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स्त्रियों पर अत्याचार
रामायण में श्रीराम-लक्ष्मण और सीता ने पंचवटी में रह रहे थे।
| उस समय एक दिन सीता ने स्वर्ण मृग देखा। ऐसा हिरण सीता ने पहले
कभी देखा नहीं था। सीता ने श्रीराम से वह हिरण लेकर आने के लिए
| कहा। श्रीराम भी सीता की इच्छा पूरी करने के लिए हिरण के पीछे
| चले गए। दरअसल, वह हिरण नहीं था, रावण का मामा मारीच था।
|जो रावण के कहने पर वेश बदलकर आया था, ताकि वह सीता का
| हरण कर सके। राम अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए गए और
| लक्ष्मण को सीता की रक्षा के लिए छोड़ गए। हिरण के पीछे गए श्रीराम
| ने जैसे ही बाण छोड़ा तो मारीच ने राम की आवाज में लक्ष्मण को
| पुकारा। आवाज सुनते ही सीता ने लक्ष्मण से कहा कि तुम्हारे भाई
| किसी संकट में है, जाकर उन्हें बचाओ। लक्ष्मण ने बहुत समझाया कि
| श्रीराम का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, लेकिन सीता के कहने पर वे
| श्रीराम कि खोज में निकल पड़े। लक्ष्मण के जाने के बाद रावण वहां
| साधु वेश में पहुंच गया।साधु के रूप में रावण ने सीता से कहा कि तुम्हें
| आश्रम की सीमा से बाहर आना पड़ेगा, तब ही मैं दान लूंगा। सीता
| जैसे ही लक्ष्मण रेखा से बाहर आई, रावण ने उनका हरण कर लिया।
| सीता रावण के छल को समझ नहीं सकी और रावण ने देवी का हरण
| कर लिया। इसके बाद रावण ने सीता को अशोक वाटिका में बंदी
| बनाकर रखा था। बाद में श्रीराम वानर सेना के साथ पहुंचे और रावण
का वध किया। इसके बाद देवी सीता आजाद हो सकीं। “स्त्रियों को
| अपराधी प्रवृत्ति के बलवान लोगों के साथ ही छल करने वाले लोगों से
भी सतर्क रहना चाहिए, अगर छल करने वाले लोगों के संबंध में छोटी
|सी भी लापरवाही की गई तो भयंकर परेशानी आ सकती है।”

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मुल्ला नसरुद्दीन बैठा था एक स्टेशन पर। ट्रेन लेट थी। जैसा कि नियम
है। दो-चार बार उठ कर भी गया, स्टेशन मास्टर को पूछा भी, मगर जब
जाए तभी और लेट होती जाए। आखिर उसने कहा कि मामला क्या
है,क्या ट्रेन पीछे की तरफ सरक रही है? लेट होना भी समझ में आता
है,मगर और-और लेट होता जाना….क्या ट्रेन उस तरफ जा रही है? फिर
आएगी कैसे? और जब हर गाड़ी को लेट ही होना है तो टाइम-टेबल
किसलिए छापते हो?
उस स्टेशन मास्टर ने कहा, टाइम-टेबल नहीं छापेंगे तो पता कैसे चलेगा
कि कौन सी गाड़ी कितने लेट है?
नसरुद्दीन ने कहा, यह बात जंचती है। यह बात पते की कही!
फिर उसने कहा, अब कोई फिक्र नहीं। अब मैं बैठ कर राह देखता हूं।
बैठ कर वह राह देखने लगा। बीच-बीच में हंसे। कभी-कभी ऐसा झिड़क
दे कोई चीज हाथ से। कभी-कभी कहे-छिः छिः! वह स्टेशन-मास्टर
थोड़ी देर देखता रहा कि यह कर क्या रहा है! बार-बार आता था, वही
अच्छा था पूछने, अब यह और उत्सुकता जगा रहा है। किसी चीज को
हाथ से सरकाता है, किसी चीज को छिः छिः कहता है, कभी कुछ। और
फिर बीच-बीच में हंसता है, ऐसा खिलखिला कर हंसता है! आखिर वह
आया, उसने कहा कि भाईजान, बड़े मियां! आप मुझे काम ही नहीं करने
दे रहे हैं। मेरा दिल यहीं लगा है। इसमें कुछ गड़बड़ हो जाए, ट्रेन पटरी से
उतर जाए कि दूसरी पटरी पर चढ़ जाए, कि दो ट्रेनें टकरा जाएं, जब तक
मैं आपसे पूछ न लूं, मुझे चैन नहीं है। या तो आप जरा दूर जाकर बैठो।
आप कर क्या रहे हो? आप हंसते क्यों हो बीच-बीच में? कुछ भी तो नहीं
हो रहा है यहां। गाड़ी लेट है। सब सन्नाटा छाया हुआ है। रात आधी हो
गई है। सब यात्री बैठे-बैठे सो गए हैं। कुली-कबाड़ी भी विश्राम कर रहे
हैं। तुम हंसते किसलिए हो बीच-बीच में?
उसने कहा कि अब मैं बैठे-बैठे क्या करूं? अपने को कुछ चुटकुले सुना
रहा हूं।
उसने कहा कि अब मैं बैठे-बैठे क्या करूं? अपने को कुछ चुटकुले सुना
रहा हूं।
उसने कहा, चलो, यह भी समझ में आ गया कि चुटकुले। ये बीच-बीच में
छिः छिः और यह हाथ से हटाना, यह क्या करते हो?
तो उसने कहा कि जो चुटकुले मैं पहले सुन चुका हूं, उन्हें कहता हूं…अरे
हटो, रास्ते पर लगो! उनको ऐसा हटा देता हूं। बीच-बीच में घुस आते हैं।
हंसो-बहाने मिलें तो ठीक, न बहाने मिलें तो कुछ खोजो! मगर जिंदगी
तुम्हारी एक हंसी का सिलसिला हो। हंसी तुम्हारी सहज अभिव्यक्ति बन
जानी चाहिए।
प्रीतम छवि नैन बसी
ओशो

