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कर्म पीछा नहीं छोड़ते
एक सेठ जी ने अपने मैनेजर को जरा सी बात पर इतना डांटा— कि
मैनेजर को बहुत गुस्सा आया , पर सेठ जी को कुछ बोल ना सका-वह अपना गुस्सा किस पर निकाले-वो गया सीधा अपने कंपनी स्टाफ
के पास और सारा गुस्सा कर्मचारियों पर निकाल दिया।
अब कर्मचारी किस पर अपना गुस्सा निकाले-तो जाते-जाते अपने गेट वॉचमैन पर उतारते गए-अब वॉचमैन किस पर निकाले अपना गुस्सा-?
-तो वह घर गया और अपनी बीवी को डांटने लगा बिना किसी बात पर।
बीवी भी उठी और अपने बच्चे की पीठ पर 2 धमाक धमाक लगा दिया- सारा दिन tv देखता रहता है काम कुछ करता नहीं है-अब बच्चा घर से गुस्से से निकला, और सड़क पर सो रहे कुत्ते को पत्थर
दे मारा।
-कुत्ता हड़बड़ा कर भागा और सोचने लगा कि इसका मैंने क्या
बिगाड़ा-?
और गुस्से में उस कुत्ते ने एक आदमी को काट खाया ।
और कुत्ते ने जिसे काटा वह आदमी कौन था !
वही सेठ जी थे, जिन्होंने अपने मैनेजर को डांटा था।
-सेठ जी जब तक जिए तब तक यही सोचते रहे कि उस कुत्ते ने आखिर
मुझे क्यों काटा-? जब की वो रोज मेरे पास दुम हिला कर आता था ।
*लेकिन बीज किसने बोया?

  • आया कुछ समझ मेंकर्म के फल पीछा नहीं छोड़ते — जाने अनजाने में कितने लोग हमारे
    व्यवहार से त्रस्त होते हैं, परेशान होते हैं और कितनों का तो बहुत
    नुकसान भी हो जाता है।
    पर हमें तो उसका अंदाजा भी नहीं होता, क्योंकि हम तो अपनी मस्ती में
    ही मस्त है।
    पर ईश्वर सब देखता है और उसका फल फिर किसी ओर के निमित्त से
    हमें मिलता है, और हमें लगता है कि लोग हमें बेवजह ही परेशान कर रहे
    हैं ।।
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🚩नमक जैसी लगती हो🚩
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एक बार सत्यभामाजी नें श्रीकृष्णसे पूछा, “मैं आप को कैसी लगती हूँ ?

श्रीकृष्णजीनें कहा, तुम मुझे नमक जैसी लगती हो!

सत्यभामाजी इस तुलना को सुन कर क्रुद्ध हो गयीं, तुलना भी की तो किससे! आपको इस संपूर्ण विश्वमें मेरी तुलना करने केलिए और कोई पदार्थ नहीं मिला?

श्रीकृष्णजीनें उस समय तो किसी तरह सत्यभामाजी को मना लिया और उनका गुस्सा शांत कर दिया ।

कुछ दिनोंके पश्चात् श्रीकृष्णजीनें महलमें सहभोजका आयोजन किया। छप्पन भोगकी व्यवस्था हुई।

श्री कृष्ण जी ने सर्वप्रथम सत्यभामाजीसे भोजन प्रारम्भ करनेका आग्रह किया ।

सत्यभामाजीनें पहला कौर मुँहमें डाला मगर यह क्या, सब्जीमें नमक ही नहीं था । कौर को मुँहसे निकाल दिया।

फिर दूसरा कौर मावा-मिश्रीका जिह्वापर रखा और फिर उसे चबाते-चबाते बुरा सा मुँह बनाया और फिर पानीकी सहायतासे किसी तरह क॔ठसे उतारा।

अब तीसरा कौर फिर कचौरीका मुँहमें डाला और फिर.. आक्..थू !

तब तक सत्यभामाजीका पारा सातवें आसमानपर पहुँच चुकाथा। जोरसे चीखीं, किसने बनाईहै यह रसोई?

सत्यभामाजीकी आवाज सुनकर श्रीकृष्ण दौड़ते हुए सत्यभामाजी केपास आये और पूछा, क्या हुआ देवी ? कुछ गड़बड़ हो गयी क्या? इतनी क्रोधित क्यों हो ? तुम्हारा चेहरा इतना तमतमा क्यूँ रहा है ? क्या हो गया ?

सत्यभामाजीनें कहा, किसने कहा था आपको भोजके आयोजन करने को?

इस तरह बिना नमक की कोई रसोई बनती है ? किसी वस्तु में नमक नहीं है। मिठाईमें मिश्री नहीं है। एक कौर भी नहीं खाया गया!

श्रीकृष्णनें बड़े भोलेपनसे पूछा, तो क्या हुआ बिना नमकके ही खा लेती!

सत्यभामाजी फिर क्रुद्ध होकर बोलीं, लगता है दिमाग फिर गयाहै! आपका? बिना माधुरीके मिष्ठान्न तो फिर भी खाया जा सकता है, मगर बिना नमकके कोई भी नमकीन वस्तु नहीं खायी जा सकती!

तब श्रीकृष्णनें कहा, तब फिर उस दिन क्यों गुस्सा हो गयी थी जब मैंने तुम्हे यह कहा कि तुम मुझे नमक जितनी प्रिय हो?

अब सत्यभामाजीको सारी बात समझमें आ गयी, यह सारा वाकया उसे सबक सिखाने के लिए था और उनकी पलकें झुक गयीं!

