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राम राम जी🙏🏻((( प्रारब्ध ))))
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एक मछुआरा था। उस दिन सुबह से शाम तक नदी में जाल डालकर मछलियाँ पकड़ने की कोशिश करता रहा, लेकिन एक भी मछली जाल में न फँसी।
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जैसे -जैसे सूरज डूबने लगा, उसकी निराशा गहरी होती गयी।
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भगवान् का नाम लेकर उसने एक बार और जाल डाला पर इस बार भी वह असफल रहा, पर एक वजनी पोटली उसके जाल में अटकी।
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मछुआरे ने पोटली को निकाला और‌ टटोला तो झुंझला गया और बोला, हाय ये तो पत्थर है !
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फिर मन मारकर वह नाव में चढ़ा। बहुत निराशा के साथ कुछ सोचते हुए वह अपने नाव को आगे बढ़ता जा रहा था और मन में आगे के योजनाओं के बारे में सोचता चला जा रहा था।
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सोच रहा था, कल दुसरे किनारे पर जाल डालूँगा। सबसे छिपकर… उधर कोई नही जाता, वहां बहुत सारी मछलियाँ पकड़ी जा सकती है।
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मन चंचल था तो फिर हाथ कैसे स्थिर रहता ? वह एक हाथ से उस पोटली के पत्थर को एक -एक करके नदी में फेंकता जा रहा था।
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पोटली खाली हो गयी। जब एक पत्थर बचा था तो अनायास ही उसकी नजर उस पर गयी तो वह स्तब्ध रह गया।
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उसे अपने आँखों पर यकीन नही हो रहा था, यह क्या ! ये तो, नीलम था।
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मछुआरे के पास अब पछताने के अलावा कुछ नही बचा था।
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नदी के बीचोबीच अपनी नाव में बैठा वह सिर्फ अब अपने को कोस रहा था।
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प्रकृति और प्रारब्ध ऐसे ही न जाने कितने नीलम हमारी झोली में डालता रहता है जिन्हें पत्थर समझ हम ठुकरा देते हैं। ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

गौरव गुप्ता

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🌺भोले भक्त की भक्ति🌺🙏

एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था। एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम में आया और बोला कि बाबा आप सब का ध्यान रखते है, मेरा इस दुनिया मेँ कोई नही है तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम में रह सकता हूँ ?

बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है ? उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ।

तब संत ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना। रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा।

उन संत की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ रुकेगा ?

संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे.! क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे।

अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था।

बालक रामदास संत के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ।
संत ने कहा ठीक हैँ पर तुझे काम करना पड़ेगा आश्रम की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा मे कोई कमी मत रखना।

रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप बता दिजिये के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है ? फिर मैँ कर दूंगा।

संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार की झाँकी थी। श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी थे।

संत ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है सब सिखा दिया।

रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योँकि अगर रिश्ता पता चल जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा।

उन संत ने बालक रामदास कहा की तू कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज से ये राम जी और सीता जी तेरे माता-पिता हैँ।

रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है ?

संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है।

रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये।

आज सेवा का पहला दिन था, रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया ,आश्रम की साफ़ सफाई की,और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया।

रामदास ने श्री राम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा।

रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर खायेंगे. पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी।

तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिश्ता बना हैँ तो शरमा रहेँ होँगे। रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था।

अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ !
और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और मैँ भूख से मर जाऊँगा..! इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा।

रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब भगवान राम जी हनुमान जी को कहते हैँ हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ।

हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो?

रामदास कहता हैँ आप कौन ? हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ?

रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहा बोल रहा था की खाना खा लो तब आये नहीँ अब क्योँ आ गये ?

तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे। फिर राम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी , हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैँ।

इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता।

सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा घर मैँ ५ लोग हैं,सारा काम में ही अकेला करता हुँ ,बाकी लोग तो दिन भर घर में आराम करते है.मेरे माँ, बाप ,चाचा ,भाई तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ. मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा।

रामदास मंदिर जाता हैँ ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।राम जी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ ?

रामदास कहता हैँ की घर में मैं सबसे छोटा हुँ ,और मैं ही सब काम करता हुँ।अब से मैँ अकेले काम नहीँ करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा,आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा।

राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है?रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले. और चाचा जी (लक्ष्मणजी) आप घर की साफ़ सफाई करियेगा.

भैय्या जी (हनुमान जी)शरीर से मज़बूत हैं ,जाकर जंगल से लकड़ियाँ लाइयेंगे. पिता जी (रामजी) आप बाज़ार से राशन लाइए और घर पर बैठकर पत्तल बनाओँगे। सबने कहा ठीक हैँ।मैंने बहुत दिन अकेले सब काम किया अब मैं आराम करूँगा.
अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ।
एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो देखा आश्रम तो शीशे जैसा चमक रहा है, वो बहुत प्रसन्न हुए.मंदिर मेँ गये और देखा की मंदिर से प्रतिमाऐँ गायब हैँ.
संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीँ दी ? संत ने रामदास को बुलाया और पूछा भगवान कहा गये

रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता हनुमान भैया जंगल लकड़ी लाने गए होंगे,लखन चाचा झाड़ू पोछा कर रहे होंगे,पिताजी राम पत्तल बन रहे होंगे माता सीता रसोई मेँ काम कर रही होंगी.

संत बोले ये क्या बोल रहा ? रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जब से आप गये हैँ ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ।

वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ राम जी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये।

संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तू धन्य हैँ। और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये…!

रामदास जैसे भोले,निश्छल भक्तो की भक्ति से विवश होकर भगवान को भी साधारण मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने आना पड़ता है.
🌺जय श्री राम🌺

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पति पत्नी आने वाले त्योहार की ख़रीदारी को लेकर बहुत जल्दीबाजी में थे…

पति ने पत्नी से कहा:- ज़ल्दी करो, मेरे पास टाईम नहीं है औऱ भी जरुरी काम है ऑफिस का.. 😎

दोनों घर से निकलने लगे ….

तभी बाहर बरामदे में बैठी बूढ़ी मां पर उसके बेटे की नज़र पड़ गई…

वह मां के पास जाकर बोला:-
मां, हम लोग त्योहार की ख़रीदारी के लिए बाज़ार जा रहे हैं,आपको कुछ चाहिए तो मुझें बता दीजिए… ❓😄

मां ने कहा:- मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा…😎

बेटे के बार बार बहुत ज़ोर देकर कहने पर मां बोली:- ठीक है, तुम रुको, मैं अभी लिख कर देती हूं…. 😄

उसके कुछ देर बाद मां ने बेटे को कुछ लिखकर एक कागज़ थमा दिया…😄

बेटा गाड़ी के ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए अपनी पत्नी से बोला:-
देखा, मां को भी कुछ चाहिए था लेकिन बोल नहीं रही थी, मेरे ज़िद करने पर लिस्ट बना कर दी है। रोटी और वस्त्र के अलावा भी इंसान को जीवन में बहुत कुछ चाहिए होता है….. 👍

