Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ఎవరి గొప్ప వారిదే!
సింగవరానికి వెళ్లే కూడలిలో ఒక పెద్ద చెట్టు ఉండేది.
బాటసారులు దాని కింద విశ్రాంతి తీసుకునే వారు. ఓ
రోజు చెట్టులో అంతర్భాగాలైన వేర్లు, ఆకులు, పండ్లు
‘నేను గొప్ప… కాదు నేనే
గొప్ప’ అంటూ వాదనకు
దిగాయి. ఈ విషయం
గమనించిన చెట్టు వాటిని
శాంతపరిచి ‘కొన్ని రోజులు
| ఆగండి. మీలో ఎవరు
గొప్ప అన్న విషయాన్ని
నేను తేలుస్తాను’ అని
చెప్పింది. ఒక రోజు ఆ
దారివెంట వెళ్తున్న ఓ బాటసారి చెట్టుకిందకు వచ్చాడు.
ఆకలితో నకనకలాడుతున్న అతను చెట్టెక్కి పండు
కోసుకుని తిని కాస్త తేరుకున్నాడు. అప్పుడు ఆ చెట్టు
బాటసారిని ‘నాలో నీకు ఏ భాగం ఇష్టం” అని అడిగింది.
అప్పుడు బాటసారి… ‘నా ఆకలి తీర్చిన నీ మధుర ఫలాలు
ఇష్టం’ అని చెప్పి తన దారిన తాను వెళ్లిపోయాడు. కొన్ని
రోజులు గడిచాయి. ఒక ఆయుర్వేద వైద్యుడు చెట్టు
కిందకు వచ్చి వేర్లను తవ్వి మూటగట్టుకుంటున్నాడు. ఆ
చెట్టు వైద్యుణ్ని ‘నాలో నీకిష్టమైంది ఏంటి’ అని ప్రశ్నించింది.
‘నీ వేర్ల ద్వారా ఎంతో మంది రోగులకు వైద్యం చేస్తున్నా…
కాబట్టి అవంటేనే నాకు ఇష్టం’ అనేసి వెళ్లాడు. మరికొన్నాళ్లకు
ఓ వృద్ధుడు ఎండకు తాళలేక చెట్టుకింద కునుకు తీసి
సాయంత్రం వరకు విశ్రాంతి తీసుకున్నాడు. తర్వాత తన
దారిన తాను వెళ్తుండగా… ‘నాలో నీకు ఏ భాగం ఇష్టం’
అని చెట్టు అడిగింది. ‘ఎండ నుంచి నాకు ఉపశమనాన్ని
కలిగించిన నీ ఆకులు, కొమ్మలంటే ఇష్టం. కానీ వేళ్లుంటేనే
చెట్టుకు నీరందుతుంది. ఆకులూ కొమ్మలూ ఉంటేనే
బాటసారులకు నీడనివ్వగలవు. ఇక, ఆకలి తీర్చాలంటే
పండ్లు కావాల్సిందే. ఇలా నీలోని ఏభాగాలూ వేటికీ
తీసిపోవు. అన్నీ సమన్వయంతో పనిచేస్తేనే చెట్టు
మనగలుగుతుంది. మీ వల్లనే స్వచ్ఛమైన గాలి అందుతుంది.
వర్షాలు సమృద్ధిగా కురుస్తాయి’ అని చెప్పి వెళ్లిపోయాడు.
తూర్పింటి నరేష్ కుమార్

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🌹कर्मो का फल🌹

🙏🌹Om Shanti🌹🙏
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एक आदमी का पूरा परिवार गुरूआश्रम जाकर गुरु की महान सेवा किया करता था..
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उस परिवार में एक लड़का जो कि दोनों पैरों से अपाहिज था, वह भी वहाँ बैठे-बैठे बहुत सेवा किया करता था।
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सेवा करते करते बरसों बीत गए, उसका परिवार यह सोचता था कि हम सब गुरुआश्रम जा कर इतनी महान सेवा रोज किया करते हैं.. फिर हमारे परिवार में यह बच्चा ऐसे क्यों हुआ, इसका क्या दोष था।
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एक दिन गुरु पूर्णिमा के दिन सत्संग चल रहा था। हजारों लाखों श्रद्धालुओं के बीच उस अपाहिज पुत्र के पिता ने गद्दी पर बैठे हुए गुरुदेव जी से एक सवाल किया..
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जय गुरु देव हम सब इतनी गुरुआश्रम में सेवा करते हैं कभी किसी के बारे में बुरा नहीं सोचते हैं ना ही किसी का बुरा करते हैं फिर ऐसा क्या गुनाह हुआ जो हमारा बच्चा अपाहिज पैदा हुआ??
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फिर गुरुदेव ने जवाब दिया वैसे तो यह बात बता नहीं सकते थे, पर इस समय तूने हजारों लाखों संगत के बीच में यह सवाल पूछा है…
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अब अगर मैंने तेरे बात का उत्तर नहीं दिया तो हजारो लाखो संगत का विश्वास डामाडोल हो जाएगा।
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इसलिए पूछता है तो सुन… यह जो बच्चा हैं जो दोनों टांगों से बेकार है, पिछले जन्म यह एक किसान का बेटा था।
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रोज खेत में अपने पिता को दोपहर में भोजन का टिफिन खेत में देने जाया करता था।
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एक दिन इसकी मां ने इसे दोपहर में 11:00 बजे खाना लगा कर दिया कि बेटा खाना खाकर पापा को टिफिन दे कर आ।
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इसकी मां ने खाना परोस कर थाली में रखा कि इतने में इसके किसी दोस्त ने आवाज लगाई तो यह खाना वही छोड़ कर अपने दोस्त से बात करने बाहर चला गया।
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इतने में एक कुत्ता घर में घुस आया और उसने थाली में मुंह डाला और रोटी खाने लगा।
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लड़का जैसे ही घर में वापिस आया और कुत्ते को थाली में मुंह डालता हुआ देखकर पास ही में एक लोहे का बड़ा सा डंडा पड़ा हुआ था..
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इसने यह भी नहीं सोचा कि खाना तो झूठा हो चुका है बिना सोचे समझे उस कुत्ते की दोनों टांगों पर इतनी जोर से लोहे का डंडा मारा…
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वह कुत्ता अपनी जिंदगी जब तक जिंदा रहा दोनों पैरों से बेकार हो कर घसीटते घसीटते जिंदगी जिया और तड़प तड़प कर मर गया।
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यह उसी कुत्ते की बद्दुआ का फल है जो इस जन्म में यह दोनों टांगों से अपाहिज पैदा हुआ है।
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पुत्र इस संसार में इंसान को अपने अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है इस जन्म में अगर किसी की टांग तोड़ी है तो स्वाभाविक है कि अगले जन्म में अपनी टांग टूटना है।
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इसलिए जो भी कर्म करो सोच समझ कर करो और अच्छे कर्म करो कभी किसी का दिल न दुखाओ.. हमेशा सत्कर्म करो।
🌹जय जय श्री राधे🌹🙏🙏

