Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जय श्री सीता राम….
एक बार एक राजा ने गाव में रामकथा करवाई और कहा की सभी ब्राह्मणो को रामकथा के लिए आमत्रित किया जाय , राजा ने सबको रामकथा पढने के लिए यथा स्थान बिठा दिया |
एक ब्राह्मण अंगुठा छाप था उसको पढना लिखना कुछ आता नही था , वो ब्राह्मण सबसे पीछे बैठ गया , और सोचा की जब पास वाला पन्ना पलटेगा तब मैं भी पलट दूंगा
काफी देर देखा की पास बैठा व्यक्ति पन्ना नही पलट रहा है, उतने में राजा श्रद्धा पूर्वक सबको नमन करते चक्कर लगाते लगाते उस सज्जन के समीप आने लगे, तो उस ने एक ही रट लगादी की “अब राजा पूछेगा तो क्या कहूँगा
अब राजा पूछेगा तो क्या कहूँगा
उस सज्जन की ये बात सुनकर पास में बैठा व्यक्ति भी रट लगाने लग गया,की “तेरी गति सो मेरी गति तेरी गति सो मेरी गति ,”
उतने में तीसरा व्यक्ति बोला,ये पोल कब तक चलेगी !ये पोल कब तक चलेगी !
चोथा बोला
जबतक चलता है चलने दे ,जब तक चलता है चलने दे,वे चारो अपने सिर निचे किये इस तरह की रट लगाये बैठे है की
1 अब राजा पूछेगा तो क्या कहूँगा..
2 तेरी गति सो मेरी गति..
3 ये पोल कब तक चलेगी..
4 जबतक चलता है चलने दे..
जब राजा ने उन चारो के स्वर सुने , राजा ने पूछा की ये सब क्या गा रहे है, ऐसे प्रसंग तो रामायण में हम ने पहले कभी नही सुना
उतने में, एक महात्मा उठे और बोले महाराज ये सब रामायण का ही प्रसंग बता रहे है ,पहला व्यक्ति है ये बहुत विद्वान है ये , बात सुंमत ने (अयोध्याकाण्ड ) में कही, राम लक्ष्मण सीता जी को वन में छोड़ , घर लोटते है तब ये बात सुंमत कहता है की अब राजा पूछेंगे तो क्या कहूँगा ? अब राजा पूछेंगे तो क्या कहूँगा ?
फिर पूछा की ये दूसरा कहता है की तेरी गति सो मेरी गति , महात्मा बोले महाराज ये तो इनसे भी ज्यादा विद्वान है ,( किष्किन्धाकाण्ड ) में जब हनुमान जी, राम लक्ष्मण जी को अपने दोनों कंधे पर बिठा कर सुग्रीव के पास गए तब ये बात राम जी ने कही थी की , सुग्रीव ! तेरी गति सो मेरी गति , तेरी पत्नी को बाली ने रख लिया और मेरी पत्नी का रावण ने हरण कर लिया..
राजा ने आदर से फिर पूछा,की महात्मा जी!ये तीसरा बोल रहा है की ये पोल कब तक चलेगी , ये बात कभी किसी संत ने नही कही ?बोले महाराज ये तो और भी ज्ञानी है ।,( लंकाकाण्ड ) में अंगद जी ने रावण की भरी सभा में अपना पैर जमाया , तब ये प्रसंग मेधनाथ ने अपने पिता रावन से किया की, पिता श्री ! ये पोल कब तक चलेगी , पहले एक वानर आया और वो हमारी लंका जला कर चला गया , और अब ये कहता है की मेरे पैर को कोई यहाँ से हटा दे तो भगवान श्री राम बिना युद्ध किये वापिस लौट जायेंगे
फिर राजा बोले की ये चौथा बोल रहा है ? वो बोले महाराज ये इतना बड़ा विद्वान है की कोई इनकी बराबरी कर ही नही सकता ,ये मंदोदरी की बात कर रहे है , मंदोदरी ने कई बार रावण से कहा की,स्वामी ! आप जिद्द छोड़, सीता जी को आदर सहित राम जी को सोप दीजिये अन्यथा अनर्थ हो जायगा।तब ये बात रावण ने मंदोदरी से कही की जबतक चलता है चलने दे
मेरे तो दोनों हाथ में लड्डू है ,अगर में राम के हाथो मारा गया तो मेरी मुक्ति हो जाएगी , इस अधम शरीर से भजन -वजन तो कुछ होता नही , और में युद्द जीत गया तो त्रिलोकी में भी मेरी जय जय कार हो जाएगी
राजा इन सब बातो से चकित रह गए बोले की आज हमे ऐसा अद्भुत प्रसंग सूनने को मिला की आज तक हमने नही सुना , राजा इतने प्रसन्न हुए की उस महात्मा से बोले की आप कहे वो दान देने को राजी हूँ
उस महात्मा ने उन अनपढ़ अंगुटा छाप ब्राह्मण्
को अनेको दान दक्षिणा दिलवा दी
यहाँ विशेष ध्यान दे
इन सब बातो का एक ही सार है की कोई अज्ञानी,कोई नास्तिक, कोई कैसा भी क्यों न हो,रामायण , भागवत ,जैसे महान ग्रंथो को श्रद्धा पूर्वक छूने मात्र से ही सब संकटो से मुक्त हो जाते है
और भगवान का सच्चा प्रेमी हो जाये उन की तो बात ही क्या है,मत पूछिये की वे कितने धनी हो जाते है
!!जय जय श्री सीताराम!!