अच्छा बाबा ठीक है, पर पहले मैं अपनी ज़रूरत का सारा सामान लूंगी,बाद में आप अपनी मां की लिस्ट देखते रहना…😎.पत्नी बोली

दोनों गाड़ी से बाज़ार के लिए निकल पड़े…

चार घंटों तक पूरी ख़रीदारी करने के बाद पत्नी बोली:- मैं तो बहुत थक गयी हूं,कार में एसी चला कर बैठती हूं, आप अपनी मां का सामान उनका लिस्ट देख कर खरीद लो…..😄
मां ने इस त्योहार पर क्या मंगाया है…जरा मुझें भी बताना … ❓😎

पति ने मां का दिया हुआ कागज पत्नी को ही पकड़ा दिया…. 😄

बाप रे! इतनी लंबी लिस्ट, . पता नहीं क्या क्या मंगाया है❓😎
और बनो श्रवण कुमार…..कहते हुए पत्नी गुस्से से पति की ओर देखते हुए वापस उसे लिस्ट पकड़ा दी….. 😎

पर ये क्या…. ❓😎

पति की आंखों में आंसू…….. ❓😎

लिस्ट पकड़े हुए हाथ सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था….. उसका पूरा शरीर बेसुध था…..

पत्नी बहुत घबरा गई…..क्या हुआ…❓😎 ऐसा क्या मांग लिया है तुम्हारी मां ने…..❓😎

कहकर पति के हाथ से पर्ची झपट ली….😎

हैरान थी पत्नी भी …क्योंकि इतनी बड़ी पर्ची में बस चंद शब्द ही लिखे थे…..

उस कागज़ में लिखा था….

मेरे कलेजे के टुकड़े, मेरे आंखों के तारे,मेरे बेटे….
मुझे इस त्योहार पर क्या किसी भी त्योहार पर कभी कुछ नहीं चाहिए…..❓
फिर भी तुम ज़िद कर रहे हो तो……

अगर शहर की किसी दुकान में अगर मिल जाए तो “फ़ुरसत के कुछ पल मेरे लिए” लेते आना….😎

क्योंकि ढलती हुई सांझ हूं अब मैं,मुझे गहराते अंधियारे से डर लगने लगा है,मुझें अकेलापन से डर लगने लगा है…….
मेरा ये बुढ़ापा मुझे कचोटता है, मुझें अब तन्हाई से डर लगने लगा है……
तो जब तक मैं जिंदा हूं,जब तक मेरी सांसे चल रही हैं, जब तक मेरी धड़कनों में आवाज़ है,कुछ पल बैठा कर मेरे पास…….

कुछ देर के लिए ही सही बांट लिया कर मेरे बुढ़ापे का अकेलापन….
बिन दीप जलाए ही रौशन हो जाएगी मेरी जीवन की ये काली सांझ…. 😎

कितने साल हो गए बेटा…❓तुझे स्पर्श नहीं किया….😎
एक बार फिर से,आ मेरी गोद में सर रख और मैं ममता भरी हथेली से सहलाऊं तेरे सर को…..

एक बार फिर से इतराए मेरा हृदय मेरे अपनों को क़रीब, बहुत क़रीब पा कर….

और मुस्कुरा कर मिलूं मौत के गले ….

क्या पता अगले त्योहार तक रहूं ना रहूं…….❓😎

दोनों रोने लगे…..😭😭

दोस्तो….
हमारे माता पिता को सिर्फ़ हमारा प्रेम चाहिए, हमारा साथ चाहिए,हमारा आदर औऱ सम्मान चाहिए ।औऱ कुछ नहीं बस…….
🙏🙏

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साधु बड़ा मनमौजी था। जब-तब जिस-तिस भक्त के दरवाजे पहुँच जाता और आवाज लगाता। बिना किसी पूर्व सूचना के, यूँ ही अचानक दरवाजे पर आकर आवाज लगाना उस साधु का ट्रेडमार्क था।

भक्त दौड़कर दरवाजा खोलते, और कुछ ही समय में उस भक्त के घर अनेक भक्त इकट्ठा हो जाते। साधु आएगा तो भंडारा भी होगा। अभी एक के यहां भंडारा चल ही रहा होता कि वह किसी दूसरे भक्त के घर पहुंच जाता और वहां भी भंडारा चालू हो जाता। भोर है कि दोपहर, संध्या है कि आधी रात, भंडारे थे कि चले ही जा रहे हैं। आश्चर्य यह कि सामग्री कभी खत्म भी न होती।

ऐसे ही एक बार साधु भीमताल (जिला नैनीताल, उत्तराखंड) के एक भक्त देवी दत्त जोशी जी के घर पहुंच गया। थोड़ी बातचीत के बाद साधु ने दो-तीन भक्तों से कहा कि वे जाएं और थोड़ी दूर पर बने शिव मंदिर के पीछे एक खंडहर हो चुके घर से एक आदमी और उसकी पत्नी को लिवा लाएं।

भक्त गए। भवन का दरवाजा पीटा, पर कोई निकला नहीं। फिर बहुत देर तक दरवाजा पीटने पर एक अधेड़ निकला और टूटी-फूटी हिंदी में गुस्से में बोला, “क्या है?”

भक्तों ने कहा कि चलो, बाबा बुलाते हैं। पर वह अधेड़ आने को तैयार नहीं। भक्त वापस आ गए और साधु को हाल सुनाया। साधु ने कुछ और भक्तों को भेजा और कहा कि अबकी अगर वे राजीखुशी न आए तो जबरदस्ती उठाकर ले आना।

अधेड़ ने फिर आनाकानी की। भक्त अड़ गए कि पाँव-पाँव चलना हो तो चलो, नहीं तो उठाकर के जाएंगे। मजबूरी में दोनों पति-पत्नी साथ चल पड़े।

साधु के पास पहुँचे, तो साधु देखते ही गुस्से में बोला, “क्या समझते हो तुम दोनों कि भूखे रहकर भगवान को डरा दोगे? प्रारब्ध का दंड भोगना पड़ता है जो तुम भोग चुके। पर अब यह जिद कि भूखे मरोगे? भगवान अपने भक्त को कैसे भूखा मरने देगा? बताओ तो जरा।”

जब पति-पत्नी कुछ न बोले तो साधु बोला, “चलो, यह सामने प्रसाद रखा है। खाओ इसे।”

साधु के कहने पर पति-पत्नी ने सामने रखे पूरी, सब्जी, मिठाई को खा लिया।

हुआ यह था कि दक्षिण भारत के किसी धनी परिवार का यह अधेड़ वैष्णव जोड़ा अपनी सारी सम्पत्ति दान कर तीर्थयात्रा पर निकला था। बद्रीनाथ के दर्शन कर वापस आ रहा था कि रास्ते में बदमाशों ने इनकी समस्त पूंजी लूट ली थी। अपनी भक्ति का यह हश्र देख पति-पत्नी ने आमरण अनशन कर प्राण त्यागने का विचार बना लिया था।

पर भक्त को भगवान कैसे मरने दे? वह किसी न किसी रूप में भक्त को बचाने आ ही जाता है।

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વાવેલો સંબંધ
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કન્ડકટર ભાઇસાબ,આ મારી દીકરી બસમાં એકલી જ છે. એનાં મામાને ઘરે જઇ રહી છે. તમે જરા એનું ઘ્યાન રાખજો…ને… વાસણા આવે એટલે ઉતારી દેજો! જો ઊંઘી ગઇ હોય તો જગાડજો!’