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એક સત્ય ઘટના … દુષ્કાળ પડેલો કાઠીયાવાડ માં મરકી નો રોગ નિકળેલો સાહેબ બહુ સરસ પ્રસંગ છે આ ઈ મરકી ના રોગમાં માણસે માણસ મરવા લાગ્યું ગામડે ગામડું ખાલી થવા લાગ્યું ઈ રોગમાંથી બચવા ખાતર એક બાર વર્ષ ની દિકરી ઘરે થી નિકળે છે અને એવો રોગ હતો કે માણસને બાળવા માટે બળતણ પણ નો મળતા સાહેબ તે દિવસે માણસ પર ભેખડુ વાળી દેવામાં આવી હતી એવા રોગમાંથી બચવા ખાતર એક દિકરી નિકળે છે કયા જાવ શું કરું કેમ બચવું વિચાર આવ્યો મામા ને ઘેર જાવ મામાને ઘરે જાય છે ગામના પાદરમાં આવે છે ઉભી બજારે હાલતિ થાય છે શેરીમાંથી આમ ખડકીમાથી અંદર જાય છે મામાને ઘરે ત્યારે કાને સબદ પડ્યા છે કોઈક મરણ પથારીએ પડ્યું છે અરરે કોઈક નો જીવ નથી જતો કોણ હશે આ જોવા મંડી બાર વર્ષ ની દિકરી એક ખાલી ઓરડો હતો આ બનેલી સોરઠની હકીકત ઘટના છે એક માં પડી હતી એનો જીવ નહોતો જતો પડખામાં ત્રણ વર્ષ નો દિકરો સૂતો હતો જીવ જાય ને આવે ને જાય જીવ ફરી આવે જીવ બાર વર્ષ ની દિકરી જયને એમ કહે છે માં હા બેટા તમારો જીવ નથી જતો ના દિકરી મારો જીવ નથી જતો કારણ કે મારા રોગમાં મારું આખું કુટુંબ ખલાસ થઈ ગયું છે છેલો મારો વારો છે મારા ત્રણ વર્ષ ના દિકરાને ઉછેરીને મોટો કોણ કરશે એટલે મારો જીવ નથી જતો દિકરી મારો જીવ નથી જતો સાહેબ સૌરાષ્ટ્રની બાર વર્ષ ની દિકરી બોલે છે હે માં એમ કરને તારા દિકરાને તું મને વચનથી પરણાવી દે હું ધણી તરીકે મોટો કરીને ઉજેરીશ માં તારા જીવને સતગતી કરી દે ત્યારે માએ દિકરાને છેલ્લે ધાવણ આપ્યું માં એક વચનથી મને પરણાવી દે અને સાહેબ બાર વર્ષ ની દિકરી ત્રણ વર્ષ ના દિકરાને પરણી ગય એક ડોચીના વચન ખાતર પરણી માંનો જીવ નિકળી ગયો વયો ગયો માડીનો જીવ અને પછી ત્રણ વર્ષ ધણીને કાખમાં બેસાડીને ગામનાં પાધરમા પાણી ભરવા જતી હશે ત્રણ વર્ષ ના ધણીને કાખમાં બેસાડીને સાણનો સુડલો નાખવા જતી હશે ને બજારમાં બેઠાં બેઠાં કોઈક જુવાનો એમને પ્રલોભન આપતા હશે 🌹 કેતો ગોરી તને ઘોઘાના ઘોઙલા મંગાવી દવ તે દિવસે આ દિકરી બોલી હતી કે ઘોઘાનો હોરનાર રે કાનો રમે છે મારી કેડમાં નથડીનો હોરનાર કાનો રમે છે મારી કેડમાં ચુદડીનો હોરનાર રે કાનો રમે મારી કેડમાં બાર વર્ષ દિકરી બોલી છે હૂં લાસાર શું મારો નટવર નાનો છે કેડમાં બેઠો છે એટલે તમે. મને એમ કહો છો ને નગર ની ચુંદડી ઓઢી દવ મંગાવી દવ નહિતર તાકાત છે તમે મારી સામે આંખ ઊંચી કરો હું લાસાર શું કે નટવર નાનો રે કાનો રમે છે મારી કેડમાં આ ગીતના ઉંડાણ છે સાહેબ શ્રી અમૂક ગીતને તમે ના સમજો ત્યાં સુધી મજા નહીં આવે વાત ઝવેરચંદ મેઘાણી કહી છે ભાઈ શ્રી ભીખુદાન ભાઈ ગઢવી પ્રસ્તુત કરે છે મને ખૂબજ ગમ્યો આપણો ઈતિહાસ🌹🌹🌹🌹🌹

सीता पटेल

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जब भगवान विष्णु का मस्तक कटकर अदृश्य हो गया

एक समय की बात है। हयग्रीव नाम का एक परम पराक्रमी दैत्य हुआ। उसने सरस्वती नदी के तट पर जाकर भगवती महामाया की प्रसन्नता के लिए बड़ी कठोर तपस्या की। वह बहुत दिनों तक बिना कुछ खाए भगवती के मायाबीज एकाक्षर महामंत्र का जाप करता रहा। उसकी इंद्रियां उसके वश में हो चुकी थीं।

