है और वह करीना कपूर की बुआ है।

मैं अब जब 70 और 80 के दशक की कुछ स्मृतियों को झझकोरता हूँ तो यह याद आता है कि उस काल मे जब राज कपूर के यहां कोई जश्न होता था तो ढेर सारे पाकिस्तानी मेहमान, कव्वाल, गायक महफ़िल की रंगत बढाते थे। मुझे तब कपूर परिवार का यह पाकिस्तानी प्रेम, बड़ा अजीब जरूर लगता था लेकिन मैने इस पर कुछ मनन नही किया क्योंकि कपूर खानदान की विरासत के छुपे हुये पहलुओं को बिल्कुल भी नही जानता था।

अब इन्ही सब बातों को देख और समझ कर मुझे करीना कपूर समझ मे आती है। वह उस वातावरण में पैदा और पली बढ़ी हुई है जहां उसके खानदान ने इस हिन्दू मुस्लिम झालमेल को सहेजा हुआ है। ये निमित्त मात्र हिन्दू शेष रह गए है ये लायलपुर, पेशावर की जड़ो में रोमांस से लिपटे लोग है। ये वे लोग है जो पेशावर में खड़ी दीवान विशेश्वर नाथ कपूर की हवेली के साये में, अपने हंताओ के साथ सोने में रोमानियत ढूंढते है।

मैं यह मानता हूँ कि ये और ऐसे ही अपनी ज़मीन छोड़, पुराने ज़माने की रोमानियत में कैद लोग, कुछ भी हो सकते है लेकिन अब हिन्दू शायद बिल्कुल भी नही रह गये है। इसीलिए जहां सैफ अली खान के लिए बेटों को तैमूर और जहांगीर नाम देना उसे गज़वा-ए-हिन्द के लिए गाज़ी होने का सुख देता है वही करीना को कोई फर्क नही पड़ता क्योंकि वह एक गाज़ी की लौंडी से ज्यादा कुछ नही रह गई है।

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गधा पेड़ से बंधा था।
शैतान आया और उसे खोल गया।

गधा मस्त होकर खेतों की ओर भाग निकला और खड़ी फसल को खराब करने लगा।

किसान की पत्नी ने यह देखा तो गुस्से में गधे को मार डाला।

गधे की लाश देखकर गधे के मालिक को बहुत गुस्सा आया और उसने किसान की पत्नी को गोली मार दी।

किसान पत्नी की मौत से इतना गुस्से में आ गया कि उसने गधे के मालिक को गोली मार दी।

गधे के मालिक की पत्नी ने जब पति की मौत की खबर सुनी तो गुस्से में बेटों को किसान का घर जलाने का आदेश दिया।

बेटे शाम में गए और मां का आदेश खुशी-खुशी पूरा कर आए। उन्होंने मान लिया कि किसान भी घर के साथ जल गया होगा।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। किसान वापस आया और उसने गधे के मालिक की पत्नी और बेटों, तीनों की हत्या कर दी।

इसके बाद उसे पछतावा हुआ और उसने शैतान से पूछा कि यह सब नहीं होना चाहिए था। ऐसा क्यों हुआ?

शैतान ने कहा> ‘मैंने कुछ नहीं किया। मैंने सिर्फ गधा खोला लेकिन तुम सबने रिऐक्ट किया, ओवर रिऐक्ट किया और अपने अंदर के शैतान को बाहर आने दिया।
इसलिए अगली बार किसी का जवाब देने, प्रतिक्रिया देने, किसी से बदला लेने से पहले एक लम्हे के लिए रुकना और सोचना ज़रूर।’

ध्यान रखें। कई बार शैतान हमारे बीच सिर्फ गधा छोड़ता है और बाकी विनाश हम खुद कर देते हैं !!