शिव कुमार भारद्वाज

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एक समय की बात है, जब किशोरी जी को यह पता चला कि कृष्ण पूरे गोकल में माखन चोर कहलाता है तो उन्हें बहुत बुरा लगा उन्होंने कृष्ण को चोरी छोड़ देने का बहुत आग्रह किया। पर जब ठाकुर अपनी माँ की नहीं सुनते तो अपनी प्रियतमा की कहा से सुनते। उन्होंने माखन चोरी की अपनी लीला को जारी रखा। एक दिन राधा रानी ठाकुर को सबक सिखाने के लिए उनसे रूठ गयी। अनेक दिन बीत गए पर वो कृष्ण से मिलने नहीं आई। जब कृष्णा उन्हें मनाने गया तो वहां भी उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया। तो अपनी राधा को मनाने के लिए इस लीलाधर को एक लीला सूझी। ब्रज में लील्या गोदने वाली स्त्री को लालिहारण कहा जाता है। तो कृष्ण घूंघट ओढ़ कर एक लालिहारण का भेष बनाकर बरसाने की गलियों में पुकार करते हुए घूमने लगे। जब वो बरसाने, राधा रानी की ऊंची अटरिया के नीचे आये तो आवाज़ देने लगे।

मै दूर गाँव से आई हूँ, देख तुम्हारी ऊंची अटारी,
दीदार की मैं प्यासी, दर्शन दो वृषभानु दुलारी।
हाथ जोड़ विनंती करूँ, अर्ज मान लो हमारी,
आपकी गलिन गुहार करूँ, लील्या गुदवा लो प्यारी।।

जब किशोरी जी ने यह आवाज सुनी तो तुरंत विशाखा सखी को भेजा और उस लालिहारण को बुलाने के लिए कहा। घूंघट में अपने मुँह को छिपाते हुए कृष्ण किशोरी जी के सामने पहुंचे और उनका हाथ पकड़ कर बोले कि कहो सुकमारी तुम्हारे हाथ पे किसका नाम लिखूं। तो किशोरी जी ने उत्तर दिया कि केवल हाथ पर नहीं मुझे तो पूरे श्री अंग पर लील्या गुदवाना है और क्या लिखवाना है, किशोरी जी बता रही हैं।

माथे पे मदन मोहन, पलकों पे पीताम्बर धारी
नासिका पे नटवर, कपोलों पे कृष्ण मुरारी
अधरों पे अच्युत, गर्दन पे गोवर्धन धारी
कानो में केशव, भृकटी पे चार भुजा धारी
छाती पे छलिया, और कमर पे कन्हैया
जंघाओं पे जनार्दन, उदर पे ऊखल बंधैया
गुदाओं पर ग्वाल, नाभि पे नाग नथैया
बाहों पे लिख बनवारी, हथेली पे हलधर के भैया
नखों पे लिख नारायण, पैरों पे जग पालनहारी
चरणों में चोर चित का, मन में मोर मुकट धारी
नैनो में तू गोद दे, नंदनंदन की सूरत प्यारी और
रोम रोम पे लिख दे मेरे, रसिया रास बिहारी

जब ठाकुर जी ने सुना कि राधा अपने रोम रोम पर मेरा नाम लिखवाना चाहती है, तो ख़ुशी से बौरा गए प्रभू उन्हें अपनी सुध न रही, वो भूल गए कि वो एक लालिहारण के वेश में बरसाने के महल में राधा के सामने ही बैठे हैं। वो खड़े होकर जोर जोर से नाचने लगे। उनके इस व्यवहार से किशोरी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ की इस लालिहारण को क्या हो गया। और तभी उनका घूंघट गिर गया और ललिता सखी को उनकी सांवरी सूरत का दर्शन हो गया और वो जोर से बोल उठी कि अरे….. ये तो बांके बिहारी ही है। अपने प्रेम के इज़हार पर किशोरी जी बहुत लज्जित हो गयी और अब उनके पास कन्हैया को क्षमा करने के आलावा कोई रास्ता न था। ठाकरजी भी किशोरी का अपने प्रति अपार प्रेम जानकर गदगद् और भाव विभोर हो गए।

जय जय श्री राधे।.❣❣

शिव कुमार भारद्वाज

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. निष्ठा पूर्वक कर्म

      कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर नीचे गिर पड़ी।
      ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया। दूसरे दिन वह एक सद्गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहस्वामिनी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा, “भगवन् ! थोड़ी देर ठहरो अभी आपको भिक्षा दूँगी।” इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति-सेवा को अधिक महत्व दे रही है।
      गृहस्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा, “क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूँगी।” ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई ?
      ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिलापुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे। भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा।
      वह तौल-नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया और कहा, “तपोधन कौशिक देव ! आपको उस सद्गृहस्थ गृहस्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लूँ तब आपकी सेवा करूँगा। कृपया थोड़ी देर बैठिये।“ ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना ?
      थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफा लेकर अच्छी चीजें लोक-हित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजाता चाण्डाल के पास जाइये। कौशिक मगध चल दिये और चाण्डाल के यहाँ पहुँचे।
      वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टाँग प्रणाम किया और कहा, “भगवन् ! आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुये यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लूँ, तब आपसे बात करूँगा। तब तक आप विश्राम कीजिये।”
      चाण्डाल जब सेवा-वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा, “अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्त्तव्य कर्मों में निरन्तर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।”
      तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्त्तव्य, कर्म निष्ठापूर्वक करते रहने से भी ‘आध्यात्मिकता का लक्ष्य’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।

                      ~~~०~~~

                   "जय जय श्री राधे राधे जी"

