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शीर्षक : पर्दों वाला कमरा

रानी – देखो हम अपना बैडरूम बहुत बड़ा बनाएंगे । बाकी सारे कमरों से बड़ा , उसमे शीशे वाली खिड़कियां भी होंगी , ओर पर्दे भी । ओर हाँ एक बड़ा सा शीशा भी लगवाएंगे ,ठीक बिल्कुल बेड के पास , मै वहाँ बैठ कर श्रृंगार किया करूंगी । क्यों देव अब बोलो बहुत खूबसूरत है ना मेरा प्लान ।
देव – खूबसूरत तो बहुत है ,लेकिन …..
रानी – लेकिन क्या ? तुम्हे नही पसंद ? तुम कुछ और चाहते हो । कोई बात नही ,हम थोड़ा सा बदलाव कर लेंगे , आखिर हम दोनो का कमरा है ।
देव – अरे जरा तुम रुको तो सही । तुम्हारा कमरा बिल्कुल वैसा ही बनेगा जैसा तुम चाहती हो ।
रानी – तो फिर लेकिन क्या ?
देव् – इसके लिए अभी रुपये भी तो जमा करने होंगे ।
रानी – खूब सारे रुपये लगेंगे क्या ?
देव – हाँ ,यही कुछ बीस तीस लाख
रानी – बीस- तीस लाख , बाप रे ये तो बहुत सारे है , रहने दो हम छोटा सा घर बना लेंगे ओर छोटा सा कमरा ।
देव – तुम थोड़ा सा इंतेज़ार करो, तुम्हे अपने देव पे भरोसा है
ना ।
रानी – खुद से भी भी ज्यादा भरोसा है तुम पर , लेकिन पापा रिश्ता देख रहे है वो ओर इंतेज़ार नही कर सकते , वो जल्द से जल्द मेरी शादी करना चाहते है ।
देव – हाँ तो अगर कोई अच्छा लड़का मिलता है तो कर लो शादी । हो सकता है वो रानी को हक़ीक़त की रानी बना दे , और फिर तुम्हे पर्दों वाला कमरा भी तो चाहिए ना ।
देव – तुम ऐसे मजाक ना किया करो । मुझे तक़लीफ़ होती है , तुम्हे कोई फर्क ही नही ।( रानी मुह फेरकर बैठ गयी )
देव – (देव ने रानी का चेहरा अपनी तरफ घुमाया और बोलने लगा )रानी , तुम्हे क्या लगता है मै रह सकता हुँ अपनी रानी के बगैर ।अभी जिम्मेदारिया है मुझ पर, और अपनी रानी के लिए कमरा भी तो बनवाना है । बस इस साल ओर , इस साल मै काम कर लूँ फिर हमारे सारे सपने पूरे हो जाएगे ।
रानी – कब जाओगे ?
देव – कल की फ्लाइट है ।
रानी – इतनी जल्दी चले जाओगे । कैसे कटेगा एक साल ।
देव – मै दिन भर काम करूंगा ,और शाम को ओवरटाइम ।
रानी – इतना टाइम काम करोगे तो दिन का पता ही नही चलेगा ।
देव – अच्छा तो साल जल्दी कट जायेगा और हमारी जुदाई भी ।
रानी – और मै क्या करूंगी ?
देव – तुम , मुझे याद करना और हमारा कमरा सजाना ।
रानी -तुम भी ना ।मै तुम्हारा इंतज़ार करूंगी ।
रानी , कहाॅं गयी जरा थोड़ी चाय् तो बना दे, जाने दिनभर क्या करती है कमरे मे पड़ी पड़ी ( रानी की सास ने आवाज़ देते हुए कहा )
रानी एकदम से सपने से बाहर आयी ,और अपने कमरे से आवाज़ दी – अभी लाती हुँ माँ जी ।
देव के विदेश जाने के बाद , रानी के पिताजी की तबियत खराब रहने लगी , माँ की जिद पर 6 महीने बाद रानी की शादी कर दी गयी । रानी के पति एक साधारण सी नौकरी करते है , घर मे 5 भाई बहन ओर सबसे बड़े उसके पति । सारी तनख्वाह घर के खर्चे मे निकल जाती । उसके पति काम मे व्यस्त रहते ताकि परिवार की जिम्मेदारी ओर बहन की शादी का कर्ज चुका सके ।
रानी रात को अक्सर अपने कमरे की खिड़की पर खड़े होके कभी चाँद को निहारती , कभी बिस्तर पर आके बैठ जाती , उसके सपने तो बहुत पीछे रह गये थे , बड़ा सा बैडरूम , शीशे वाली खिड़की , उसके अरमान पूरे करने वाला देव ओर उसका पर्दों वाला कमरा ।
प्रिया त्यागी
( स्वरचित)

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एक बार नदी ने समुद्र से बड़े ही गर्वीले शब्दों में कहा, बताओ पानी के प्रचंड वेग से मैं तुम्हारे लिए क्या बहा कर लाऊं ? तुम चाहो तो मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु, मानव आदि सभी को उखाड़ कर ला सकती हूं।

समुद्र समझ गया कि नदी को अहंकार आ गया है। उसने कहा, यदि मेरे लिए कुछ लाना ही चाहती हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आना। समुद्र की बात सुनकर नदी ने कहा, बस, इतनी सी बात ? अभी आपकी सेवा में हाजिर कर देती हूं। नदी ने अपने पानी का प्रचंड प्रवाह घास उखाड़ने के लिए लगाया परंतु घास नहीं उखड़ी। नदी ने हार नहीं मानी और बार-बार प्रयास किया पर घास बार-बार पानी के वेग के सामने झुक जाती और उखड़ने से बच जाती। नदी को सफलता नहीं मिली।

थकी हारी निराश नदी समुद्र के पास पहुंची और अपना सिर झुका कर कहने लगी, मैं मकान, वृक्ष, पहाड़, पशु, मनुष्य आदि बहाकर ला सकती हूं परंतु घास उखाड़ कर नहीं ला सकी क्योंकि जब भी मैंने प्रचंड वेग से खास पर प्रहार किया उसने झुककर अपने आप को बचा लिया और मैं ऊपर से खाली हाथ निकल आई।

नदी की बात सुनकर समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा, जो कठोर होते हैं वह आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन जिसने घास जैसी विनम्रता सीख ली हो, उसे प्रचंड वेग भी नहीं अखाड़ सकता। समुद्र की बात सुनकर नदी का घमंड भी चूर चूर हो गया।

विनम्रता अर्थात् जिसमें लचीलापन है, जो आसानी से मुड़ जाता है, वह टूटता नहीं। नम्रता में जीने की कला है, शौर्य की पराकाष्ठा है। नम्रता में सर्व का सम्मान संचित है। नम्रता हर सफल व्यक्ति का गहना है। नम्रता ही बड़प्पन है। दुनिया में बड़ा होना है तो नम्रता को अपनाना चाहिए। संसार को विनम्रता से जीत सकते हैं । ऊंची से ऊंची मंजिल हासिल कर लेने के बाद भी अहंकार से दूर रहकर विनम्र बने रहना चाहिए।

