Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Ram Ram ji,जो होना था, वह होने देना था

अखाड़े के परम्परा में दश नाम सन्यास परम्परा के एक बहुत अनूठे संन्यासी हुए, युक्तेश्वर गिरि

वे योगानंद के गुरु थे। बंगाल को उन्होंने अपना कर्म क्षेत्र बनाया था। योगानंद ने पश्चिम में फिर बहुत ख्याति पाई। गिरि अदभुत आदमी थे। ऐसा हुआ एक दिन कि गिरि का एक शिष्य गांव में गया। किसी उपद्रवि आदमी ने उसको परेशान किया, पत्थर मारा, मार—पीट भी कर दी। वह यह सोचकर कि मैं संन्यासी हूं क्या उत्तर देना, चुपचाप वापस लौट आया। और फिर उसने सोचा कि जो होने वाला है, वह हुआ होगा, मैं क्यों अकारण बीच में आऊं। तो वह अपने को सम्हाल लिया। सिर पर चोट आ गई थी। खून भी थोड़ा निकल आया था। खरोंच भी लग गई थी। लेकिन यह मानकर कि जो होना है, होगा। जो होना था, वह हो गया है। वह भूल ही गया।

जब वह वापस लौटा आश्रम कहीं से भिक्षा मांगकर, तो वह भूल ही चुका था कि रास्ते में क्या हुआ। गिरि ने देखा कि उसके चेहरे पर चोट है, तो उन्होंने पूछा, यह चोट कहां लगी? तो वह एकदम से खयाल ही नहीं आया उसे कि क्या हुआ। फिर उसे खयाल आया। उसने कहा कि आपने अच्छी याद दिलाई। रास्ते में एक आदमी ने मुझे मारा। तो गिरि ने पूछा, लेकिन तू भूल गया इतनी जल्दी! तो उसने कहा कि मैंने सोचा कि जो होना था, वह हो गया। और जो होना ही था, वह हो गया, अब उसको याद भी क्या रखना! अतीत भी निश्चिंतता से भर जाता है, भविष्य भी। लेकिन एक और बड़ी बात इस घटना में है आगे।

गिरि ने उसको कहा, लेकिन तूने अपने को रोका तो नहीं था? जब वह तुझे मार रहा था, तूने क्या किया?

तो उसने कहा कि एक क्षण तो मुझे खयाल आया था कि एक मैं भी लगा दूं। फिर मैंने अपने को रोका कि जो हो रहा है, होने दो।

तो गिरि ने कहा कि फिर तूने ठीक नहीं किया। फिर तूने थोड़ा रोका। जो हो रहा था, वह पूरा नहीं होने दिया। तूने थोड़ी बाधा डाली। उस आदमी के कर्म में तूने बाधा डाली, गिरि ने कहा।

उसने कहा, मैंने बाधा डाली! मैंने उसको मारा नहीं, और तो मैंने कुछ किया नहीं। क्या आप कहते हैं, मुझे मारना था! गिरि ने कहा, मैं यह कुछ नहीं कहता। मैं यह कहता हूं जो होना था, वह होने देना था। और तू वापस जा, क्योंकि तू तो निमित्त था। कोई और उसको मार रहा होगा।

और बड़े मजे की बात है कि वह संन्यासी वापस गया। वह आदमी बाजार में पिट रहा था। लौटकर वह गिरि के पैरों में पड़ गया। और उसने कहा कि यह क्या मामला है?

गिरि ने कहा कि जो तू नहीं कर पाया, वह कोई और कर रहा है। तू क्या सोचता है, तेरे बिना नाटक बंद हो जाएगा! तू निमित्त था।

तुम जो विचार के बीज बो देते हो.. जरुरी है कि उसे अपने ही धरातल मे अंकुरित होने दो। या तो तुम मे इतना संयम हो कि विचार ही प्रकट ना हो.. सोचने का मतलब हुआ आधा काम तो आपने कर ही लिया.. फिर उस को छुपा कर, दबा कर अच्छे बनने का आडंबर क्यूँ..??? तुम जो भी हो उसे प्रकट होने दो, जाहिर होने दो… सहजता से, सरलता से.. बाधा मत डालो..

नदी की बहाव मे जब रुकावट की जाती है, बाँध दिया जाता है फिर जब वो टूटता है तो बाढ़ आ जाती है, प्रकोप बन जाता है.. इसीलिए अपने विचार को फूलने फलने दो… नहीं तो दूसरे ने उस बीज को पकड़ लिया तो पता नहीं कितना फैल जाये.. हो सकता है फैलता ही जाये..

तूम चेष्टा करके कुछ मत करो। तूम निश्चेष्ट भाव से, निमित्त मात्र हो जाओ और जो होता है, वह हो जाने दे।

🙏🙏🙏 Ram Ram ji

शिव कुमार भारद्वाज

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