हर रोज टीवी चैनल गधे छोड़ जाते हैं…

कोई ग्रुप में गधा छोड़ देता है।

दोस्तों के ग्रुप में और पार्टी बाजी या विचारधारा के चक्कर में आप और हम लड़ते रहते हैं।

मिल जुल कर मुस्कुरा कर खुशी से रहिये
याद रखें-..
तोड़ना आसान है जुड़े रहना बहुत मुश्किल है…
लड़ाना आसान है मिलाना बहुत मुश्किल…

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🌹महिमा🌹

🙏🌹Om Shanti🌹🙏

एक दिन लक्ष्मी जी की बड़ी बहन ज्येष्ठा ने उनसे कहा, ‘बहुत दिनों से एक बात मेरे मस्तिष्क में कौंध रही है। सोचती हूँ कि तुमसे पूछूं या नहीं।’ ‘ऐसी क्या बात है बहन? मन में जो कुछ भी है, निःसंकोच पूछो। वैसे भी कोई बात मन में न रखकर उसका समाधान कर लेना ही बुद्धिमानी है।’ लक्ष्मी जी ने मुस्कराकर कहा। ‘मैं अक्सर यही सोचती रहती हूँ कि सुंदरता में हम दोनों बराबर हैं, फिर भी लोग तुम्हारा आदर करते हैं और मैं जहाँ भी जाती हूँ, वहाँ उदासी छा जाती है। मुझे लोगों की घृणा और क्रोध का शिकार होना पड़ता है जबकि हम दोनों सगी बहनें हैं। ऐसा क्यों?’ लक्ष्मी जी ने हँसकर कहा, ‘सगी बहन या समान सुंदरता होने से ही आदर नहीं मिलता। उसके लिए अपने को भी कुछ करना चाहिए। लोग मेरा आदर इसलिए करते हैं क्योंकि मैं उनके घर पहुँचते ही सुख के साधन जुटा देती हूँ। सम्पत्ति और वैभव से आनंदित होकर लोग मेरा उपकार मानते हैं, तभी मेरी पूजा करते हैं। उधर, तुम्हारा यह हाल है कि जिसके यहाँ भी तुम जाती हो; उसको ग़रीबी, रोग और आपदा सहनी पड़ती है। इसी वजह से लोग तुमसे घृणा करते हैं। कोई आदर नहीं करता। आदर पाना है तो दूसरों को सुख पहुँचाओ।’ ज्येष्ठा को लक्ष्मी जी की बात चुभ गई। उन्हें लगा कि लक्ष्मी को अपनी महिमा का अभिमान हो गया है। उन्होंने तड़प कर कहा, ‘लक्ष्मी! तुम मुझसे हर बात में छोटी हो−अवस्था में भी और प्रभाव में भी। मुझे उपदेश देने का भी विचार न करो। अगर तुम्हें अपने वैभव का अहंकार है तो मेरे पास भी अपना एक प्रभाव है। मैं जब अपनी पर आ जाऊँ तो तुम्हारे करोड़पति भक्त को भी पल भर में भिखारी बना दूँ।’ लक्ष्मी जी को हँसी आ गई और कहने लगीं, ‘बहन! तुम बड़ी हो, इसलिए कुछ भी कह लो। लेकिन जहाँ तक प्रभाव की बात है, मैं तुमसे कम नहीं हूँ। जिसको तुम भिखारी बनाओगी, उसे मैं दूसरे दिन रंक से फिर राजा बना दूँगी। मेरी महिमा का अभी तुम्हें पता ही कहाँ है।’ ‘और तुम्हें भी मेरी महिमा का पता ही नहीं है। जिसकी तुम सहायता करोगी, उसे मैं दाने−दाने के लिए भी मोहताज कर दूँगी।’