विनम्रता के अभाव में व्यक्ति पद में बड़ा होने पर भी घमंड का ऐसा पुतला बनकर रह जाता है जो किसी के भी सम्मान का पात्र नहीं बन पाता। स्थान कोई भी हो, विनम्र व्यक्ति हर जगह सम्मान हासिल करता है। जहां विरोध हो जहां प्रतिरोध और बल से काम नहीं चल सकता। विनम्रता से ही समस्याओं का हल संभव है। विनम्रता के बिना सच्चा स्नेह नहीं पाया जा सकता। जो व्यक्ति अहंकार और वाणी की कठोरता से बचकर रहता है वही सर्वप्रिय बन जाता है।

ललित राजपाल

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“આકાશવાણી….!”
શ્રાવણ માસનું સરવડિયું વરસી રહ્યું હતું. ‘કૃષ્ણ-નિવાસ’ બંગલાના ભોંયતળિયાના આગલા ઓરડામાં દેવકી, શિવમહિમ્ન સ્તોત્ર એકચિત્તે સાંભળી રહી હતી. અચાનક ગેઇટ પરથી ‘મમ્મા’ એવો સાદ સાંભળી એના કાન ચમક્યા.
બહાર જોયું તો એક પચ્ચીસેક વર્ષનો, પરાણે ગમી જાય એવો નવયુવાન, પીઠ પર બૅગ સાથે ઊભેલો જણાયો. દેવકીએ ગેઇટ પર આવી કહ્યું, ‘બોલો!’ યુવાને કહ્યું, ‘તમારે રૂમ ભાડે આપવાનો છે?’ મારે એક વર્ષ રહેવું છે.’ દેવકીએ પૂછ્યું, ‘તારું શું નામ ને કામ?’ યુવાને પોતાનું નામ ‘વાસુદેવ’ એમ જણાવી, પોતે થોડા સમયથી બેંકમાં કારકુન તરીકે નોકરી કરી રહ્યો હતો એમ જણાવ્યું.
દેવકી માટે ‘વાસુદેવ’ શબ્દ મુખ્ય ને બાકીના શબ્દો ગૌણ બની ગયા. એને કહ્યું ‘અંદર આવ!’ એને આગલા રૂમમાં બેસાડીને કહ્યું, ‘માળ ઉપર એક રૂમ છે. એ મળી જશે પણ દર મહિનાની પહેલી તારીખે રોકડા ત્રણ હજાર મારા હાથમાં જોઈએ.’
વાસુદેવ કબૂલ થયો એટલે દેવકીએ બારેમાસ રાખેલી કામવાળી સુમનને ઉપરનો રૂમ બતાવવાનું કહ્યું. વાસુદેવને રૂમ ગમી ગયો. નીચે આવ્યો એટલે દેવકીએ કડક અવાજે કહ્યું, ‘રાત્રે દસ પહેલા તારે આવી જવાનું ને અહીં કોઈ પ્રકારનું વ્યસન કરવું નહીં! કોઈ છોકરીબોકરી પણ અહીં તને મળવા ન આવવી જોઈએ! સામેનો રૂમ, અમસ્તો આગળો વાસીને રાખ્યો છે. એ તારે કદી ખોલવાનો નથી!’
વાસુદેવને આ, કડક પણ માયાળુ ડોશીમા ગમી ગયા. રોજ સવારે નાસ્તાના ટેબલ પર એ બ્રેડ-બટર લઈ આવતો. દેવકી કૉફી બનાવતી. એને સરખો ન્યાય આપવાનો એમનો નિત્ય ક્રમ બની ગયેલો. દેવકીને તો, વાસુદેવના રૂપમાં જાણે દિકરો મળી ગયો!
થોડાક દિવસમાં જ વાસુદેવે એક વાત નોંધી કે ડોશીમા કદી દાદર ચઢી ઉપર નહોતા આવતા. એક વર્ષ આમ જ નીકળી ગયું. ફરી શ્રાવણ મહિનો આવ્યો. જન્માષ્ટમીનો દિવસ હતો. ડોશીમા શણગાર માટે આસોપાલવ લેવા ગયેલા. સામેનો ઓરડો બંધ કેમ રહેતો હશે એવું કુતૂહલ, વાસુદેવને આવ્યો ત્યારથી જ જન્મેલું. આજે રજાનો દિવસ હતો ને ડોશીમા બહાર ગયેલા. આ સારો મોકો હતો, પેલો સામેનો ઓરડો ઉઘાડી અંદર જોવાનો!
બારણું ખોલી સામેના રૂમમાં ગયો ને એ તો આશ્ચર્યમાં ગરકાવ થઈ ગયો. આ તે સીધોસાદો રૂમ હતો કે રમકડાંની દુકાન! સંખ્યાબંધ જૂના ટેડીબેર, આખી-તૂટેલી રમકડાંની ગાડીઓ, ઘૂઘરા, નગારું, વાંસળી… કેટલું બધું એક જ ઓરડામાં! દીવાલ પર ચાર વર્ષના હસતા બાળકની તસ્વીર હતી.
એટલામાં ડોશીમા ઘરમાં આવ્યા. ઉપર નજર કરી ને પેલો, સામેનો ઓરડો ખૂલ્લો જણાયો. આંખો સમક્ષ આખું દ્રશ્ય ખડું થઈ ગયું, ‘શ્રાવણ મહિનો, ભીની અગાસી, ચીકણો દાદર, ચાર વર્ષના દિકરા વાસુદેવનું ગબડવું, એની કારમી ચીસ, એનું લોહીલુહાણ, અચેતન શરીર!’
ડોશીમાએ નીચેથી જ કરડાકીભર્યો ઘાંટો પાડ્યો, ‘તારી હિંમત જ કેવીરીતે થઈ આ રૂમ ખોલવાની! આ કાળમુખો દાદર હું કેટલા વર્ષોથી ચઢતી નથી પણ તું એ સાચવીને ઉતર! અત્યારે ને અબઘડી મારા ઘરમાંથી ચાલતી પકડ!’
રાત્રે કૃષ્ણજન્મ થયો ને ડોશીમા કાનુડાને હીંચકો નાંખી રહ્યા હતા. એમને લાગ્યું કે આકાશવાણી થઈ, ‘દેવકીમા, હું તારે ત્યાં એક વર્ષ પહેલા આવેલો ને તેં મને આજે જ કાઢી મુક્યો?’
ડોશીમા, ‘વાસુદેવ!…વાસુદેવ!’ બોલતા દરવાજે આવ્યા ને બહાર ઊભેલ વાસુદેવને બથમાં લઈ, ઘરમાં પાછો લઈ આવ્યા.
– વિજેશ શુક્લ

