Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🚩नमक जैसी लगती हो🚩
~~~~

एक बार सत्यभामाजी नें श्रीकृष्णसे पूछा, “मैं आप को कैसी लगती हूँ ?

श्रीकृष्णजीनें कहा, तुम मुझे नमक जैसी लगती हो!

सत्यभामाजी इस तुलना को सुन कर क्रुद्ध हो गयीं, तुलना भी की तो किससे! आपको इस संपूर्ण विश्वमें मेरी तुलना करने केलिए और कोई पदार्थ नहीं मिला?

श्रीकृष्णजीनें उस समय तो किसी तरह सत्यभामाजी को मना लिया और उनका गुस्सा शांत कर दिया ।

कुछ दिनोंके पश्चात् श्रीकृष्णजीनें महलमें सहभोजका आयोजन किया। छप्पन भोगकी व्यवस्था हुई।

श्री कृष्ण जी ने सर्वप्रथम सत्यभामाजीसे भोजन प्रारम्भ करनेका आग्रह किया ।

सत्यभामाजीनें पहला कौर मुँहमें डाला मगर यह क्या, सब्जीमें नमक ही नहीं था । कौर को मुँहसे निकाल दिया।

फिर दूसरा कौर मावा-मिश्रीका जिह्वापर रखा और फिर उसे चबाते-चबाते बुरा सा मुँह बनाया और फिर पानीकी सहायतासे किसी तरह क॔ठसे उतारा।

अब तीसरा कौर फिर कचौरीका मुँहमें डाला और फिर.. आक्..थू !

तब तक सत्यभामाजीका पारा सातवें आसमानपर पहुँच चुकाथा। जोरसे चीखीं, किसने बनाईहै यह रसोई?

सत्यभामाजीकी आवाज सुनकर श्रीकृष्ण दौड़ते हुए सत्यभामाजी केपास आये और पूछा, क्या हुआ देवी ? कुछ गड़बड़ हो गयी क्या? इतनी क्रोधित क्यों हो ? तुम्हारा चेहरा इतना तमतमा क्यूँ रहा है ? क्या हो गया ?

सत्यभामाजीनें कहा, किसने कहा था आपको भोजके आयोजन करने को?

इस तरह बिना नमक की कोई रसोई बनती है ? किसी वस्तु में नमक नहीं है। मिठाईमें मिश्री नहीं है। एक कौर भी नहीं खाया गया!

श्रीकृष्णनें बड़े भोलेपनसे पूछा, तो क्या हुआ बिना नमकके ही खा लेती!

सत्यभामाजी फिर क्रुद्ध होकर बोलीं, लगता है दिमाग फिर गयाहै! आपका? बिना माधुरीके मिष्ठान्न तो फिर भी खाया जा सकता है, मगर बिना नमकके कोई भी नमकीन वस्तु नहीं खायी जा सकती!

तब श्रीकृष्णनें कहा, तब फिर उस दिन क्यों गुस्सा हो गयी थी जब मैंने तुम्हे यह कहा कि तुम मुझे नमक जितनी प्रिय हो?

अब सत्यभामाजीको सारी बात समझमें आ गयी, यह सारा वाकया उसे सबक सिखाने के लिए था और उनकी पलकें झुक गयीं!

कथा-मर्म :-

स्त्री, जलकी तरह होतीहै, जिसके साथ मिलतीहै उसका ही गुण अपना लेती है। स्त्री नमककी तरह होतीहै, जो अपना अस्तित्व मिटाकर भी अपने प्रेम-प्यार तथा आदर-सत्कार से परिवारको ऐसा बना देती है।
माला तो आप सबने देखी होगी, तरह-तरह के फूल पिरोये हुवे; पर शायदही कभी किसीनें अच्छीसे अच्छी मालामें अदृश्य उस “सूत” को देखा हो! जिसनें उन सुन्दर सुन्दर फूलोंको एक साथ बाँध रखा है।

लोग प्रशंसा तो उस मालाकी करतेहैं जो दिखाई देतीहै, मगर तब उन्हें उस सूत की याद नहीं आती, जो यदि टूट जाये तो सारे फूल इधर-उधर बिखर जातेहै!

स्त्री उस सूतकी तरह होतीहै जो बिना किसी चाहके , बिना किसी कामनाके , बिना किसी पहचानके , अपना सर्वस्व समर्पित करके भी किसीके परिचयकी मोहताज नहीं होती! और शायद इसीलिए दुनियाँ श्रीरामके पहले सीताजीको और कान्हाजीके पहले राधेजी को याद करती है।

अपने को विलय करके पुरुषोंको सम्पूर्ण करनेकी शक्ति भगवाननें केवल स्त्रियों को ही दिया है।

🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒

शिव कुमार भारद्वाज

Author:

Buy, sell, exchange books

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s