‘देखो बहन! दाने−दाने के लिए तो तुम उसे मोहताज कर सकती हो जिससे मैं रूठ जाऊँ। जिसके सिर पर मेरा वरदहस्त न हो, उसका तुम कुछ भी बिगाड़ सकती हो। परंतु जिस पर मेरी कृपादृष्टि है, उसका कोई भी बाल तक बांका नहीं कर सकता। अगर तुम अपना प्रभाव दिखाने को इतनी ही उतावली हो रही हो तो कल अपना प्रभाव दिखाकर देख लेना।’ ‘ठीक है। बोलो, कहाँ चलें?’ ‘दूर क्यों जाएँ, पास ही अनुराधापुर है। उसमें एक ब्राह्मण रहता है−दीनानाथ। वह रोज मंदिर में पूजा करने जाता है और मेरा पक्का भक्त है। उसी पर हमें अपनी−अपनी महिमा दिखानी है।’ ज्येष्ठा को ताव आ गया। उन्होंने हाथ झटककर कहा, ‘ठीक है, ठीक है। देख लेना, कल तुम्हारा सिर ही झुक जाएगा।’ कहकर वह एक ओर चली गई। लक्ष्मी जी वहीं खड़ी बहन के क्रोध ओर अहंकार पर मुस्कराती रहीं। दूसरे दिन दोनों बहनें अनुराधापुर के विष्णु मंदिर में पहुँचीं। उन्होंने वेश बदल रखा था। साधारण स्त्रियों की तरह वे दोनों मंदिर के द्वार पर बैठ गईं। लोगों ने देखा अवश्य, किंतु किसी ने उनकी ओर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया। ध्यान देने वाली कोई ख़ास बात थी भी नहीं। वह मंदिर था और वहाँ हर रोज दीन दुःखी आते−जाते रहते थे। वहाँ आने वाले सभी किसी न किसी परेशानी में घिरे रहते थे। फिर भला उन्हें किसी दूसरे की परेशानी से क्या सरोकार हो सकता था। थोड़ी देर बाद वहाँ दीनू पंडित आया। दोनों बहनों की नजरें उस पर जम गईं। पूजा करके जब वह लौटने लगा तो ज्येष्ठा ने कहा, ‘लक्ष्मी! वह तुम्हारा भक्त आ रहा है। बन पड़े तो कोई सहायता करो।’ ‘हाँ, करती हूँ।’ कहकर लक्ष्मी जी ने एक पोला बांस दीनू के रास्ते में रख दिया जिसमें मोहरें भरी हुई थीं। ज्येष्ठा ने बांस को छूकर कहा, ‘अब तुम मेरा प्रभाव भी देख लेना।’ पूजा करके लौट रहे दीनू ने रास्ते में पड़ा हुआ वह बांस का टुकड़ा उठा लिया। उसका विचार था कि वह किसी काम आ जाएगा। घर में सौ ज़रूरतें होती हैं। अभी वह पंडित कुछ ही आगे बढ़ा था कि उसे एक लड़का मिला। लड़के ने पहले पंडित जी से राम−राम की, फिर बड़ी ही नम्रता से बोला, ‘पंडित जी! मुझे अपनी चारपाई के लिए बिल्कुल ऐसा ही बांस चाहिए। दादा जी ने यह कहकर भेजा है कि जाओ, बाज़ार से ले आओ। ऐसा बांस पंडित जी कहाँ मिलेगा?’ दीनू ने कहा, ‘मैंने मोल नहीं लिया। रास्ते में पड़ा था; सो उठा लाया। लो, तुम्हें ज़रूरत है तो तुम ही रख लो। वैसे बाज़ार में एक रुपये से कम का नहीं है।’ लड़के ने चवन्नी देते हुए कहा, ‘मगर मेरे पास तो यह चवन्नी ही है, पंडित जी। अभी तो आप इसे ही रखिए, बाकी बारह आने शाम को दे जाऊँगा।’ पंडित जी खुश थे कि बिना किसी हील−हुज्जत के रुपया कमा लिया। दीनू पंडित ने चवन्नबांस लड़के को दे दिया और वह चवन्नी अपनी डोलची में रख दी।