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🌹सेठ जी का लालच और #हनुमानजी का न्याय 🚩🚩
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एक गरीब ब्रह्मण था . उसको अपनी कन्या का विवाह करना था .
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उसने विचार किया कि कथा करने से कुछ पैसा आ जायेगा तो काम चल जायेगा .
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ऐसा विचार करके उसने भगवान् राम के एक मंदिर में बैठ कर कथा आरम्भ कर दी .
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उसका भाव यह था कि कोई श्रोता आये, चाहे न आये पर भगवान् तो मेरी कथा सुनेंगे !
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पंडित जी की कथा में थोड़े से श्रोता आने लगे,
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एक बहुत कंजूस सेठ था. एक दिन वह मंदिर में आया.
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जब वह मंदिर कि परिक्रमा कर रहा था, तब भीतर से कुछ आवाज आई.
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ऐसा लगा कि दो व्यक्ति आपस में बात कर रहे हैं. सेठ ने कान लगा कर सुना.
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भगवान् राम हनुमान जी से कह रहे थे कि इस गरीब ब्रह्मण के लिए सौ रूपए का प्रबंध कर देना, जिससे कन्यादान ठीक हो जाये.
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हनुमान जी ने कहा ठीक है महाराज ! इसके सौ रूपए पैदा हो जायेंगे.
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सेठ ने यह सुना तो वह कथा समाप्ति के बाद पंडित जी से मिले और उनसे कहा कि महाराज ! कथा में रूपए पैदा हो रहें कि नहीं ?
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पंडित जी बोले श्रोता बहुत कम आतें हैं तो रूपए कैसे पैदा हों.
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सेठ ने कहा कि मेरी एक शर्त है.. कथा में जितना पैसा आये वह मेरे को दे देना और मैं आप को पचास रूपए दे दूंगा.
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पंडित जी ने सोचा कि उसके पास कौन से इतने पैसे आतें हैं पचास रूपए तो मिलेंगे, पंडित जी ने सेठ कि बात मान ली
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उन दिनों पचास रूपए बहुत सा धन होता था .
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इधर सेठ कि नीयत थी कि भगवान् कि आज्ञा का पालन करने हेतु हनुमान जी सौ रूपए पंडित जी को जरूर देंगे. मुझे सीधे सीधे पचास रूपए का फायदा हो रहा है.
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जो लोभी आदमी होते हैं वे पैसे के बारे में ही सोचते हैं.
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सेठ ने भगवान् जी कि बातें सुनकर भी भक्ति कि और ध्यान नहीं दिया बल्कि पैसे कि और आकर्षित हो गए.
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अब सेठ जी कथा के उपरांत पंडित जी के पास गए और उनसे कहने लगे कि कितना रुपया आया है ,
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सेठ के मन विचार था कि हनुमान जी सौ रूपए तो भेंट में जरूर दिलवाएंगे ,
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मगर पंडित जी ने कहा कि पांच सात रूपए ही आयें हैं.
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अब सेठ को शर्त के मुताबिक पचास रूपए पंडित जी को देने पड़े.
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सेठ को हनुमान जी पर बहुत ही गुस्सा आ रहा था कि उन्हों ने पंडित जी को सौ रूपए नहीं दिए !
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वह मंदिर में गया और हनुमान जी कि मूर्ती पर घूँसा मारा.
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घूँसा मारते ही सेठ का हाथ मूर्ती पर चिपक गया
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अब सेठ जोर लगाये अपना हाथ छुड़ाने के लिए पर नाकाम रहा हाथ हनुमान जी कि पकड़ में ही रहा .
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हनुमान जी किसी को पकड़ लें तो वह कैसे छूट सकता है.
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सेठ को फिर आवाज सुनाई दी. उसने ध्यान से सुना,
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भगवान् हनुमान जी से पूछ रहे थे कि तुमने ब्रह्मण को सौ रूपए दिलाये कि नहीं ?
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हनुमान जीने कहा ‘महाराज पचास रूपए तो दिला दिए हैं, बाकी पचास रुपयों के लिए सेठ को पकड़ रखा है !
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वह पचास रूपए दे देगा तो छोड़ देंगे’
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सेठ ने सुना तो विचार किया कि मंदिर में लोग आकर मेरे को देखेंगे तो बड़ी बेईज्ज़ती होगी !
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वह चिल्लाकर बोला ‘हनुमान जी महाराज ! मेरे को छोड़ दो, मैं पचास रूपय दे दूंगा !’
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हनुमान जी ने सेठ को छोड़ दिया !
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सेठ ने जाकर पंडित जी को पचास रूपए दे दिए.

#जयश्रीराम🌷🙏

जयबजरंगबलि जी की🌷🙏

सुनील दवे

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તાજી પરણીને સાસરે આવેલી શ્રીમંત ઘરની નવવધૂ. એનાં પિયરમાં જેમ શ્રીમંતાઈ હતી એમ સાસરે પણ અઢળક શ્રીમંતાઈ હતી. પરંતુ લગ્નના ત્રીજા જ દિવસે શ્વશુરગૃહે એણે જે દ્રશ્ય નિહાળ્યું એનાથી એ આઘાતથી સ્તબ્ધ બની ગઈ.
બન્યું હતું એવું કે તૈયાર થઈને બહાર જવા ડગ માંડી રહેલ સસરાજીએ તેલની શીશીમાંથી તેલના બે બુંદ ઢળતાં જોયા અને એમણે તુરત આંગળીથી એ બુંદ ઝીલી લઈને પોતાના બૂટ પર ઘસી નાંખ્યા.

નવવધૂને ક્ષણભર વિચાર આવી ગયો કે જ્યાં ઘરની મુખ્ય વ્યક્તિ જ આવી કંજુસાઈ કરતી હોય એ ઘરમાં મારા થી બરદાસ્ત કેવી રીતે થશે?