. निष्ठा पूर्वक कर्म

      कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर नीचे गिर पड़ी।
      ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया। दूसरे दिन वह एक सद्गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहस्वामिनी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा, “भगवन् ! थोड़ी देर ठहरो अभी आपको भिक्षा दूँगी।” इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति-सेवा को अधिक महत्व दे रही है।
      गृहस्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा, “क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूँगी।” ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई ?
      ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिलापुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे। भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा।
      वह तौल-नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया और कहा, “तपोधन कौशिक देव ! आपको उस सद्गृहस्थ गृहस्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लूँ तब आपकी सेवा करूँगा। कृपया थोड़ी देर बैठिये।“ ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना ?
      थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफा लेकर अच्छी चीजें लोक-हित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजाता चाण्डाल के पास जाइये। कौशिक मगध चल दिये और चाण्डाल के यहाँ पहुँचे।
      वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टाँग प्रणाम किया और कहा, “भगवन् ! आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुये यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लूँ, तब आपसे बात करूँगा। तब तक आप विश्राम कीजिये।”
      चाण्डाल जब सेवा-वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा, “अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्त्तव्य कर्मों में निरन्तर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।”
      तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्त्तव्य, कर्म निष्ठापूर्वक करते रहने से भी ‘आध्यात्मिकता का लक्ष्य’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।

                      ~~~०~~~

                   "जय जय श्री राधे राधे जी"

प्रकाश सुथार

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

. 🌹 🙏”भगवान् विट्ठल की करधनी”🙏🌹

      नरहरि सुनार रहते तो पंढरपुर में थे, किन्तु इनका हृदय काशी के भोले बाबा ने चुरा लिया था। शिव की भक्ति में ये इतने मगन रहते थे कि पंढरपुर में रहकर भी विट्ठल भगवान् को न तो इन्होंने कभी देखा और न ही देखने को उत्सुक थे। नरहरि सुनारी का काम करते थे। इसलिए जब सोने के आभूषण बनाते, तो उस समय भी शिव, शिव, शिव, शिव का नाम सतत् इनके होंठों पर रहता। इसलिए इनके बनाए आभूषणों में भी दिव्य सौंदर्य झलकने लगता था। 
      पंढरपुर में ही रहता था एक साहूकार, जो कि विट्ठल भगवान् का भक्त था। उसके कोई पुत्र न था। उसने एक बार विट्ठल भगवान् से मनौती की कि यदि उसे पुत्र हुआ, तो वह विट्ठल भगवान् को सोने की करधनी (कमरबंद या कमर पट्टा) पहनाएगा। 
      विट्ठल भगवान् की कृपा से उसके पुत्र उत्पन्न हुआ। वह खुशी से फूला न समाया और भागा-भागा नरहरि सुनार के पास सोना लेकर पहुँचा और बोला, नरहरि जी ! विट्ठल भगवान् ने प्रसन्न होकर मुझे पुत्र प्रदान किया है। अतः मनौती के अनुसार आज मैं विट्ठल भगवान् को रत्नजड़ित सोने की करधनी पहनाना चाहता हूँ। पंढरपुर में आपके अलावा इस प्रकार की करधनी और कोई नहीं गढ़ सकता। इसलिए आप यह सोना ले लीजिए और पांडुरंग मंदिर में चलकर विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले आइए और जल्दी से करधनी तैयार कर दीजिए। 
      विट्ठल भगवान् का नाम सुनकर नरहरि जी बोले, "भैया ! मैं शिवजी के अलावा किसी अन्य देवता के मंदिर में प्रवेश नहीं करता। इसलिए आप किसी दूसरे सुनार से करधनी तैयार करा लें। लेकिन साहूकार बोला, नरहरि जी ! आपके जैसा श्रेष्ठ सुनार तो पंढरपुर में और कोई नहीं है, इसलिए मैं करधनी तो आपसे ही बनवाऊँगा। यदि आप मंदिर नहीं जाना चाहते हैं, तो ठीक है। मैं स्वयं विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ला देता हूँ। नरहरि जी ने मजबूरी में इसे स्वीकार कर लिया।
      साहूकार विट्ठल भगवान् की कमर का नाप लेकर आ गया और नरहरि जी ने उस नाप की रत्नजड़ित सोने की करधनी बना दी। साहूकार आनंद पूर्वक उस करधनी को लेकर अपने आराध्य देव विट्ठल भगवान् को पहनाने मंदिर गया। जब पुजारी जी वह करधनी विट्ठल भगवान् को पहनाने लगे, तो वह करधनी कमर से चार अंगुल बड़ी हो गई। 
      साहूकार करधनी लेकर वापिस नरहरि जी के पास लौटा और उस करधनी को छोटा करवा लिया। जब वह पुनः करधनी लेकर मंदिर पहुँचा और पुजारी ने वह करधनी विट्ठल भगवान् को पहनानी चाही, तो अबकी बार वह चार अंगुल छोटी निकली। 
      नरहरि जी ने करधनी फिर बड़ी की, तो वह चार अंगुल बढ़ गई। फिर छोटी की, तो वह चार अंगुल कम हो गई। ऐसा चार बार हुआ। पुजारी जी व अन्य श्रद्धालुओं ने साहूकार को सलाह दी कि नरहरि जी स्वयं ही विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले लें। 
      साहूकार के अत्यधिक अनुनय-विनय करने पर नरहरि जी बड़ी मुश्किल से विट्ठल भगवान् के मंदिर में जाकर स्वयं नाप लेने को तैयार हुए। किन्तु कहीं उन्हें विट्ठल भगवान् के दर्शन न हो जाएँ, यह सोचकर उन्होंने साहूकार के सामने यह शर्त रखी कि मंदिर में घुसने से पहले मैं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लूँगा और हाथों से टटोल कर ही आपके विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले सकूँगा। साहूकार ने नरहरि जी की यह शर्त मान ली। अनेक शिवालयों से घिरे पांडुरंग मंदिर की ओर कदम बढ़ाने से पहले नरहरि जी ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। साहूकार इन्हें मंदिर के अंदर ले आया और विट्ठल भगवान् के सामने खड़ा कर दिया। 
      जब नरहरिजी ने नाप लेने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाए और मूर्ति को टटोलना शुरू किया, तो उन्हें लगा कि वे पाँच मुख, दस हाथ वाले, साँपों के आभूषण पहने हुए, मस्तक पर जटा और उसमें से प्रवाहित हो रही गंगा वाले शंकर भगवान् की मूर्ति का स्पर्श कर रहे हैं। नरहरि जी ने सोचा, 'कहीं साहूकार मुझ से ठिठोली करने के लिए विट्ठल भगवान् के मंदिर की जगह किसी शिवालय में तो नहीं ले आए हैं। यह सोचकर ये अपने आराध्य देव के दर्शन के लोभ से बच नहीं पाए और प्रसन्न होकर इन्होंने अपनी आँखों से पट्टी खोल दी। 
      किन्तु आँखें खोलकर देखा तो ठगे से रह गए। देखा सामने उनके आराध्य शिव भगवान् नहीं विट्ठल ही खड़े हैं। झट इन्होंने फिर से अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी और पुनः नाप लेने लगे। लेकिन जैसे ही इन्होंने पुनः मूर्ति के दोनों ओर अपने हाथ ले जाकर कमर की नाप लेने का प्रयास किया, तो इन्हें पुन: ऐसा आभास हुआ कि मानो ये अपने इष्टदेव बाघाम्बर धारी भगवान् शिवजी का ही आलिंगन कर रहे हों। जैसे ही आँखों से पट्टी खोलकर देखा, तो पुनः विट्ठल भगवान् की मुस्कराती हुई छवि दिखलाई पड़ी। हड़बड़ाते हुए इन्होंने तुरंत अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और फिर से मूर्ति की कमर का नाप लेने लगे। लेकिन आँखें बंद करने पर पुनः मूर्ति में शंकर भगवान् का आभास हुआ। 
      जब ऐसा तीन बार हुआ, तो नरहरि जी असमंजस में पड़ गए। इन्हें समझ में आ गया कि शिव और विट्ठल भगवान् अलग-अलग नहीं हैं। जो शंकर हैं, वे ही विट्ठल (विष्णु) हैं और जो विट्ठल (विष्णु) हैं, वे ही शंकर हैं। अब तो इन्होंने झट अपनी आँखों पर बँधी अज्ञान की पट्टी उतारकर फेंकी और क्षमा माँगते हुए विट्ठल भगवान् के चरणों में गिर पड़े और सुबक-सुबककर रोते हुए कहने लगे, हे विश्व के जीवनदाता ! मैं आपकी शरण में आया हूँ। मैं शिवजी में और आपमें अंतर करता था। इसीलिए मुझ नराधम ने आज तक आपके दर्शन तक न किए। आज आपने मेरे मन का अज्ञान और अंधकार दूर कर दिया। कृपया अपने इस अपराधी को क्षमा कर दीजिए।
      नरहरि जी की इस सरलता पर विट्ठल भगवान् रीझ गए और उन्होंने प्रसन्न होकर नरहरि के इष्टदेव शिवजी को सम्मान देते हुए अपने शीश पर शिवलिंग धारण कर लिया। विट्ठल भगवान् को सिर पर शिवलिंग धारण किए देखकर नरहरि जी और भी अधिक रोमांचित हो गए और अश्रुपात करते हुए गद्गद स्वर से उनकी स्तुति करने लगे।
      अब की बार नरहरि जी ने विट्ठल भगवान् की कमर की नाप लेकर प्रेम पूर्ण हृदय से जो करधनी बनाई, वह उनकी कमर में बिल्कुल ठीक बैठी। विट्ठल भगवान् को रत्नजड़ित करधनी पहने देख नरहरि जी और साहूकार भाव-विभोर हो उठे। 
      अब नरहरि जी विट्ठल भगवान् को अपने इष्ट देव शिव भगवान् का ही रूप मानने लगे थे, अतः ये विट्ठल-भक्तों के वारकरी मंडल में शामिल हो गए। ये विट्ठल, विट्ठल, विट्ठल, विट्ठल का भगवन्नाम संकीर्तन करते हुए मस्ती में नृत्य करते। आज भी अपने सिर पर शिवलिंग धारण किए पंढरपुर के विट्ठल भगवान् के दर्शन कर भक्तजनों को नरहरि सुनार की इस कथा की बरबस याद आ जाती है।
                   ----------:::×:::----------