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धर्मशील व्यक्ति ,,,,,,,
जिमि सरिता सागर महँ जाहीं l
जद्यपि ताहि कामना नाहीं ll
तिमि सुख सम्पति बिनहिं बुलाये l
धर्मशील पहँ जाइ सुहाये ll
जैसे सरिता (नदी ) उबड-खाबड़, पथरीले स्थानों को पार करते हुए पूर्ण रूपेण निष्काम भाव से समुद्र में जा मिलती है, उसी प्रकार धर्म-रथ पर आसीन मनुष्य के पास उसके न चाहते हुए भी समस्त सुख-सम्पत्ति, रिद्धियाँ-सिद्धियाँ स्वत: आ जाती हैं, सत्य तो यह है कि वे उसकी दासिता ग्रहण करने के लिए लालायित रहती है !
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गौ सेवा एवं गौ रक्षा ,,,,,,,,
भगवान हंस कहते हैं- हे ब्राह्मणों ! !!! गौओं के शरीर को खुजलाने, उनके शरीर के कीटाणुओं कोदूर करने से मनुष्य अपने समस्त पापों को धो डालता हैं ।
श्लोक ,,,,,,
गवां कण्डूयकान्मत्र्यः सर्वपापं व्यपोहति ।
तासां ग्रास प्रदानेन महत्पुण्यमवाप्नुयात् ।।
(विष्णुधर्मोत्तर पुराण)
अदिति ,,,,,,,
हरे हरे तिनकों पर अमृत-घट छलकाती गौ माता,
जब-जब कृष्ण बजाते मुरली लाड़ लड़ाती गौ माता।
तुम्ही धर्म हो, तुम्ही सत्य हो, पृथ्वी-सा सब सहती हो,
मोक्ष न चाहे ऐसे बंधन में बँधकर तुम रहती हो।
प्यासे जग में सदा दूध की नदी बहाती गौ माता,
जब-जब कृष्ण बजाते मुरली लाड़ लड़ाती गौ माता।।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है, जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है। अत: इस पृथ्वी पर गोमाता मनुष्यों के लिए भगवान का प्रसाद है। भगवान के प्रसादस्वरूप अमृतरूपी गोदुग्ध का पान कर मानव ही नहीं अपितु देवगण भी तृप्त होते हैं। इसीलिए गोदुग्ध को ‘अमृत’ कहा जाता है। गौएं विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का खजाना हैं। सभी देवता गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध का पान करने के लिए गोमाता के शरीर में सदैव निवास करते हैं। ऋग्वेद में गौ को ‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है।
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* अपने आप को गौरवांवित महसूस करें l*
आप भाग्यशाली है कि परलोक से संबंधित ज्ञान ( पवित्र गीता अध्याय १४ वर्णित ” सृष्टि त्रिगुणात्मक == सत्व, रज, तामस ) केवल सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथो में लिपिबद्ध है l दुनिया के और किसी धर्म के पास नहीं है l इस ज्ञान को पाकर आप नरक जाने से बच सकते हैं l आवश्यकता है सात्विक आहार खाने की !
हमारे दो ” पेज” १. देवलोक गौशाला एवं २. देवलोक अग्निहोत्र , जिसपर आपको शास्त्रों का ज्ञान श्लोकों के प्रमाण सहित एवं भावार्थ के साथ गूढ़ार्थ सरल ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता /मिलता है । इसलिए कृपया पेज के कम्युनिटी “Community ” आप्शन पर जाकर अपने सभी मित्रों को पेज के सदस्य बनाने के लिए आमंत्रित ( Invite ) करें , इस नेक कर्म को करके पुण्य के भागी बनें !
बहुत कुछ सीखा और जाना
पर खाक सीखा और जाना
जब, उसी को न जाना,
जिसके पास है जाना
उसे जानने के लिए पढ़े ,,,,,,,
देवलोक गौशाला एवं देवलोक अग्निहोत्र
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” जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !”
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“एक माटी का दिया सारी रात अंधियारे से लड़ता है,
तू तो प्रभु का दिया है फिर किस बात से डरता है…”
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हे मानव तू उठ और सागर (प्रभु ) में विलीन होने के लिए पुरुषार्थ कर ,,,,,
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,,,,सच्चे संतो की वाणी से अमृत बरसता है , आवश्यकता है ,,,उसे आचरण में उतारने की ….
Note ; कृपया पोस्ट के साथ ही देवलोक गौशाला का page भी लाइक करें और हमेशा के लिए सत्संग का लाभ उठाएं ! देवलोक गौशाला सदैव आपको सन्मार्ग दिखाएगी और उस पर चलने के लिए प्रेरित करती रहेगी!
: सर्वदेवमयी यज्ञेश्वरी गौमाता को नमन, जय गौमाता की 🙏👏🌹🌲🌿🌹:
शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है ! चाहो तो इससे ” विभूतिया ” (अच्छाइयां / पुण्य इत्यादि ) अर्जित करलो चाहे घोरतम ” दुर्गति ” ( बुराइया / पाप ) इत्यादि !
परोपकारी बनो एवं प्रभु का सानिध्य प्राप्त करो !
प्रभु हर जीव में चेतना रूप में विद्यमान है अतः प्राणियों से प्रेम करो !
शाकाहार अपनाओ , करुणा को चुनो !
जय गौमाता की 🙏🚩☘️🙏🚩☘️

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ગામડાની_સરળતા બોલે અને

બુદ્ધિ સાંભળે એનું નામ લોકસાહિત્ય!

પદ્મશ્રી ભીખુદાન ગઢવી3 મહિનો પહેલા
ગામડાની સરળતા બોલે અને બુદ્ધિ સાંભળે એનું નામ લોકસાહિત્ય!

લોકોનું હિત જેમાં સમાયેલું હોય એવું સાહિત્ય એટલે લોકસાહિત્ય. જે દુહામાં, જે લોકગીતમાં, જે વાર્તામાં લોકોનું હિત સમાયેલુ હોય એને લોકસાહિત્ય કહેવાય. લોકોમાંથી આવેલું સાહિત્ય એટલે લોકસાહિત્ય. મેઘાણીભાઈને કોઈએ પ્રશ્ન કરેલો કે લોકસાહિત્ય એટલે શું? મેઘાણીભાઈએ જવાબ આપેલો કે અભણ બોલે અને ભણેલા સાંભળે એનું નામ લોકસાહિત્ય. ગામડું બોલે અને નગર સાંભળે, એનું નામ લોકસાહિત્ય. ગામડાંની સરળતા બોલે અને બુદ્ધિ સાંભળે એનું નામ લોકસાહિત્ય. ગામડાંના એક માણસે સરસ વાત કરેલી કે શિવાજી દેશને ખાતર ખપી ગયા અને આપણે શિવાજી બીડી પી પીને ખપી ગયાં. અભણ માણસે કહેલી આ ખૂબ મોટી વાત છે. જે સમજવા જેવી છે. લોકમુખે કહેવાયેલી આવી સરળ છતાં સમજણ ભરેલી વાતો એટલે લોકસાહિત્ય.

કવિવર દુલા કાગ અને ઝવેરચંદ મેઘાણીએ ગામડાંઓ ખુંદી, નેસડાઓમાં ફરી ફરીને ભણેલા અને અભણ માણસો પાસેથી આવી અનેક વાતો મેળવેલી છે. આવા ધૂળધોયા સર્જકોએ ખરા અર્થમાં આપણી સંસ્કૃતિનું જતન કર્યું છે. લોકસાહિત્યની ઘણી વાતો લોક ઉપયોગી અને સમાજ ઉપયોગી છે. જે આપણને જીવન જીવતા શીખવે છે.