कथा-मर्म :-

स्त्री, जलकी तरह होतीहै, जिसके साथ मिलतीहै उसका ही गुण अपना लेती है। स्त्री नमककी तरह होतीहै, जो अपना अस्तित्व मिटाकर भी अपने प्रेम-प्यार तथा आदर-सत्कार से परिवारको ऐसा बना देती है।
माला तो आप सबने देखी होगी, तरह-तरह के फूल पिरोये हुवे; पर शायदही कभी किसीनें अच्छीसे अच्छी मालामें अदृश्य उस “सूत” को देखा हो! जिसनें उन सुन्दर सुन्दर फूलोंको एक साथ बाँध रखा है।

लोग प्रशंसा तो उस मालाकी करतेहैं जो दिखाई देतीहै, मगर तब उन्हें उस सूत की याद नहीं आती, जो यदि टूट जाये तो सारे फूल इधर-उधर बिखर जातेहै!

स्त्री उस सूतकी तरह होतीहै जो बिना किसी चाहके , बिना किसी कामनाके , बिना किसी पहचानके , अपना सर्वस्व समर्पित करके भी किसीके परिचयकी मोहताज नहीं होती! और शायद इसीलिए दुनियाँ श्रीरामके पहले सीताजीको और कान्हाजीके पहले राधेजी को याद करती है।

अपने को विलय करके पुरुषोंको सम्पूर्ण करनेकी शक्ति भगवाननें केवल स्त्रियों को ही दिया है।

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शिव कुमार भारद्वाज

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❣ ♤ मन की हालत ♤ ❣
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एक सेठ ने पंडित जी को निमंत्रण दिया
पर पंडित जी का एकादशी का व्रत था,
तो पंडित जी नहीं जा सके, पर उन्होंने
अपने दो शिष्यों को सेठ के यहाँ
भोजन के लिए भेज दिया.

जब दोनों शिष्य वापस लौटे, तो 

एक शिष्य दुखी और दूसरा प्रसन्न था.

    पंडित जी को आश्चर्य हुआ,

उन्होंने पूछा ~ बेटा, दुखी क्यों हो ?

क्या सेठ ने भोजन में अंतर कर दिया ?
नहीं , गुरुजी !

क्या सेठ ने आसन में अंतर कर दिया ?
नहीं , गुरुजी !

क्या सेठ ने दक्षिणा में अंतर कर दिया ?
नहीं , गुरुजी ! बराबर दक्षिणा दी.
2 रुपये मुझे और 2 रुपये दूसरे को.

अब तो गुरुजी को और भी आश्चर्य हुआ.
और पूछा ~ फिर क्या कारण है,
जो तुम दुखी हो ?

तब दुखी चेला बोला ~ गुरु जी !
मैं तो सोचता था,
सेठ बहुत बड़ा आदमी है.
कम से कम 10 रुपये दक्षिणा त़ो देगा,
पर उसने 2 रुपये ही दिये.
इसलिए मैं दुखी हूँ.
📍
अब दूसरे से पूछा ~
तुम क्यों प्रसन्न हो ?

   तो दूसरा बोला ~ गुरु जी !

मैं जानता था, सेठ बहुत कंजूस है.
आठ आने से ज्यादा दक्षिणा नहीं देगा,
पर उसने 2 रुपए दे दिये तो मैं प्रसन्न हूँ.

🔘

◆ बस यही हमारे मन का हाल है. ◆
संसार में घटनाएं
समान रूप से घटती हैं
पर कोई उन्हीं घटनाओं से
सुख प्राप्त करता है,
कोई दुखी होता है.

   ❗ पर असल में ❗
     न दुख है , न सुख.
   ये हमारे मन की स्थिति पर 
            निर्भर है.

इसलिए …
मन को प्रभु चरणों मे लगाओ.
कामना पूरी न हो, तो दुख .. और
कामना पूरी हो जाये, तो सुख.
लेकिन …
यदि कोई कामना ही न हो,
तो आनंद ही आनंद.

                ¸.•*""*•.¸ 
                Զเधे Զเधे
                ❋━━❥

╲\╭┓
╭ 🌸 ╯ प्रेषक ~ शिव शुक्ल ~ ‘शिशु’
┗╯\╲☆ ● ════════❥ ❥ ❥

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ईश्वर का गणित

एक बार दो आदमी एक मंदिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे । वहां अंधेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे ।
थोड़ी देर में वहां एक आदमी आया और वो भी उन दोनों के साथ बैठकर गपशप करने लगा ।

कुछ देर बाद वो आदमी बोला उसे बहुत भूख लग रही है, उन दोनों को भी भूख लगने लगी थी ।
पहला आदमी बोला मेरे पास 3 रोटी हैं, दूसरा बोला मेरे पास 5 रोटी हैं, हम तीनों मिल बांट कर खा लेते हैं।

उसके बाद सवाल आया कि 8 (3+5) रोटी तीन आदमियों में कैसे बांट पाएंगे ??

पहले आदमी ने राय दी कि ऐसा करते हैं कि हर रोटी के 3 टुकडे करते हैं, अर्थात 8 रोटी के 24 टुकडे (8 X 3 = 24) हो जाएंगे और हम तीनों में 8 – 8 टुकड़े बराबर बराबर बंट जाएंगे।

    तीनों को उसकी राय अच्छी लगी और 8 रोटी के 24 टुकडे करके प्रत्येक ने 8 – 8 रोटी के टुकड़े खाकर भूख शांत की और फिर बारिश के कारण मंदिर के प्रांगण में ही सो गए ।

सुबह उठने पर तीसरे आदमी ने उनके उपकार के लिए दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से 8 रोटी के टुकड़ों के बदले दोनों को उपहार स्वरूप 8 सोने की गिन्नी देकर अपने घर की ओर चला गया।

उसके जाने के बाद दूसरे आदमी ने  पहले आदमी से कहा हम दोनों 4 – 4 गिन्नी बांट लेते हैं ।

पहला आदमी बोला नहीं मेरी 3 रोटी थी और तुम्हारी  5 रोटी थी, अतः मैं 3 गिन्नी लुंगा, तुम्हें 5 गिन्नी रखनी होगी।

इस पर दोनों में बहस होने लगी।

इसके बाद वे दोनों समाधान के लिये मंदिर के पुजारी के पास गए और उन्हें  समस्या बताई तथा  समाधान के लिए प्रार्थना की ।