सभी भोगों का उसने त्याग कर दिया था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती ने उसे तामसी शक्ति के रूप में दर्शन दिया। भगवती महामाया ने उससे कहा, ‘‘महाभाग! तुम्हारी तपस्या सफल हुई। मैं तुम पर परम प्रसन्न हूं। तुम्हारी जो भी इच्छा हो मैं उसे पूर्ण करने के लिए तैयार हूं। वत्स!⁉️👌 वर मांगो।’’ भगवती की दया और प्रेम से ओत-प्रोत वाणी सुनकर हयग्रीव की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसके नेत्र आनंद के अश्रुओं से भर गए। उसने भगवती की स्तुति करते हुए कहा, ‘‘कल्याणमयी देवि! आपको नमस्कार है। आप महामाया हैं। सृष्टि, स्थिति और संहार करना आपका स्वाभाविक गुण है। आपकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे अमर होने का वरदान देने की कृपा करें।’’ देवी ने कहा, ‘‘दैत्य राज! संसार में जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। प्रकृति के इस विधान से कोई नहीं बच सकता। किसी का सदा के लिए अमर होना असंभव है। अमर देवताओं को भी पुण्य समाप्त होने पर मृत्यु लोक में जाना पड़ता है। अत: तुम अमरत्व के अतिरिक्त कोई और वर मांगो।’’ हयग्रीव बोला, ‘‘अच्छा तो हयग्रीव के हाथों ही मेरी मृत्यु हो। दूसरे मुझे न मार सकें। मेरे मन की यही अभिलाषा है। आप उसे पूर्ण करने की कृपा करें।’’ ‘ऐसा ही हो’। यह कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गईं। हयग्रीव असीम आनंद का अनुभव करते हुए अपने घर चला गया। वह दुष्ट देवी के वर के प्रभाव से अजेय हो गया। त्रिलोकी में कोई भी ऐसा नहीं था, जो उस दुष्ट को मार सके। उसने ब्रह्मा जी से वेदों को छीन लिया और देवताओं तथा मुनियों को सताने लगा। यज्ञादि कर्म बंद हो गए और सृष्टि की व्यवस्था बिगडऩे लगी। ब्रह्मादि देवता भगवान विष्णु के पास गए, किन्तु वे योगनिद्रा में निमग्र थे। उनके धनुष की डोरी चढ़ी हुई थी। ब्रह्मा जी ने उनको जगाने के लिए वम्री नामक एक कीड़ा उत्पन्न किया। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उसने धनुष की प्रत्यंचा काट दी। उस समय बड़ा भयंकर शब्द हुआ और भगवान विष्णु का मस्तक कटकर अदृश्य हो गया। सिर रहित भगवान के धड़ को देखकर देवताओं के दुख की सीमा न रही। सभी लोगों ने इस विचित्र घटना को देखकर भगवती की स्तुति की। भगवती प्रकट हुई। उन्होंने कहा, ‘‘देवताओ चिंता मत करो।

मेरी कृपा से तुम्हारा मंगल ही होगा। ब्रह्मा जी एक घोड़े का मस्तक काटकर भगवान के धड़ से जोड़ दें। इससे भगवान का हयग्रीवावतार होगा। वे उसी रूप में दुष्ट हयग्रीव दैत्य का वध करेंगे।’’ ऐसा कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गई। भगवती के कथनानुसार उसी क्षण ब्रह्मा जी ने एक घोड़े का मस्तक उतारकर भगवान के धड़ से जोड़ दिया। भगवती के कृपा प्रसाद से उसी क्षण भगवान विष्णु का हयग्रीवावतार हो गया। फिर भगवान का हयग्रीव दैत्य से भयानक युद्ध हुआ। अंत में भगवान के हाथों हयग्रीव की मृत्यु हुई। हयग्रीव को मारकर भगवान ने वेदों को ब्रह्मा जी को पुन: समर्पित कर दिया और देवताओं तथा मुनियों का संकट निवारण किया।

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मित्रो बहुत भावुक ज्ञानवर्धक कथा है, जब भगवान शंकर को पता चलता है, कि रामावतार हो चुका है, तो वह प्रभुश्रीराम के बालरूप के दर्शन करने के लिये कागभुशुण्डि जी के साथ मनुष्य को रूप बना के अयोध्या आते हैं, आगे पढें,,,,,,,

*बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥

भावार्थ:-मैं उन्हीं श्री रामचन्द्रजी के बाल रूप की वंदना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरने वाले और श्री दशरथजी के आँगन में खेलने वाले (बालरूप) श्री रामचन्द्रजी मुझ पर कृपा करें॥

जिस समय भगवान राम का जन्म हुआ तो चारों और उत्सव मनाया जा रहा है। भगवान शिव भी भगवान राम के बाल रूप का दर्शन करने गए थे। वही कथा पार्वती माँ को सुना रहे है। भगवान शिव कहते हैं पार्वती जिस समय भगवान का अवतरण हुआ था उस समय मुझसे रहा नही गया। मैं अपने मन को रोक नही पाया और तुरंत अवधपुरी पहुंच गया। मेरी चोरी ये थी की मैंने तुमको नही बताया। भगवान ये कहना चाह रहे हैं की जब भगवान का बुलावा आये तो किसी का इंतजार मत करना। और एक मानव रूप धारण कर लिया।

पार्वती बोली की आप महादेव हो। और मानव बनकर क्यों गए?

भगवान शिव बोले हैं की जब महादेव के देव भी मानव बनकर आ सकते हैं तो मैं मानव ना बनूँ तो ये कैसे हो सकता हैं?

जैसे ही अयोध्या में पहुंचा हुईं बहुत भीड़ लगी हुई हैं। भोलेनाथ बहुत प्रयास कर रहे हैं राम जी के दर्शन करने का। लेकिन नही जा पा रहे हैं। शिव ने थोड़ी ताकत लगाई हैं। और थोड़ा धक्का दिया हैं। जैसे ही शिव ने धक्का दिया हैं तो अंदर से ऐसा धक्का आया हैं की भोले नाथ दूर जाकर मंदिर के एक शिवलिंग के पास टकराकर गिर गए हैं।

भोलेनाथ बोले की ये लो, हो गए दर्शन। राम के तो हुए नही पर मेरे खुद के हो गए।

भोलेनाथ ने सोचा की ऐसी भीड़ में दर्शन कैसे हो? तब भोलेनाथ को याद आई मेरा एक चेला हैं वो दिखाई नही दे रहा हैं। यहीं कहीं ही होगा। वो चेला हैं काकभुशुण्डि जी महाराज। सोच रहे हैं की भगवान का दर्शन करने जरूर आये होंगे। जैसे ही भोलेनाथ ने इन्हे याद किया हैं तो काकभुशुण्डि जी तुरंत आ गए हैं। क्योंकि कौवे के रूप में हैं।

भोलेनाथ को कहते हैं महादेव कैसे बुलाया हैं। जल्दी बताइये।

भोलेनाथ बोले की जल्दी बताऊ। पर क्यू? कहाँ जाना हैं?

