Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार संत सूरदास को किसी ने भजन के लिए आमंत्रित किया..भजन कार्यक्रम के बाद उस व्यक्ति को सूरदास जी को अपने घर तक पहुँचाने का ध्यान नही रहा और वह अन्य अतिथियों की सेवा में व्यस्त हो गया।सूरदास जी ने भी उसे तकलीफ नहीं देना चाहा और खुद लाठी लेकर ,”गोविंद–गोविंद” करते हुये अंधेरी रात मे पैदल घर की ओर निकल पड़े । रास्ते मे एक कुआं पड़ता था । वे लाठी से टटोलते–टटोलते भगवान का नाम लेते हुये बढ़ रहे थे और उनके पांव और कुएं के बीच मात्र कुछ इंच की दूरी रह गई थी कि…..उन्हे लगा कि किसी ने उनकी लाठी पकड़ ली है,
तब उन्होने पूछा -” तुम कौन हो ?” उत्तर मिला – “बाबा, मैं एक बालक हूँ । मैं भी आपका भजन सुन कर लौट रहा हूँ । देखा कि आप गलत रास्ते जा रहे हैं, इसलिए मैं इधर आ गया । चलिये, आपको घर तक छोड़ दूँ…!”

सूररदास ने पूछा- “तुम्हारा नाम क्या है बेटा ?”

“बाबा, अभी तक माँ ने मेरा नाम नहीं रखा है।‘’

“तब मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ ?”
“कोई भी नाम चलेगा बाबा…!”

सूरदास ने रास्ते में और कई सवाल पूछे। उन्हें लगा कि हो न हो, यह कन्हैया ही है!वे समझ गए कि आज गोपाल खुद मेरे पास आए हैं । क्यो नहीं मैं इनका हाथ पकड़ लूँ ?यह सोच उन्होने अपना हाथ उस लकड़ी पर कृष्ण की ओर बढ़ाने लगे ।
भगवान कृष्ण उनकी यह चाल समझ गए ।सूरदास का हाथ धीरे–धीरे आगे बढ़ रहा था । जब केवल चार अंगुल अंतर रह गया, तब श्री कृष्ण लाठी को छोड़ दूर चले गए । जैसे उन्होने लाठी छोड़ी, सूरदास विह्वल हो गए, आंखो से अश्रुधारा बह निकली ।

बोले – “मैं अंधा हूँ ,ऐसे अंधे की लाठी छोड़ कर चले जाना क्या कन्हैया तुम्हारी बहादुरी है ?”

और.. उनके श्रीमुख से वेदना के यह स्वर निकल पड़े

“हाथ छुड़ाये जात हो, निर्बल जानि के मोय ।
हृदय से जब जाओगे, तो सबल जानूँगा तोय ।।”

मुझे निर्बल जानकार मेरा हाथ छुड़ा कर जाते हो, पर मेरे हृदय से जाओ तो मैं तुम्हें मर्द कहूँ ।

भगवान कृष्ण ने कहा,”बाबा, अगर मैं ऐसे भक्तों के हृदय से चला जाऊं तो फिर मैं कहाँ रहूँ ??”

भज गोविंदम्… !!जय श्री राधेगोविंद!!

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🙏मैं का त्याग 🙏
सत्यनारायण भगवान की कथा में से एक 🙏
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एक राजा ने परमात्मा को खोजना चाहा। वह किसी आश्रम में गया।
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उस आश्रम के प्रधान साधु ने कहा, ”जो तुम्हारे पास है, उसे छोड़ दो। परमात्मा को पाना तो बहुत सरल है।”
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वह राजा सब कुछ छोड़ कर पहुंचा। उसने राज्य का परित्याग कर दिया और सारी संपत्ति दरिद्रों को बांट दी। वह बिलकुल भिखारी होकर आया था।
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लेकिन, साधु ने उसे देखते ही कहा, ”मित्र, सभी कुछ साथ ले आये हो ?” राजा कुछ भी समझा नहीं सका।
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साधु ने आश्रम के सारे कूड़ा-करकट फेंकने का काम उसे सौंपा।
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आश्रमवासियों को यह बहुत कठोर प्रतीत हुआ, लेकिन साधु बोला, ”सत्य को पाने के लिए वह अभी तैयार नहीं है और तैयार होना तो बहुत आवश्यक है!”
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कुछ दिनों बाद आश्रमवासियों द्वारा राजा को उस कठोर कार्य से मुक्ति दिलाने की पुन: प्रार्थना करने पर प्रधान ने कहा, ”परीक्षा ले लें।”
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फिर दूसरे दिन जब राजा कचरे की टोकरी सिर पर लेकर गांव के बाहर फेंकने जा रहा था, तो कोई व्यक्ति राह में उससे टकरा गया।
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राजा ने टकराने वाले से कहा, ”महानुभाव! पन्द्रह दिन पहले आप इतने अंधे नहीं हो सकते थे!”
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साधु ने यह प्रतिक्रिया जानकर कहा, ”क्या मैंने नहीं कहा था कि अभी समय नहीं आया है! वह अभी भी वही है!”
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कुछ दिन बाद पुन: कोई राजा से टकरा गया।
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इस बार राजा ने आंख उठाकर उसे देखा भर, कहा कुछ भी नहीं। किंतु आंखों ने भी जो कहना था, कह ही दिया।
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साधु ने सुना तो वह बोला, ”संपत्ति को छोड़ना कितना आसान, स्वयं को छोड़ना कितना कठिन है!”
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फिर तीसरी बार वही घटना हुई। राजा ने राह पर बिखर गये कचरे को इकट्ठा किया और अपने मार्ग पर चल गया, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो!
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उस दिन वह साधु बोला, ”वह अब तैयार है। जो मिटने को राजी हो, वही प्रभु को पाने का अधिकारी होता है।”
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सत्य की आकांक्षा है, तो स्वयं को छोड़ दो। ‘मैं’ से बड़ा और कोई असत्य नहीं।
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उसे छोड़ना ही संन्यास है। क्योंकि, वस्तुत: मैं-भाव ही संसार है।