मंदिर के पास खड़ी दोनों देवियाँ यह सारी लीला देख रही थीं। ज्येष्ठा ने कहा, ‘लक्ष्मी! देखा तुमने? तुम्हारी इतनी सारी मोहरें मात्र एक चवन्नी में बिक गईं। और अभी क्या, यह चवन्नी भी तुम्हारे भक्त के पास नहीं रूकेगी। चलो, उसके पीछे चलते हैं और देखते हैं कि क्या होता है।’ दोनों बहने दीनू के पीछे−पीछे चलने लगीं। एक तालाब के पास दीनू ने डोलची रख दी और कमल के फूल तोड़ने लगा। उसी बीच एक चरवाहे का लड़का आया और डोलची में रखी हुई चवन्नी लेकर भाग गया। दीनू को पता ही नहीं चला। फूल तोड़कर वह अपने घर चलने लगा। इतने में वही लड़का आता हुआ दिखाई दिया जिसने चवन्नी देकर उससे बांस ले लिया था। क़रीब आकर वह बोला, ‘पंडित जी! यह बांस तो बहुत वज़नी है। दादाजी ने कहा है कि कोई हल्का बांस चाहिए। इसकी चारपाई ठीक न होगी। यह लीजिए, आप अपना बांस वापस ले लीजिए।’ कहकर उसने बांस पंडित जी के हवाले कर दिया। दीनू ने बांस ले लिया। लेकिन चवन्नी तो डोलची में थी ही नहीं। तब उसने कहा, ‘बेटा, चवन्नी तो कहीं गिर गई। तुम मेरे साथ घर चलो, वहाँ दूसरी दे दूँगा। इस समय मेरे पास एक भी पैसा नहीं है।’ ‘तब आप जाइए। मैं शाम को आकर घर से ले लूँगा।’ यह कहकर लड़का अपनी राह लौट गया। बांस फिर से पंडित जी के ही पास आ गया और लक्ष्मी जी हौले से मुस्कराईं। उनको इस प्रकार मुस्कराते देखकर ज्येष्ठा मन ही मन में जल उठीं। वह बोलीं, ‘अभी तो खेल शुरू ही हुआ है। देखती चलो कि मैं इसे कैसे तिगनी का नाच नचाती हूँ।’ दीनू बेचारा इन सब बातों से बेख़बर अपनी ही धुन में आगे बढ़ा चला जा रहा था। उसे क्या पता था कि वह शतरंज का मोहरा बना हुआ है। वह तो धूप−छाँव की भाँति दोनों बहनों का प्रभाव सहता चुपचाप चला जा रहा था। आगे चलकर गाँव का एक अहीर मिला। उसने दीनू को चवन्नी वापस करते हुए बताया, ‘पंडित जी! मेरा लड़का आपकी डोलची से यह चवन्नी उठा लाया था। वह बड़ा ही शैतान है। मैं आपकी वही चवन्नी लौटाने आया हूँ। हो सके तो उस शैतान को माफ कर दीजिएगा।’ दीनू ने आशीर्वाद देकर चवन्नी ले ली और प्रसन्न मन से उस लड़के को पुकारने लगा जो शाम को घर आकर चवन्नी लेने की बात कहकर लौटा जा रहा था। आवाज़ सुनकर लड़का लौट आया। अपनी चवन्नी वापस पाकर वह भी प्रसन्न हो गया। दीनू पंडित निश्चिंत मन से घर की ओर बढ़ने लगा। उसके एक हाथ में पूजा की डोलची थी और दूसरे में वही पाँच हाथ का लम्बा बांस।
राह चलते दीनू पंडित सोच रहा था, ‘बांस तो काफ़ी वज़नी है। वज़नी है तो मजबूत भी होगा, क्योंकि ठोस है। इसे दरवाजे के छप्पर में लगा दूँगा। कई साल के लिए बल्ली से छुटकारा मिल जाएगा।’ ज्येष्ठा को उसके विचार पर क्रोध आ गया। लक्ष्मी जी के प्रभाव से दीनू को लाभ होता देख वह मन ही मन बुरी तरह जली जा रहीं थीं। जब उन्होंने देखा कि पंडित का घर क़रीब आ गया है तो कोई उपाय न पाकर उन्होंने दीनू को मारने डालने का विचार किया। उन्होंने कहा, ‘लक्ष्मी! धन−सम्पत्ति तो मैं छीन ही लेती हूँ, अब तुम्हारे भक्त के प्राण भी ले लूँगी। देखो, वह किस तरह तड़प−तड़प कर मरता है।’ और वह तुरंत साँप बनकर दीनू की ओर दौड़ पड़ीं। लक्ष्मी जी को तनिक भी घबराहट नहीं हुई। वह उसी तरह खड़ी मुस्कराती रहीं। सहसा दीनू चौंक पड़ा। एक भयानक साँप फन उठाए उसकी ओर झपट रही था। प्राण तो सभी को प्रिय होते हैं। उपाय रहते कोई अपने को संकट में नहीं पड़ने देता। दीनू ने पगडंडी वाला रास्ता छोड़ दिया और एक ओर को भागने लगा। लेकिन साँप बनी ज्येष्ठा उसे भला कहाँ छोड़ने वाली थीं। वह तो उस ग़रीब के प्राणों की प्यासी हो चुकी थीं। वह भी दीनू के आगे−पीछे, दाएं−बाएं बराबर दौड़ती ही रहीं। दीनू घबरा गया। उसने हाथ जोड़कर कहा, ‘नाग देवता! मैंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा। शांति से अपनी राह लौट जाओ। आखिर क्यों मुझ ग़रीब के पीछे पड़े हो? व्यर्थ में किसी ब्राह्मण को सताना अच्छी बात नहीं है।’ लेकिन वह नाग तो ज्येष्ठा का रूप था, जो दीनू को किसी भी तरह डसना चाहता था। प्रार्थना पर कुछ भी ध्यान न देकर वह साँप एक बारगी फुफकारता हुआ झपट पड़ा। जब दीनू ने देख लिया कि बिना संघर्ष किए अब जान नहीं बचेगी तो उसने प्राण−रक्षा के लिए भरपूर जोर लगाकर वही बांस साँप के ऊपर दे मारा। धरती से टकराते ही बांस के दो टुकड़े हो गए और उसके भीतर भरी हुईं मोहरें खन−खनाकर बिखर गईं, जैसे लक्ष्मी हँस रही हो।
दीनू के मुँह से हैरतपूर्ण चीख−सी निकली, ‘अरे!’ थोड़ी देर के लिए वह ठगा−सा खड़ा आँखें फाड़े, उन मोहरों की ओर देखता रहा। एक पल के लिए तो वह साँप को भूल ही गया। परंतु फिर जैसे उसे झटका−सा लगा। साँप का ध्यान आते ही उसने उसकी ओर गरदन घुमायी, तो देखा कि बांस की चोट से साँप की कमर टूट गयी है और वह लहूलुहान अवस्था में झाड़ीकी ओर भागा जा रहा है। दूसरे क्षण वह मोहरों पर लोट गया और कहने लगा, ‘तेरी जय हो लक्ष्मी माता! जीवन−भर का दारिद्रय आज दूर हो गया। तेरी महिमा कौन जान सकता है। चलो, अब घर में बैठकर तुम्हारी पूजा−आरती करूँगा।’ और फिर जल्दी−जल्दी उसने सारी मोहरें अंगोछे में बाँध दीं और लम्बे−लम्बे कदमों से घर की ओर चल दिया। पीछे एक पेड़ की छाया में खड़ी लक्ष्मी अपनी बहन ज्येष्ठा से मुस्कराकर पूछ रहीं थीं, ‘कहो बहन! सच बताना, बड़प्पन की थाह मिली कि अभी नहीं? बड़प्पन किसी को कुछ देने में ही है, उससे छीनने में नहीं।’ ज्येष्ठा ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह चुपचाप उदास खड़ी रहीं। लक्ष्मी जी ने उनका हाथ पकड़कर कहा, ‘फिर भी, हम दोनों बहनें हैं। जहाँ रहेंगीं, साथ ही रहेंगीं। आओ, अब चलें।’