काकभुशुण्डि जी बोले की आपके पीछे उत्सव छोड़ कर आया हूँ।

शिव जी बोले की तुम कहाँ थे?

उसने कहा की प्रभु मैं तो अंदर ही था। दशरथ जी खूबआनन्द लूटा रहे हैं। बड़ा आनंद हो रहा हैं।

भगवान शिव बोले की बढ़िया हैं। मानव को तो भीड़ के कारण रोक सकते हैं पर कौवे को कौन रोकेगा। वाह! चेला आनंद ले रहा हैं और गुरु यहाँ बैठा हैं।

भोलेबाबा कहते हैं की चेला जी कोई युक्ति बताइये, हमे भी दर्शन करवाइये।

काकभुशुण्डि जी ने कहा की महाराज चलिए कोई युक्ति बनाते हैं।

काकभुशुण्डि ने भी मानव रूप धारण कर लिया। बहुत बार प्रयास किया हैं लेकिन इन्हे अंदर नही जाने दिया। अब जब काफी समय हुआ तो भगवान राम ने भी रोना शुरू कर दिया। इनके मन में भी भोले बाबा के दर्शन करने की तड़प जाग गई हैं। अब राम जी दुःख में तड़प कर रो रहे हैं। और जब ये पीड़ा भरी पुकार मैया के कानों में गई हैं तो कौसल्या जी बिलख पड़ी हैं। की मेरे लाल को आज क्या हो गया हैं। इधर भोले बाबा ने भी पूरा नाटक किया है। भोले बाबा एक 80 साल के ज्योतिष बन गए हैं। गोस्वामी जी ने गीतावली में इस भाव को बताया हैं।

और स्वयं ज्योतिषी बन कर काकभुशुण्डि जी को अपना शिष्य बना लिया है और सरयू जी के किनारे बैठ गए है। जितने भी लोग रस्ते से आ-जा रहे है भगवान शिव सबके हाथ देख रहे है। और भविष्यवाणी कर रहे हैं। अब अवधपुरी में चर्चा शुरू हो गई हैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषी आ गया हैं। गोस्वामी जी कह रहे हैं। अवध आजु आगमी एकु आयो।

जब भगवान राम ने रोना शुरू किया हैं तो माँ बहुत परेशान हैं। गुरु वशिष्ठ जी को खबर की गई हैं। लेकिन वशिष्ठ जी व्यस्त हैं। इतने में एक नौकर आकर बोला की मैया,” मुझे खबर मिली हैं की एक बहुत बड़ा ज्योतिषी अवध पूरी में आया हैं। आपकी आज्ञा हो तो उसे बुला लाऊँ।”

माँ तो परेशान थी। मैया ने कहा- की जाओ और जल्दी बुला कर लाओ। बस मेरे लाल का रोना बंद हो जाये।

दौड़े दौड़े सेवक गए हैं । भोले बाबा सरयू नदी के किनारे बैठे हुए हैं। नौकरों ने कहा की आप ही वो ज्योतिषी हैं जिसकी चर्चा हर जगह फैली हुई हैं।

भोले बाबा बोले तुम लोग कहाँ से आये हो?

वो बोले की हम राजभवन से आये हैं।

ये सुनते ही भोले नाथ का रोम-रोम पुलकित हो गया हैं। समझ गए हैं की मेरे राम ने ही इन्हे भिजवाया हैं।

भगवान शिव बोले की क्या करना हैं बोलो?

वो सेवक बोले की महाराज जल्दी चलिए, सुबह से लाला आज बहुत रो रहे हैं। रानी ने आपको बुलाया हैं।

भोले नाथ जैसे ही चलने लगे तो काकभुशुण्डि जी कुरता पकड़ लिया हैं। की महाराज मैं भी तो आपके साथ में हूँ। मुझे भी साथ लेके चलो।

भोले नाथ बोले की तुमने दर्शन तो कर लिए हैं। तुम जाकर क्या करोगे?

काकभुशुण्डि जी कहते हैं की मैंने दर्शन तो किया हैं पर स्पर्श नही किया हैं प्रभु का। यदि आप स्पर्श करवाओगे तो ठीक नही हैं नही तो अभी पोल खोलता हूँ आपकी जितनी भी कृपा होगी उस पर हमे भी तो मिलनी चाहिए।

भोले नाथ बोले की ठीक हैं आपको भी दर्शन करवा देते हैं पर आप पोल मत खोलना।

जब राजभवन पर पहुंचे हैं तो पहरेदारों ने रोक लिया हैं। हाँ भैया कौन हो और कहाँ जा रहे हो?