દાખલા તરીકે વાત કરું તો આપણે ત્યાં એક કહેવત છે કે એક રુપિયાનો ફેર ભાંગનારા માણસ છે. એ કહેવત પાછળ એક બનેલી ઘટના છે. રાજાશાહીમાં એક કવિ પોતાની ઘોડી વેચવા નીકળેલા. ઘોડી વેચવા જ્યાં જાય ત્યાં કિંમતમાં કંઈકને કંઈક વાંધો પડે. કારણ એ કે કવિએ નક્કી કરેલું કે કોઈ એક હજાર રૂપિયા આપે તો જ આ ઘોડી આપવી. નવસો નવ્વાણુ પણ નહીં. જ્યાં જાય ત્યાં એ ઘોડી ખરીદદાર માણસને ગમે તો એના મિત્રને ન ગમે, મિત્રને ગમે તો જેને લેવી હોય એને ન ગમે, બન્નેને ગમે તો એના કુટુંબને ન ગમે. ઘોડીનો ભાવ ક્યાંક પાંચસોથી અટકે, ક્યાંક સાતસોએ અટકે, કોઈ હજાર રૂપિયા દેવા તૈયાર થાય નહીં. કવિ ઘોડી લઈને ખુબ ફર્યાં. અંતે કોઈ ડાહ્યા માણસે એને સલાહ આપી કે તમે આમ ફરવાનું બંધ કરો અને કોઈ રાજમાં જાવ. કોઈ રાજા જ આની કિંમત આપી શકશે. સામાન્ય માણસ નહીં આપી શકે. કવિ રાજમાં ગયા. રાજમાં પણ એ જ સ્થિતિ થઈ. ઘોડી કોઈ રાજાને ગમે તો દિવાનને ન ગમે, દિવાનને ગમે તો સલાહકાકરને ન ગમે. એક રાજમાં રાજના માણસો ડાયરો ભરીને ઘોડીની કિંમત નક્કી કરવા બેઠાં. સવારથી સાંજ સુધી કિંમતની ચર્ચા ચાલી અને નવસો નવ્વાણુંએ વાત અટકી. રાજાએ બીજા દિવસે ચર્ચા કરવાનું કહી દરબાર બરખાસ્ત કર્યો. રાજાએ કહ્યું કે એક

રૂપિયા માટે કંઈ કવિ ઘોડી લઈને ચાલ્યા નહીં જાય. રાજા રાજમહેલમાં ગયાં. અમીર-ઉમરાવો પોતપોતાના ઘરે અને કવિ પોતાના ઉતારે ગયા. બન્યું એવું કે રાત્રે ઘોડી જ્યાં બાંધી હતી ત્યાં એને કોઈ ઝેરી જનાવર કરડ્યું અને ઘોડી મરી ગઈ. રાજાને પારાવાર અફસોસ થયો. કવિને સમાચાર પહોંચાડવામાં આવ્યા. કવિ રડવા લાગ્યાં. વીસ વર્ષનો દીકરો મર્યો હોય અને બાપ રડે એમ કવિ રડતાં હતા. રડતાં રડતાં જ તેઓ રાજા પાસે પહોંચ્યાં. રાજા અને સલાહકારોએ એમને સાંત્વના આપીને છાના રાખવાનો પ્રયાસ કર્યો. દરબારીઓએ કહ્યું કે રાજા તમને નવી ઘોડી આપશે, તમે છાના રહો, પણ કવિ શાંત થવાનું નામ નહોતા લેતાં. અંતે રાજાએ ઊભા થઈને જાહેરાત કરી કે કવિ તમને જેવી જોઈએ એવી બે ઘોડી આપીશ, પણ તમે શાંત થઈ જાવ. તમને તકલીફ શું છે? તમારે જોઈએ છીએ શું? ત્યારે કવિ જવાબ આપે છે કે ઘોડી મરી ગઈ એનો અફસોસ નથી. એનું હું રોતો પણ નથી. મને રડવું એ વાતનું આવે છે કે તારા રાજમાં એક રૂપિયાનો ફેર ભાંગે એવો એકેય માણસ તે રાખ્યો નથી. મને તારા રાજનું રડવું આવે છે. સમાજમાં આવા ડાહ્યાં માણસો હતા. જેના શાણપણની વાતો આપણને લોકસાહિત્ય શીખવે છે. આવા તો અસંખ્ય પ્રસંગો લોકસાહિત્યમાં છે.