पुजारी भी असमंजस में पड़ गया, दोनों  दूसरे को ज्यादा  देने के लिये लड़ रहे है ।  पुजारी ने कहा तुम लोग ये 8 गिन्नियाँ मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो, मैं कल सवेरे जवाब दे पाऊंगा ।

पुजारी को दिल में वैसे तो दूसरे आदमी की 3-5 की बात ठीक लग रही थी पर फिर भी वह गहराई से सोचते-सोचते गहरी नींद में सो गया।

कुछ देर बाद उसके सपने में भगवान प्रगट हुए तो पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायिक मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की और बताया कि मेरे ख्याल से 3 – 5 बंटवारा ही उचित लगता है।

भगवान मुस्कुरा कर बोले- नहीं, पहले आदमी को 1 गिन्नी मिलनी चाहिए और दूसरे आदमी को 7 गिन्नी मिलनी चाहिए ।

भगवान की बात सुनकर पुजारी अचंभित हो गया और अचरज से पूछा- प्रभु, ऐसा कैसे  ?

भगवन फिर एक बार मुस्कुराए और बोले :

इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी 3 रोटी के 9 टुकड़े किये परंतु उन 9 में से उसने सिर्फ 1 बांटा और 8 टुकड़े स्वयं खाया अर्थात उसका त्याग सिर्फ 1 रोटी के टुकड़े का था इसलिए वो सिर्फ 1 गिन्नी का ही हकदार है ।

    दूसरे आदमी ने अपनी 5 रोटी के 15 टुकड़े किये जिसमें से 8 टुकड़े उसने स्वयं खाऐ और 7 टुकड़े उसने बांट दिए । इसलिए वो न्यायानुसार 7 गिन्नी का हकदार है .. ये ही मेरा गणित है और ये ही मेरा न्याय है  !

ईश्वर की न्याय का सटिक विश्लेषण सुनकर पुजारी  नतमस्तक हो गया।

उपरोक्त का सार ये ही है कि हमारी वस्तुस्थिति को देखने की, समझने की दृष्टि और ईश्वर का दृष्टिकोण एकदम भिन्न है । हम ईश्वरीय न्यायलीला को जानने समझने में सर्वथा अज्ञानी हैं।
  
हम अपने त्याग का गुणगान करते है, परंतु ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य एवं भोग तौल कर यथोचित निर्णय करते हैं।

यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम कितने धन संपन्न है, महत्वपूर्ण यहीं है कि हमारे सेवाभाव कार्य में त्याग कितना है।

आपका दिन शुभ हो 🙏🏻😊

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🌹”शिव-पूजा का फल”🌹

🙏🌹Om Shanti🌹🙏

     मथुरा नगरमें दाशार्ह नामक एक यदुवंशी राजा राज्य करता था। वह बड़ा ही गुणवान्, उदार और शूर था। उसके राज्य में प्रजा और ब्राह्मण बहुत ही सुख-शान्ति से रहते थे। पड़ोस के राजा उसका लोहा मानते थे। राजा की स्त्री भी अत्यन्त रूपवती और परम पतिव्रता थी। उसका नाम कलावती था। 
     एक दिन राजा कामातुर हो अपनी रानी के पास रंगमहल में गया। रानी उस दिन व्रत करके शिव की उपासना में रत थी। उसने राजा को अपने पास आने से मना किया, क्योंकि शास्त्र का आदेश है कि व्रतस्थ स्त्री के साथ पुरुष का समागम नहीं होना चाहिये। परंतु राजा ने न माना, वह जबरदस्ती रानी का आलिङ्गन करने के लिये आगे बढ़ा; किंतु जैसे ही रानी के समीप पहुँचा उसके शरीर के ताप से वह जलने लगा। तब उसने चकित होकर इस ताप का कारण पूछा। 

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     रानी ने उत्तर दिया-'महाराज ! मैंने शिवमन्त्र की दीक्षा ली है, उसी के जप की यह महिमा है कि कोई भी मनुष्य मुझे व्रत से च्युत नहीं कर सकता। आप भी चाहें तो गर्गमुनि से इस मन्त्र की दीक्षा ले अपने को निष्पाप और सुरक्षित बना सकते हैं।' कलावती के मुख से इस बात को सुनते ही राजा बहुत प्रसन्न हुआ और गर्गमुनि के आश्रम में पहुँचा। मुनि को साष्टङ्ग प्रणाम कर राजा ने शिवषडक्षरी-मन्त्र के उपदेश के लिये उनसे प्रार्थना की। 
      मुनि ने राजा को यमुना में स्नान करवाकर शिव की षोडशोपचार पूजा करवायी। तत्पश्चात् राजा ने मुनि का दिव्य रत्नों से अभिषेक किया। इससे प्रसन्न हो मुनि ने अपना वरद हस्त राजा के मस्तक पर रखा और उसे षडक्षरी-मन्त्र का उपदेश दिया। मन्त्र के कान में पड़ते ही राजा के हृदयाकाश में ज्ञान-सूर्य का उदय हुआ और उसका आज्ञानान्धकार नष्ट हो गया।
     उस मन्त्र का ऐसा विलक्षण प्रभाव दिखलायी दिया कि क्षण भर में राजा के सारे पाप उसके शरीर से कौओं के रूप में बाहर निकल गड़े। उनमें से कितनों के पंख जले हुए थे और कितने तड़फड़ाकर जमीन पर गिरते जाते थे। जिस प्रकार दावाग्नि से कंटक-वन दग्ध हो जाता है, वैसे ही पापरूप कौओं के भस्मीभूत होने से राजा को महान् आश्चर्य हुआ। उसने गर्गमुनि से पूछा कि 'एकाएक मेरा शरीर ऐसा दिव्य कैसे हो गया ?' 
      मुनि बोले-'ये जो कौए तुम्हारे देह से निकले हैं सो जन्म-जन्मान्तर के पाप हैं।' राजा ने शिवमन्त्र के उपदेश के द्वारा निष्पाप बनाने वाले उन परमगुरु गर्गमुनि को बारम्बार प्रणाम कर उनसे विदा माँग अपने घर को प्रस्थान किया          

🌹”ॐ नम: शिवाय”🌹

🌹जय शिवशक्ति🌹
🌹🌹जय माँ भवानी🌹🌹

शिव कुमार भारद्वाज

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अहिरावण कथा ! 🔔

🐒🐒 पंचमुखी क्यों हुए हनुमानजी ? 🐒🐒

लंका में महा बलशाली मेघनाद के साथ बड़ा ही भीषण युद्ध चला. अंतत: मेघनाद मारा गया. रावण जो अब तक मद में चूर था राम सेना, खास तौर पर लक्ष्मण का पराक्रम सुनकर थोड़ा तनाव में आया.