પંદર વર્ષ પહેલાંની ઘટના. ઓગસ્ટનો મહિનો હતો. વરસાદના દિવસો હતા. ચરોતરના એક જાણીતા ગામનો સુખી અને સમૃદ્ધ પટેલ પિતા એની તેર-ચૌદ વર્ષની દીકરી જયશ્રીને અમદાવાદ આવતી એસ.ટી.ની બસમાં બેસાડતી વખતે કન્ડકટરને ભલામણ કરી રહ્યો હતો. છોકરીને જે સીટ ઉપર જગ્યા મળી, એ જ બેઠક ઉપર અમદાવાદના મુકેશભાઇ પણ બેઠા હતા અને ચુપચાપ આ દૃશ્ય જોઇ-સાંભળી રહ્યા હતા.

જયશ્રીના પિતા રમણ પટેલ બસ ઉપડવાની થઇ ત્યાં સુધી ઊભા રહ્યા. બારીમાંથી શિખામણ પીરસતાં રહ્યા, ‘બેટા, ખેતરનું કામ નહોત, તો હું તારી સાથેજ આવ્યો હોત. આમ તને સાવ એકલી તો મોકલું જ નહીં ને! તું પણ ભારે જિદ્દી નીકળી. ‘મામાના ઘરે જવું છે… ભાઇને રાખડી બાંધવી જ છે! એક મહિનાથી આ બેજ વાકયો સાંભળીને આખા ઘરનાં કાન પાકી ગયા. નહીંતર આજ દિન સુધી તને કયાંય એકલી જવા દીધી નથી.’

બાપની ચિંતા તો હજુયે ચાલુ જ હતી, ‘જયશ્રી! બેટા, જાતનું ઘ્યાન રાખજે. બારીમાંથી હાથ બહાર કાઢીશ નહીં. અને આ કળિયુગ છે. કોઇનોય વિશ્વાસ કરતી નહીં. પુરુષથી તો ખાસ ચેતતી રેજે. ચાલુ બસમાં કોઇ કંઇ ખાવા-પીવાનું આપે, તો ના પાડી દેજે. વાસણા આવે એટલે કન્ડકટરને પૂછીને ખાતરી કરીને ઉતરી જજે.

ત્યાં તો તારા મામા તને લેવા માટે આવીજ ગયેલા હશે. ઘરે પહોંરયા પછી મને ફોન કરી દેજે કે તું સહીસલામત પહોંચી ગઇ છે.’

બસ ચાલુ થઇ. એના એન્જિનની ઘરઘરાટીમાં બાપના શબ્દો ડૂબી ગયા. જયશ્રીની બાજુમાં બેઠેલા ચાલીસ વર્ષના મુકેશભાઇ મનોમન વિચારી રહ્યા, ‘બિચારો બાપ! શો જમાનો આવ્યો છે! દીકરી ભલે નાની હોય, તોયે એનાં બાપને એની કેટલી બધી ફિકર હોય છે!

આ બાપડી માંડ તેર-ચૌદ વર્ષની હશે, અંગ ઉપર હજુતો જુવાની બેસવાને ચાર-પાંચ વર્ષની વાર લાગે છે. તોયે એનાં બાપને દીકરી કયાંક ચૂંથાઇ ન જાય એની ચિંતા સતાવે છે. બાપની ફિકર વાજબી પણ છે. શિકારીઓને તો શિકાર સાથે નિસબત છે, શિકારની ઉંમર સાથે એમને શી લેવા-દેવા?’

ટિકિટ..! ટિકિટ..!’ કરતો કન્ડકટર આખી બસમાં ફરી વળ્યો. જયશ્રીએ વાસણાની ટિકિટ માગી. કન્ડકટરે પૈસા લીધા. ટિકિટ ફાડી આપી. સાથે હૈયાધારણ પણ આપી,‘ગભરાતી નહીં, હોં બેટા! વાસણા આવે એટલે હું તને…’ અને તેમ છતાં જયશ્રી ગભરાતી રહી. બાજુમાં બેઠેલા મુકેશભાઇને યાદ કરાવતી રહી. દર અડધા કલાકે પૂછતી રહી, ‘વાસણા જતું તો નથી રહ્યું ને, કાકા? મનેતો ઉઘ આવે છે, પણ તમે ઘ્યાન રાખજો, હોં ને! મને જગાડવાનું ભૂલી ન જતા.’

આમ જુઓ તો આખીય ઘટના સુખાંત સાથે પૂરી થઇ ગઇ હોત. પણ જીવનની સફર એટલી સરળ નથી હોતી. પાયામાં ધરબાયેલી સૌથી મોટી ગરબડ ‘વાસણા’ નામના કારણે સર્જાઇ ગઇ. ચરોતરમાં વાસણા નામનું એક સાવ નાનું ગામ છે એ વાતની ખબર કન્ડકટરને તો હતીજ, પણ અમદાવાદમાં રહેતા મુકેશભાઇને ન હતી. કન્ડકટર છેક છેવાડાના ભાગે બારણાની બાજુમાં આવેલી એની બેઠકમાં બેઠો-બેઠો ટિકિટનો વકરો ગણી રહ્યો હતો, ત્યાં વાસણા લખેલું પાટિયું કયારે પાછળ છૂટી ગયું એ વાતની કોઇને ખબર ન રહી. મુકેશભાઇનું પોતાનું રહેવાનું અમદાવાદના જીવરાજ પાર્ક વિસ્તારમાં. એટલે એ તો એક જ વાસણાને ઓળખે. અને જયારે બસ અમદાવાદના વાસણા આગળ આવી પહોંચી, ત્યારે મુકેશભાઇએ જયશ્રીને જગાડી, ‘બેટા, વાસણા આવી ગયું.’

જયશ્રી તો ડઘાઇ જ ગઇ. આવડું મોટું શહેર, આટલી બધી ઝાકમઝોળ, આટલાં બધાં વાહનો અને માણસોની ભીડ!! બાપડી રડવા માંડી, ‘મારે અહીં નથી ઉંતરવું. મામાનું વાસણા તો સાવ નાનકડું છે.’ બસના મુસાફરો ભેગા થઇને એને છાની રાખવા માંડયા. કન્ડકટરે રસ્તો ચીંધાડયો, ‘બસ પોલીસ સ્ટેશને લઇ લઉં?

છોકરીને પોલીસના હાથમાં સોંપી દઇએ. એ લોકો એને સહીસલામત રીતે એનાં મામાના ઘરે પહોંચાડી દેશે.’ પેસેન્જરો માંથી એક પણ ને આ ‘સહીસલામત’ વાળી વાતમાં ભરોસો ન પડયો. જયશ્રીએ પણ છાપામાં પોલીસ સ્ટેશનમાં બનતી દુઘટર્નાઓ વિશે વાંચેલું હતું. એટલે એનો ભેંકડો વધારે મોટો થઇ ગયો. છેવટે મુકેશભાઇએ પૂછ્યું, ‘બેટા, મારામાં વિશ્વાસ પડે છે? તો મારી સાથે ચાલ.’