આવો જ એક બીજો પ્રસંગ છે. એક રાજાને એક દિવસ વિચાર આવે છે કે મારા રાજમાં મને સાચુ કહેવાવાળા કેટલાં? કોઈ છે એવું કે જે મને મોઢામોઢ સાચુ કહી શકે કે બાપુ, તમારાથી આ ભૂલ થઈ ગઈ છે. તમારાથી નિર્દોષ માણસ દુભાઈ ગયો છે. આવો વિચાર આવતા રાજાએ પોતાના પંદરેક સલાહકારોને બોલાવ્યા અને એમની પરીક્ષા લેવાનું નક્કી કર્યું. બપોરનો સમય હતો. સૂર્યનારાયણ માથે આવ્યા હતા. બધાંને ભેગા કરીને રાજાએ કહ્યું કે હું સૂર્યનારાયણ તરફ જોઉં છું તો મને એમાં કોઈ ઘોડેસવાર આવતો હોય એવું લાગે છે. પછી વારાફરતી બધાંને પૂછવામાં આવ્યું કે એમને સૂર્યનારાયણમાં શું દેખાય છે? બધાં દરબારી-સલાહકાર એક પછી એક ઊભાં થઈને કહેવા લાગ્યાં કે હા, બાપુ ઘોડેસવાર જ છે. કોઈ કહે કે એનો ભાલો આવો દેખાય છે તો કોઈ કહે કે એણે સાફો બાંધ્યો છે. પહેલો… બીજો… ત્રીજો વારાફરતી બધાં ઘોડેસવારનું જાત જાતનું વર્ણન કરે છે. છેલ્લો વારો જેનો આવ્યો એ અંગરક્ષક હતો. એને પિતાનો પટ્ટો મળેલો એટલે કે નોકરી વારસામાં મળેલી. એણે કહ્યું કે મને સૂર્યનારાયણમાં કંઈ જ દેખાતું નથી. માત્ર સૂર્યનારાયણ જ દેખાય છે. બીજા બધાં કહે છે કે અમને દેખાય છે, બાપુને દેખાય છે, પણ તને નથી દેખાતું? પેલાએ ફરી મક્કમતાથી જવાબ આપ્યો કે મને નથી દેખાતું. દરબારીઓમાંથી કોઈએ કહ્યું કે બાપુ, આ સ્વભાવે જ ઊંધો છે, એ આપણું નહીં માને. બધાંને દેખાય છે અને આને નથી દેખાતું. એક જણાએ કહ્યું કે બાપુ આના પિતાનો સ્વભાવ પણ આવો જ હતો. એ પણ ઊંધું જ બોલતાં. પોતાનું ધાર્યું જ કરતાં. રાજાએ અંગરક્ષકને કહ્યું કે બરાબર જુઓ તમે. મને તો ઘોડેસવાર આવતો દેખાય છે. અંગરક્ષકે કહ્યું કે આ બધાંની ઉંમર થઈ ગઈ છે. મારી આંખો યુવાન છે. મને ચોખ્ખુ દેખાય છે. મને ત્યાં સૂર્યનારાયણ સિવાય કંઈ જ દેખાતું નથી. એટલે ફરી ડાયરામાંથી કોઈએ કહ્યું કે બાપુ અમે કહ્યું જ ને કે આના પિતાનો સ્વભાવ પણ ઊંધો હતો અને આ પણ ઊંધું જ બોલે છે. અંગરક્ષક બોલ્યો કે બાપુ તમારા અનાજ પર જીવું છું. તમે મને નિભાવો છો. હું તમને અસત્ય નહીં કહું. સાચુ જ કહીશ. મને માત્ર સૂર્યનારાયણ જ દેખાય છે. એમાં કશું દેખાતું નથી. ફરીવાર દરબારીઓએ કહ્યું કે આનો સ્વભાવ એના પિતા જેવો જ છે. આ નહીં માને. એટલે અંગરક્ષક બોલી ઉઠ્યો કે બાપુ, આ રહ્યો તમારો પટ્ટો, તમારી નોકરી સંભાળી લ્યો અને મને રજા આપો. પછી રાજા બોલ્યા કે તમે આ પટ્ટો બાંધી લ્યો અને આ તમામના પટ્ટા અત્યારે જ ખેંચી લ્યો. સાચું કહેવાવાળો તું એક જ મળ્યો. આ કોઈ મને સાચું કહેતા નથી. માત્ર હાએ હા જ કરે રાખે છે. લોકજીભે કહેવાયેલી અને કંઠોપકંઠ-કર્ણોપકર્ણ પરંપરાથી સચવાયેલી આવી અનેક વાતો આપણા લોકસાહિત્યમાં સમાયેલી છે. જે આપણને સૌને વફાદારી અને સાચું બોલવાની પ્રેરણા આપે છે.

રસરંગ,Rasrang – Divya Bhaskar

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🌴🌾🍀ગામડાનું સરળ જીવન🌿🌵🌳


આમ તો અમે બે ભાઈઓ ખાતરના ગાડા
ફેરવા વાળી કંપની!!!

પાંત્રીસેક વીઘા જમીન પણ ખેતી માં એવું કે એક વરહ હારુ તો ત્રણ વરહ માઠાં જાય વર્ષો વર્ષ બિયારણ જ લેવું

એટલે હું ગામની ભજન મંડળીમાં જાવ ભગવાન ની ક્રુપા થી બે ચાર ભજન કિર્તન ગાતા આવડતું એટલે આપણી ભગતી હાલી લગન તો હજી કર્યા નોતા કારણે એક તો અભણ અને પાછું હું ભજનીક એટલે કોઈ છોકરી દેખાડે નય…

બસ કોઈ રોકવા કે ટોકવા વાળું નહીં બસ દિવસે ખેતી કરી અને રાત્રે પાછાં ભજન મંડળીમાં પોચી જાવાનું હોય…

પણ થાય એવું કે રાતે ઉજાગરો થાય એટલે સવારે ઊઠા તું નય એટલે ખેતી માં ધ્યાન દેવાય નય પણ થાય શું?

આ વર્ષ ચોમાસામાં માંડવી નું વાવી તો ખરી પણ વાડીએ જાય કોણ પંદર વીસ દિ પછી જ્યારે હું વાડીએ ગ્યો ત્યાં તો હે ય ને તાજરીયો લીલકાય છે ત્યાં તો તાજરીયો પણ કેવાં મંડ્યો કહે
આવો આવો કલાકાર
મે કિધુ કે ઈ તો ઠીક પણ મે માંડવી વાવી તી ઈ ક્યાં ગઈ?

અરે ભજનીક તમે આટલાં બધા ભગતી ભાવ વાળા માણસ કેહવાવ તમારી માંડવી ને અમે કાય ન થવા દય

આ રહી મારે ઓથે મનમાં ને મનમાં હું પણ હસ્યો
એમાં ઈ વર્ષ ઠીક ઠીક ઉપજ થયું
એક સગાએ મારી સગાઈ ની વાત હાંકી હું જોવા ગયો અને હાં નાં હાં કરતા ઈ ગોઠવાય ગ્યું!!!

એ સમયે માણસોમાં બોવ ભોળપણ હતું
ગામમાં નવી વહવારુ આવેલી લાજુ કાઢવાનો રિવાજ હોય એમાં ત્યારે લાઈટુ તો હતી નહિ એટલે દીવા નાં અંજવાળે બધા રહેતા કોઈ સત્યનારાયણ ભગવાનની પ્રસાદ લય ને આવ્યું બધાં ને પ્રસાદ આપી છેલ્લે વહુને પ્રસાદ આપી
બે પડારીયુ મકાન વચ્ચે થાંભલી હતી લાજમાથી હાથ લાંબો કરીને ખોબો ધરીયો પણ થાંભલી વચારે આવી હવે કરવું શું હાથ કાઢવા જાય તો પ્રસાદ ઢોળાય જાય બધાં વીચાર કે હવે કરવું શું
કોઈ એ કહ્યું કે મોભારે ચડો અને થાંભલી કાઢો
એ થાંભલી કાઢી ત્યારે વહુએ પ્રસાદ ખાધી
કોઈ પ્રસાદ લય લધી હોત તો થાંભલી ન કાઢવી પડત પણ ભોળપણુ હતું

પછી મેં એ મંડળી છોડીને નાટક કંપની માં જોડાઈ ગયો
ખેતરમાં ઉભા ઉભા કહું કે એ બલુન જાય પણ બેહવાનો વારો આવ્યો નય
એ સમયે છોકરાવ નો બુસકટ પણ કેવો અઠવાડિયે ધોવે તો પણ એમને એમ બુસકટ ઉભો રહે કારણ કે ઈ મટીરીયલ જ એવું નાકમાં હરખમ ચાલુ જ હોય નાકમાંથી ઈર,શરદી, સરેખમ નીકળે રાખે નાકથી નીચે આવે તો જીભ ખેંચી લ્યે ઉપર નાક ખેંચી લ્યે!!!