रावण को कुछ दुःखी देखकर रावण की मां कैकसी ने उसके पाताल में बसे दो भाइयों अहिरावण और महिरावण की याद दिलाई. रावण को याद आया कि यह दोनों तो उसके बचपन के मित्र रहे हैं.

लंका का राजा बनने के बाद उनकी सुध ही नहीं रही थी. रावण यह भली प्रकार जानता था कि अहिरावण व महिरावण तंत्र-मंत्र के महा पंडित, जादू टोने के धनी और मां कामाक्षी के परम भक्त हैं.

रावण ने उन्हें बुला भेजा और कहा कि वह अपने छल बल, कौशल से श्री राम व लक्ष्मण का सफाया कर दे. यह बात दूतों के जरिए विभीषण को पता लग गयी. युद्ध में अहिरावण व महिरावण जैसे परम मायावी के शामिल होने से विभीषण चिंता में पड़ गए.

विभीषण को लगा कि भगवान श्री राम और लक्ष्मण की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करनी पड़ेगी. इसके लिए उन्हें सबसे बेहतर लगा कि इसका जिम्मा परम वीर हनुमान जी को राम-लक्ष्मण को सौंप कर दिया जाए. साथ ही वे अपने भी निगरानी में लगे थे.

राम-लक्ष्मण की कुटिया लंका में सुवेल पर्वत पर बनी थी. हनुमान जी ने भगवान श्री राम की कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा खींच दिया. कोई जादू टोना तंत्र-मंत्र का असर या मायावी राक्षस इसके भीतर नहीं घुस सकता था.

अहिरावण और महिरावण श्री राम और लक्ष्मण को मारने उनकी कुटिया तक पहुंचे, पर इस सुरक्षा घेरे के आगे उनकी एक न चली, असफल रहे. ऐसे में उन्होंने एक चाल चली. महिरावण विभीषण का रूप धर के कुटिया में घुस गया.

राम व लक्ष्मण पत्थर की सपाट शिलाओं पर गहरी नींद सो रहे थे. दोनों राक्षसों ने बिना आहट के शिला समेत दोनो भाइयों को उठा लिया और अपने निवास पाताल की ओर लेकर चल दिए.

विभीषण लगातार सतर्क थे. उन्हें कुछ देर में ही पता चल गया कि कोई अनहोनी घट चुकी है. विभीषण को महिरावण पर शक था, उन्हें राम-लक्ष्मण की जान की चिंता सताने लगी.

विभीषण ने हनुमान जी को महिरावण के बारे में बताते हुए कहा कि वे उसका पीछा करें. लंका में अपने रूप में घूमना राम भक्त हनुमान के लिए ठीक न था, सो उन्होंने पक्षी का रूप धारण कर लिया और पक्षी का रूप में ही निकुंभला नगर पहुंच गये.

निकुंभला नगरी में पक्षी रूप धरे हनुमान जी ने कबूतर और कबूतरी को आपस में बतियाते सुना. कबूतर, कबूतरी से कह रहा था कि अब रावण की जीत पक्की है. अहिरावण व महिरावण राम-लक्ष्मण को बलि चढा देंगे. बस सारा युद्ध समाप्त.

कबूतर की बातों से ही बजरंग बली को पता चला कि दोनों राक्षस राम लक्ष्मण को सोते में ही उठाकर कामाक्षी देवी को बलि चढाने पाताल लोक ले गये हैं. हनुमान जी वायु वेग से रसातल की और बढे और तुरंत वहां पहुंचे.

हनुमान जी को रसातल के प्रवेश द्वार पर एक अद्भुत पहरेदार मिला. इसका आधा शरीर वानर का और आधा मछली का था. उसने हनुमान जी को पाताल में प्रवेश से रोक दिया.

द्वारपाल हनुमान जी से बोला कि मुझ को परास्त किए बिना तुम्हारा भीतर जाना असंभव है. दोनों में लड़ाई ठन गयी. हनुमान जी की आशा के विपरीत यह बड़ा ही बलशाली और कुशल योद्धा निकला.

दोनों ही बड़े बलशाली थे. दोनों में बहुत भयंकर युद्ध हुआ, परंतु वह बजरंग बली के आगे न टिक सका. आखिर कार हनुमान जी ने उसे हरा तो दिया पर उस द्वारपाल की प्रशंसा करने से नहीं रह सके.

हनुमान जी ने उस वीर से पूछा कि हे वीर तुम अपना परिचय दो. तुम्हारा स्वरूप भी कुछ ऐसा है कि उससे कौतुहल हो रहा है. उस वीर ने उत्तर दिया- मैं हनुमान का पुत्र हूं और एक मछली से पैदा हुआ हूं. मेरा नाम है मकरध्वज.

हनुमान जी ने यह सुना तो आश्चर्य में पड़ गए. वह वीर की बात सुनने लगे. मकरध्वज ने कहा- लंका दहन के बाद हनुमान जी समुद्र में अपनी अग्नि शांत करने पहुंचे. उनके शरीर से पसीने के रूप में तेज गिरा.

उस समय मेरी मां ने आहार के लिए मुख खोला था. वह तेज मेरी माता ने अपने मुख में ले लिया और गर्भवती हो गई. उसी से मेरा जन्म हुआ है. हनुमान जी ने जब यह सुना तो मकरध्वज को बताया कि वह ही हनुमान हैं.