જયશ્રીને મુકેશભાઇની આંખોમાં સજજનતા દેખાણી. એણે રડતાં-રડતાં હા પાડી દીધી. રિક્ષામાં મહેમાનએ લઇને મુકેશભાઇ ઘરે આવ્યા, ત્યારે સાંજનો સૂરજ એના આખરી કિરણો ફેંકીને અમદાવાદને ‘આવજો!’ કરી રહ્યો હતો. ફલેટમાં પહોંચીને મુકેશભાઇએ પત્નીનાં હાથમાં જયશ્રી સોંપી, ‘પારકી થાપણ છે. આજની રાત આપણે સાચવવાની છે. ’

પત્નીએ જયશ્રીને સોડમાં લીધી. બે નાના દીકરાઓ જયશ્રીને વીંટળાઇ વળ્યા.
જયશ્રી માટે ગરમ-ગરમ ભોજન પીરસાઇ ગયું. પણ જયશ્રીની હાલત કફોડી હતી. એક તરફ એનાં કાનમાં પિતાની શિખામણ ગુંજતી હતી, ‘પારકા માણસોનો ભરોસો કરવો નહીં. કોઇ કશું ખાવા-પીવાનું આપે તો લેવું નહીં.’ એણે ભોજન કરવાની ના પાડી દીધી.

‘બેટા તારી પાસે તારા ઘરનો કે મામાના ઘરનો ફોન નંબર છે? તો હું વાત કરી લઉં.’ મુકેશભાઇએ રસ્તો કાઢયો. પણ જયશ્રી એટલી હદે ગભરાઇ ગઇ હતી કે એને કશું યાદ જ આવતું ન હતું. એણે તો એક જ વાતની રટ લીધી, ‘મને ગમે તેમ કરીને મારા મામાને ઘરે લઇ જાવ. અત્યારેને અત્યારે જ.’
ખૂબ સમજાવી ત્યારે જયશ્રીએ બે કોળિયા ખાધાં. રાત્રે સાડા નવ વાગ્યે મુકેશભાઇ એને લઇને પાછા એસ.ટી. સ્ટેશને પહોંરયા. વાસણા જવા માટે બસ ઉપડી.

રાત્રે અગિયાર વાગે જયશ્રીનાં મામાના ઘરે પહોંરયા. મામાના હાથમાં ભાણી સોંપી. બધી વાત કરી. ત્યાં સુધીમાં જયશ્રીનાં પિતાના ઘરે અને મામાના ઘરે રડારોળ જામી ચૂકેલી હતી. જયશ્રી ગુમ થવાની વાતથી ધરતીકંપ મચી ગયો હતો.

જયશ્રીને જીવતી-જાગતી અને અખંડ હાલતમાં જોઇને બંને પરિવારોમાં હાશ વળી.
રાત્રે વાસણાથી મુકેશભાઇ જયારે પોતાના ઘરે પાછા ફર્યા, ત્યારે ઘડિયાળમાં સાડા ત્રણ વાગ્યા હતા. પત્ની જાગતી સૂતી હતી, ‘એ લોકોને શાંતિ થઇ હશે નહીં? તમારો આભાર માન્યો કે નહીં?’

‘આપણે જે કર્યું એ માનવતા ખાતર કર્યું ને? કોઇ આભાર માને કે ન માને એનાથી આપણને શો ફરક પડવાનો?’ મુકેશભાઇના વાકયોમાં રહેલી હતાશા સૂચક હતી. પણ એમને ખબર નહોતી કે એમણે જે દીકરી માટે સદ્કાર્ય કર્યું એ એક પટેલની દીકરી હતી અને ચરોતરના પટેલો આભાર વ્યકત કરવાની વાતે ભલે ‘જાડા’ હોય છે, પણ હોય છે જબરા.

આ વાતની સાબિતી બીજા દિવસે મળી ગઇ. ગાડીઓમાં ભરાઇને જયશ્રીનાં મા-બાપ અને મામા-મામી સપરિવાર આવી ચડયાં. ભેટ-સોગાદો મુકેશભાઇના દીકરાઓ માટે હતી અને આભાર મુકેશભાઇ માટે હતો.

જયશ્રીના પિતા રમણભાઇની આંખો ભીની હતી, ‘જો તમે ન હોત તો મારા દીકરીનું શું થાત?’ પછી એમણે દીકરીની દિશામાં ફરીને આદેશ આપ્યો, ‘બેટા, તારા આ બે ભાઇઓના હાથ પર રાખડી બાંધ! આજથી આપણો નવો સંબંધ શરૂ થાય છે.’

રાખડી, રૂપિયાની આપ-લે, ભોજન અને પછી ભાવભીની વિદાય. સંબંધના દાણાં આયખાના ખેતરમાં વવાઇ ચૂકયા હતા, હવે પ્રતીક્ષા હતી ફસલ ઊગવાની. ફસલ ઊગી અને મબલખ ઊગી. વર્ષમાં બે વાર જયારે વેકેશન પડે ત્યારે રમણ પટેલ મુકેશભાઇને સહકુટુંબ એમના ઘરે રજાઓ ગાળવા તેડાવે. બદલામાં રમણભાઇને તો વર્ષ દરમિયાન સોવાર અમદાવાદનો ફેરો ખાવાનો થાય. દર વખતે તરવાનું તો મુકેશભાઇના ઘરે જ હોય. અને દર રક્ષાબંધનના દિવસે જયશ્રી એકને બદલે બે ‘વાસણા’ની મુલાકાત લેવાનું ચૂકે નહીં.

વર્ષો વિતતાં ગયાં. જયશ્રીએ કિશોરાવસ્થાની વાડ કૂદીને યૌવનના બગીચામાં પગ મૂકયો. સારી તો હતી જ, હવે સુંદર પણ દેખાવા માંડી. એનાં માટે મુરતિયાની શોધ ચાલી. આખરે અમેરિકામાં વસતો સુખી ઘરનો ગ્રીનકાર્ડ હોલ્ડર જુવાન મળી ગયો. લગ્ન લેવાયાં.

‘આપણી જયશ્રી દીકરીનાં લગ્ન છે. કંઇ સૂઝે છે?’ મુકેશભાઇના પત્નીએ પૂછ્યું. ‘એમાં વિચારવાનું શું? જયશ્રી મને મામા કહે છે, મારે મામેરું કરવું જ પડે ને?’ મુકેશભાઇ સાવ સાધારણ સ્થિતિના માણસ હતા, તો પણ ગજા ઉપરવટનું મોસાળુ કરવા માટે જયશ્રીનાં માંડવે પહોંચી ગયા.