બુસકોટનો કોલર નો આખો રંગ બદલાય જાય આજનો યુગ સારો છે કે આજની પેઢી થોડીક ભણી ગણીને નિરિક્ષક બની થોડું વિજ્ઞાન આગળ વધ્યું એટલે આ મટીરીયલ બોહુ ઓછું જોવા મળે છે

શ્રાવણ માસમાં નાટકો ખુબ રમાવા જાય
નાટક કંપનીમાં અમે પંદર વીસ જણ આજુબાજુ ના ગામડા માં જવાનું થાય એટલે એ સમયે મારી પાસે ચોવીસ્યુ સાઇકલ ભાગે ય બોવ કારણ કે ઘરાના દુધ છાસ ખાધેલા અને તાકાત પુરી હતી તણ તણ સવારી રણકાવ્યે જાય તો પણ થાક ન લાગતો!!!

જુદા-જુદા વેશ ભજવતા એમાં મારે પાત્ર ભર્તૃહરિ નું હતું પોશાક પહેરવાં માટે જુદી જુદી મંડળી માંથી માગી લાવતા એક વખત બાજુના ગામમાં બીજા મંડળીઓ વારા નું હતું એનો નાયકે અમારી મંડળી વાળાઓને આમંત્રણ આપ્યું કે તમે બધા આવો રાજા ભર્તૃહરિ નું પાત્રો કેમ ભજવાય તે જોવું હોય તો
એ મંડળી તરફથી બોવ આમંત્રણ હતું એટલે અમે બધા ગયાં જોવા માટે
એ ગામમાં જે રાજા ભર્તૃહરિ નું પાત્ર ભજવે તેનાં સાસરાનુ ગામ હતું!!!

અમારો ઉતારો એનાં સસરાના ઘરે હતો અમે બધા તો એનાં સસરાની ઘરે ખાટલે બેઠાં હતાં રાત નાં આઠ થવા આવ્યા એટલે મેં કીધું કે હાલો હવે પળમાં જાય નહીતર પછી ગામ લોકો બધા સુય જાશે!!!

એટલે પેલાં વ્યક્તિ એ એનાં સસરાને કીધું કે બાપુજી તમે પણ આવજો જોવા માટે બોવ તાણ કરી એટલે એના સસરાએ કીધુ કે રહેવા દો જમાય મારા થી બેહાય નહીં
એટલે રહેવા દો

નાના બાપુજી તમે આવો હું તમારા માટે ખુરશી ની વ્યવસ્થા કરી આપીશ હું આ મંડળી નો નાયક છું,

મે કિધુ કે આવો આવો મજા આવશે
બોવ મથામણ પછી એ આવવા રાજી થયા
અમે બધા ઉભા થયને ગામને ચોરે આવવા માટે હલતા થાય…

એ મંડળી વાળા બધા ચોરા ઉપર મેક-અપ કરવા ગ્યાં અને અમારૂં ટોળુ નીચે આગળની લાઇનમાં બેસવા માટે વ્યવસ્થા કરી હતી કારણ કે એમને અમન દેખાડવું હતું કે કેમ પાત્રો ભજવાય…

એક જણ આવ્યો ટુટેલો તેલનો ડબ્બો લય ને
કારણકે સારો ડબ્બો કોઈ આપે નહિ
એક પતરાની ખુરશી મુકી…

ઘડીક ડબ્બો વગાડ્યો એટલે ગામનાં ચોરાના પગથિયાં પરથી ટક-ટક-ટક-ટક કરતા રાજા ભર્તૃહરિ નીચે ઉતરે પળમાં આવી ને હેનટર પછાડી ને એ પતરાની ખુરશી પર બેઠા એટલામાં પ્રધાનજી ને ઈશારો કર્યો
કે ઉભા થાવ…

કઠણાઈ ઈ હતી જે પ્રધાન બને એ હાજર નહીં એટલે બીજા ને પ્રધાનનું પાત્ર આપ્યું હતું એ થોડક હાજો-માદો એટલે આવાજ બાઈ માણસ જેવો પ્રધાનજી હાથમાં માઇક લયને ઉભાં થયાં એટલે માઇકમાં કીધુ એ જુવો આપણાં આ મહારાજ રાજા ભર્તૃહરિ આપને કહે છે કે એમનાં રાજમાં છે કોઈ દુખી
હોય તો કહી દો…

આ બાજુ ફરીને કીધુ છે કોઈ દુખી
બીજી બાજુ ફરીને કીધુ કે છે કોઈ દુખી
કોણ બોલે
એટલે કોઈ ન બોલીયુ એટલે હરવેક થી કીધુ કે છેલ્લી વાર પુછો ફરી પ્રધાનજી એ કીધું કે છે કોઈ દુખી તો કોઈ ન બોલ્યું કોણ બોલે આમાં

એટલે અમને દેખાડવા માટે પ્રધાનજને કીધુ કે બેસી જાવ
પોતે માઇક હાથમાં લયને પતરાની ખુરશી પર જોરથી પગ પછાડીને હુકમ કર્યો
હું કોણ બાણું લાખ માળવાનો ધણી મારાં નગરમાં કોઈ દુખ હોય એ હું જોય ન શકું
છે કોઈ દુખી કે, છે કોઈ દુખી, છે કોઈ દુખી
એટલામાં તો એનાં સસરાનો મગજ ફાટ્યું અને હાથ ઉંચા કરીને કીધુ મહારાજ હું દુખી છું…

ત્યાં તો આને પરસેવો છૂટી ગયો અરર આ ખોટું થયું બાપુજી ક્યાં વચારે બોલ્યા હવે થાય શું
એટલે હવે થુકેલુ ગળાય નહીં ભારે કરી બાપુજીએ
એટલે મેં કીધું કે બાપુજી આ નાટક છે એટલે તમારાં જમાય બોલ્યા
જમાય હોય તો શું એક વાર બોલય બે વાર બોલય…

ઘળીએ વળીએ શું મંડાય પડ્યો છે
ત્યાં તો માઇક માંથી ફરી અવાજ આવ્યો કે બોલો નગરજનો કંઈ વાત પર શું દુખી છોવો
એટલે એના સસરાએ કહ્યું આ નગરમાં બે વ્યક્તિઓ દુખી છે
એક તો મારી વેવાણ દુખી છે
બીજું મારી દીકરી દુખી છે
પછી મેં એનાં સસરાને સમજાવ્યું કે
આ નાટક છે….