🌹!! जय माता दी !!🌹
अधरों पर मुस्कान, भक्ति से भर दो मन को।
हो जग का कल्याण, शक्ति से भर दो जन को।
🌹!! जय माता दी !!🌹

शिव कुमार

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जय श्री लक्ष्मीनारायण जी

श्रद्धा और समर्प

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी।
उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।
वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी।
वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।
वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया।
तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।
उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे।
वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी।
वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका।
वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा।

दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।
दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे।
गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।

थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?

बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।

गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?

उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।

गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढ़ते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?

थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।
जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे।
वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

गाय समर्पित हृदय का प्रतीक है।
बाघ अहंकारी मन है और
मालिक सद्गुरु का प्रतीक है।
कीचड़ यह संसार है। और
यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है। किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए।
आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

शिव कुमार भारद्वाज

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कर्मों का हिसाब किताब
एक स्त्री थी जिसे 20 साल तक संतान नहीं हुई, फिर कर्म संजोग से 20 वर्ष के बाद उसे पुत्र संतान की प्राप्ति हुई। किन्तु दुर्भाग्य वश 20 दिन में ही वह संतान मृत्यु को प्राप्त हो गयी। वह स्त्री हद से ज्यादा रोई और उस मृत बच्चे का शव ले कर एक सिद्ध महात्मा जी के पास पहुच गई।
वह महात्मा जी से रो रो कर कहने लगी, मुझे मेरा बच्चा एक बार जीवित कर के दीजिये। मात्र एक बार मैं उस के मुख से “माँ” शब्द सुनना चाहती हूँ। स्त्री के बहुत जिद करने पर महात्मा जी ने 2 मिनट के लिए उस बच्चे की आत्मा को बापिस बुलाया। तब उस स्त्री ने उस आत्मा से कहा तुम मुझे क्यों छोड़ कर चले गए मेरे बच्चे?
मैं तुम से सिर्फ एक बार ‘माँ’ शब्द सुनना चाहती हूँ। तभी उस आत्मा ने कहा कौन माँ? कैसी माँ ! मैं तो तुम से कर्मों का हिसाब किताब करने आया था। स्त्री ने पूछा कैसा हिसाब! आत्मा ने बताया पिछले जन्म में तुम मेरी सौतन थी, और मेरी आँखों के सामने तू मेरे पति को ले गई। मैं बहुत रोई तुम से अपना पति मांगा। पर तुम ने मेरी एक नही सुनी, तब मैं रो रही थी और आज तुम रो रही हो। बस मेरा तुम्हारे साथ जो कर्मों का हिसाब था, वह मैंने पूरा किया और मर गया। इत ना कह कर वह आत्मा वापिस चली गयी। उस स्त्री को यह सब देख और सुन कर ऐसा झटका लगा कि उसकी आंखें खुल गई। फिर उसे महात्मा जी ने समझाया कि देखो मैने कहा था। कि यह सब रिश्तेदार माँ, पिता, भाई-बहन सब कर्मों के कारण जुड़े हुए हैं। उस औरत ने महात्मा जी से कहा, जी महात्मा जी! आप सच बोल रहे थे, अब मेरी आंखें खुल चुकी है। हम सब यहां पर कर्मो का हिसाब किताब करने आये हैं। इस लिए सदा अच्छे कर्म करो, ताकि हमे बाद में यह सब भुगतना ना पड़े। वो स्त्री समझ गयी और अपने घर लौट गयी ।
इसलिए हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए हमारा यह शरीर एक किराये का घर है। जैसे कि जब हम “किराए का मकान” लेते है तो “मकान मालिक” कुछ शर्तें रखता है! मकान का किराया समय पर देना। मकान में गंदगी नही फैलाना, उसे साफ सुथरा रखना। मकान मालिक का कहना मानना,और मकान मालिक जब चाहे मकान को खाली करवा सकता है!! इसी प्रकार परमात्मा ने भी जो हमें यह शरीर दिया है, यह भी एक किराए का मकान ही है। हमें परमात्मा ने जब यह शरीर दिया है, तो यह सॉरी शर्ते हमारे लिये भी लागु होती है।
1 किराया है। (भजन -सिमरन)

  1. गन्दगी (बुरे विचार और बुरी भावनाये) नही फैलानी।
  2. जब मर्जी होगी परमात्मा अपनी आत्मा को वापिस बुला लेगा!! मतलब यह है, कि यह जीवन हमे बहुत थोड़े समय के लिए मिला है। इसे लड़ाई -झगड़े कर के या मन मै द्वेष भावना रख कर नही। बल्कि प्रभु जी के नाम का सिमरन करते हुए बिताना चाहिए। और हर समय उस सच्चे मालिक के आगे विनती करनी है कि हे मेरे प्रभु जी! इतनी कृपा करना कि आप की आज्ञा में रहे और भजन -सुमिरन करते रहे!! “ये जन्म मनुष्य शरीर जो हमे मिला है। गुरु किरपा का प्रशाद समझें, हम इस की बेकदरी ना करे। और अपने हर स्वास के साथ नाम जपन और जीवन का राज समझे !!”

रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय।
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय॥
अर्थ: रात सो कर बिता दी, दिन खा कर बिता दिया हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य विषयों की कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया इस से दुखद क्या हो सकता है?
🙏🏻🙏🙏✴️✴️✴️

शिव कुमार भारद्वाज

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पिता

एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय वह अख़बार देने आता था, उस समय मैं उसको अपने मकान की ‘गैलरी’ में टहलता हुआ मिल जाता था। अत: वह मेरे आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए मेरे आवास में अख़बार फेंकता और मुझको ‘नमस्ते बाबू जी’ वाक्य से अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था।

क्रमश: समय बीतने के साथ मेरे सोकर उठने का समय बदल कर प्रात: 7:0 बजे हो गया।

जब कई दिनों तक मैं उसको प्रात: टहलते नहीं दिखा तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:0 बजे वह मेरा कुशल-क्षेम लेने मेरे आवास पर आ गया। जब उसको ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल- मंगल है, मैं बस यूँ ही देर से उठने लगा था।

वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला,

“बाबू जी! एक बात कहूँ?”