લગ્ન પતી ગયા, હનિમૂન પણ પતી ગયું. મુરતિયાનું પાછા અમેરિકા જવાનું ટાણું નજીક આવી ગયું. જયશ્રીની પણ ત્યાં જવાની વિધિ કરવાની જ હતી. એ માટે તો અમદાવાદ આવવું જ પડે. જયશ્રી એનાં વરને લઇને ‘મામા’ના ઘરે આવી. અમેરિકન મુરતિયાની નવાઇનો પાર ન હતો, ‘આપણે પટેલ… અને… મામા જૈન..? ’

જવાબમાં નવી-નવેલી દુલ્હને અતીતમાં બની ગયેલી વાસણા નામની શરતચૂક વિશે માંડીને વાત કરી. પતિ બોલ્યો, ‘વાઉ! જો આવી વાત હોય તો મામાનો સૌથી મોટો ઉપકાર તો મારા માથે કહેવાય! પૂછ, કેવી રીતે?’

‘કેવી રીતે?’ ‘એ રાતે જો મુકેશમામાએ તને બચાવી ન હોત, તો તું અત્યારે કયાં હોત? મને પત્નીરૂપે તો ન જ મળી હોત ને! મારે પણ આ સંબંધને યાદ રાખવો પડશે.’ કહીને એણે રૂપાળી પત્નીને આલિંગનમાં લીધી. પતિપત્ની અમેરિકા પહોંચી ગયા.

એ પછી એક દિવસ જયશ્રીનાં વરનો મુકેશભાઇ ઉપર ફોન આવ્યો, ‘મામા, બે દિવસ હું તમારા ઘરે રહ્યો. એમાં હું તમારી આર્થિક તકલીફો અને ચિંતા વિશે ઘણું બધું જાણી ચૂકયો છું. પણ હવે તમે મુઝાશો નહીં. તમારા બંને દીકરાઓને કમ્પ્યૂટરનું કે એમ.બી.એ.નું ભણાવો. હજુ તો બંને નાનાં છે. પણ જેવા એ બંને જુવાન થાય, એવા જ હું એમને અમેરિકા બોલાવી લઉં છું. ના, ઉપકાર કરતો હોઉં એ રીતે નહીં, પણ બા-કાયદા એકની સાથે મારી સગી બહેન પરણાવીને અને બીજા માટે પણ મારા પરિચિતોમાંથી કોઇ યોગ્ય કન્યા શોધીને.’

સામો છેડો ચૂપ હતો. માત્ર મુકેશભાઇનો ડૂમો ‘સંભળાઇ’ રહ્યો હતો. જમાઇ બોલતો રહ્યો, ‘મામા, તમે રડો છો શા માટે? આમાં મેં કયાં મોટો મીર માર્યો છે? અરે, આ તો તમે વાવેલો સંબંધ છે, જે હવે સોળ આની ફસલ સાથે ઊગી નીકળ્યો છે.’

એ રાત્રે મુકેશભાઇ એમની પત્નીને કહી રહ્યા હતા, ‘મને એ સમજાતું નથી કે બ્રહ્માંડનું સંચાલન કરતી જે અદૃષ્ટ શકિત છે એના મનમાં શું રહેલું હોય છે! જયશ્રી ભૂલી પડી, એ દુઘટર્ના હતી? કે સુ-ઘટના? કે પછી મેં ખરે સમયે નિસ્વાર્થ બુદ્ધિથી મારી ફરજ સમજીને કરેલું કૃત્ય આપણને આ ચમત્કાર બતાવી રહ્યું છે? કે પછી લોકો કહે છે એ સાચું હશે કે ઈશ્વર સારા માણસોનું ઘ્યાન હંમેશાં રાખતો જ હોય છે! બાકી આપણે કયાં આવી કોઇ અપેક્ષા રાખી હતી..?. 💞🌹💞🌹💞

મનોજ કુમાર પરમાર

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एक स्थान पर चार ब्राह्मण रहते थे। चारों विद्याभ्यास के लिए कान्यकुब्ज गए। निरन्तर बारह वर्ष तक विद्या पढ़ने के बाद वे सम्पूर्ण शास्त्रों के पारंगत विद्वान हो गए। किन्तू व्यवहार बुद्धि से चारों खाली थे। विद्याभ्यास के बाद चारों स्वदेश के लिए लौट पड़े। कुछ दूर चलने के बाद रास्ता दो तरफ था ।-किस मार्ग से जाना चाहिए-इसका कोई भी निश्चय न करने पर वहीं बैठ गए। इसी समय वहाँ से एक मृत वैश्य बालक की अर्थी निकली। अर्थी के साथ बहुत से महाजन भी थे। ‘महाजन’ नाम से उनमें से एक को कुछ याद आ गया। उसने पुस्तक के पन्ने पलटकर देखा तो लिखा था : महाजनो येन गत:स पन्थाः, अर्थात् जिस मार्ग से महाजन जाए,वही मार्ग है। पुस्तक लिखे को ब्रह्म-वाक्य मानने वाले चारों पण्डित महाजनों के पीछे श्मशान की ओर चल पड़े।

थोड़ी दूर पर श्मशान में उन्होंने एक गधे को खड़ा देखा। गधे को देखते उन्हें शास्त्र की यह बात याद आ गई: राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः, अर्थात् राजद्वार और श्मशान में जो खड़ा हा, वह भाई होता है। फिर क्या था, चारों ने उस श्मशान में खड़े गधे को भाई बना लिया। कोई उसके गले से लिपट गया, तो कोई उसके पैर धोने लगा।

इतने में एक ऊँट उधर से गुजरा । उसे देखकर सब विचार में पड़ गए। यह कौन है। बारह वर्ष तक विद्यालय की चारदीवारी में रहते हुए उन्हें पुस्तक के अतिरिक्त संसार की किसी वस्तु का ज्ञान नहीं था। ऊँट को वेग से भागे हुए देखकर उनमें से एक को पुस्तक में लिखा यह वाक्य याद आ गया :धर्मस्य त्वरिता गति:अर्थात् धर्म की गति में बड़ा वेग होता है उन्हें निश्चय गया कि वेग से जानेवाली यह वस्तु अवश्य धर्म है। उसी समय उनमें से एक याद आया : इष्टं धर्मेण योजयेत्, अर्थात् धर्म का संयोग इष्ट से करा दे।

उनकी समझ में इष्ट बान्धव था और ऊँट था धर्म; दोनों का संयोग कराना उन्होंने शास्त्रोक्त मान लिया। बस खींचखाँचकर उन्होंने ऊँट के गले में गधा गाँध दिया। वह गधा एक धोबी का था। उसे पता लगा तो वह भाग आया। उसे अपनी ओर आता देखकर चारों शास्त्रपारंगत पण्डित वहाँ से भाग खड़े हुए।

थोड़ी दूर पर एक नदी थी। नदी में पलाश का एक पत्ता तैरता हुआ आ रहा था। इसे देखते ही उनमें से एक को याद आ गया : आगमिष्यति यत्पत्रं तदस्मांस्तारयिष्यति, अर्थात् जो पत्ता तैरता हुआ आएगा वही हमारा उद्धार करेगा। उद्धार की इच्छा से वह मूर्ख पण्डित पत्ते पर लेट गया। पत्ता पानी में डूब गया तो वह भी डूबने लगा।