તમે એને કેવી મુંજવણમાં નાખો છો
બધાં છુટા પડ્યા
પછી મેં આ નાટકો રમવાનાં બંધ કરીને ભગવાનની કૃપા થકી બે ચાર ભજન કરતા આવળુયુ એટલે દેશ વિદેશમાં ફરવાનું થયુ અને બલુનમા બેઠાં બાકી આમ તો ખાતરના ગાડા ફેરવા વાળી કંપની

કોણે કીધું ગરીબ છીએ ? કોણે કીધું રાંક ?
કાં ભૂલી જા મન રે ભોળા ! આપણા જુદા આંક.

થોડાક નથી સિક્કા પાસે,..થોડીક નથી નોટ,
એમાં તે શું બગડી ગયું ? એમાં તે શી ખોટ ?

ઉપરવાળી બેંક બેઠી છે. આપણી માલામાલ,
આજનું ખાણું આજ આપે ને. કાલની વાતો કાલ.

ધૂળિયે મારગ કૈંક મળે જો આપણા જેવો સાથ,
સુખદુઃખોની વારતા કે’તા ..બાથમાં ભીડી બાથ.

ખુલ્લાં ખેતર અડખે પડખે…માથે નીલું આભ,
વચ્ચે નાનું ગામડું બેઠું…ક્યાં છે આવો લાભ ?

સોનાની તો સાંકડી ગલી,…હેતું ગણતું હેત,
દોઢિયાં માટે દોડતાં એમાં જીવતાં જોને પ્રેત !

માનવી ભાળી અમથું અમથું આપણું ફોરે વ્હાલ;
નોટ ને સિક્કા નાખ નદીમાં, ધૂળિયે મારગ ચાલ !

~ મકરંદ દવે.

ભીખાભાઈ વડાળા વાળાની મુખેથી
સાંભળેલ વાત પર થી

✍️: ટાઈપીંગ કણબી ની કટારી એથી
(જયંતિ પટેલ)

તસ્વીરો પ્રતિકારક છે

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शुभ प्रभात


एक अती सुन्दर महिला ने विमान में प्रवेश किया और अपनी सीट की तलाश में नजरें घुमाईं।

उसने देखा कि उसकी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में है। जिसके दोनों ही हाथ नहीं है।

महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में झिझक हुई।

उस ‘सुंदर’ महिला ने एयरहोस्टेस से बोला “मै इस सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पाऊँगी।

क्योंकि साथ की सीट पर जो व्यक्ति बैठा हुआ है उसके दोनों हाथ नहीं हैं।

” उस सुन्दर महिला ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया।

असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, “मैम क्या मुझे कारण बता सकती है..?”

‘सुंदर’ महिला ने जवाब दिया “मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। मैं ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर यात्रा नहीं कर पाउंगी।”

दिखने में पढी लिखी और विनम्र प्रतीत होने वाली महिला की यह बात सुनकर एयरहोस्टेस अचंभित हो गई।

महिला ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा कि “मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती। अतः मुझे कोई दूसरी सीट दे दी जाए।”

एयरहोस्टेस ने खाली सीट की तलाश में चारों ओर नजर घुमाई, पर कोई भी सीट खाली नहीं दिखी।

एयरहोस्टेस ने महिला से कहा कि “मैडम इस इकोनोमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है, किन्तु यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व है।

अतः मैं विमान के कप्तान से बात करती हूँ। कृपया तब तक थोडा धैर्य रखें।” ऐसा कहकर होस्टेस कप्तान से बात करने चली गई।

कुछ समय बाद लोटने के बाद उसने महिला को बताया, “मैडम! आपको जो असुविधा हुई, उसके लिए बहुत खेद है |

इस पूरे विमान में, केवल एक सीट खाली है और वह प्रथम श्रेणी में है। मैंने हमारी टीम से बात की और हमने एक असाधारण निर्णय लिया। एक यात्री को इकोनॉमी क्लास से प्रथम श्रेणी में भेजने का कार्य हमारी कंपनी के इतिहास में पहली बार हो रहा है।”

‘सुंदर’ महिला अत्यंत प्रसन्न हो गई, किन्तु इसके पहले कि वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती और एक शब्द भी बोल पाती…

एयरहोस्टेस उस अपाहिज और दोनों हाथ विहीन व्यक्ति की ओर बढ़ गई और विनम्रता पूर्वक उनसे पूछा

“सर, क्या आप प्रथम श्रेणी में जा सकेंगे..? क्योंकि हम नहीं चाहते कि आप एक अशिष्ट यात्री के साथ यात्रा कर के परेशान हों।

यह बात सुनकर सभी यात्रियों ने ताली बजाकर इस निर्णय का स्वागत किया। वह अति सुन्दर दिखने वाली महिला तो अब शर्म से नजरें ही नहीं उठा पा रही थी।

तब उस अपाहिज व्यक्ति ने खड़े होकर कहा,

“मैं एक भूतपूर्व सैनिक हूँ। और मैंने एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर सीमा पर हुए बम विस्फोट में अपने दोनों हाथ खोये थे।

सबसे पहले, जब मैंने इन देवी जी की चर्चा सुनी, तब मैं सोच रहा था। की मैंने भी किन लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली और अपने हाथ खोये..?

लेकिन जब आप सभी की प्रतिक्रिया देखी तो अब अपने आप पर गर्व हो रहा है कि मैंने अपने देश और देशवासियों के लिए अपने दोनों हाथ खोये।”

और इतना कह कर, वह प्रथम श्रेणी में चले गए।

‘सुंदर’ महिला पूरी तरह से अपमानित होकर सर झुकाए सीट पर बैठ गई।

अगर विचारों में उदारता नहीं है तो ऐसी सुंदरता का कोई मूल्य नहीं है।

🇮🇳🇮🇳🙏🏻जय हिन्द🙏🇮🇳🇮🇳

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🌹,,,पढोगे तो रो पड़ोगे,,,🌹

जीवन के 20 साल हवा की तरह उड़ गए । फिर शुरू हुई नोकरी की खोज । ये नहीं वो, दूर नहीं पास । ऐसा करते करते 2, 3 नोकरियाँ छोड़ने के बाद एक तय हुई। थोड़ी स्थिरता की शुरुआत हुई।

फिर हाथ आया पहली तनख्वाह का चेक। वह बैंक में जमा हुआ और शुरू हुआ अकाउंट में जमा होने वाले शून्यों का अंतहीन खेल। 2- 3 वर्ष और निकल गए। बैंक में थोड़े और शून्य बढ़ गए। उम्र 25 हो गयी।

और फिर विवाह हो गया। जीवन की राम कहानी शुरू हो गयी। शुरू के एक 2 साल नर्म, गुलाबी, रसीले, सपनीले गुजरे । हाथो में हाथ डालकर घूमना फिरना, रंग बिरंगे सपने। पर ये दिन जल्दी ही उड़ गए।