नौकर बोले की इन्हे रानी ने बुलाया हैं। ये ज्योतिषी हैं। इन्हे अंदर जाने दो।

अब भोले बाबा राजभवन में अंदर प्रवेश करने लगे हैं पर काकभुशुण्डि जी को रोक लिया हैं। पहरेदार बोले ठीक हैं ये ज्योतिषी हैं तो अंदर जा रहे हैं पर ये साथ में कौन हैं जो अंदर चला जा रहा हैं। इनके अंदर जाने का क्या काम? दशरथ जी का आदेश हैं की किसी अनजान को अंदर नही आने देना हैं।

भोले बाबा मुस्कुरा कर अंदर जाने लगे हैं तभी काकभुशुण्डि बोले की प्रभु साथ लेके जाओ नही तो पोल खोलता हूँ अभी।

भोले बाबा बोले की ठीक हैं मैं कुछ करता हूँ। भोले बाबा कहते हैं की भैया बात ऐसी हैं। मैंने 80 साल का बूढ़ा हो गया हूँ। ज्योतिषी तो पक्का हूँ पर आँखों से कम दिखाई देता हैं। ये मेरे चेला हैं। इनके बिना मेरा काम चलेगा।

मैया बोली की करो महाराज अब जो आपको अपना झाड़-फूँक करना हैं।

भोले नाथ बोले की मैया- इतनी दूर से कुछ नही होगा। ना तो तू मुँह दिखा रही। ना तू स्पर्श करवा रही। बिना मुँह देखा और बिना स्पर्श करे मैं कुछ नही कर सकता हूँ। मुझे एक एक अंग देखना पड़ेगा की नजर कहाँ लगी हैं। नाक को लगी हैं या आँख को लगी हैं।

मैया बोली की दूर से कुछ नही होगा?
भोले नाथ बोले-मैया दूर से कुछ भी नही होगा।

आज मैया ने अपनी साडी का पल्लू उठा लिया और जो राम जी अब तक रो रहे थे भगवान शिव को देख कर खिलखिलाकर मुस्कुराने लगे हैं।

मैया बोली-महाराज आप तो कमाल के ब्राह्मण हो। आपने सिर्फ लाला को देखा ही हैं और लाला का रोना बंद कर दिया हैं।

भगवान शिव बोले की मैया अभी तो नजर पड़ी हैं और रोना बंद हो गया हैं अगर तू गोदी में दे दे तो हमेशा के लिए आनंद आ जाये।

अब मैया ने तुरंत राम जी को लेकर भोले नाथ की गोदी में दे दिया हैं। जैसे ही भगवान, भगवान शिव की गोदी में आये हैं। मानो साक्षात शिव और राम का मिलान हो गया हैं। भगवान शिव की नेत्रों से आंसू बहने लगे हैं। अब तक जिस बाल छवि का मन में दर्शन करते थे आज साक्षात दर्शन हो गए हैं। भोले नाथ कभी हाथ पकड़ते हैं, कभी गाल छूते हैं और माथा सहलाते हैं।

भगवान राम भी टुकुर-टुकुर अपनी आँखों से शिव जी को देख रहे हैं। जब थोड़ी देर हो गई तो काकभुशुण्डि जी ने पीछे से कुरता पकड़ा हैं। और कहते हैं हमारा हिस्सा भी तो दीजिये। आपने आनंद ले लिया हैं तो मुझे पर भी कृपा करो।

अब भगवान शिव जब राम को काकभुशुण्डि की गोद में देने लगे तो मैया ने रोक दिया हैं। की इनकी गोद में लाला को क्यों दे रहे हो?

भगवान शिव बोले की मैया मैं बूढ़ा हो गया हूँ ये मेरे चेला हैं। ये हाथ देखेंगे और मैं भविष्य बताऊंगा।

काकभुशुण्डि जी की गोद में लाला को दे दिया हैं। अब काकभुशुण्डि जी भी भगवान का दर्शन पा रहे हैं। और भोले नाथ ने भगवान का सारा भविष्य बताया हैं। सब बता दिया हैं की आपके लाला कोई साधारण लाला नही होंगे आपका लाला का जग में बहुत नाम होगा। आपके लाला के नाम से ही लोग भव सागर तर जायेंगे।

मैया बोली की ये सब ठीक हैं पर ये बताओ की लाला की शादी कब होगी?

भोले नाथ बोले की इतना बता सकते हैं आगे चलकर आप थोड़ा ध्यान रखना। एक बूढ़े बाबा आपके लाला को आपसे मांगने के लिए आएंगे। और जब वो मांगने आये तो तुम तुरंत दिलवा देना। मना मत करवाना। क्योंकि आपके लाला उनके साथ चले जायेंगे तो वहां से बहू लेकर ही आएंगे।

कौसल्या जी बोली की आप चिंता मत करो महाराज ये बात मेरे दिमाग में नोट हो गई हैं। मैं इसे हमेशा याद रखूंगी। इस प्रकार भोले बाबा ने सब बताया हैं।

मैया ने बोला की आपने बड़ी कृपा की हैं मेरे लाला का रोना बंद करवा दिया हैं। मेरे लाला का भविष्य बता दिया हैं। अब मेरे लाला को आशीर्वाद भी दे दीजिये।

भगवान शिव ने खूब आशीर्वाद दिया हैं। हे राम! आप जुग-जुग जियो। सबको आनंदित करो। इस प्रकार से भोले नाथ बड़ी मस्ती में राम जी को आशीर्वाद देके अपने धाम पधारते है।

भोले नाथ जी ने ये भी कहा है की इस चरित्र को सब लोग नही जान सकते। बस जिस पर राम की कृपा होगी वो ही लोग इस चरित्र को जान सकते है।
पार्वती जी कहती है महाराज हम पर राम जी की कृपा बनी हुई है तभी हम ये सब जान पाये है।

  • इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥
    निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥

भावार्थ:-बालक रूप श्री रामचंद्रजी मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीर में अरबों कामदेवों की शोभा है। हे गरुड़जी! अपने प्रभु का मुख देख-देखकर मैं नेत्रों को सफल करता हूँ॥
🌷🙏जय श्री राम🙏🌷
🔱हर हर महादेव🔱

शिव कुमार भारद्वाज

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Ram Ram ji,जो होना था, वह होने देना था

अखाड़े के परम्परा में दश नाम सन्यास परम्परा के एक बहुत अनूठे संन्यासी हुए, युक्तेश्वर गिरि