આ વિચારનું પારખું કરવા નવવધૂએ એક ગણતરી પૂર્વકની યોજના કરી એ મુજબ સાંજ પડતાં જ અસહ્ય શિર:શૂળ – ભયંકર મસ્તકવેદનાનો એણે દેખાવ કર્યો. વેદનાની ચીસો તો એવી ઉઠતી હતી કે જાણે હમણાં જ પ્રાણ નીકળી જશે. સમગ્ર પરિવાર ચિંતાતુર થઇ ગયો. સસરાએ મોટા મોટા વૈદરાજો તેડાવ્યા, પણ રોગ પકડાય તો સારવાર કરી શકાય ને ! સહુ નાકામયાબ નીવડવા લાગ્યા. વેદના અને ત્રાસ જોયો ન જાય એવો થતો ગયો.
એવામાં સસરાએ નવવધૂને પૂછ્યું : ‘ વહુ બેટા ! પિયરમાં આ તકલીફ ક્યારેય થઈ હતી ખરી? અને થઈ હોય તો ત્યારે ક્યાં ઉપાયથી એ શમી જતી હતી? ‘
નવવધૂએ નાટક જારી રાખીને વેદનાથી કણસતાં કહ્યું : ‘પિતાજી ! પિયરમાં બે વાર આવી વેદના થઈ હતી ખરી અને ત્યારે સાચા મોતીઓ વાટીને તેનો લેપ મસ્તકે લગાવવાથી એ પીડા શમી હતી.
પણ અહીં તો એ ક્યાંથી બને?’
સસરાએ તરત જ કહ્યું : ‘ વહુ બેટા ! એની ચિંતા તમે ન કરો. ઉપાય મળી ગયો છે, તો હમણાં જ એનો અમલ થશે.’ – અને ખરેખર સસરાએ લાખો રૂપિયાની કિંમતના એકેક મોતી મંગાવીને તેને ખાંડવાની તૈયારી પણ કરાવી લીધી.
પારખું થઈ ગયું હોવાથી વિચક્ષણ નવવધૂએ નાટકને નવો વળાંક આપી દઈ એકાએક રોગ ગાયબ થયાનો દેખાવ રચી દીધો.. પરિવારમાં પુન: આનંદ છવાઈ ગયો.

કરકસર આ ચીજ છે કે જેમાં બિનજરૂરી હોય ત્યારે તેલનો પણ વેડફાટ ન હોય અને જરૂરિયાત હોય ત્યારે મહામૂલા મોતી વાટવામાંય ખચકાટ ન હોય.

વસ્તુતઃ
કરકસર એક કળા છે.
કરકસર એ કંજુસાઈ નથી અને ઉડાઉપણું એ ઉદારતા નથી!!

અનિલ દવે

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🙃🙃🙃🙃🙃🙃– तिजोरी–🙃🙃🙃🙃🙃🙃

पत्नी के देवलोक गमन करने के बाद – एक दिन पत्नी के गहनें बेचकर – एक भारी – मज़बूत – अभेद – तिजोरी खरीद लाया।

अपने कमरे की दीवार में फिक्स करवाने के बाद – घण्टों दरवाज़ा बन्द कर आराम से सोता रहा।

शाम हुई तो ज़ेवर के खाली डिब्बे तिजोरी में जमाया। कुछ पुराने अखबार भरें फिर, अच्छी तरह से तिजोरी बन्द कर – चाभियाँ सम्भालता हुआ घर से बाहर निकल गया।
सत्तर साल की उम्र है मेरी।
सड़सठ बसन्त देखने के बाद पिछले ही माह पत्नी मुझसे जुदा हो गयी।
उसकी तेरहवीं तक तो कुछ पता न चला – चूंकि घर भरा- भरा था – नाते रिश्तेदारों का आना-जाना लगा हुआ था। मुझें न एकाकीपन लगा – न सहचर के जाने पर उत्तपन हुई शून्यता का बोध हुआ।

उसके कारण ज़िन्दगी का मेला था– जाकर भी एक आखिरी बार मेला लगा गयी थी वह।

कहने को तो भरा पूरा परिवार है मेरा–दो बेटे और दो बेटियां – बेटे बेटियों का भी अपना परिवार है–बड़ा नवासा तो खुद एक बच्चे का बाप है।

जीवन में आजीविका का साधन व्यपार रहा था। बहुत लाभ कमाया – बहुत नुकसान सहा। कुल मिला कर सुख का हिंडोला भी झूला और दुख की चटनी में रोटी भी डुबो कर खायी।

बच्चें बड़े हो गए तो धीरे-धीरे उन्हें ज़िम्मेदारी सौंपता गया – जीतने वे दक्ष होते गए मैं उतना ही व्यपार से मुक्त होता गया।

पिछले दस सालों से मैंने ऑफिस जाना छोड़ दिया है –
पर जब कभी बच्चों को व्यवसायिक सलाह या सहायता की ज़रूरत होती है तो उनकी पहली पसंद मैं ही होता हूँ।

आखिर अनुभव बोलता है।

दोनों दामाद भी वेल सेटल है।
किसी को किसी चीज़ की कमी नहीं है।

पत्नी के गुजरने के पन्द्रह दिन बाद से ही मुझें अनुभव होने लगा कि मेरी तरफ किसी की तवज़्ज़ो ही नहीं है।

रुपये से खरीदी जाने वाली वस्तु की कमी नहीं थी परन्तु बहुओं में सेवा की भावना नहीं है।

समय पर खाना नहीं। दवाई की याद कोई दिलाता नहीं। हाथ-पांव टूट रहे हो तो कोई दबाता नहीं।

जो काम पत्नी सहज भाव से करती थी और मैं उसका उपकार तक नहीं मानता था–उसका हर समर्पण मुझें याद आने लगा था – चूंकि याद आने लगा तो उसकी कमी भी मुझें कल्पाने रुलाने लगा।

विधवा स्त्री को इन बातों का अहसास नहीं होता।
बहुवे किचन में, अपने बच्चों में ही सास को उलझाए रखती है और जीवन गुज़र जाता है।
वैसे भी, कभी कोई कमी – कोई बात चुभी भी तो स्त्री सोचती है कि पहले पति की उदण्डता बर्दास्त करती ही थी – अब बच्चों की अवहेलना बर्दास्त कर लेती हूँ।

विधुर पत्नी के जाने के बाद एकांतवास में चला जाता है।बेटे कमरे में आते भी है तो डयूटी समझ कर। आखिर वे भी थके हारे होते है। उनकी अपनी मज़बूरियां होती है।

आज महीना भर हो गया है पत्नी से जुदाई का। ऐसी जुदाई कि वह वापस नहीं आ सकती। उससे मिलने की एक ही सूरत है कि मुझें खुद ही उसके पास जाना होगा।

अभी और जीने की अभिलाषा नहीं पर पलायनवादी की तरह मृत्यु को अंगीकार करना – ये भी तो उचित नहीं।

घर से निकल कर मैं दरिया के पास पहुँचा।
जेब से तिजोरी की चाभियाँ निकाली।

अंतिम बार – नयी तिजोरी की नयी चमचमाती चाभियों को गौर से देखा – मेरे ओंठो से एक आह सी निकली फिर मैंने अपने सुखद भविष्य के लिये उन चाभियों को दरिया में उछाल दिया।

मन उदास था।
काश !
मौत – पत्नी को नहीं पहले मुझें ले जाती – पर अफसोस– ऐसा हो न सका।

बेवजह दीवानों की तरह– बिना सोचे-समझें सड़कों पर भटकता रहा – अपनी टांगे तोड़ता रहा।
कितनी ही दूर चला आया था मैं।

रात के अँधेरे में मैं वापस अपने घर लौटा।

अंतिम परिणाम आना अभी बाकी है परंतु आसार दिखने लगे है।

नयी तिजोरी ने परिजनों में उत्सुकता जगा दी है।

आज मुझें मेरा कमरा साफ सुथरा मिला है।

मेरी कपड़ों की आलमारी तक साफ की गयी है।

ज़रूर तिजोरी की चाबी की तलाश में पूरा कमरा खंगाला गया था।

चाबी न मिली तो कमरा दुरुस्त कर शराफत दिखायी गयी थी।

उनकी उम्मीद ज़िंदा रहे इसलिये ही तो – चाभियाँ मैंने दरिया के हवाले की थी।

                                          अरुण कुमार अविनाश
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મર્યા પછી પણ લોહી પીવાનું?