मकरध्वज ने हनुमान जी के चरण स्पर्श किए और हनुमान जी ने भी अपने बेटे को गले लगा लिया और वहां आने का पूरा कारण बताया. उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि अपने पिता के स्वामी की रक्षा में सहायता करो.

मकरध्वज ने हनुमान जी को बताया कि कुछ ही देर में राक्षस बलि के लिए आने वाले हैं. बेहतर होगा कि आप रूप बदल कर कामाक्षी के मंदिर में जा कर बैठ जाएं. उनको सारी पूजा झरोखे से करने को कहें.

हनुमान जी ने पहले तो मधु मक्खी का वेश धरा और मां कामाक्षी के मंदिर में घुस गये. हनुमान जी ने मां कामाक्षी को नमस्कार कर सफलता की कामनाकी और फिर पूछा- हे मां क्या आप वास्तव में श्री राम जी और लक्ष्मण जी की बलि चाहती हैं ?

हनुमान जी के इस प्रश्न पर मां कामाक्षी ने उत्तर दिया कि नहीं. मैं तो दुष्ट अहिरावण व महिरावण की बलि चाहती हूं. यह दोनों मेरे भक्त तो हैं पर अधर्मी और अत्याचारी भी हैं. आप अपने प्रयत्न करो. सफल रहोगे.

मंदिर में पांच दीप जल रहे थे. अलग-अलग दिशाओं और स्थान पर मां ने कहा यह दीप अहिरावण ने मेरी प्रसन्नता के लिए जलाये हैं जिस दिन ये एक साथ बुझा दिए जा सकेंगे, उसका अंत सुनिश्चित हो सकेगा.

इस बीच गाजे-बाजे का शोर सुनाई पड़ने लगा. अहिरावण, महिरावण बलि चढाने के लिए आ रहे थे. हनुमान जी ने अब मां कामाक्षी का रूप धरा. जब अहिरावण और महिरावण मंदिर में प्रवेश करने ही वाले थे कि हनुमान जी का महिला स्वर गूंजा.

हनुमान जी बोले- मैं कामाक्षी देवी हूं और आज मेरी पूजा झरोखे से करो. झरोखे से पूजा आरंभ हुई ढेर सारा चढावा मां कामाक्षी को झरोखे से चढाया जाने लगा. अंत में बंधक बलि के रूप में राम लक्ष्मण को भी उसी से डाला गया. दोनों बंधन में बेहोश थे.

हनुमान जी ने तुरंत उन्हें बंधन मुक्त किया. अब पाताल लोक से निकलने की बारी थी, पर उससे पहले मां कामाक्षी के सामने अहिरावण महिरावण की बलि देकर उनकी इच्छा पूरी करना और दोनों राक्षसों को उनके किए की सज़ा देना शेष था.

अब हनुमान जी ने मकरध्वज को कहा कि वह अचेत अवस्था में लेटे हुए भगवान राम और लक्ष्मण का खास ख्याल रखे और उसके साथ मिलकर दोनों राक्षसों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.

पर यह युद्ध आसान न था. अहिरावण और महिरावण बडी मुश्किल से मरते तो फिर पाँच पाँच के रूप में जिदां हो जाते. इस विकट स्थिति में मकरध्वज ने बताया कि अहिरावण की एक पत्नी नागकन्या है.

अहिरावण उसे बलात् हर लाया है. वह उसे पसंद नहीं करती, पर मन मार के उसके साथ है, वह अहिरावण के राज जानती होगी. उससे उसकी मौत का उपाय पूछा जाये. आप उसके पास जाएं और सहायता मांगे.

मकरध्वज ने राक्षसों को युद्ध में उलझाये रखा और उधर हनुमान अहिरावण की पत्नी के पास पहुंचे. नागकन्या से उन्होंने कहा कि यदि तुम अहिरावण के मृत्यु का भेद बता दो तो हम उसे मारकर तुम्हें उसके चंगुल से मुक्ति दिला देंगे.

अहिरावण की पत्नी ने कहा- मेरा नाम चित्रसेना है. मैं भगवान विष्णु की भक्त हूं. मेरे रूप पर अहिरावण मर मिटा और मेरा अपहरण कर यहां कैद किये हुए है, पर मैं उसे नहीं चाहती. लेकिन मैं अहिरावण का भेद तभी बताउंगी, जब मेरी इच्छा पूरी की जायेगी.

हनुमान जी ने अहिरावण की पत्नी नागकन्या चित्रसेना से पूछा कि आप अहिरावण की मृत्यु का रहस्य बताने के बदले में क्या चाहती हैं ? आप मुझसे अपनी शर्त बताएं, मैं उसे जरूर मानूंगा.

चित्रसेना ने कहा- दुर्भाग्य से अहिरावण जैसा असुर मुझे हर लाया. इससे मेरा जीवन खराब हो गया. मैं अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना चाहती हूं. आप अगर मेरा विवाह श्री राम से कराने का वचन दें तो मैं अहिरावण के वध का रहस्य बताऊंगी.

हनुमान जी सोच में पड़ गए. भगवान श्री राम तो एक पत्नी निष्ठ हैं. अपनी धर्म पत्नी देवी सीता को मुक्त कराने के लिए असुरों से युद्ध कर रहे हैं. वह किसी और से विवाह की बात तो कभी न स्वीकारेंगे. मैं कैसे वचन दे सकता हूं ?

फिर सोचने लगे कि यदि समय पर उचित निर्णय न लिया तो स्वामी के प्राण ही संकट में हैं. असमंजस की स्थिति में बेचैन हनुमानजी ने ऐसी राह निकाली कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

हनुमान जी बोले- तुम्हारी शर्त स्वीकार है, पर हमारी भी एक शर्त है. यह विवाह तभी होगा, जब तुम्हारे साथ भगवान राम जिस पलंग पर आसीन होंगे, वह सही सलामत रहना चाहिए. यदि वह टूटा तो इसे अपशकुन मांगकर वचन से पीछे हट जाऊंगा.