                    🙏  "जय जय विट्ठल"🙏

शिव कुमार भारद्वाज

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Ram Ram ji,एक कुम्हार को रास्ते पर चलते समय..बाजार से लौटता था अपनी मटकियां बेच कर, अपने गधे को लेकर..एक हीरा पड़ा मिल गया। बड़ा हीरा! उठा लिया सोच कर कि चमकदार पत्थर है, बच्चे खेलेंगे। फिर राह में ख्याल आया उसे कि बच्चे कहीं गंवा देंगे, यहां-वहां खो देंगे, अच्छा हो गधे के गले में लटका दूं। गधे के लिए आभूषण हो जाएगा।

कुम्हार के हाथ हीरा पड़े तो गधे के गले में लटकेगा ही, और जाएगा कहां! उसने गधे के गले में हीरा लटका दिया। एक जौहरी अपने घोड़े पर सवार आता था। देख कर चैंक गया। बहुत हीरे उसने देखे थे, पर ऐसा हीरा नहीं देखा था। और गधे के गले में लटका! रोक लिया घोड़ा।

समझ गया कि इस मूढ़ को कुछ पता नहीं है। इसलिए नहीं कहा कि इस हीरे का कितना दाम; कहा कि इस पत्थर का क्या लेगा? कुम्हार ने बहुत सोचा-विचारा, बहुत हिम्मत करके कहा कि आठ आने दे दें। जौहरी तो बिल्कुल समझ गया कि इसे कुछ भी पता नहीं है।

आठ आने में करोड़ों का हीरा बेच रहा है! मगर जौहरी को भी कंजूसी पकड़ी। उसने सोचा: चार आने लेगा? चार आने में देगा? आठ आने, शर्म नहीं आती इस पत्थर के मांगते। कुम्हार ने कहा कि फिर रहने दो। फिर गधे के गले में ही ठीक। चार आने के पीछे कौन उसके गले में पहनाए हुए पत्थर को उतारे!

जौहरी यह सोच कर आगे बढ़ गया कि और दो आने लेगा, ज्यादा से ज्यादा; या आगे बढ़ जाऊं तो शायद चार आने में ही दे दे। मगर उसके पीछे ही एक और जौहरी आ गया। और उसने एक रुपये में वह पत्थर खरीद लिया।

जब तक पहला जौहरी वापस लौटा, सौदा हो चुका था। पहले जौहरी ने कहा: अरे मूर्ख, अरे पागल कुम्हार! तुझे पता है तूने क्या किया? करोड़ों की चीज एक रुपये में बेच दी!