કેટલાક માણસો એવા પણ હોય છે કે જે મરી ગયા પછી પણ લોકોને હેરાન કરે છે.આજની મારી વાર્તાનો નાયક પણ એવો એક ખલનાયક છે.(નાલાયક)

આ એક એવો માણસ હતો કે જેણે જીવતેજીવ આખા ગામને હેરાન કર્યું હતું.ગામમાં કોઈનું લોહી પીવામાં કોઈ કસર નહોતી રાખી.જ્યારે કોઈ હેરાન થાય ત્યારે તેને ખૂબ આનંદ આવતો.એ સતત એજ વિચાર્યા કરતો કે હું શું કરું તો બીજા હેરાન થાય અને જ્યારે બીજો હેરાન થાય ત્યારે એને અપાર આનંદની અનુભૂતિ થાય.આખી જિંદગી ગામ વાળાને હેરાન કરવામાં પસાર કરી ત્યારે આખું ગામ એના મોત માટે ભગવાનને પ્રાર્થના કરતું હતું.

આખરે એક દિવસ એવો આવી ગયો કે આ માણસ બીમાર પડ્યો અને મરણ પથારીમાં પડ્યો. પરંતુ મજાની વાત એ છે કે આ માણસ મરતા મરતા પણ એવો વિચાર કરતો હતો કે મેં આખી જિંદગી ગામ ને હેરાન કર્યું છે એટલું જ નહીં, હું મર્યા પછી પણ આ લોકોને હેરાન કરતો જઈશ.છોડીશ તો નહિ જ. એટલે એણે એના છોકરાઓને કહ્યું કે મારી એક આખરી ઈચ્છા છે કે મારા મર્યા પછી મારા પેટમાં તમે એક લોખંડની કૉશ નાખજો.(જે ખાડો ખોદવા વપરાય તે કૉશ) જોકે ત્યારે છોકરાઓને નવાઈ લાગી કે પિતાજી આવી કેવી વિચિત્ર પ્રકારની ઇચ્છા
ધરાવે છે. ત્યારે એણે કહ્યું કે મેં આ ગામને ખૂબ જ હેરાન કર્યું છે એટલે મને થાય છે કે મારે મારા પાપનું પ્રાયશ્ચિત કરવું જોઈએ. પરંતુ મારી જીવતેજીવ પ્રાયશ્ચિત કરવાની હિંમત નથી. એટલે મારા મરી ગયા પછી તમે મારા પેટમાં કૉશ મારજો.એટલે મારું પ્રાયશ્ચિત થઈ જશે અને મારા આત્માને મુક્તિ મળી જશે.છોકરાઓને થયું કે પિતાજીની જો આવી જ અંતિમ ઈચ્છા હોય તો આપણને એમના મરી ગયા પછી પેટમાં કૉશ મારવામાં શું વાંધો છે? એટલે છોકરાઓએ મરી ગયા પછી એમના પેટમાં કૉશ મારવાની બાબતે સંમતિ આપી.

થોડા દિવસ પછી ડોસા મરી ગયા એટલે એમની સ્મશાનયાત્રામાં ગામના લોકો જોડાયા અને સાથે અંતિમ ઈચ્છા પ્રમાણે કોશ પણ લેવામાં આવી. અગ્નિસંસ્કાર કરવાની તૈયારી હતી કે એક છોકરો બોલ્યો કે બાપાની અંતિમ ઇચ્છા હતી કે તેમના પેટમાં ખોસવામાં આવે એટલે ચાલો આપણે કોષ મારવાની વિધિ કરી દઈએ એટલે બાપાના આત્માને શાંતિ મળે.તરત કોષ લાવવામાં આવી અને બાપા ના પેટમાં ખોદવામાં આવી.

એ જ વખતે બન્યું એવું કે બાજુના રસ્તા ઉપરથી પોલીસની જીપ જતી હતી. જીપમાં બેઠા બેઠા જમાદારે જોયું કે આ લોકો લાશના પેટમાં કૉશ મારી રહ્યા છે. એટલે જમાદાર તરત જ જીપ લઇને ત્યાં આવ્યો.જોયું તો આ લોકો લાશના પેટમાં કૉશ મારી રહ્યા હતા.એટલે જમાદારે તરત જ પૂછ્યું કે તમે શું કરી રહ્યા છો?છોકરાઓએ કહ્યું કે અમારા પિતાજી ની અંતિમ ઇચ્છા હતી કે મારા મરી ગયા પછી મારા પેટમાં કોષ મારજો એટલે મારો મોક્ષ થશે. એટલે જમાદારે કહ્યું કે ઉલ્લુ બનાવવાની વાતો કરો છો? તમે લોકો જબરદસ્તીથી આ માણસને સ્મશાનમાં લાવીને હત્યા કરી છો.તમે આ માણસનું ખૂન કર્યું છે.
તમારા ઉપર ખૂનનો આરોપ છે. ચાલો બધા ગાડીમાં બેસી જા અને ચાલો પોલીસ સ્ટેશન ઉપર. જમાદારે બધાને પકડીને જેલમાં પૂરી દીધા.

આ માણસ મર્યા પછી પણ આખા ગામને હેરાન કરતો ગયો. આપણી વચ્ચે પણ આવા કેટલાક માણસો મુક્ત વિહાર કરતા હોય છે.જેમનું મનુષ્ય દેહમાં અવતાર પ્રાગટ્ય બીજાનું અહિત કરવા જ થયું હોય.આભાર.