और फिर बच्चे के आने ही आहट हुई। वर्ष भर में पालना झूलने लगा। अब सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया। उठना बैठना खाना पीना लाड दुलार ।

समय कैसे फटाफट निकल गया, पता ही नहीं चला।
इस बीच कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया, बाते करना घूमना फिरना कब बंद हो गया दोनों को पता ही न चला।

बच्चा बड़ा होता गया। वो बच्चे में व्यस्त हो गयी, मैं अपने काम में । घर और गाडी की क़िस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शुन्य बढाने की चिंता। उसने भी अपने आप काम में पूरी तरह झोंक दिया और मेने भी

इतने में मैं 35 का हो गया। घर, गाडी, बैंक में शुन्य, परिवार सब है फिर भी कुछ कमी है ? पर वो है क्या समझ नहीं आया। उसकी चिड चिड बढती गयी, मैं उदासीन होने लगा।

इस बीच दिन बीतते गए। समय गुजरता गया। बच्चा बड़ा होता गया। उसका खुद का संसार तैयार होता गया। कब 10वि आई और चली गयी पता ही नहीं चला। तब तक दोनों ही चालीस बयालीस के हो गए। बैंक में शुन्य बढ़ता ही गया।

एक नितांत एकांत क्षण में मुझे वो गुजरे दिन याद आये और मौका देख कर उस से कहा ” अरे जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कही घूम के आते हैं।”

उसने अजीब नजरो से मुझे देखा और कहा कि “तुम्हे कुछ भी सूझता है यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है तुम्हे बातो की सूझ रही है ।”
कमर में पल्लू खोंस वो निकल गयी।

तो फिर आया पैंतालिसवा साल, आँखों पर चश्मा लग गया, बाल काला रंग छोड़ने लगे, दिमाग में कुछ उलझने शुरू हो गयी।

बेटा उधर कॉलेज में था, इधर बैंक में शुन्य बढ़ रहे थे। देखते ही देखते उसका कॉलेज ख़त्म। वह अपने पैरो पे खड़ा हो गया। उसके पंख फूटे और उड़ गया परदेश।

उसके बालो का काला रंग भी उड़ने लगा। कभी कभी दिमाग साथ छोड़ने लगा। उसे चश्मा भी लग गया। मैं खुद बुढा हो गया। वो भी उमरदराज लगने लगी।

दोनों पचपन से साठ की और बढ़ने लगे। बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं। बाहर आने जाने के कार्यक्रम बंद होने लगे।

अब तो गोली दवाइयों के दिन और समय निश्चित होने लगे। बच्चे बड़े होंगे तब हम साथ रहेंगे सोच कर लिया गया घर अब बोझ लगने लगा। बच्चे कब वापिस आयेंगे यही सोचते सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे।

एक दिन यूँ ही सोफे पे बेठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वो दिया बाती कर रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। लपक के फोन उठाया। दूसरी तरफ बेटा था। जिसने कहा कि उसने शादी कर ली और अब परदेश में ही रहेगा।

उसने ये भी कहा कि पिताजी आपके बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना। और आप भी वही रह लेना। कुछ और ओपचारिक बाते कह कर बेटे ने फोन रख दिया।

मैं पुन: सोफे पर आकर बेठ गया। उसकी भी दिया बाती ख़त्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी “चलो आज फिर हाथो में हाथ लेके बात करते हैं “
वो तुरंत बोली ” अभी आई”।

मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा ख़ुशी से चमक उठा।आँखे भर आई। आँखों से आंसू गिरने लगे और गाल भीग गए । अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गयी और मैं निस्तेज हो गया। हमेशा के लिए !!

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आके बैठ गयी “बोलो क्या बोल रहे थे?”

लेकिन मेने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छू कर देखा। शरीर बिलकुल ठंडा पड गया था। मैं उसकी और एकटक देख रहा था।

क्षण भर को वो शून्य हो गयी।
“क्या करू ? “

उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक दो मिनट में ही वो चेतन्य हो गयी। धीरे से उठी पूजा घर में गयी। एक अगरबत्ती की। इश्वर को प्रणाम किया। और फिर से आके सोफे पे बैठ गयी।

मेरा ठंडा हाथ अपने हाथो में लिया और बोली
“चलो कहाँ घुमने चलना है तुम्हे ? क्या बातें करनी हैं तुम्हे ?” बोलो !!

ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई !!……
वो एकटक मुझे देखती रही। आँखों से अश्रु धारा बह निकली। मेरा सर उसके कंधो पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था।

 *क्या ये ही जिन्दगी है ??????* 

मै पूछता हूँ क्या ये ही जिन्दगी है ?
नही, नही, कभी नहीं ??

सब अपना नसीब साथ लेके आते हैं इसलिए कुछ समय अपने लिए भी निकालो । जीवन अपना है तो जीने के तरीके भी अपने रखो। शुरुआत आज से करो। क्यूंकि कल कभी नहीं आएगा,,,

अपने दोस्तों और रिश्तेदार तक जरूर शेयर करना!
🌹🙏🏻जय श्री जिनेन्द्र🙏🏻🌹
❤️पवन जैन❤️

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एक बार मैं अपने अंकल के साथ बैंक में गया,क्यूँकि उन्हें कुछ पैसा कहीं ट्रान्सफ़र करना था।

ये स्टेट बैंक एक छोटे से क़स्बे के छोटे से इलाक़े में था। वहां एक घंटा बिताने के बाद जब हम वहां से निकले तो उन्हें पूछने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाया।

अंकल क्यूँ ना हम घर पर ही इंटर्नेट बैंकिंग चालू कर लें❓

अंकल ने कहा:- ऐसा मैं क्यूँ करूं❓

तो मैंने कहा:- अब छोटे छोटे ट्रा०सफ़र के लिए बैंक आने की और एक घंटा टाइम ख़राब करने की ज़रूरतनहीं और आप जब चाहे तब घर बैठे अपनी ऑनलाइन शॉपिंग भी कर सकते हैं……
हर चीज़ बहुत आसान हो जाएगी। मैं बहुत उत्सुक था उन्हें नेट बैंकिंग की दुनिया के बारे में विस्तार से बताने के लिए….

इस पर उन्होंने पूछा:-
अगर मैं ऐसा करताहूं तो क्या मुझे घर से बाहर निकलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी ❓

मुझे बैंक जाने की भी ज़रूरत नहीं?