वे योगानंद के गुरु थे। बंगाल को उन्होंने अपना कर्म क्षेत्र बनाया था। योगानंद ने पश्चिम में फिर बहुत ख्याति पाई। गिरि अदभुत आदमी थे। ऐसा हुआ एक दिन कि गिरि का एक शिष्य गांव में गया। किसी उपद्रवि आदमी ने उसको परेशान किया, पत्थर मारा, मार—पीट भी कर दी। वह यह सोचकर कि मैं संन्यासी हूं क्या उत्तर देना, चुपचाप वापस लौट आया। और फिर उसने सोचा कि जो होने वाला है, वह हुआ होगा, मैं क्यों अकारण बीच में आऊं। तो वह अपने को सम्हाल लिया। सिर पर चोट आ गई थी। खून भी थोड़ा निकल आया था। खरोंच भी लग गई थी। लेकिन यह मानकर कि जो होना है, होगा। जो होना था, वह हो गया है। वह भूल ही गया।

जब वह वापस लौटा आश्रम कहीं से भिक्षा मांगकर, तो वह भूल ही चुका था कि रास्ते में क्या हुआ। गिरि ने देखा कि उसके चेहरे पर चोट है, तो उन्होंने पूछा, यह चोट कहां लगी? तो वह एकदम से खयाल ही नहीं आया उसे कि क्या हुआ। फिर उसे खयाल आया। उसने कहा कि आपने अच्छी याद दिलाई। रास्ते में एक आदमी ने मुझे मारा। तो गिरि ने पूछा, लेकिन तू भूल गया इतनी जल्दी! तो उसने कहा कि मैंने सोचा कि जो होना था, वह हो गया। और जो होना ही था, वह हो गया, अब उसको याद भी क्या रखना! अतीत भी निश्चिंतता से भर जाता है, भविष्य भी। लेकिन एक और बड़ी बात इस घटना में है आगे।

गिरि ने उसको कहा, लेकिन तूने अपने को रोका तो नहीं था? जब वह तुझे मार रहा था, तूने क्या किया?

तो उसने कहा कि एक क्षण तो मुझे खयाल आया था कि एक मैं भी लगा दूं। फिर मैंने अपने को रोका कि जो हो रहा है, होने दो।

तो गिरि ने कहा कि फिर तूने ठीक नहीं किया। फिर तूने थोड़ा रोका। जो हो रहा था, वह पूरा नहीं होने दिया। तूने थोड़ी बाधा डाली। उस आदमी के कर्म में तूने बाधा डाली, गिरि ने कहा।

उसने कहा, मैंने बाधा डाली! मैंने उसको मारा नहीं, और तो मैंने कुछ किया नहीं। क्या आप कहते हैं, मुझे मारना था! गिरि ने कहा, मैं यह कुछ नहीं कहता। मैं यह कहता हूं जो होना था, वह होने देना था। और तू वापस जा, क्योंकि तू तो निमित्त था। कोई और उसको मार रहा होगा।

और बड़े मजे की बात है कि वह संन्यासी वापस गया। वह आदमी बाजार में पिट रहा था। लौटकर वह गिरि के पैरों में पड़ गया। और उसने कहा कि यह क्या मामला है?

गिरि ने कहा कि जो तू नहीं कर पाया, वह कोई और कर रहा है। तू क्या सोचता है, तेरे बिना नाटक बंद हो जाएगा! तू निमित्त था।

तुम जो विचार के बीज बो देते हो.. जरुरी है कि उसे अपने ही धरातल मे अंकुरित होने दो। या तो तुम मे इतना संयम हो कि विचार ही प्रकट ना हो.. सोचने का मतलब हुआ आधा काम तो आपने कर ही लिया.. फिर उस को छुपा कर, दबा कर अच्छे बनने का आडंबर क्यूँ..??? तुम जो भी हो उसे प्रकट होने दो, जाहिर होने दो… सहजता से, सरलता से.. बाधा मत डालो..

नदी की बहाव मे जब रुकावट की जाती है, बाँध दिया जाता है फिर जब वो टूटता है तो बाढ़ आ जाती है, प्रकोप बन जाता है.. इसीलिए अपने विचार को फूलने फलने दो… नहीं तो दूसरे ने उस बीज को पकड़ लिया तो पता नहीं कितना फैल जाये.. हो सकता है फैलता ही जाये..

तूम चेष्टा करके कुछ मत करो। तूम निश्चेष्ट भाव से, निमित्त मात्र हो जाओ और जो होता है, वह हो जाने दे।