કર્દમ ર. મોદી,
M.Sc.,M.Ed.,
પાટણ.
82380 58094
U Tube: kardam Modi

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कहानी – लाल बिंदी

लम्बे अंतराल के बाद आज अचानक, फोन पर रागिनी भाभी की आवाज सुन कर रिया खुशी से झूम उठी। उनकी खनकती हुई आवाज अभी भी कानों में मिश्री-सी घोल रही थी। एकाएक वह ठिठक पड़ी! ओह ! ये क्या किया उसने? बिना सोचे समझे ही झट उनसे मिलने के लिए हामी भी भर दी। वह सोच में पड़ गयी, अगर कहीं शरद को पता चल गया तो … फिर वही हँगामा … ! वह भीतर ही भीतर काँप उठी। मगर अगले ही पल अपना सिर झटक कर, शरद का लंच बाॅक्स तैयार करने में जुट गयी। उधर घड़ी की सुइयाँ भी अपनी रफ्तार से भागी चली जा रही थी।

बारह बजे का टाइम दिया था भाभी ने मिलने का और लंच साथ लेने का वादा भी। उसका तो मन हुआ था कि वह उन्हें घर पर ही बुला ले। मगर शरद को तो उनका चेहरा तक देखना पसंद नहीं था। उनके लिए तो वह … छी-छी! इतने गंदे शब्द बोलना तो दूर, वह स्वप्न में भी नहीं सोच सकती। क्या पुरुष की सोच, किसी स्त्री के लिए इतने नीचे तक गिर सकती है! वह इसी उधेड़बुन के साथ काम करती जा रही थी।

उसने स्टडी रूम में झाँक कर देखा। शरद अभी भी, कुछ कागज-पत्तर उठा-धर रहा था। ओह! ऐसा तो नहीं कि आज फिर वह आॅफिस न जाए और घर पर ही बैठकर, लैपटॉप पर अपना काम करे? उसने एक गहरी साँस ली। उससे कुछ भी पूछने का मतलब था कि उसका मूड फ्लकचुएट करना। वैसे भी उसके मूड का कोई ठिकाना नहीं। कितना भी, कुछ भी उसके लिए कर दो, मगर … । वह खीज उठी, ये आदमी की जात भी ना …! भगवान ने भी न जाने क्यों, इतने कठोर हृदय वाले प्राणी को रच कर धरती पर भेज दिया।

सारा काम निपटा कर वह, शीशे के सामने तैयार होने लगी। माथे पर बिंदी लगाने के लिए ड्रार खोला ही था कि रागिनी भाभी का मुस्कुराता चेहरा सामने आ गया। ऊँचे माथे पर, बड़ी-सी सुर्ख लाल बिंदी, ढ़ीला-सा जूड़ा, कितना फबता था उन पर। उसने भी बड़ी-सी लाल बिंदी निकाल कर झट अपने माथे पर लगा ली।

भैया के न रहने पर, आस-पड़ोस की बड़ी-बूढ़ीयाँ कहने लगी थीं, बहू की इस बिंदी को ही तो सबकी नजर लग गयी। दुःख की उस घड़ी में भला उन सबको कौन समझाता कि भैया एक आर्मी आॅफिसर थे, और देश से प्रेम करने वाले सिपाही की ज़िंदगी तो उसके देश की अमानत होती है। रस्मोरिवाज के बीच एक माँ ही तो थी, जिसने भाभी के माथे से उसकी बिंदी नहीं उतरने दी थी।

अचानक दरवाजे के खुलने की आहट पाकर, उसने धीरे से बाहर झाँका। शरद आॅफिस के लिए निकल रहा था। उसने राहत की साँस ली और उसके जाने के कुछ मिनट बाद ही, वह भी जल्दी से दरवाजा लाॅक करके, लिफ्ट से नीचे उतर कर कार में जा बैठी।

कार सड़क पर दौड़ी जा रही थी। अनगिनत विचार घुमड़-घुमड़ कर मस्तिष्क पर छाने लगे। क्या भाभी पहले की ही तरह खुश होंगी? कैसी दिखती होंगी अब वह? उन्होंने जो फैसला लिया, क्या सचमुच वह सही था? भैया के न रहने पर अब उनकी जिंदगी कितनी बदल गयी होगी …। बहुत सारी बातें याद करके उसकी आँखें भर आईं।

भैया जब फील्ड पर होते तो भाभी कुछ दिनों के लिए माँ के पास रहने आ जाती थीं। कितना अच्छा लगता था सबको। घर गुलजार हो जाता था। भैया का लेटर आते ही, फिर तो भाभी का चेहरा और भी खिल उठता था। फोन पर तो कुछ पलों के लिए ही बात हो पाती थी।

विचारों के अंतर्द्वंद के साथ, होटल भी आ चुका था। दूर से ही हाथ हिलाती हुई भाभी दिख गयीं। जल्दी से कार से उतर कर रिया दौड़ती हुई, उनके गले से जा लिपटी । “हाय भाभी!” आप तो बिल्कुल भी नहीं बदलीं।”

“अरे मेरी बिन्नो! भला मैं कैसे बदल सकती हूँ। तुम्हारे लिए तो मैं वही, तुम्हारी भाभी हूँ। कहते-कहते उनका स्वर भीग गया।”

बिन्नो! ओह! इस नाम को तो वह कब का भूल चुकी थी। ये नाम उसे भाभी का ही तो दिया हुआ था। सचमुच! भाभी जरा भी नहीं बदली थीं। वही खिलखिलाहट, ऊँचे माथे पर आज भी बड़ी-सी वही लाल बिंदी दमक रही थी। और चेहरे पर परिपक्वता, पहले से अब और भी ज्यादा झलकने लगी थी। शायद ये उनके जीवन के अनुभवों से मिला उनका उपहार था।

“चलो बिन्नो! पहले तुम्हें एक अच्छा-सा गिफ्ट तो दिलवा दूँ। फिर हम लंच करेंगे।”

“नहीं-नहीं! असली गिफ्ट तो बस आप ही हैं मेरे लिए। कहते-कहते रिया की आँखें फिर भर आईं। मगर अपने जज्बातों को जब्त किये हुए वह मुस्कुरा उठी। “आज तो मुझे सिर्फ आपसे बातें ही बातें करनी हैं, वो भी ढ़ेर सारी।”

भाभी हमेशा की तरह खिलखिला पड़ीं। हाथ में हाथ डाले दोनों होटल के अंदर दाखिल हो गयीं।

पहले से ही अपनी रिजर्व्ड टेबिल के सामने जा कर बैठ गयीं। खाने का ऑर्डर देने के बाद, रिया बोल उठी, “और भाभी, आप कैसी हैं?”

भाभी की आँखों की चमक, उनकी खुशहाल जिंदगी को बयां कर रही थीं।

“पहले तू बता बिन्नो, बच्चे कैसे हैं और तेरे पति …?”

“जैसा सब कुछ पहले था, वैसा ही आज भी है। बदला है तो सिर्फ इतना ही, कि बच्चे बड़े हो गये हैं और बड़ी क्लासेज में पहुँच गये हैं। और आप अपनी सुनाइए।” कहते हुए उसने भी खिलखिलाने की एक कोशिश की।

“तुझे तो मालूम ही होगा, रिनी न्यूजीलैंड में है। और मैं, आई एम सो हैप्पी!” कहते-कहते भाभी के चेहरे पर मानो दुनिया भर की खुशियाँ खिल आईं।

रिया, भाभी को देखे जा रही थी। बड़ी मुश्किल से वह बोल पाई, “और भाभी, आपके वो, आई मीन … वो कैसे हैं?”

भाभी समझ गई कि रिया उसके बारे में सब कुछ जानना चाहती है।” वह बोल पड़ी, “बिन्नो, ही इज अ वंडरफुल मैन!”