वह कुम्हार हंसने लगा। उसने कहा: मैं तो कुम्हार हूं, मुझे तो पता नहीं कि करोड़ों का था हीरा। मैंने तो सोचा एक रुपया मिलता है, यही क्या कम है! महीने भर की मजदूरी हो गई। मगर तुम्हारे लिए क्या कहूं, तुम तो जौहरी हो, तुम आठ आने में न ले सके।

करोड़ों तुमने गंवाए हैं, मैंने नहीं गंवाए। मुझे तो पता ही नहीं था।

तुम्हें भी पता नहीं है कि तुम कितना गंवा रहे हो! और वो लोग जो तुम्हे जानते है पर लालच या अहंकार के कारण सस्ते में सौदा करना चाहते हैं वो तुमसे भी ज्यादा वे गंवा रहे हैं। तुम तो नहीं जानते कि तुम क्या गंवा रहे हो, वो तो जानते है तुम्हारी कीमत कम से कम उन्हें तो बोध होना चाहिए।

कुम्हार तो मुर्ख है है, पर उसकी मूर्खता अज्ञानता के कारण है.. पर जौहरी… वो तो महामूर्ख निकला..

आपने जीवन के ऐसे महामूर्खों के लिए दुखी मत होइए…
Ram Ram ji

शिव कुमार भारद्वाज

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रणछोड़ दास पगी


अजय देवगन की एक फ़िल्म आने वाली है, जिसका नाम है- ‘भुज’ – the pride of India’ इसमें संजय दत्त एक किरदार निभा रहे हैं, ‘रणछोड़दास रबारी’ ‘पागी’ का। इनके बारे में कम लोग ही जानते हैं।

यह एक (रणछोड दास पगी) वृद्ध गडरिया है, वास्तव में ये एक सेना का सबसे बड़ा राजदार था। 2008 फील्ड मार्शल मानेक शॉ वेलिंगटन अस्पताल, तमिलनाडु में भर्ती थे। गम्भीर अस्वस्थता तथा अर्धमूर्छित अवस्था में वे एक नाम अक्सर लेते थे – ‘पागी_पागी’, डाक्टरों ने एक दिन पूछ ही लिया “Sir, who is this Paagi?”
सैम साहब ने खुद ही पागी के बारे में हैरान कर देने वाला जो बताया वो इस प्रकार है —

1971 का भारत युद्ध जीत चुका था, जनरल मानेक शॉ ढाका में थे। आदेश दिया कि पागी को बुलवाओ, डिनर आज उसके साथ करूँगा। हेलिकॉप्टर भेजा गया। हेलिकॉप्टर पर सवार होते समय पागी की एक थैली नीचे रह गई, जिसे उठाने के लिए हेलिकॉप्टर वापस उतारा गया। अधिकारियों ने नियमानुसार हेलिकॉप्टर में रखने से पहले थैली खोलकर देखी, तो दंग रह गए। क्योंकि उसमें दो रोटी, प्याज तथा बेसन का एक पकवान (गाठिया) भर था। डिनर में एक रोटी सैम साहब ने खाई एवं दूसरी पागी ने।

उत्तर गुजरात के ‘सुईगाँव ‘ अन्तर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक बॉर्डर पोस्ट को ‘रणछोड़दास पोस्ट’ नाम दिया गया। यह पहली बार हुआ जब किसी आम आदमी के नाम पर सेना की कोई पोस्ट और साथ ही उनकी मूर्ति भी लगाई गई।

पागी का अर्थ है- ‘मार्गदर्शक’, अर्थात वो व्यक्ति जो रेगिस्तान में रास्ता दिखाए। ‘रणछोड़दास रबारी’ को जनरल सैम मानिक शॉ इसी नाम से बुलाते थे।
रणछोड़दास गुजरात के बनासकांठा ज़िले के पाकिस्तान की सीमा से सटे गाँव पेथापुर गथड़ों के निवासी थे। वे भेड़, बकरी व ऊँट पालन का काम करते थे। उनके जीवन में बदलाव तब आया, जब उन्हें 58 वर्ष की आयु में बनासकांठा के पुलिस अधीक्षक वनराज सिंह झाला ने उन्हें पुलिस के मार्गदर्शक के रूप में रख लिया।

उनमें हुनर इतना था कि ऊँट के पैरों के निशान देखकर ही बता देते थे कि उस पर कितने आदमी सवार हैं। इंसानी पैरों के निशान देखकर वज़न से लेकर उम्र तक का अन्दाज़ा लगा लेते थे। कितनी देर पहले का निशान है तथा कितनी दूर तक गया होगा, सब एकदम सटीक आँकलन, जैसे कोई कम्प्यूटर गणना कर रहा हो।

1965 के युद्ध के आरम्भ में पाकिस्तानी सेना ने भारत के गुजरात में कच्छ सीमा स्थित विधकोट पर कब्ज़ा कर लिया। इस मुठभेड़ में लगभग 100 भारतीय सैनिक हताहत हो गये थे तथा भारतीय सेना की एक 10 हजार सैनिकों वाली टुकड़ी को तीन दिन में छारकोट पहुँचना आवश्यक था। तब आवश्यकता पड़ी थी, पहली बार रणछोडदास पागी की। रेगिस्तानी रास्तों पर अपनी पकड़ की बदौलत उन्होंने सेना को तय समय से 12 घण्टे पहले मञ्ज़िल तक पहुँचा दिया था। सेना के मार्गदर्शन के लिए उन्हें सैम साहब ने खुद चुना था तथा सेना में एक विशेष पद सृजित किया गया- ‘पागी’। अर्थात- पग अथवा पैरों का जानकार।

भारतीय सीमा में छिपे 1200 पाकिस्तानी सैनिकों की लोकेशन तथा अनुमानित संख्या केवल उनके पदचिह्नों से पता कर भारतीय सेना को बता दी तथा इतना ही काफ़ी था, भारतीय सेना के लिए वो मोर्चा जीतने के लिए।

1971 के युद्ध में सेना के मार्गदर्शन के साथ-साथ अग्रिम मोर्चे तक गोला-बारूद पहुँचाना भी पागी के काम का हिस्सा था। पाकिस्तान के पालीनगर शहर पर जो भारतीय तिरंगा फहराया था, उस जीत में पागी की अहम भूमिका थी। सैम साब ने स्वयं ₹300 का नक़द पुरस्कार अपनी जेब से दिया था।

पागी को तीन सम्मान भी मिले 65 व 71 के युद्ध में उनके योगदान के लिए – संग्राम पदक, पुलिस पदक व समर सेवा पदक।

27 जून, 2008 को सैम मानिक शॉ का देहांत हो गया तथा 2009 में पागी ने भी सेना से ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ ले ली। तब पागी की उम्र 108 वर्ष थी। जी हाँ, आपने सही पढ़ा… 108 वर्ष की उम्र में ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ एवं सन् 2013 में 112 वर्ष की आयु में पागी का निधन हो गया।

हमें पढ़ाया जाना चाहिए पाठ्य पुस्तकों में ऐसे वीरों और सादगी से भरे बुद्धिजीवियों के बारे में..झूठ तो हम सदियों से पढ़ रहे हैं