केवल उसकी शिखा पानी से बाहर रह गई। इसी तरह बहते-बहते जब वह दूसरे मूर्ख पण्डित के पास पहुंचा तो उसे एक और शास्त्रोक्त वाक्य याद आ गया : सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्ध त्यजति पण्डित:, अर्थात् सम्पूर्ण का नाश होते देखकर आधे को बचा ले और आधे का त्याग कर दे ।- यह याद आते ही उसने बहते हुए पूरे आदमी का आधा भाग बचाने के लिए उसकी शिखा पकड़कर गरदन काट दी। उसके हाथ में केवल सिर का हिस्सा आ गया। देह पानी में बह गई।

उन चार के अब तीन रह गए। गाँव पहुँचने पर तीनों को अलग-अलग घरों में ठहराया गया। वहाँ उन्हें जब भोजन दिया गया तो एक ने सेमियों को यह कहकर छोड़ दिया। : दीर्घसूत्री विनश्यति, अर्थात दीर्घ तन्तुवली वस्तु नष्ट हो जाती है। दूसरे को रोटियाँ दी गईं तो उसे याद आ गया :अतिविस्तार-विस्तीर्ण तद्भवेन्न चिरायुषम्, अर्थात् बहुत फैली हुई वस्तु आयु को घटाती है-तीसरे को छिद्रवाली वाटिका दी गई तो उसे याद आ गया : छिद्रेष्वना बहुली भवन्ति, अर्थात छिद्रवाली वस्तु में बहुत अनर्थ होते हैं। परिणाम यह हुआ कि तीनों की जगहँसाई हुई और तीनों भूखे भी रहे।

शिक्षा
ज्ञान तो हर कोई ग्रहण कर लेता है परन्तु उसे सही समय पर कैसे प्रयोग करना है जो यह जानता है वही सच्चा ज्ञानी होता है। Esi hi kahaniya padhne ke liye click kare http://www.hindisuccessstories.in

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एक बार की बात है, एक बड़ा आम का पेड़ रहता था। एक छोटा लड़का रोज उसके आसपास आकर खेलना पसंद करता था।

वह पेड़ की चोटी पर चढ़ गया, आम खा लिया, छाया के नीचे एक झपकी ली … वह पेड़ से प्यार करता था और पेड़ उसके साथ खेलना पसंद करता था।

समय बीतता गया… छोटा लड़का बड़ा हुआ, और वह अब पेड़ के आसपास नहीं खेलता था।

एक दिन, लड़का अपने चेहरे पर उदास भाव के साथ वापस पेड़ के पास आया।

“आओ और मेरे साथ खेलो,” पेड़ ने लड़के से पूछा।

“मैं अब बच्चा नहीं रहा, मैं अब पेड़ों के आसपास नहीं खेलता।” लड़के ने उत्तर दिया, “मुझे खिलौने चाहिए। मुझे उन्हें खरीदने के लिए पैसे चाहिए।”

“क्षमा करें, मेरे पास पैसे नहीं हैं… लेकिन आप मेरे सभी आम चुन सकते हैं और उन्हें बेच सकते हैं ताकि आपके पास पैसा हो।”

लड़का बहुत उत्साहित था। उसने पेड़ पर लगे सभी आमों को उठाया और खुशी-खुशी चला गया। लड़का वापस नहीं आया। पेड़ उदास था।

एक दिन, लड़का बड़ा होकर आदमी बन गया। पेड़ बहुत उत्साहित था।

“आओ और मेरे साथ खेलो,” पेड़ ने कहा।

“मेरे पास खेलने का समय नहीं है। मुझे अपने परिवार के लिए काम करना है। हमें आश्रय के लिए एक घर चाहिए। क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं?”

“क्षमा करें, मेरे पास घर नहीं है, लेकिन आप अपना घर बनाने के लिए मेरी शाखाओं को काट सकते हैं।”

इसलिए उस आदमी ने पेड़ की सारी डालियाँ काट दीं और खुशी-खुशी वहाँ से चला गया। पेड़ उसे खुश देखकर खुश हुआ लेकिन लड़का बाद में वापस नहीं आया। पेड़ फिर से अकेला और उदास था।

एक गर्म गर्मी के दिन, वह आदमी लौट आया और पेड़ खुश हो गया।

“आओ और मेरे साथ खेलो!” पेड़ ने कहा।

“मैं दुखी हूं और बूढ़ा हो रहा हूं। मैं अपने आप को आराम करने के लिए नौकायन जाना चाहता हूं। क्या आप मुझे नाव दे सकते हैं?”

“अपनी नाव बनाने के लिए मेरी सूंड का उपयोग करो। आप बहुत दूर जा सकते हैं और खुश रह सकते हैं।”

तो आदमी ने नाव बनाने के लिए पेड़ के तने को काट दिया। वह नौकायन के लिए गया और लंबे समय तक वापस नहीं आया।

आखिरकार, इतने सालों के बाद वह आदमी वापस लौट आया।

“क्षमा करें, मेरे लड़के, लेकिन मेरे पास अब तुम्हारे लिए कुछ नहीं है। तुम्हें देने के लिए और आम नहीं।” पेड़ ने कहा।

“मेरे पास काटने के लिए दांत नहीं हैं,” आदमी ने उत्तर दिया।

“तुम्हारे ऊपर चढ़ने के लिए कोई और ट्रंक नहीं है।”

“मैं अब इसके लिए बहुत बूढ़ा हो गया हूँ,” उस आदमी ने कहा।

“मैं वास्तव में आपको कुछ नहीं दे सकता … केवल एक चीज बची है मेरी मरती हुई जड़ें,” पेड़ ने दुख के साथ कहा।

“मुझे अभी ज्यादा जरूरत नहीं है, बस आराम करने के लिए जगह है। मैं इतने वर्षों के बाद थक गया हूँ, ”उस आदमी ने उत्तर दिया।

“अच्छा! पुराने पेड़ की जड़ें आराम करने और आराम करने के लिए सबसे अच्छी जगह होती हैं। आओ मेरे साथ बैठो और आराम करो।”

लड़का बैठ गया और पेड़ खुश होकर मुस्कुराया।

कहानी में पेड़ हमारे माता-पिता का प्रतिनिधित्व करता है। जब हम छोटे होते हैं तो हम उनके साथ खेलना पसंद करते हैं। जब हम बड़े हो जाते हैं तो हम उन्हें छोड़ देते हैं और तभी वापस आते हैं जब हमें मदद की जरूरत होती है। माता-पिता हमारे लिए अपनी जान कुर्बान कर देते हैं

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*एक कहानी * एक विश्वास*

मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था.
उस दिन सफ़र से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आ कर एक लिफाफा मुझे पकड़ा दिया.
लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देख कर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई.
‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे.
मैंने लिफाफा खोला तो उस में 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी.
इतनी बड़ी राशि वह भी मेरे नाम पर.
मैंने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सारा पत्र पढ़ डाला.
पत्र किसी परी कथा की तरह मुझे अचंभित कर गया.

लिखा था :
आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आप को दे रहा हूं.
मुझे नहीं लगता कि आप के एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा.
ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है.
घर पर सभी को मेरा प्रणाम.
आपका अमर.