मैंने कहा… “बोलो”

वह बोला… “आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आप के लिए ही मैं सुबह तड़के विधान सभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चला कर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ…सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे।”

मैने विस्मय से पूछा… “और आप! विधान सभा मार्ग से अखबार लेकर आते हैं?”

“हाँ! सबसे पहला वितरण वहीं से प्रारम्भ होता है,” उसने उत्तर दिया।

“तो फिर तुम जगते कितने बजे हो?”

“ढाई बजे…. फिर साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ।”

“फिर?” मैंने पूछा।

“फिर लगभग सात बजे अख़बार बाँट कर घर वापस आकर सो जाता हूँ….. फिर दस बजे कार्यालय…… अब बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।”

मैं कुछ पलों तक उसकी ओर देखता रह गया और फिर बोला, “ठीक! तुम्हारे बहुमूल्य सुझाव को ध्यान में रखूँगा।”

घटना को लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गये। एक दिन प्रात: नौ बजे के लगभग वह मेरे आवास पर आकर एक निमंत्रण-पत्र देते हुए बोला, “बाबू जी! बिटिया का विवाह है….. आप को सपरिवार आना है।“

निमंत्रण-पत्र के आवरण में अभिलेखित सामग्री को मैंने सरसरी निगाह से जो पढ़ा तो संकेत मिला कि किसी डाक्टर लड़की का किसी डाक्टर लड़के से परिणय का निमंत्रण था। तो जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया, “तुम्हारी लड़की?”

उसने भी जाने मेरे इस प्रश्न का क्या अर्थ निकाल लिया कि विस्मय के साथ बोला, “कैसी बात कर रहे हैं, बाबू जी! मेरी ही बेटी।”

मैं अपने को सम्भालते हुए और कुछ अपनी झेंप को मिटाते हुए बोला, “नहीं! मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाक्टर बना सके, इसी प्रसन्नता में वैसा कहा।“

“हाँ बाबू जी! लड़की ने केजीएमसी से एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी वहीं से एमडी है ……. और बाबू जी! मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।”

मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा सोच रहा था कि उससे अन्दर आकर बैठने को कहूँ कि न कहूँ कि वह स्वयम् बोला, “अच्छा बाबू जी! अब चलता हूँ….. अभी और कई कार्ड बाँटने हैं…… आप लोग आइयेगा अवश्य।”

मैंने भी फिर सोचा आज अचानक अन्दर बैठने को कहने का आग्रह मात्र एक छलावा ही होगा। अत: औपचारिक नमस्ते कहकर मैंने उसे विदाई दे दी।

उस घटना के दो वर्षों के बाद जब वह मेरे आवास पर आया तो ज्ञात हुआ कि उसका बेटा जर्मनी में कहीं कार्यरत था। उत्सुक्तावश मैंने उससे प्रश्न कर ही डाला कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को वैसी उच्च शिक्षा कैसे दे डाली?

“बाबू जी! इसकी बड़ी लम्बी कथा है फिर भी कुछ आप को बताये देता हूँ। अख़बार, नौकरी के अतिरिक्त भी मैं ख़ाली समय में कुछ न कुछ कमा लेता था। साथ ही अपने दैनिक व्यय पर इतना कड़ा अंकुश कि भोजन में सब्जी के नाम पर रात में बाज़ार में बची खुची कद्दू, लौकी, बैंगन जैसी मौसमी सस्ती-मद्दी सब्जी को ही खरीद कर घर पर लाकर बनायी जाती थी।

एक दिन मेरा लड़का परोसी गयी थाली की सामग्री देखकर रोने लगा और अपनी माँ से बोला, ‘ये क्या रोज़ बस वही कद्दू, बैंगन, लौकी, तरोई जैसी नीरस सब्ज़ी… रूख़ा-सूख़ा ख़ाना…… ऊब गया हूँ इसे खाते-खाते। अपने मित्रों के घर जाता हूँ तो वहाँ मटर-पनीर, कोफ़्ते, दम आलू आदि….। और यहाँ कि बस क्या कहूँ!!'”