🙏🇮🇳🙏

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ધ્યાનચંદ


ધ્યાનચાંદ સ્પેશિયલ !!!!
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આઝાદ ભારતમાં શિક્ષણ પણ કઈહદે કોંગ્રેસી ચમચાગીરીનો ભોગ બનેલું એ જુઓ.
આપણે ગાંધીની બકરી ચરખો નહેરુના જાકિટમાં ગુલાબ , અને નહેરુને બાળકો બવ વ્હાલા આટલું ભણયા , પણ એક ચેપટર તો ઠીક એક પેજ પણ ધ્યાન ચાંદ વિષે કોઈ ધોરણમાં ભણવામાં ના આવ્યું. !!!
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ઉપર “ચાંદ ” લખ્યું છે એ ભૂલથી નથી લખ્યું. પણ ચાંદ એ એમને અપાયેલી તખલ્લુસ હતી. એમનું નામ ધ્યાનસિંગ હતું.
ધ્યાનસિંગ ના પિતા બ્રિટિશ આર્મીમાં હતા અને ધ્યાનસિંગ પણ 16 વર્ષની ઉંમરે સેનામાં ભરતી થયેલા. એ વખતે કવાયતો અને ટ્રેનિંગ બાદ ફુરસદમાં પરેડ ગ્રાઉન્ડમાં હોકી ફૂટબોલ વગેરે રમતો આર્મીના જવાનો રમતા , એમાં ધ્યાનસીંગ પણ ખરા.
પણ ધ્યાનસિંગને રમત દરમિયાન કેટલીક ભૂલો સમજાતા પરફેક્સન માટે રાત્રે ચાંદની રાતોમાં ચંદ્રના અજવાળામાં પરેડ ગ્રાઉન્ડ પર એકલા એકલા હોકી રમ્યા કરતા , કલાકો સુધી રમતા રમતા એમને પરફેક્ટ ટાઈમિંગ થી પરફેક્ટ એન્ગલે પરફેકટ્ શોટ મારવાની મહારથ કેળવી લીધેલી( જે અગાઉ ક્યારે કોઈએ જોઈ કે શીખી નહતી )
ત્યારબાદ આર્મીની અલગ અલગ રેજિમેન્ટની હોકી ટોર્નામેન્ટમાં સતત ધ્યાનસિંગની
જ ટિમ જીતતી. ધ્યાનસિંગને ચાંદના અજવાળે રાત્રે પ્રેક્ટિસ કરવાની ટેવ હતી એટલે ટીમના અન્ય ખેલાડીઓએ એમને ધ્યાન ” ચાંદ ” તરીકે ઓળખવું શરુ કરેલું. . ( ઓલમ્પિક માં ગયા ત્યાં સુધી ધ્યનસિંગને કોઈ ખ્યાતિ નહતી મળી પણ ઓલમ્પિક પછી ટાઈમ્સ હેરાલ્ડ અને અન્ય અંગ્રેજી અખબારો માં ધ્યાન ચાંદ તરીકે છપાયું એટલે ભારતના અખબારો અને પાઠ્યપુસ્તકના પોપટિયા ઇતિહાસકારોએ ધ્યાન ચાંદ ને ધ્યાન ચન્દ બનાવી દીધા જે આપણે હજુય સાચું માનીએ છીએ. !!!!
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માણીલો કે ભારતની ક્રિકેટ ટિમ વલ્ડ કપ રમવા ગઈ હોય અને વિન્ડીઝ , ઓઝી ઈંગ્લીશ અને શ્રીલનકન્સ ને એકપણ વિકેટ આપ્યા વગર વલ્ડકપ જીતી લાવે તો માહોલ કેવો કલ્પનાતીત ફેસ્ટિવ હોય ?
યસ , ધ્યાનસિંગની ટીમનો આવોજ જાદુ હતો ઓલમ્પિકમાં
1928 માં નેધરલેન્ડ માં ધ્યાનસિંગની ટીમે પ્રથમ દિવસે ઓસ્ટ્રિયાને 6-0 થી હરાવ્યું બીજા દિવસે બેલ્જીયમને 9-0 થી હરાવ્યું , પાછું ત્રીજા દિવસે ડેન્માર્કને 5-0 થી હરાવ્યું , ચોથા દિવસે સેમિફાઇનલમાં સ્વિત્ઝર્લેન્ડને 6-0 થી હરાવ્યું અને પાંચમા દિવસે નેધરલેન્ડની ટીમને એમનાજ હોમગ્રાઉન્ડ પર 3-0 થી પરાજિત કરીને તમામ ટીમોના ઝીરો ગોલમા સૂપડા સાફ કરીને વિશ્વવિજેતા બનવાનું જ્વલન્ત ગૌરવ ઓલમ્પિકમાં ગોલ્ડ મેડલ જીતીને અપાવ્યું.
( આ અગાઉ આવું ક્યારેય બન્યું નહતું )
ત્યારથી ધ્યાનસિંગ હોકીના જાદુગર તરીકે વિશ્વભરના અખબારો અને મીડિયામાં પ્રખ્યાત થયા .
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ઓલમ્પિક ની શ્ફ્ળતા પછી આર્મીમાં એમની બઢતી લાન્સ નાયક તરીકે થઇ . ત્યારબાદ 1932 માં જાપાન ને 11-1 થી હરાવીને ફાઇનલમાં અમેરિકાની ટીમને એમનાજ હોમ ગ્રાઉન્ડ પર 24-1 થી હરાવીને અમેરિકાની ટીમના ચીથરા ફાડી નાખીને ફરી ગોલ્ડ મેડલ જીતી આવ્યા.