मेरी आंखों में वर्षों पुराने दिन सहसा किसी चलचित्र की तरह तैर गये.
एक दिन मैं कोलकाता में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी मनपसंद पत्रिकाएं उलट_पलट रहा था
कि मेरी नज़र बाहर पुस्तकों के एक छोटे से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी.
वह पुस्तक की दुकान में घुसते हर संभ्रांत व्यक्ति से कुछ अनुनय विनय करता और कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर वापस अपनी जगह पर जा कर खड़ा हो जाता.
मैं काफी देर तक मूकदर्शक की तरह यह नज़ारान देखता रहा.
पहली नज़र में यह फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों द्वारा की जाने वाली सामान्य सी व्यवस्था लगी लेकिन उस लड़के के चेहरे की निराशा सामान्य नहीं थी.
वह हर बार नई आशा के साथ अपनी कोशिश करता और फिर वही निराशा.

मैं काफी देर तक उसे देखने के बाद अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाया और उस लड़के के पास जा कर खड़ा हो गया.
वह लड़का कुछ सामान्य सी विज्ञान की पुस्तकें बेच रहा था.
मुझे देख कर उस में फिर उम्मीद का संचार हुआ और बड़ी ऊर्जा के साथ उस ने मुझे पुस्तकें दिखानी शुरू कीं.
मैंने उस लड़के को ध्यान से देखा.
साफ_सुथरा, चेहरे पर आत्मविश्वास लेकिन पहनावा बहुत ही साधारण.
ठंड का मौसम था और वह केवल एक हलका सा स्वेटर पहने हुए था.
पुस्तकें मेरे किसी काम की नहीं थीं फिर भी मैंने जैसे किसी सम्मोहन से बंध कर उससे पूछा, ‘बच्चे, ये सारी पुस्तकें कितने की हैं?’
‘आप कितना दे सकते हैं, सर?’
‘अरे, कुछ तुमने सोचा तो होगा.’
‘आप जो दे देंगे,’ लड़का थोड़ा निराश हो कर बोला.
‘तुम्हें कितना चाहिए?’ उस लड़के ने अब यह समझना शुरू कर दिया कि मैं अपना समय उस के साथ गुज़ार रहा हूं.

‘5 हजार रुपए,’ वह लड़का कुछ कड़वाहट में बोला.
‘इन पुस्तकों का कोई 500 भी दे दे तो बहुत है,’
मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था फिर भी अनायास मुंह से निकल गया.
अब उस लड़के का चेहरा देखने लायक था.
जैसे ढेर सारी निराशा किसी ने उस के चेहरे पर उड़ेल दी हो.
मुझे अब अपने कहे पर पछतावा हुआ.
मैंने अपना एक हाथ उस के कंधे पर रखा और उससे सांत्वना भरे शब्दों में फिर पूछा, ‘देखो बेटे, मुझे तुम पुस्तक बेचने वाले तो नहीं लगते,
क्या बात है.? साफ साफ बताओ कि क्या ज़रूरत है?’

वह लड़का तब जैसे फूट पड़ा.
शायद काफी समय निराशा का उतार चढ़ाव अब उसके बरदाश्त के बाहर था.
‘सर, मैं 10+2 कर चुका हूं.
मेरे पिता एक छोटे से रेस्तरां में काम करते हैं.
मेरा मेडिकल में चयन हो चुका है.
अब उसमें प्रवेश के लिए मुझे पैसे की ज़रूरत है.
कुछ तो मेरे पिताजी देने के लिए तैयार हैं,
कुछ का इंतजाम वह अभी नहीं कर सकते,’
लड़के ने एक ही सांस में बड़ी अच्छी अंग्रेज़ी में कहा.

‘तुम्हारा नाम क्या है?’ मैंने मंत्रमुग्ध हो कर पूछा.
‘अमर विश्वास.’
‘तुम विश्वास हो और दिल छोटा करते हो.
कितना पैसा चाहिए?’
‘5 हजार,’ अब की बार उस के स्वर में दीनता थी.
‘अगर मैं तुम्हें यह रकम दे दूं तो क्या मुझे वापस कर पाओगे?
इन पुस्तकों की इतनी कीमत तो है नहीं,’ इस बार मैंने थोड़ा हँस कर पूछा.
‘सर, आपने ही तो कहा कि मैं विश्वास हूं.
आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं.
मैं पिछले 4 दिन से यहां आता हूं,
आप पहले आदमी हैं जिसने इतना पूछा.
अगर पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया तो मैं भी आपको किसी होटल में कप प्लेटें धोता हुआ मिलूंगा,’
उसके स्वर में अपने भविष्य के डूबने की आशंका थी.
उसके स्वर में जाने क्या बात थी जो मेरे जेहन में उसके लिए सहयोग की भावना तैरने लगी.
मस्तिष्क उसे एक जालसाज से ज्यादा कुछ मानने को तैयार नहीं था जबकि दिल में उसकी बात को स्वीकार करने का स्वर उठने लगा था.
आखिर में दिल जीत गया.
मैंने अपने पर्स से 5 हजार रुपए निकाले जिनको मैं शेयर मार्किट में निवेश करने की सोच रहा था और उसे पकड़ा दिए.
वैसे इतने रुपए तो मेरे लिए भी मायने रखते थे लेकिन न जाने किस मोह ने मुझ से वह पैसे निकलवा लिए.
‘देखो बेटे, मैं नहीं जानता कि तुम्हारी बातों में * तुम्हारी इच्छाशक्ति में कितना दम है लेकिन मेरा दिल कहता है कि तुम्हारी मदद करनी चाहिए,
इसीलिये मैं ये कर रहा हूं.
तुमसे 4-5 साल छोटी मेरी बेटी भी है मिनी.
सोचूंगा उसके लिए ही कोई खिलौना खरीद लिया,’
मैंने पैसे अमर की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

अमर हतप्रभ था. शायद उसे यकीन नहीं आ रहा था. उसकी आंखों में आंसू तैर आये.
उसने मेरे पैर छुए तो आंखों से निकली दो बूंदें मेरे पैरों को चूम गईं.
‘ये पुस्तकें मैं आप की गाड़ी में रख दूं?’
‘कोई ज़रूरत नहीं. इन्हें तुम अपने पास रखो.
यह मेरा कार्ड है * जब भी कोई ज़रूरत हो तो मुझे बताना.’
वह मूर्ति बन कर खड़ा रहा और मैंने उस का कंधा थपथपाया * कार स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी.

कार को चलाते हुए वह घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी और मैं अपने खेले जुए के बारे में सोच रहा था जिसमें अनिश्चितता ही ज्यादा थी.
कोई दूसरा सुनेगा तो मुझे एक भावुक मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं समझेगा.
अत: मैंने यह घटना किसी को न बताने का फैसला किया.
दिन गुजरते गए.

अमर ने अपने मेडिकल में दाखिले की सूचना मुझे एक पत्र के माध्यम से दी.
मुझे अपनी मूर्खता में कुछ मानवता नज़र आई.
एक अनजान सी शक्ति में या कहें दिल में अंदर बैठे मानव ने मुझे प्रेरित किया कि मैं हजार 2 हजार रुपए उसके पते पर फिर भेज दूं.
भावनाएं जीतीं और मैं ने अपनी मूर्खता फिर दोहराई. दिन हवा होते गये. उसका संक्षिप्त सा पत्र आता जिसमें 4 लाइनें होतीं. 2 मेरे लिए, एक अपनी पढ़ाई पर और एक मिनी के लिए
जिसे वह अपनी बहन बोलता था.
मैं अपनी मूर्खता दोहराता और उसे भूल जाता.
मैंने कभी चेष्टा भी नहीं की कि उसके पास जा कर अपने पैसे का उपयोग देखूं और न कभी वह मेरे घर आया.