!! बोलिये सत्यनारायण भगवान की जय !!🙏🙏।

महेंद्र वर्षने

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  • शुभ प्रभात*
    •❁ धन, बहुत ज़रूरी है ❁•
    👇 लेकिन 👇
    ︶︸︶︸︶︸︶︸︶︸︶
    किसी गाँव में …
    एक धनी सेठ रहता था.
    उसके बंगले के पास
    एक जूते सिलने वाले
    गरीब मोची की
    छोटी सी दुकान थी.

उस मोची की एक खास आदत थी, कि
वो जब भी जूते सिलता, तो
भगवान के भजन गुनगुनाता रहता था,
लेकिन … सेठ ने कभी
उसके भजनों की तरफ
ध्यान नहीं दिया.

   एक दिन सेठ की तबीयत 
 बहुत ख़राब हो गयी, लेकिन 

पैसे की कोई कमी तो थी नहीं, सो
शहर से डॉक्टर, वैद्य, हकीमों को
बुलाया गया. लेकिन कोई भी सेठ की
बीमारी का इलाज नहीं कर सका.

अब सेठ की तबीयत दिन प्रतिदिन
      ख़राब होती जा रही थी.
 वह चल फिर भी नहीं पाता था.

   एक दिन वह घर में लेटा

था.
अचानक उसके कान में मोची के
भजन गाने की आवाज सुनाई दी,
आज मोची के भजन, सेठ को
कुछ अच्छे लग लग रहे थे.

     कुछ ही देर में सेठ 
       इतना मंत्रमुग्ध हो गया, कि 
        उसे ऐसा लगा जैसे 
          वो साक्षात परमात्मा से 
             मिलन कर रहा हो.

   मोची के भजन सेठ को 

उसकी बीमारी से दूर ले जा रहे थे.
कुछ देर के लिए सेठ भूल गया, कि
★ वह बीमार है. ★
उसे अपार आनंद की प्राप्ति हुई.

कुछ दिन यही सिलसिला चलता रहा.
अब धीरे-धीरे सेठ के स्वास्थ्य में
सुधार आने लगा.

एक दिन उसने मोची को बुलाया, और
कहा ~ मेरी बीमारी का इलाज
बड़े-बड़े डॉक्टर नहीं कर पाये,
लेकिन …. तुम्हारे भजन ने
मेरा स्वास्थ्य सुधार दिया.
ये लो 1000 रुपये इनाम.
मोची खुशी-खुशी
पैसे लेकर चला गया.

  लेकिन ... उस रात मोची को 
      बिल्कुल नींद नहीं आई.
वो सारी रात यही सोचता रहा, कि 

इतने सारे पैसों को कहाँ छुपा कर रखूँ,
और … इनसे क्या-क्या खरीदना है ?

      इसी सोच की वजह से वो 
  इतना परेशान हुआ, कि अगले दिन 
        काम पर भी नहीं जा पाया.
         अब भजन गाना तो जैसे 
      ◆  वो भूल ही गया था. ◆
      मन में खुशी जो थी ... पैसे की.

   अब तो उसने काम पर जाना ही 
  बंद कर दिया, और धीरे-धीरे उसकी 
     दुकानदारी भी चौपट होने लगी.
            इधर सेठ की बीमारी ...
          फिर से बढ़ती जा रही थी.

एक दिन मोची सेठ के बंगले में आया,
और बोला ~ सेठ जी .. आप अपने
★ ये पैसे वापस रख लीजिये. ★
इस धन की वजह से
मेरा धंधा चौपट हो गया,
मैं भजन गाना ही भूल गया.
इस धन ने तो मेरा परमात्मा से
नाता ही तुड़वा दिया.