🙏🙏🙏 Ram Ram ji

शिव कुमार भारद्वाज

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એક સત્ય ઘટના … દુષ્કાળ પડેલો કાઠીયાવાડ માં મરકી નો રોગ નિકળેલો સાહેબ બહુ સરસ પ્રસંગ છે આ ઈ મરકી ના રોગમાં માણસે માણસ મરવા લાગ્યું ગામડે ગામડું ખાલી થવા લાગ્યું ઈ રોગમાંથી બચવા ખાતર એક બાર વર્ષ ની દિકરી ઘરે થી નિકળે છે અને એવો રોગ હતો કે માણસને બાળવા માટે બળતણ પણ નો મળતા સાહેબ તે દિવસે માણસ પર ભેખડુ વાળી દેવામાં આવી હતી એવા રોગમાંથી બચવા ખાતર એક દિકરી નિકળે છે કયા જાવ શું કરું કેમ બચવું વિચાર આવ્યો મામા ને ઘેર જાવ મામાને ઘરે જાય છે ગામના પાદરમાં આવે છે ઉભી બજારે હાલતિ થાય છે શેરીમાંથી આમ ખડકીમાથી અંદર જાય છે મામાને ઘરે ત્યારે કાને સબદ પડ્યા છે કોઈક મરણ પથારીએ પડ્યું છે અરરે કોઈક નો જીવ નથી જતો કોણ હશે આ જોવા મંડી બાર વર્ષ ની દિકરી એક ખાલી ઓરડો હતો આ બનેલી સોરઠની હકીકત ઘટના છે એક માં પડી હતી એનો જીવ નહોતો જતો પડખામાં ત્રણ વર્ષ નો દિકરો સૂતો હતો જીવ જાય ને આવે ને જાય જીવ ફરી આવે જીવ બાર વર્ષ ની દિકરી જયને એમ કહે છે માં હા બેટા તમારો જીવ નથી જતો ના દિકરી મારો જીવ નથી જતો કારણ કે મારા રોગમાં મારું આખું કુટુંબ ખલાસ થઈ ગયું છે છેલો મારો વારો છે મારા ત્રણ વર્ષ ના દિકરાને ઉછેરીને મોટો કોણ કરશે એટલે મારો જીવ નથી જતો દિકરી મારો જીવ નથી જતો સાહેબ સૌરાષ્ટ્રની બાર વર્ષ ની દિકરી બોલે છે હે માં એમ કરને તારા દિકરાને તું મને વચનથી પરણાવી દે હું ધણી તરીકે મોટો કરીને ઉજેરીશ માં તારા જીવને સતગતી કરી દે ત્યારે માએ દિકરાને છેલ્લે ધાવણ આપ્યું માં એક વચનથી મને પરણાવી દે અને સાહેબ બાર વર્ષ ની દિકરી ત્રણ વર્ષ ના દિકરાને પરણી ગય એક ડોચીના વચન ખાતર પરણી માંનો જીવ નિકળી ગયો વયો ગયો માડીનો જીવ અને પછી ત્રણ વર્ષ ધણીને કાખમાં બેસાડીને ગામનાં પાધરમા પાણી ભરવા જતી હશે ત્રણ વર્ષ ના ધણીને કાખમાં બેસાડીને સાણનો સુડલો નાખવા જતી હશે ને બજારમાં બેઠાં બેઠાં કોઈક જુવાનો એમને પ્રલોભન આપતા હશે 🌹 કેતો ગોરી તને ઘોઘાના ઘોઙલા મંગાવી દવ તે દિવસે આ દિકરી બોલી હતી કે ઘોઘાનો હોરનાર રે કાનો રમે છે મારી કેડમાં નથડીનો હોરનાર કાનો રમે છે મારી કેડમાં ચુદડીનો હોરનાર રે કાનો રમે મારી કેડમાં બાર વર્ષ દિકરી બોલી છે હૂં લાસાર શું મારો નટવર નાનો છે કેડમાં બેઠો છે એટલે તમે. મને એમ કહો છો ને નગર ની ચુંદડી ઓઢી દવ મંગાવી દવ નહિતર તાકાત છે તમે મારી સામે આંખ ઊંચી કરો હું લાસાર શું કે નટવર નાનો રે કાનો રમે છે મારી કેડમાં આ ગીતના ઉંડાણ છે સાહેબ શ્રી અમૂક ગીતને તમે ના સમજો ત્યાં સુધી મજા નહીં આવે વાત ઝવેરચંદ મેઘાણી કહી છે ભાઈ શ્રી ભીખુદાન ભાઈ ગઢવી પ્રસ્તુત કરે છે મને ખૂબજ ગમ્યો આપણો ઈતિહાસ🌹🌹🌹🌹🌹 શ્રી રામ સિંગ તેલ મીલ 🌹 શુધ્ધ દેશી ઘાણી નું પ્યોર તેલ કાઢીને આપું છું આવનારી પેઢીઓ રોગ મુક્ત રહે તંદુરસ્ત રહે છે 🌹 9824752948

आहिर भगवान

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🌻फ्यूज बल्ब🌻

शहर की एक कॉलोनी में एक बड़े आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे।‌

ये रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान परेशान से रोज शाम को पास के पार्क में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नज़रों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे।

एक दिन एक बुज़ुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था-
मैं इतना बड़ा आईएएस अफ़सर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं।

मुझे तो दिल्ली या जयपुर में अमीरजादो के इलाके में बसना चाहिए था । और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे।

परेशान होकर एक दिन बुजुर्ग ने उनको समझाया-

आपने कभी फ्यूज बल्ब देखे हैं?

बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है‌ कि‌ बल्ब‌ किस कम्पनी का बना‌ हुआ था , या कितने वाट का था, या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी?

बल्ब के‌ फ्यूज़ होने के बाद इनमें‌‌ से कोई भी‌ बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है।
लोग ऐसे‌ बल्ब को‌ कबाड़‌ में डाल देते‌ हैं।

फिर जब उन रिटायर्ड‌ आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति‌ में सिर‌ हिलाया तो‌ बुजुर्ग फिर बोले‌ – रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो‌ जाती है‌।

हम‌ कहां‌ काम करते थे‌, कितने‌ बड़े‌/छोटे पद पर थे‌, हमारा क्या रुतबा‌ था,‌ यह‌ सब‌ कुछ भी कोई मायने‌ नहीं‌ रखता‌।

मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं।

वो जो सामने वर्मा जी बैठे हैं, रेलवे के महाप्रबंधक थे।

वे सामने से आ रहे सिंह साहब सेना में ब्रिगेडियर थे।

वो मेहरा जी इसरो में चीफ थे।

ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज़ बल्ब करीब-करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो।

कोई रोशनी नहीं‌ तो कोई उपयोगिता नहीं।

कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते‌ हैं‌ कि‌ रिटायरमेंट के बाद भी‌ उनसे‌ अपने अच्छे‌ दिन भुलाए नहीं भूलते।

माना‌ कि‌ आप बहुत बड़े‌ आफिसर थे‌, बहुत काबिल भी थे‌, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती‌ थी‌ पर अब क्या?