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ધ્યાનસિંગની કરીઅરની સૌથી કપરી પળો 1936 ની ઓલમ્પિક વખતે હતી.
પ્રથમ વિશ્વયુદ્ધમાં પોણું યુરોપ જીતી બેઠેલા હિટલરનો સૂર્ય મધ્યાહ્ને હતો અને 36 નો ઓલમ્પિક પર્વ બર્લિનમાં જર્મની દ્વારા હોસ્ટ થવાનો હતો. જર્મની હોકી ટિમ બે વાર સલન્ગ વિશ્વવિજેતા બનેલી ઇન્ડિયાની ટીમને હરાવીને કોઈપણ ભોગે હરાવીને ફ્યુહરર હિટલર અને જર્મનીને વિજેતા bnvaa ભારે તૈયારી કરતી હતી
આખા જર્મનીની શેરીઓમાં ધ્યનસિંગની તસ્વીર વાળા પોસ્ટરો લાગ્યા હતા ” જીવતો જાદુ જોવા ઓલમ્પિક સ્ટેડિયમ પધારો ” !!!!
( કદાચ આટલી ખ્યાતિ ગાંધી નહેરુ ને ય આખા જીવનમાં નહતી મળી – કદાચ ધય્નચાંદ ની ખ્યાતિને ઇતિહાસમાં એટલેજ હાંસિયામાં મૂકી હશે.
હિટલર પોતે હોકીનો રસિયો હતો ફાઇનલ જોવા હિટલર આવવાનો હતો એટલે જબબરજ્સ્ત માહોલ હતો.
( ભારતીય ટિમ માર્સેલ્સ થી થર્ડક્લાસ માં ટ્રેઈનમાં ટ્રાવેલ કરીને બર્લિન પહોંચેલી !!! )
પ્ર્થમદિવસે હંગેરીને 4-0 થી હરાવી , બીજાદિવસે યુએસ ને 7-0 થી હરાવ્યું !! ત્રીજા દિવસે japan ના 9-0 થી હરાવીને છોતરા કાઢી નાખ્યા!! સેમિફાઇનલ માં ચોથા દિવસે ફ્રાન્સ ને 10-0 થી હરાવીને ભુકા કાઢી નાખ્યા !!!!
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એક કયામતની રાત પછી હિટલરની મહ્તકાંક્ષી ટિમ સામે ભારત ફાઇનલ રમવાની હતી .
ભારતનો 28 ઓલમ્પિક નો બધી ટીમના ઝીરો ગૉલ માં સૂપડા સાફ કરવાનો record ધ્યાનસિંગ ની ટીમે જર્મનીમાં 36 માં રિપીટ કરેલો
વિશ્વનું હોકી જગત અને જર્મની એ રાત કાલે શું થશે એની ફિકરમાં સુઈ નહતું શક્યું.
બીજે દિવસે ખચોખચ ભરેલા સ્ટેડિયમ માં ધ્યાનસિંગની ટિમ તિરંગાને સલામ કરીને આવી.
અભૂતપૂર્વ રસાકસી અને હણગામાં વચ્ચે ભારતની ટીમે 4 ગૉલ કર્યા , જર્મન ટિમ એકપણ ગૉલ નહતી કરી શકી .
પ્રથમ અંતરાલ થઇ ગયો
નેક્સ્ટ હાફ શરૂ થયો
સેન્ટર પર ધ્યાનસિંગ નો અભૂતપૂર્વ જાદુ ચાલી રહ્યો હતો ધ્યાનસિંગે બીજા બે ગૉલ કર્યા .
સમય પૂરો થવા નજીક હતો
લોકો બેઠક પરથી ઉભા થઈને ઇન્ડિયાને એપ્લોઝ કરીને ચીયર અપ કરી રહયા હતા.
ખુદ હિટલર પેવેલિયનમાં પોતાની બેઠક છોડીને રેલિંગ સુધી પહોંચી ગયો અને નિર્ણાયક ઘડીઓને જોઈ રહ્યો હતો. !!!!
જર્મની એ એકપણ ગૉલ હજુ નોંધાવ્યો નહતો.
( હિટલરે એ ક્ષણોને એના જીવનની સુધી અઘરી ક્ષણો ગણેલી )
ધ્યાનસિંગ છેકસુધી પરફેકટ્ જ રમ્યા પણ છેલ્લી ઘડીએ ઇન્ડિયન ટીમના એક ખેલાડીની ભૂલથી બોલ જર્મન્સ તરફ પાસ થયો અને અંતે જર્મની 1 ગૉલ કરીને ઇજ્જતના કાંકરા થતા બચ્યા પણ ભારત સામે 8-1 થી હાર્યા અને ભારત સલન્ગ ત્રીજીવાર વિશ્વવિજેતા બનીને ઓલમ્પિકમાં ગોલ્ડ મેડાલીસ્ટ બન્યું. !!!!

જર્મનીની હાર થયેલી છતાં હજારો પ્રેક્ષકો સાથે હિટલર પણ રેલિંગ પર ઊભાઊભા ધ્યાનસિંગના જાદુ પર તાળીઓ વરસાવતો હતો , આ તસ્વીર બીજે દિવસે વિશ્વભરના અખબારોમાં છપાઈ હતી
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તે રાત્રે હિટલરે ધ્યાનચાંદ ને મળવા મેસેજ મોકલ્યો.
બીજે દિવસે હિટલરે મોકલેલી કારમાં ss એસ્કો્ટ્સ સાથે ધ્યાનસિંગ ને હિટલર ની ચેમ્બરમાં લઇ જવાયા જ્યા પેસેજમાં એસએસ ના ટોપ બ્રાસ ગણાતા લોકો જાદુગર ધ્યનસિંગ ને જોવા લાઈનમાં ઉભા હતા. !!!
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સામે ચાલીને હિટલરે ધ્યાનસિંગનું અભિવાદન કર્યું અને એસએસ ના વડાઓ નીહાજરીમાં પૂછ્યું ” તમે હોકી ના રમતા હોવ ત્યારે શું કરો છો ?”
ધ્યાનચાંદ એ જવાબ આપ્યો ” હું ઇન્ડિયન આર્મીમાં છું “
હિટલરે પૂછ્યું ” તમારો રેન્ક શું છે ?”
ધ્યાનસિંગએ જણાવ્યું ” હું ત્યાં લાન્સનાયક છું “
હિટલરે સીધો પાસો ફેંક્યો ” તમે જર્મની આવી જાઓ જર્મન સિટીઝનશિપ આપીને હું તમને ઈમમીડિએટ ઇફેક્ટ થી જર્મન આર્મીમાં ફિલ્ડ માર્શલ બનાવીશ.
હોલમાં પીંનડ્રોપ સાયલેન્સ છવાઈ ગઈ . હિટલર સાથે ઉભેલા જર્મન આર્મી એરફોર્સ અને અને
નેવીના ટોપબ્રાસ ના ધબકારા વધી ગયા કે આ માણસ ફ્યુહરરની ઓફર સ્વીકારી લે તો સીધો આપણૉ સમકક્ષ બની જશે.
થોડીવાર વિચારીને ધ્યાનસિંગ બોલ્યા ” આભાર, પણ હું ઇન્ડિયાની આર્મીમાં ખુશ છું અને ત્યાંજ રહેવા માગું છું “
………
એક કોહીનોર ઘુમાવવાનો હોય એવી ખિન્નતા સાથે હિટલર એ જણાવ્યું ” ભલે , જેવી તમારી ઇચ્છા”
ઔપચારિક વાતો સાથે મુલાકાત પુરી થઇ.
…………..
આવી વિશ્વવિખ્યાત વ્યક્તિ ધ્યાનસિંગ ને આઝાદીની લડતમાં તો બહુ કવરેજ ના મળ્યું પણ આઝાદી પછીય નહેરુ ગાંધીની ચમચાગીરી કરતા અખબારી મીડિયાએ ધ્યાનસિંગ ની કોઈ પ્રસસ્તી ના કરી. નેહરુના ચમચા શિક્ષણવિદોએ આજસુધી ધ્યાનચાંદની સિદ્ધિઓ અને સ્કિલ્સ ને બિરદાવતું એકેય ચેપટર પાઠ્યપુસ્તકોમાં ના રાખ્યું , ના કોઈ ડોક્યુમેન્ટરી બની ( ફિલ્મ ડિવિઝન તરફથી ગાંધી નેહરુની બ્લેક એન્ડ વહાઇટ ડોક્યુમેન્ટરી થિયેટરોમાં બતાવવી ફરજીયાત હતી !!! )
ધ્યાનચાંદ રિટાયર્ડ થઈને ઝાંસી માં સેટલ થયેલા પણ સરકારે પેન્સનથી વિશેષ કઈ નહતું આપ્યું. ( સચિનને ભારત રત્ન અપાયો , ધ્યાનસિંગને ના અપાયો !! ઇવન ઇન્દિરા અને નેહરુએ નહેરુએ જાતેજ પોતાને ભારત રત્ન આપી દીધા હતા !!! )
……….
મેજર ધ્યાન ચાંદને સત સત સલામ !!!