मैं सब सुन रहा था तो रहा न गया और मैं बड़े उदास मन से उसके पास जाकर बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और फिर बोला, “पहले आँसू पोंछ फिर मैं आगे कुछ कहूँ।”

मेरे ऐसा कहने पर उसने अपने आँसू स्वयम् पोछ लिये। फिर मैं बोला, “बेटा! सिर्फ़ अपनी थाली देख। दूसरे की देखेगा तो तेरी अपनी थाली भी चली जायेगी…… और सिर्फ़ अपनी ही थाली देखेगा तो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जाये। इस रूख़ी-सूख़ी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हूँ। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले ….।”

उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी माँग नहीं रक्खी। बाबू जी! आज का दिन बच्चों के उसी त्याग का परिणाम है।

उसकी बातों को मैं तन्मयता के साथ चुपचाप सुनता रहा।

आज जब मैं यह संस्मरण लिख रहा हूँ तो यह भी सोच रहा हूँ कि आज के बच्चों की कैसी विकृत मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं…!!

सदैव प्रसन्न रहिये!!
जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!

राम मनोहर अग्रवाल

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👏 #अंदरकीखदान…👏

एक फकीर जो एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहा था, रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काटते ले जाते देखता था ???

एक दिन उससे कहा कि “सुन भाई, दिन- भर लकड़ी काटता है, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती। तू जरा आगे क्यों नहीं जाता। वहां आगे चंदन का जंगल है। एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा !!!!!!!!

गरीब लकड़हारे को भरोसा तो नहीं आया, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है ???

जंगल में ही तो जिंदगी बीती। लकड़ियां काटते ही तो जिंदगी बीती। यह फकीर यहां बैठा रहता है वृक्ष के नीचे, इसको क्या खाक पता होगा???

मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो! फिर झूठ कहेगा भी क्यों???

शांत आदमी मालूम पड़ता है, मस्त आदमी मालूम पड़ता है?कभी बोला भी नहीं इसके पहले एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है ???

तो गया। लौटा फकीर के चरणों में सिर रखा और कहा कि “मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है। मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी। मेरा बाप भी लकड़हारा था, उसका बाप भी लकड़हारा था। हम यही काटने की, जलाऊ-लकड़ियां काटते-काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या! हमें तो चंदन मिल भी जाता तो भी हम काटकर बेच आते उसे बाजार में ऐसे ही। तुमने पहचान बताई, तुमने गंध जतलाई, तुमने परख दी। जरुर जंगल है। मैं भी कैसा अभागा! काश, पहले पता चल जाता ????

फकीर ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है। जब घर आ गए तभी सबेरा है??

दिन बड़े मजे में कटने लगे। एक दिन काट लेता, सात-आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती ???

एक दिन फकीर ने कहा; “मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी। जिंदगी भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है?”

उसने कहा; “यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है?”

उस फकीर ने कहा : “चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है। लकड़िया-वकडिया काटना छोड़ो। एक दिन ले आओगे, दो-चार छ: महीने के लिए हो गया।”

अब तो भरोसा आया था। भागा। संदेह भी न उठाया। चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या! चांदी ही चांदी थी! चार-छ: महीने नदारद हो जाता। एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता। लेकिन आदमी का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे खयाल न आया कि और आगे कुछ हो सकता है।

फकीर ने फिर एक दिन कहा कि “तुम कभी जागोगे कि नहीं! कि मुझी को तुम्हें जगाना पड़ेगा। आगे सोने की खदान है मूर्ख! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत है। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता?”

उसने कहा कि “मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा?”

गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। फकीर ने कहा : “थोड़ा और आगे सोने की खदान है।”

और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। और एक दिन फकीर ने कहा कि नासमझ, “अब तू हीरों पर ही रुक गया?”

अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा “अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशान न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है?”

उस फकीर ने कहा. हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह आदमी मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा?

रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि “मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह सवाल ही नहीं आता। तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों-जन्मों में नहीं आ सकता था खयाल कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है।

फकीर ने कहा : उसी धन का नाम ध्यान है।

अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं। अब जरा अपने भीतर की खदान खोद, जो सबसे कीमती है।…..🙏🙏हरिओम 🙏🙏