“रियली भाभी!” रिया अब खुलने की कोशिश करने लगी।

“यस डियर!”

“क्या मेरे संजू भैया से भी ज्यादा?” रिया उत्सुक हो उठी।

भाभी फिर खिलखिला पड़ीं। “न कम, न ज्यादा। बस संजू की कम बोलने की आदत थी, और, रजत की बहुत …। इतना ही अंतर है दोनों में …।” कहते-कहते वह कुछ पलों के लिए गम्भीर हो गयीं। शायद संजू भैया की याद उन्हें उद्वेलित कर गयी थी।

रिया उनके चेहरे के हर एक भाव को पढ़ने की कोशिश कर रही थी। वह भी रिया को ध्यान से देख रही थीं। शायद उसके भीतर जो चल रहा था, उसे पढ़ने की कोशिश कर रही थीं।

रिया फिर बोल पड़ी, “सचमुच भाभी! आप खुश तो हैं न?”

अचानक उन्होंने उसका हाथ थाम लिया और उसकी आँखों में झाँक कर बोलीं, “जब तेरे भैया थे, तब भी रजत अक्सर हमारे घर आया करते थे। भैया की आत्मा तो बस उन्हीं में बसती थी।”

“और रजत जी की …?”

“उनकी तेरे भैया में। यूँ समझ बिन्नो, दोनों सोलमेट थे।“

रिया शांत-सी उनके हृदय की गहराई में गोते लगाने लगी थी।

“तेरे भैया की डेथ के दस महीने बाद, रजत ने जब मेरे सामने प्रपोजल रखा था, तब एक बार तो मैं चौंकी थी और डरी भी थी।”

“डर …? किस बात का डर भाभी?”

यही कि ऐसा न हो कहीं ये भी दूसरे पुरुषों की तरह हो। आई मीन, जैसा कि मैं लोगों के संबंधों में सुनती आई थी । वैसे भी बिन्नो, मैंने संजू के अलावा अपने जीवन में, कभी किसी दूसरे पुरुष की कल्पना ही नहीं की थी।

“फिर भाभी …!”

“मगर, एक दिन संजू की अलमारी का लाॅकर खोला तो जरूरी कागजों के बीच उसकी हैंडराइटिंग में लिखा एक लेटर मिला।

रिया की उत्सुकता अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी। “क्या लिखा था भैया ने, भाभी?”

“यही, कि यदि मैं न रहूँ तो तुम कभी अकेले मत रहना। अपना जीवन साथी खोज लेना। और सच कहूँ, तो तुम्हारे माथे पर ये लाल बिंदी बहुत अच्छी लगती है मुझे …।” कहते हुए उनकी आँखें भर आईं।

रिया का ध्यान अपनी बिंदी की ओर चला गया। मगर वह भाभी के अंदर रिस रही संवेदना को भी महसूस कर रही थी।

“मैं तो इंतजार में बैठी थी कि कब संजू ड्यूटी से लौट कर आए और मैं उसकी अच्छी तरह से खबर लूँ। मगर खबर तो वहाँ से आई थी, वो भी उसके शहीद होने की खबर …।” कहते हुए भाभी का स्वर काँपने लगा। “कितना रोई थी उस लेटर को थाम कर। उसमें, उसके चेहरे को ढूँढती रही थी। मगर एक प्रश्न आज भी बार-बार मन को कुरेदता है, तो क्या उसे पहले से ही अपने जाने का अहसास हो गया था?”

“ओह! भाभी, भैया के न रहने की खबर सुन कर तो माँ भी …। सचमुच! आज माँ होती तो आपको खुश देखकर कितनी खुश होती।”

दोनों एक दूसरे का हाथ थामे, एक दूसरे को महसूस कर रही थीं।

“मालूम है बिन्नो! रजत से मेरी शादी को तेरह साल बीत चुके हैं। शादी के बाद ही मैंने उसे अच्छी तरह से जाना। मेरी ढ़लती उम्र में उसने मुझसे साथ तो जोड़ा, मगर संजू के अहसास को भी जिंदा बनाए रखा।”

रिया ने चौंक कर रागिनी की ओर देखा।

“वही अहसास तेरे भैया का, हर पल मेरे साथ रहता है।”

रिया ने कसकर रागिनी भाभी का हाथ थाम लिया। भीतर ही भीतर अब उसका मन भी भीगने लगा था।

रागिनी ने घड़ी की ओर देखा, फिर बोल उठी, “सच कहूँ, अब तो मुझे लगता है कि सारे पुरुष, संजू और रजत जैसे ही होते हैं।” मुस्कुराते हुए उन्होंने रिया का हाथ धीमे से दबा दिया।

“भाभी को खुश देखकर, अब रिया पूरी तरह से आश्वस्त हो गयी थी। मगर उसकी आँखों के सामने एकाएक शरद का कठोर चेहरा उभर कर आ गया। और उसके भीतर ईर्ष्या का भाव उपजने लगा, उसने फौरन उसे कसकर झटक दिया। वह बोलना तो चाह रही थी, काश! मगर मुँह से फूट पड़ा, “आमीन!”

कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद भाभी फिर बोल पड़ी, “आई एम लकी, आई मेट टू वंडरफुल मैन इन माय लाइफ !” कहते हुए उनकी लाल बिंदी की लालिमा उनके गालों तक उतर आई।

इस बार रिया भी उन्हीं की तरह खिलखिला उठी, “रि य ली!”

भाभी भी उसकी आँखों में झाँककर मुस्कुराते हुए बोली, “रि य ली!”

“एक बात मैं भी सच-सच कहूँ भाभी! रिया की आवाज में ढ़ेर सारा प्यार छलकने लगा और अपनी रागिनी भाभी को गले से लगा कर बोली, “यू आर आलसो अ वंडरफुल वुमन्!”