जब महाकाय अहिरावण के बैठने से पलंग नहीं टूटता तो भला श्रीराम के बैठने से कैसे टूटेगा !

यह सोच कर चित्रसेना तैयार हो गयी. उसने अहिरावण समेत सभी राक्षसों के अंत का सारा भेद बता दिया.

चित्रसेना ने कहा- दोनों राक्षसों के बचपन की बात है. इन दोनों के कुछ शरारती राक्षस मित्रों ने कहीं से एक भ्रामरी को पकड़ लिया. मनोरंजन के लिए वे उसे भ्रामरी को बार-बार काटों से छेड रहे थे.

भ्रामरी साधारण भ्रामरी न थी. वह भी बहुत मायावी थी, किंतु किसी कारण वश वह पकड़ में आ गई थी. भ्रामरी की पीड़ा सुनकर अहिरावण और महिरावण को दया आ गई और अपने मित्रों से लड़ कर उसे छुड़ा दिया.

मायावी भ्रामरी का पति भी अपनी पत्नी की पीड़ा सुनकर आया था. अपनी पत्नी की मुक्ति से प्रसन्न होकर उस भौंरे ने वचन दिया थ कि तुम्हारे उपकार का बदला हम सभी भ्रमर जाति मिलकर चुकाएंगे.

ये भौंरें अधिकतर उसके शयन कक्ष के पास रहते हैं. ये सब बड़ी भारी संख्या में हैं. दोनों राक्षसों को जब भी मारने का प्रयास हुआ है और ये मरने को हो हो जाते हैं तब भ्रमर उनके मुख में एक बूंद अमृत का डाल देते हैं.

उस अमृत के कारण ये दोनों राक्षस मरकर भी जिंदा हो जाते हैं. इनके कई-कई रूप उसी अमृत के कारण हैं. इन्हें जितनी बार फिर से जीवन दिया गया उनके उतने नए रूप बन गए हैं. इस लिए आपको पहले इन भंवरों को मारना होगा.

हनुमान जी रहस्य जानकर लौटे. मकरध्वज ने अहिरावण को युद्ध में उलझा रखा था. तो हनुमान जी ने भंवरों का खात्मा शुरू किया. वे आखिर हनुमान जी के सामने कहां तक टिकते.

जब सारे भ्रमर खत्म हो गए और केवल एक बचा तो वह हनुमान जी के चरणों में लोट गया. उसने हनुमान जी से प्राण रक्षा की याचना की. हनुमान जी पसीज गए. उन्होंने उसे क्षमा करते हुए एक काम सौंपा.

हनुमान जी बोले- मैं तुम्हें प्राण दान देता हूं पर इस शर्त पर कि तुम यहां से तुरंत चले जाओगे और अहिरावण की पत्नी के पलंग की पाटी में घुसकर जल्दी से जल्दी उसे पूरी तरह खोखला बना दोगे.

भंवरा तत्काल चित्रसेना के पलंग की पाटी में घुसने के लिए प्रस्थान कर गया. इधर अहिरावण और महिरावण को अपने चमत्कार के लुप्त होने से बहुत अचरज हुआ पर उन्होंने मायावी युद्ध जारी रखा.

भ्रमरों को हनुमान जी ने समाप्त कर दिया फिर भी हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों अहिरावण और महिरावण का अंत नहीं हो पा रहा था. यह देखकर हनुमान जी कुछ चिंतित हुए.

फिर उन्हें कामाक्षी देवी का वचन याद आया. देवी ने बताया था कि अहिरावण की सिद्धि है कि जब पांचो दीपकों एक साथ बुझेंगे तभी वे नए-नए रूप धारण करने में असमर्थ होंगे और उनका वध हो सकेगा.

हनुमान जी ने तत्काल पंचमुखी रूप धारण कर लिया. उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख.

उसके बाद हनुमान जी ने अपने पांचों मुख द्वारा एक साथ पांचों दीपक बुझा दिए. अब उनके बार बार पैदा होने और लंबे समय तक जिंदा रहने की सारी आशंकायें समाप्त हो गयीं थी. हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों शीघ्र ही दोनों राक्षस मारे गये.

इसके बाद उन्होंने श्री राम और लक्ष्मण जी की मूर्च्छा दूर करने के उपाय किए. दोनो भाई होश में आ गए. चित्रसेना भी वहां आ गई थी. हनुमान जी ने कहा- प्रभो ! अब आप अहिरावण और महिरावण के छल और बंधन से मुक्त हुए.

पर इसके लिए हमें इस नागकन्या की सहायता लेनी पड़ी थी. अहिरावण इसे बल पूर्वक उठा लाया था. वह आपसे विवाह करना चाहती है. कृपया उससे विवाह कर अपने साथ ले चलें. इससे उसे भी मुक्ति मिलेगी.

श्री राम हनुमान जी की बात सुनकर चकराए. इससे पहले कि वह कुछ कह पाते हनुमान जी ने ही कह दिया- भगवन आप तो मुक्तिदाता हैं. अहिरावण को मारने का भेद इसी ने बताया है. इसके बिना हम उसे मारकर आपको बचाने में सफल न हो पाते.

कृपा निधान इसे भी मुक्ति मिलनी चाहिए. परंतु आप चिंता न करें. हम सबका जीवन बचाने वाले के प्रति बस इतना कीजिए कि आप बस इस पलंग पर बैठिए, बाकी का काम मैं संपन्न करवाता हूं.

हनुमान जी इतनी तेजी से सारे कार्य करते जा रहे थे कि इससे श्री राम जी और लक्ष्मण जी दोनों चिंता में पड़ गये. वह कोई कदम उठाते कि तब तक हनुमान जी ने भगवान राम की बांह पकड़ ली.