मैंने उत्सुकतावश कहा:- हां, आपको कहीं जाने की जरुरत नही पड़ेगी और आपको किराने का सामान भी घर बैठे ही डिलिवर हो जाएगा,ऐमज़ॉन, फ़्लिपकॉर्ट व स्नैपडील सब कुछ घर पे ही डिलिवरी करते हैं…..

उन्होने इस बात पे जो जवाब मुझे दिया उसने मेरी बोलती बंद कर दी….

उन्होंने कहा:- आज सुबह जब से मैं इस बैंक में आयामैं अपने चार मित्रों से मिला और मैंने उन कर्मचारियों से बातें भी की जो मुझे जानते हैं…..

मेरे बच्चे दूसरे शहर में नौकरी करते हैं और कभी कभार ही मुझसे मिलने आते जाते हैं…
लेकिन आज ये वो लोग हैं जिनका साथ मुझे चाहिए। मैं अपने आप को तैयार कर के बैंक में आना पसंद करता हुं,यहां जो अपनापन मुझे मिलता है उसके लिए ही मैं वक़्त निकालता हूं….

दो साल पहले की बात है मैं बहुत बीमार हो गया था,जिस मोबाइल दुकानदार से मैं रीचार्ज करवाता हूं,वो मुझे देखने आया और मेरे पास बैठ कर मुझसे सहानुभूति जताई और उसने मुझसे कहा कि मैं आपकी किसी भी तरह की मदद के लिए तैयार हूं….

वो आदमी जो हर महीने मेरे घर आकर मेरे यूटिलिटी बिल्स ले जाकर ख़ुद से भर आता था, जिसके बदले मैं उसे थोड़े बहुत पैसे दे देता था उस आदमी के लिए कमाई का यही एक ज़रिया था और उसे ख़ुद को रिटायरमेंट के बाद व्यस्त रखने का तरीक़ा भी !

कुछ दिन पहले मोर्निंग वॉक करते वक़्त अचानक मेरी पत्नी गिर पड़ी, मेरे किराने वाले दुकानदार की नज़र उस पर गई,उसने तुरंत अपनी कार में डाल कर उसको घर पहुंचाया क्यूँकि वो जानता था कि वो कहां रहती है….

अगर सारी चीज़ें ऑन लाइन ही हो गई तो मानवता, अपनापन, रिश्ते नाते सब ख़त्म ही नही हो जाएंगे !😎

मैं हर वस्तु अपने घर पर ही क्यूँ मंगाऊं ?❓😎

मैं अपने आपको सिर्फ़ अपने कम्प्यूटर से ही बातें करने में क्यूँ झोंकूं❓😎

मैं उन लोगों को जानना चाहता हूं जिनके साथ मेरा लेन-देन का व्यवहार है,जो कि मेरी निगाहों में सिर्फ़ दुकानदार नहीं हैं…. 😎
इससे हमारे बीच एक रिश्ता, एक बन्धन क़ायम होता है !

क्या ऐमज़ॉन, फ़्लिपकॉर्ट या स्नैपडील ये रिश्ते-नाते , प्यार,अपनापन भी दे पाएंगे❓😎

फिर उन्होने बड़े पते की एक बात कही जो मुझे बहुत ही विचारणीय लगी, आशा है आप भी इस पर चिंतन करेंगे……..
उन्होने कहा:-
ये घर बैठे सामान मंगवाने की सुविधा देने वाला व्यापार उन देशों मे फलता फूलता है जहां आबादी कमहै और लेबर काफी मंहगी है….

भारत जैसे 130 करोड़ की आबादी वाले गरीब एंव मध्यम वर्गीय बहुल देश मे इन सुविधाओं को बढ़ावा देना आज तो नया होने के कारण अच्छा लग सकता है लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव बहुत ज्यादा नुकसानदायक होंगे……….

देश मे 80% जो व्यापार छोटे छोटे दुकानदार गली मोहल्लों मे कर रहे हैं वे सब बंद हो जाएंगे और बेरोजगारी अपने चरम सीमा पर पहुंच जाएगी…
तो अधिकतर व्यापार कुछ गिने चुने लोगों के हाथों मे चला जाएगा…….
हमारी आदतें ख़राब और शरीर इतना आलसी हो जाएगा कि बाहर जाकर कुछ खरीदने का मन नहीं करेगा… 😎

जब ज्यादातर धंधे व् दुकानें ही बंद हो जाएंगी तो रेट कहां से टकराएंगे❓😎
तब ये ही कंपनियां जो अभी सस्ता माल दे रही है वो ही फिर मनमानी किम्मत हमसे वसूल करेंगी। हमें मजबूर होकर सब कुछ ओनलाइन पर ही खरीदना पड़ेगा और ज्यादातर जनता बेकारी की ओर अग्रसर हो जाएगी।

मैं उनको क्या जबाब दूं….❓ये नही समझ पाया,…..
🙏🙏

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐हवन कुंड💐💐

पंडित जी द्वारा करवाई जाने वाली पूजा में बैठ तो जाते हैं लेकिन सोच हमारी ही रहती है….

पंडितजी ने सबको  हवन में शामिल होने के लिए बुलाया।

 सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई

पंडितजी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा ।”

लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते..

गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई ।

हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए… 
गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे ।

उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए ।
मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई….

सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई ।
“घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था ।”
हवन पूरा होने के बाद पंडितजी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे अग्नि में डाल दें ।

गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें ।
एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई । 

सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया,पूरा घर धुंए से भर गया ।

 वहां बैठना मुश्किल हो गया, एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए।अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था ।

काफी देर तक इंतज़ार करना पड़ा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में ।
……कहानी यहीं रुक जाती है ।

उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है ।

पर सभी ने उसे बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी या खत्म न हो जाए ?

ऐसा ही हम करते हैं ।

यही हमारी फितरत है ।

हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं ।

जो अंत मे जमीन जायदाद और बैंक बैलेंस के रूप में यहीं पड़ा रह जाता है।

ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है ।

हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि यह भी भूल जाते है कि सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले ही है, उसे बचा कर क्या करना । बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही होना है !!

“संसार” हवन कुंड है और “जीवन” पूजा ।

एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है ।

अच्छी पूजा वही है, जिसमें…

“हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो” न सामग्री खत्म हो ! न बची रह जाए !! 

यही है जीवन का प्रबन्धन करना !!!

“सपनो के चक्कर में जीना भूल जाना अच्छा नहीं है…..

आखिर में यह मायने नहीं रखता कि हमने जिन्दगी में कितनी सांसें ली, बल्कि यह मायने रखता है कि हमने उन सांसों में कितनी जिन्दगी जी है..!

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