प्रेरणा गुप्ता – कानपुर
मौलिक रचना
रचनाकाल : 28 – 4 – 2019

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પગની_જુતી

આજનું દૃષ્ય જોઈને દેવકી મનથી હચમચી ગઈ.. પાડોશમાં રહેતા અશોકની યુવાન પત્ની ચાર વર્ષના દિકરાને મુકી સર્પ દંશથી મરી ગઇ.. એ વાતથી લાગેલ આઘાત કરતાં ભારે વજ્રાઘાત નનામી ઘરમાંથી બહાર નિકળી ત્યારે કરાયેલ વિધિથી લાગ્યો..
સમાચાર મળતાં અશોકની મોટીબેન લાભુ તરત જ પહોંચી ગઈ હતી.. રોકકળ વચ્ચે અનુભવી અને જાણકાર સ્ત્રીઓએ મૃત્યુદેહ નવડાવ્યો.. અને પુરુષોએ નનામી બાંધી.. ચાર કાંધિયા નનામીને ડેલી બહાર લઈ ચાલ્યા..
દેવકી પણ જોવા એકઠી થયેલી સ્ત્રીઓ વચ્ચે હતી.. એણે જોયું.. અશોક નાહી ધોઈ નવા કપડાં પહેરી ડેલીએ ઉભો.. લાભુએ ચાંદલો કર્યો , અને ગોળ ખવડાવી મોં મીઠું કરાવ્યું..
એક ડોશીએ કહ્યું.. ” બીજીવાર લગ્ન કરવા હોય તો આમ કરવું પડે.. અને તે સમશાને પણ ના જઈ શકે.. ને ખાપણ અને સરપણના પૈસા પણ પિયરિયા આપે.. એવો ચાલ્યો આવતો રિવાજ છે..”
દેવકી ઘરે આવી.. એનું હૈયું વલવલતું હતું.. ” શું એક સ્ત્રીની આટલી જ કિંમત..? એનો શ્વાસ બંધ થાય કે તરત જ નવા લગ્નની તૈયારી..? આ તે કેવા ક્રુર રિવાજ..?”
દોઢ વરસ પહેલાની પોતાની ઘટના નજર સામે આવી.. એનો પતિ મરી ગયો.. સ્ત્રીઓએ ભેગા મળી એના સેંથો ચાંદલો ભુંસી નાખ્યા.. બંગડીઓ ફોડાવી નાખી.. પતિની ચીતામાં સળગી મરવાના પ્રતિક રુપે એની સાડીમાં સળગતી અગરબતી અડાડી કાણાં પાડ્યા.. મુંડનના નમુના રુપે વાળની એક લટ કાપી નાખી.. અને જે જગ્યાએ પતિનો દેહ રાખ્યો હતો, એ જગ્યાએ રાતે નીચે સુવાની ફરજ પાડી.. એ બિચારી બીકની મારી .. આખી રાત એકલી બેઠી રહી..
એને ગુમસુમ જોઈ, ભાભીએ કારણ પુછ્યું, તો દેવકીએ કહ્યું.. ” ભાભી.. સ્ત્રીનો પતિ મરે તો, જાણે આખું જગત લુંટાયું હોય, તેવા રિવાજ.. ને પત્ની મરે તો જાણે પગની જુતી ગઈ.. એવા રિવાજ.. તમે અશોકને ગોળ ખાતો જોયો ને..?”
એ આગળ બોલી.. ” હવે મારે બીજું ઘર નથી કરવું.. જ્યાંની વાત ચાલે છે, તેને ના પાડી દેજો..આવા ઘાતકી રિવાજો જોઈ, હવે બીજીવાર કોઈની પત્ની થવું નથી.. મને સીલાઈ કામ ફાવી ગયું છે.. હું એકલી રહીને જીવન ગાળીશ..”
ભાભીએ નિસાસો નાખ્યો.. ” સાવ સાચી વાત છે , બેન.. પુરુષો તો સ્ત્રીને પગની જુતી જ સમજે.. એટલે કોઈએ લગ્નગીત જોડ્યું છે ને..
‘ ઓછા છે માન .. એના ઓછા સન્માન.. દિકરીનો જન્મ ના દેજો ભગવાન..’
બેન, તમારો આણાનો પાછો આવેલ સામાન રાખ્યો છે, એ ઓરડો હવેથી તમારો.. અને મારી એક વાતમાં તમે ના પાડતા નહીં.. તમે વાપરો છો એ સંચો ખુબ જુનો થઈ ગયો છે.. મેં બચત કરીને પૈસા ભેગા કર્યા છે.. એમાંથી એક નવો સંચો હું લઈ દઈશ..”

  • જયંતીલાલ ચૌહાણ ૯-૮-૨૧
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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐ईर्ष्या💐💐

बहुत पहले की बात है, एक गरीब किसान एक गांव में रहता था। उसके पास एक बहुत छोटा सा खेत था जिसमें कुछ सब्जियां उगा कर वह अपना व अपने परिवार का पेट पालता था।

गरीबी के कारण उसके पास धन की हमेशा कमी रहती थी। वह बहुत ईर्ष्यालु स्वभाव का था। इस कारण उसकी अपने अड़ोसी-पड़ोसी व रिश्तेदारों से बिल्कुल नहीं निभती थी।

किसान की उम्र ढलने लगी थी, अत: उसे खेत पर काम करने में काफी मुश्किल आती थी। खेत जोतने के लिए उसके पास बैल नहीं थे। सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था। खेत में या आस-पास कोई कुआं भी नहीं था, जिससे वह अपने खेतों की सिंचाई कर सके।

एक दिन वह अपने खेत से थका-हारा लौट रहा था। उसे रास्ते में सफेद कपड़ों में सफेद दाढ़ी वाला एक बूढ़ा मिला। बूढ़ा बोला- “क्या बात है भाई, बहुत दुखी जान पड़ते हो?”

किसान बोला- “क्या बताऊं बाबा, मेरे पास धन की बहुत कमी है। मेरे पास एक बैल होता तो मैं खेत की जुताई, बुआई और सिंचाई का सारा काम आराम से कर लेता।”

बूढ़ा बोला- “अगर तुम्हें एक बैल मिल जाए तो तुम क्या करोगे?” “तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा। मेरी खेती का सारा काम बहुत आसान हो जाएगा पर बैल मुझे मिलेगा कहां से?” किसान बोला।

“मैं आज ही तुम्हें एक बैल दिए देता हूं, यह बैल घर ले जाओ और घर जाकर अपने पड़ोसी को मेरे पास भेज देना।” बूढ़े ने कहा।

किसान बोला- “आप मुझे बैल दे देंगे, यह जानकर मुझे बहुत खुशी हुई। परंतु आप मेरे पड़ोसी से क्यों मिलना चाहते हैं?”

बूढ़ा बोला- “अपने पड़ोसी से कहना कि वह मेरे पास आकर दो बैल ले जाए।”

बूढ़े की बात सुनकर किसान को भीतर ही भीतर क्रोध आने लगा। वह ईर्ष्या के कारण जल-भुन कर रह गया। वह बोला- “आप नहीं जानते कि मेरे पड़ोसी के पास सब कुछ है। यदि आप मेरे पड़ोसी को दो बैल देना चाहते हैं तो मुझे एक बैल भी नहीं चाहिए।”

बूढ़े ने बैल को अपनी ओर खींच लिया और कहा- “क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी समस्या क्या है? तुम्हारी समस्या गरीबी नहीं ईर्ष्या है। तुम्हें जो कुछ मिल रहा है, यदि तुम उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते और पड़ोसियों व रिश्तेदारों की सुख-सुविधा से ईर्ष्या नहीं करते तो शायद संसार में सबसे ज्यादा सुखी इंसान बन जाते।” इतना कहकर बूढ़ा जंगल में ओझल हो गया। किसान मनुष्य की ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के बारे में सोचने लगा ।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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