हनुमान जी ने भावावेश में प्रभु श्री राम की बांह पकड़ कर चित्रसेना के उस सजे-धजे विशाल पलंग पर बिठा दिया. श्री राम कुछ समझ पाते कि तभी पलंग की खोखली पाटी चरमरा कर टूट गयी.

पलंग धराशायी हो गया. चित्रसेना भी जमीन पर आ गिरी. हनुमान जी हंस पड़े और फिर चित्रसेना से बोले- अब तुम्हारी शर्त तो पूरी हुई नहीं, इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता. तुम मुक्त हो और हम तुम्हें तुम्हारे लोक भेजने का प्रबंध करते हैं.

चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है. उसने कहा कि उसके साथ छल हुआ है. मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक उनके सामने किसी के साथ छल करें, यह तो बहुत अनुचित है. मैं हनुमान को श्राप दूंगी.

चित्रसेना हनुमान जी को श्राप देने ही जा ही रही थी कि श्री राम का सम्मोहन भंग हुआ. वह इस पूरे नाटक को समझ गये. उन्होंने चित्रसेना को समझाया- मैंने एक पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिया है. इस लिए हनुमान जी को यह करना पड़ा. उन्हें क्षमा कर दो.

क्रुद्ध चित्रसेना तो उनसे विवाह की जिद पकड़े बैठी थी. श्री राम ने कहा- मैं जब द्वापर में श्री कृष्ण अवतार लूंगा, तब तुम्हें सत्यभामा के रूप में अपनी पटरानी बनाउंगा. इससे वह मान गयी.

हनुमान जी ने चित्रसेना को उसके पिता के पास पहुंचा दिया. चित्रसेना को प्रभु ने अगले जन्म में पत्नी बनाने का वरदान दिया था. भगवान विष्णु की पत्नी बनने की चाह में उसने स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया.

श्री राम और लक्ष्मण, मकरध्वज और हनुमान जी सहित वापस लंका में सुवेल पर्वत पर लौट आये.

!! जय श्री राम !!
निकला मित्र सवेरा घंटिया धन-धन बाजी
सुना राम के गीत रामधन मन में साजी
!! जय श्री राम !!

(यह प्रसंग स्कंद पुराण और आनंद रामायण के सारकांण्ड की कथा से लिया गया है ।

शिव कुमार भारद्वाज

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सावन सोमबार की पवित्र और पौराणिक कथा !!

श्रावण सोमवार की कथा के अनुसार अमरपुर नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। नगर में उस व्यापारी का सभी लोग मान-सम्मान करते थे। इतना सबकुछ होने पर भी वह व्यापारी अंतरमन से बहुत दुखी था, क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था।
दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा।
पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था।
उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वतीजी ने भगवान शिव से कहा- ‘हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।’
भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- ‘हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।’
इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- ‘नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।’
पार्वतीजी का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- ‘तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं, लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।’
उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।
भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया।
व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई, क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम ‘अमर’ रखा।जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और कहा कि अमर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। अमर अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।
लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में पहुंचे। उस नगर के राजा की कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था। निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इंकार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी।
वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा, क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं? विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा।
वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से बात की। दीपचंद ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया।
अमर जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया- ‘राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।’
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इंकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया। अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया।
जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न-वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण-पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा- ‘प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।’
भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले- ‘पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।’
पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- ‘हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें, नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।’
पार्वतीजी के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा।शिक्षा समाप्त करके अमर मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।
राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन-वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।
रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा दीपचंद ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था। भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे।
व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- ‘हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।’ व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में खुशियां लौट आईं शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-पुरुष सावन के सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं

🙏🌹❤️🙏🌹❤️ Rakesh Kumar 🙏🌹❤️🙏🌹❤️

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एक बार एक संत एक नदी के किनारे के रास्ते से जा रहे थे। तभी अचानक एक जगह उन्होंने देखा कि नदी की सतह से एक कछुआ निकला और पानी के बिलकुल किनारे पर आ गया।

उसी किनारे से एक बड़े ही जहरीले बिच्छु ने नदी के अन्दर छलांग लगाई और कछुए की पीठ पर सवार हो गया। कछुए ने तैरना शुरू कर दिया।

पूरा दृश्य देख वह संत बड़े हैरान हुए।

उन्होंने उस कछुए का पीछा करने की ठान ली। इसलिए उन्होंने नदी में तैर कर उस कछुए का पीछा करना शुरू किया। वह कछुआ नदी के दूसरे किनारे पर जाकर रूक गया और बिच्छू उसकी पीठ से छलांग लगाकर दूसरे किनारे पर चढ़ गया और आगे चलना शरू कर दिया।

संत भी उसके पीछे चलते रहे। आगे जाकर उन्होंने देखा कि जिस तरफ बिच्छू जा रहा था, उसके रास्ते में एक आदमी बड़े ध्यान में आँखे बन्द कर प्रभु की भक्ति में लगा हुआ था।

उस संत ने सोचा कि अगर यह बिच्छू उस आदमी को काटना चाहेगा तो मैं उसके करीब पहुंचने से पहले ही उसे अपनी लाठी से मार डालूंगा।

लेकिन वह चंद कदम आगे बढे ही थे कि उन्होंने देखा दूसरी तरफ से एक काला जहरीला साँप तेजी से उस आदमी को डंसने के लिए आगे बढ़ रहा था। इतने में बिच्छू भी वहां पहुंच गया।

उस बिच्छू ने ठीक उसी हालत में सांप को डंक मार कर उसे बेसुध कर दिया । बिच्छू का जहर सांप के जिस्म में दाखिल हो गया और वह सांप वहीं अचेत हो कर गिर पड़ा था। इसके बाद वह बिच्छू अपने रास्ते पर वापस चला गया।

थोड़ी देर बाद जब वह आदमी भगवान की पूजा से उठा, तब उस संत ने उसे बताया कि प्रभु ने तेरी हिफाजत के लिए कैसे उस कछुए को नदी के किनारे लाया , फिर कैसे उस बिच्छु को कछुए की पीठ पर बैठा कर साँप से तेरी रक्षा के लिए भेजा ।