          मोची पैसे वापस करके 
     फिर से अपने काम में लग गया.

   ─⊱━━━━⊱⊰━━━━━⊰─

 मित्रों ! ये एक कहानी मात्र नहीं है,
          ये एक सीख है, कि ~ 
      किस तरह पैसों का लालच 
    हमको अपनों से दूर ले जाता है. 
       हम भूल जाते हैं , कि ...
         कोई ऐसी शक्ति भी है 
            जिसने हमें बनाया है.

      आज के माहौल में ये सब 
 कुछ ज्यादा ही देखने को मिलता है.
     📍 लोग 24 घंटे सिर्फ 📍
       जॉब की बात करते हैं,
      बिज़नेस की बात करते हैं, 
         पैसों की बात करते हैं.

      ❗  हालांकि  ❗
  धन, जीवन यापन के लिए
    बहुत जरुरी है. लेकिन ...
           उसके लिए
अपने अस्तित्व को भूल जाना
         मूर्खता ही है.

अपने दोस्तों और रिश्तेदार तक जरूर शेयर करना!
🌹🙏🏻जय श्री जिनेन्द्र🙏🏻🌹
❤️पवन जैन❤️

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जयचंद की गद्दारी के कारन सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सेना गौरी से हार चुकी थी ।पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर काबुल ले जाया गया ।
पृथ्वीराज का राजकवि चन्द बरदाई पृथ्वीराज से मिलने के
लिए काबुल पहुंचा। वहां पर कैद खाने में पृथ्वीराज की दयनीय
हालत देखकर चंद्रवरदाई के हृदय को गहरा आघात लगा और उसने
गौरी से बदला लेने की योजना बनाई।
चंद्रवरदाई ने गौरी को बताया कि हमारे राजा एक प्रतापी सम्राट हैं और इन्हें
शब्दभेदी बाण (आवाज की दिशा में लक्ष्य को भेदनाद्ध चलाने
में पारंगत हैं, यदि आप चाहें तो इनके शब्दभेदी बाण से लोहे के
सात तवे बेधने का प्रदर्शन आप स्वयं भी देख सकते हैं। इस पर गौरी
तैयार हो गया और उसके राज्य में सभी प्रमुख ओहदेदारों को इस
कार्यक्रम को देखने हेतु आमंत्रित किया।
पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने पहले ही इस पूरे कार्यक्रम की गुप्त मंत्रणा कर ली थी कि उन्हें क्या करना है। निश्चित तिथि को दरबार लगा
और गौरी एक ऊंचे स्थान पर अपने मंत्रियों के साथ बैठ गया।
चंद्रवरदाई के निर्देशानुसार लोहे के सात बड़े-बड़े तवे निश्चित
दिशा और दूरी पर लगवाए गए। चूँकि पृथ्वीराज की आँखे
निकाल दी गई थी और वे अंधे थे, अतः उनको कैद एवं बेड़ियों से
आजाद कर बैठने के निश्चित स्थान पर लाया गया और उनके
हाथों में धनुष बाण थमाया गया। इसके बाद चंद्रवरदाई ने
पृथ्वीराज के वीर गाथाओं का गुणगान करते हुए बिरूदावली
गाई तथा गौरी के बैठने के स्थान को इस प्रकार चिन्हित कर
पृथ्वीराज को अवगत करवाया:-
‘‘चार बांस, चैबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है, चूके मत चौहान।।’’
अर्थात् चार बांस, चैबीस गज और आठ अंगुल जितनी दूरी के ऊपर
सुल्तान बैठा है, इसलिए चौहान चूकना नहीं, अपने लक्ष्य को
हासिल करो।
इस संदेश से पृथ्वीराज को गौरी की वास्तविक स्थिति का
आंकलन हो गया। तब चंद्रवरदाई ने गौरी से कहा कि पृथ्वीराज
आपके बंदी हैं, इसलिए आप इन्हें आदेश दें, तब ही यह आपकी
आज्ञा प्राप्त कर अपने शब्द भेदी बाण का प्रदर्शन करेंगे। इस पर
ज्यों ही गौरी ने पृथ्वीराज को प्रदर्शन की आज्ञा का आदेश
दिया, पृथ्वीराज को गौरी की दिशा मालूम हो गई और
उन्होंने तुरन्त बिना एक पल की भी देरी किये अपने एक ही बाण
से गौरी को मार गिराया।
गौरी उपर्युक्त कथित ऊंचाई से नीचे गिरा और उसके प्राण पंखेरू उड़ गए। चारों और भगदड़ और हा-हाकार मच गया, इस बीच पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एक-दूसरे को कटार मार कर
अपने प्राण त्याग दिये।
आज भी पृथ्वीराज चौहान और चंद्रवरदाई की समाधी काबुल में विद्यमान हैं।

अरुण सुकला