अब यह बात मायने नहीं रखती है बल्कि,,,,यह बात मायने‌ रखती है‌ कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे‌ थे…

आपने लोगों को कितनी तवज्जो दी…
समाज को क्या दिया…

कितने लोगों की मदद की…

पद पर रहते हुए कभी घमंड आये तो याद कर लीजिए कि,,,

एक दिन सबको फ्यूज होना है।
वर्तमान का आनंद लीजिये ।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

🙏जय श्री राम – जय श्री कृष्णा🙏

शिव कुमार भारद्वाज

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. 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
🌻फ्यूज बल्ब🌻

शहर की एक कॉलोनी में एक बड़े आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे।‌

ये रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान परेशान से रोज शाम को पास के पार्क में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नज़रों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे।

एक दिन एक बुज़ुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था-
मैं इतना बड़ा आईएएस अफ़सर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं।

मुझे तो दिल्ली या जयपुर में अमीरजादो के इलाके में बसना चाहिए था । और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे।

परेशान होकर एक दिन बुजुर्ग ने उनको समझाया-

आपने कभी फ्यूज बल्ब देखे हैं?

बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है‌ कि‌ बल्ब‌ किस कम्पनी का बना‌ हुआ था , या कितने वाट का था, या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी?

बल्ब के‌ फ्यूज़ होने के बाद इनमें‌‌ से कोई भी‌ बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है।
लोग ऐसे‌ बल्ब को‌ कबाड़‌ में डाल देते‌ हैं।

फिर जब उन रिटायर्ड‌ आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति‌ में सिर‌ हिलाया तो‌ बुजुर्ग फिर बोले‌ – रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो‌ जाती है‌।

हम‌ कहां‌ काम करते थे‌, कितने‌ बड़े‌/छोटे पद पर थे‌, हमारा क्या रुतबा‌ था,‌ यह‌ सब‌ कुछ भी कोई मायने‌ नहीं‌ रखता‌।

मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं।

वो जो सामने वर्मा जी बैठे हैं, रेलवे के महाप्रबंधक थे।

वे सामने से आ रहे सिंह साहब सेना में ब्रिगेडियर थे।

वो मेहरा जी इसरो में चीफ थे।

ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज़ बल्ब करीब-करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो।

कोई रोशनी नहीं‌ तो कोई उपयोगिता नहीं।

कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते‌ हैं‌ कि‌ रिटायरमेंट के बाद भी‌ उनसे‌ अपने अच्छे‌ दिन भुलाए नहीं भूलते।

माना‌ कि‌ आप बहुत बड़े‌ आफिसर थे‌, बहुत काबिल भी थे‌, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती‌ थी‌ पर अब क्या?
अब यह बात मायने नहीं रखती है बल्कि,,,,यह बात मायने‌ रखती है‌ कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे‌ थे…

आपने लोगों को कितनी तवज्जो दी…
समाज को क्या दिया…

कितने लोगों की मदद की…

पद पर रहते हुए कभी घमंड आये तो याद कर लीजिए कि,,,

एक दिन सबको फ्यूज होना है।
वर्तमान का आनंद लीजिये ।
🌹🙏🏻जय जिनेन्द्र🙏🏻🌹
❤️पवन जैन❤️
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

✍ एक समय मोची का काम करने वाले व्यक्ति को रात में भगवान ने सपना दिया और कहा कि कल सुबह मैं तुझसे मिलने तेरी दुकान पर आऊंगा।

मोची की दुकान काफी छोटी थी और उसकी आमदनी भी काफी सीमित थी। खाना खाने के बर्तन भी थोड़े से थे। इसके बावजूद वो अपनी जिंदगी से खुश रहता था।

एक सच्चा, ईमानदार और परोपकार करने वाला इंसान था। इसलिए ईश्वर ने उसकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया।

मोची ने सुबह उठते ही तैयारी शुरू कर दी। भगवान को चाय पिलाने के लिए दूध, चायपत्ती और नाश्ते के लिए मिठाई ले आया। दुकान को साफ कर वह भगवान का इंतजार करने लगा। उस दिन सुबह से भारी बारिश हो रही थी। थोड़ी देर में उसने देखा कि एक सफाई करने वाली बारिश के पानी में भीगकर ठिठुर रही है।
मोची को उसके ऊपर बड़ी दया आई और भगवान के लिए लाए गये दूध से उसको चाय बनाकर पिलाई।

दिन गुजरने लगा। दोपहर बारह बजे एक महिला बच्चे को लेकर आई और कहा कि मेरा बच्चा भूखा है इसलिए पीने के लिए दूध चाहिए। मोची ने सारा दूध उस बच्चे को पीने के लिए दे दिया। इस तरह से शाम के चार बज गए। मोची दिनभर बड़ी बेसब्री से भगवान का इंतजार करता रहा।

तभी एक बूढ़ा आदमी जो चलने से लाचार था आया और कहा कि मै भूखा हूं और अगर कुछ खाने को मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी। मोची ने उसकी बेबसी को समझते हुए मिठाई उसको दे दी। इस तरह से दिन बीत गया और रात हो गई।
रात होते ही मोची के सब्र का बांध टूट गया और वह भगवान को उलाहना देते हुए बोला कि “वाह रे भगवान सुबह से रात कर दी मैंने तेरे इंतजार में लेकिन तू वादा करने के बाद भी नहीं आया। क्या मैं गरीब ही तुझे बेवकूफ बनाने के लिए मिला था।”

तभी आकाशवाणी हुई और भगवान ने कहा कि ” मैं आज तेरे पास एक बार नहीं, तीन बार आया और तीनों बार तेरी सेवाओं से बहुत खुश हुआ। और तू मेरी परीक्षा में भी पास हुआ है, क्योंकि तेरे मन में परोपकार और त्याग का भाव सामान्य मानव की सीमाओं से परे हैं।”

इस कहानी से हमको यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी मजबूर या ऐसा व्यक्ति जिसको आपकी मदद की जरूरत है उसकी मदद जरूर करना चाहिए। क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है कि ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है’। और मदद की उम्मीद रखने वाले, जरूरतमंद और लाचार लोग धरती पर भगवान की तरह होते हैं। जिनकी सेवा से सुकून के साथ एक अलग संतुष्टी का एहसास होता है।

🍁💘🌷#जय #श्री #कृष्णा🍁💘🌷