(મિત્ર રાકેશભાઇ પંચાલની પોસ્ટ)..

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कोई बाझ नहीं कहेगा

आधी रात का समय था रोज की तरह एक बुजुर्ग शराब के नशे में अपने घर की तरफ जाने वाली गली से झूमता हुआ जा रहा था, रास्ते में एक खंभे की लाइट जल रही थी, उस खंभे के ठीक नीचे एक 15 से 16 साल की लड़की पुराने फटे कपड़े में डरी सहमी सी अपने आँसू पोछते हुए खड़ी थी जैसे ही उस बुजुर्ग की नजर उस लड़की पर पड़ी वह रूक सा गया, लड़की शायद उजाले की चाह में लाइट के खंभे से लगभग चिपकी हुई सी थी, वह बुजुर्ग उसके करीब गया और उससे लड़खड़ाती जबान से पूछा तेरा नाम क्या है, तू कौन है और इतनी रात को यहाँ क्या कर रही है…?

लड़की चुपचाप डरी सहमी नजरों से दूर किसी को देखे जा रही थी उस बुजुर्ग ने जब उस तरफ देखा जहाँ लड़की देख रही थी तो वहाँ चार लड़के उस लड़की को घूर रहे थे, उनमें से एक को वो बुजुर्ग जानता था, लड़का उस बुजुर्ग को देखकर झेप गया और अपने साथियों के साथ वहाँ से चला गया लड़की उस शराब के नशे में बुजुर्ग से भी सशंकित थी फिर भी उसने हिम्मत करके बताया मेरा नाम रूपा है मैं अनाथाश्रम से भाग आई हूँ, वो लोग मुझे आज रात के लिए कहीं भेजने वाले थे, दबी जुबान से बड़ी मुश्किल से वो कह पाई…!

बुजुर्ग:- क्या बात करती है..तू अब कहाँ जाएगी..!
लड़की:- नहीं मालूम…..!
बुजुर्ग:- मेरे घर चलेगी…..?
लड़की मन ही मन सोच रही थी कि ये शराब के नशे में है और आधी रात का समय है ऊपर से ये शरीफ भी नहीं लगता है, और भी कई सवाल उसके मन में धमाचौकड़ी मचाए हुए थे!
बुजुर्ग:- अब आखिरी बार पूछता हूँ मेरे घर चलोगी हमेशा के लिए…?

बदनसीबी को अपना मुकद्दर मान बैठी गहरे घुप्प अँधेरे से घबराई हुई सबकुछ भगवान के भरोसे छोड़कर लड़की ने दबी कुचली जुबान से कहा जी हाँ

उस बुजुर्ग ने झट से लड़की का हाथ कसकर पकड़ा और तेज कदमों से लगभग उसे घसीटते हुए अपने घर की तरफ बढ़ चला वो नशे में इतना धुत था कि अच्छे से चल भी नहीं पा रहा था किसी तरह लड़खड़ाता हुआ अपने मिट्टी से बने कच्चे घर तक पहुँचा और कुंडी खटखटाई थोड़ी ही देर में उसकी पत्नी ने दरवाजा खोला और पत्नी कुछ बोल पाती कि उससे पहले ही उस बुजुर्ग ने कहा ये लो सम्भालो इसको “बेटी लेकर आया हूँ हमारे लिए” अब हम बाँझ नहीं कहलाएंगे आज से हम भी औलाद वाले हो गए, पत्नी की आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे और उसने उस लड़की को अपने सीने से लगा लिया।।

शिव कुमार भारद्वाज

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सावन सोमबार की पवित्र और पौराणिक कथा !!

श्रावण सोमवार की कथा के अनुसार अमरपुर नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। नगर में उस व्यापारी का सभी लोग मान-सम्मान करते थे। इतना सबकुछ होने पर भी वह व्यापारी अंतरमन से बहुत दुखी था, क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था।
दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा।
पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था।
उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वतीजी ने भगवान शिव से कहा- ‘हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।’
भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- ‘हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।’
इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- ‘नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।’
पार्वतीजी का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- ‘तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं, लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।’
उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।
भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया।
व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई, क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम ‘अमर’ रखा।जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और कहा कि अमर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। अमर अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।
लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में पहुंचे। उस नगर के राजा की कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था। निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इंकार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी।
वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा, क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं? विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा।
वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से बात की। दीपचंद ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया।
अमर जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया- ‘राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।’
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इंकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया। अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया।
जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न-वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण-पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा- ‘प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।’
भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले- ‘पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।’
पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- ‘हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें, नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।’
पार्वतीजी के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा।शिक्षा समाप्त करके अमर मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।
राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन-वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।
रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा दीपचंद ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था। भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे।
व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- ‘हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।’ व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में खुशियां लौट आईं शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-पुरुष सावन के सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं ॐ नमः शिवाय