वह आदमी उस अचेत पड़े सांप को देखकर हैरान रह गया। उसकी आंखों से आंसू निकल आए और वह आँखें बन्द कर भगवान को याद कर उनका शुक्रिया अदा करने लगा ।

संत ने उस आदमी से कहा -बेटा, जब मैं स्वयं जो तुम्हें जानता तक नही,तुम्हारी जान बचाने के लिए लाठी लेकर नदी पार करते हुए यहाँ तक आ सकता हूँ तो फिर तू जिस प्रभु की आराधना में लीन था, वो तुम्हारी हिफाज़त कैसे न करता । प्रभु हमेशा अपनी भक्तों की हिफाज़त करते हैं, ये एक बार फिर सिद्ध हो गया ।

संजीव बल्यं

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🙏 करुणानिधि की करुणा 🙏
अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन तो भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहती

जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले… तो काल आया और जैसे ही काल आया …
तो गिद्धराज जटायु ने मौत को ललकार कहा, —

” खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना… मैं मृत्यु को स्वीकार तो करूँगा… लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकता… जब तक मैं सीता जी की सुधि प्रभु ” श्रीराम ” को नहीं सुना देता…!

मौत उन्हें छू नहीं पा रही है… काँप रही है खड़ी हो कर…
मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही… यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला।

किन्तु महाभारत के भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मौत का इंतजार करते रहे… आँखों में आँसू हैं … रो रहे हैं… भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं…!
कितना अलौकिक है यह दृश्य … रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं…
प्रभु ” श्रीराम ” रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं…
वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान ” श्रीकृष्ण ” हँस रहे हैं… भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं… ?

अंत समय में जटायु को प्रभु ” श्रीराम ” की गोद की शय्या मिली… लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली….!
जटायु अपने कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहा है….

प्रभु ” श्रीराम ” की शरण में….. और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं….
ऐसा अंतर क्यों?…

ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था… विरोध नहीं कर पाये थे …!
दुःशासन को ललकार देते… दुर्योधन को ललकार देते… लेकिन द्रौपदी रोती रही… बिलखती रही… चीखती रही… चिल्लाती रही… लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे… नारी की रक्षा नहीं कर पाये…!

उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और ….
जटायु ने नारी का सम्मान किया…
अपने प्राणों की आहुति दे दी… तो मरते समय भगवान ” श्रीराम ” की गोद की शय्या मिली…!

जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं … उनकी गति भीष्म जैसी होती है …
जो अपना परिणाम जानते हुए भी…औरों के लिए संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है।

सदैव गलत का विरोध जरूर करना चाहिए। ” सत्य परेशान जरूर होता है, पर पराजित नहीं।

🙏शिव कुमार भारद्वाज

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1950 के दशक में हावर्ड यूनिवर्सिटी के विख्यात साइंटिस्ट कर्ट रिचट्टर ने चूहों पर एक अजीबो-गरीब शोध किया था।

उन्होंने एक चूहे को पानी से भरे जार में डाला। चूहा जार से बाहर आने के लिये ज़ोर लगाने लगा।

जिस समय चूहे ने ज़ोर लगाना बन्द कर दिया और वह डूबने को था……ठीक उसी समय कर्ट ने उस चूहे को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया।

चूहे को बाहर निकाल कर कर्ट ने उसे सहलाया ……कुछ समय तक उसे जार से दूर रखा और फिर एकदम से उसे पुनः जार में फेंक दिया।

पानी से भरे जार में दोबारा फेंके गये चूहे ने फिर जार से बाहर निकलने की जद्दो-जेहद शुरू कर दी।

लेकिन पानी में पुनः फेंके जाने के पश्चात उस चूहे में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिले जिन्हें देख कर स्वयं कर्ट भी बहुत हैरान रह गये।

कर्ट सोच रहे थे के चूहा बमुश्किल 15 – 20 मिनट संघर्ष करेगा और फिर उसकी शारीरिक क्षमता जवाब दे देगी और वह जार में डूब जायेगा।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

चूहा जार में तैरता रहा। अपनी जीवन बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा।

60 घँटे …….

जी हाँ …..60 घँटे तक चूहा पानी के जार में अपने जीवन को बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा।

कर्ट यह देख कर आश्चर्यचकित रह गये।
जो चूहा 15 मिनट में परिस्थितियों के समक्ष हथियार डाल चुका था ……..वही चूहा 60 घंटों तक कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा था और हार मानने को तैयार नहीं था।

कर्ट ने अपने इस शोध को एक नाम दिया और वह नाम था…….” The HOPE experiment”…..!

Hope……..यानि आशा।

कर्ट ने शोध का निष्कर्ष बताते हुये कहा कि जब चूहे को पहली बार जार में फेंका गया …..तो वह डूबने की कगार पर पहुंच गया …..उसी समय उसे मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया गया। उसे नवजीवन प्रदान किया गया।

उस समय चूहे के मन मस्तिष्क में “आशा” का संचार हो गया। उसे महसूस हुआ कि एक हाथ है जो विकटतम परिस्थिति से उसे निकाल सकता है।

जब पुनः उसे जार में फेंका गया तो चूहा 60 घँटे तक सँघर्ष करता रहा…….
वजह था वह हाथ……
वजह थी वह आशा ……
वजह थी वह उम्मीद।

…………..
परीक्षा की घड़ी में उम्मीद बनाये रखिये।
सँघर्षरत रहिये।
सांसे टूटने मत दीजिये।
मन को हारने मत दीजिये।

उस हाथ पर विश्वास रखिए…. भगवान पर भरोसा रखिए…समय मुश्किल जरुर होता है लेकिन फिर स्थितियां सामान्य हो जाएंगी….यक़ीनन ऊपरवाला हम सब की रक्षा करेगा………

……..

Copy………..