कुछ साल तक यही क्रम चलता रहा.
एक दिन उसका पत्र आया कि वह उच्च शिक्षा के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा है.
छात्रवृत्तियों के बारे में भी बताया था और एक लाइन मिनी के लिए लिखना वह अब भी नहीं भूला.
मुझे अपनी उस मूर्खता पर दूसरी बार फख्र हुआ,
बिना उस पत्र की सचाई जाने.
समय पंख लगा कर उड़ता रहा.
अमर ने अपनी शादी का कार्ड भेजा.
वह शायद आस्ट्रेलिया में ही बसने के विचार में था.
मिनी भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी.
एक बड़े परिवार में उस का रिश्ता तय हुआ था.
अब मुझे मिनी की शादी लड़के वालों की हैसियत के हिसाब से करनी थी.
एक सरकारी उपक्रम का बड़ा अफसर कागजी शेर ही होता है.
शादी के प्रबंध के लिए ढेर सारे पैसे का इंतजाम…उधेड़बुन…और अब वह चेक?
मैं वापस अपनी दुनिया में लौट आया.

मैंने अमर को एक बार फिर याद किया और मिनी की शादी का एक कार्ड अमर को भी भेज दिया.
शादी की गहमागहमी चल रही थी.
मैं और मेरी पत्नी व्यवस्थाओं में व्यस्त थे और मिनी अपनी सहेलियों में.
एक बड़ी सी गाड़ी पोर्च में आ कर रुकी.एक संभ्रांत से शख्स के लिए ड्राइवर ने गाड़ी का गेट खोला तो उस शख्स के साथ उस की पत्नी जिसकी गोद में एक बच्चा था, भी गाड़ी से बाहर निकले.
मैं अपने दरवाजे पर जा कर खड़ा हुआ तो लगा कि इस व्यक्ति को पहले भी कहीं देखा है.
उसने आ कर मेरी पत्नी और मेरे पैर छुए.
‘‘सर, मैं अमर…’’ वह बड़ी श्रद्धा से बोला.
मेरी पत्नी अचंभित सी खड़ी थी.
मैंने बड़े गर्व से उसे सीने से लगा लिया.
उसका बेटा मेरी पत्नी की गोद में घर सा अनुभव कर रहा था.
मिनी अब भी संशय में थी.
अमर अपने साथ ढेर सारे उपहार ले कर आया था.
मिनी को उस ने बड़ी आत्मीयता से गले लगाया.
मिनी भाई पा कर बड़ी खुश थी.
अमर शादी में एक बड़े भाई की रस्म हर तरह से निभाने में लगा रहा.
उसने न तो कोई बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर डाली और न ही मेरे चाहते हुए मुझे एक भी पैसा खर्च करने दिया.
उसके भारत प्रवास के दिन जैसे पंख लगा कर उड़ गये.

इस बार अमर जब आस्ट्रेलिया वापस लौटा तो हवाई अड्डे पर उसको विदा करते हुए न केवल मेरी बल्कि मेरी पत्नी, मिनी सभी की आंखें नम थीं.
हवाई जहाज ऊंचा और ऊंचा आकाश को छूने चल दिया
और उसी के साथ साथ मेरा विश्वास भी आसमान छू रहा था.

मैं अपनी मूर्खता पर एक बार फिर गर्वित था और सोच रहा था कि इस नश्वर संसार को चलाने वाला कोई भगवान और हमारा विश्वास ही है…

राज…🙏

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

Gujarati Gyan Ganga PDF Books 📚📖:
🚩 શ્રીમદ ભગવદ ગીતાની ખાસ વિશિષ્ટતાઓ આવો જાણીએ. 🚩

જય શ્રીકૃષ્ણ.. શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતા આપણા આ સમગ્ર વિશ્વમાં એકમાત્ર ધર્મગ્રંથ (પુસ્તક) છે જેની છેલ્લાં ૫૧૧૭ વર્ષથી જન્મજયંતી ભારતભરમાં શ્રદ્ધાપૂર્વક ઉજવવામાં આવે છે. ભાગ્યે જ કોઈ ભારતીય હશે કે જેણે શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતાનું નામ ન સાંભળ્યું હોય.. ગીતા જ્ઞાાન એ ગાગરમાં સાગર છે. જ્ઞાાનનો આખેઆખો રસપ્રચુર મધપૂડો છે. માનવીના જીવનનું એકપણ ક્ષેત્ર એવું નથી કે જેમાં ગીતા જ્ઞાન ઉપયોગી ન બનતું હોય.. ગીતાની એટલી બધી વિશિષ્ટતાઓ છે કે જેનું વર્ણન કરવા બેસીએ તો પાર ન આવે એમાંની ખાસ ખાસ કેટલીક વિશિષ્ટ વાતો આજે રજૂ કરવાનો ઉપક્રમ છે. આવો આ ખાસિયતો જાણીએ

૧. ‘શ્રીમદ્ ભગવદ્ગીતા એટલે શ્રી ભગવાને ગાયેલું ગીત.

૨. મહાભારતના કુલ ૧૮ (અઢાર) પર્વ છે. જેમાં છઠ્ઠો પર્વ ભીષ્મપર્વ છે.
ભીષ્મપર્વના અધ્યાય નંબર ૨૫ થી ૪૨ના કુલ ૧૮ અધ્યાય એટલે જ ગીતા.

૩. સૌપ્રથમ શ્રી વિષ્ણુ ભગવાન થયા. તેમની નાભિમાંથી બ્રહ્માજી પ્રગટ થયા. બ્રહ્માના માનસ પુત્ર શ્રી વશિષ્ઠ ઋષિ થયા, તેમના શક્તિ, શક્તિના પારાશર, પારાશર અને મત્સ્યગંધાના મિલનથી થયા વેદવ્યાસ – જેમનું સાચું નામ શ્રીકૃષ્ણ બાદરાયણ (દ્વૈપાયન) વ્યાસ – જે ૧૮ મા છેલ્લા વેદવ્યાસ હતા તેમણે ગીતાને છંદબદ્ધ શ્લોકોમાં રૃપાંતર કરી ગીતા લખી.. તે વેદવ્યાસને વંદન.

૪. ગીતા માત્ર ૪ (ચાર) વ્યક્તિ વચ્ચેનો સંવાદ છે. ધૃતરાષ્ટ્ર, સંજય, અર્જુન અને શ્રીકૃષ્ણ ભગવાન સંજય ધૃતરાષ્ટ્રના સારથિ હતા જે વિદ્વાન ગવલ્ગણ નામના સારથિના પુત્ર હતા. શ્રીકૃષ્ણ અર્જુનના સારથિ હતા. સંજયને વેદવ્યાસે દિવ્યદૃષ્ટિ આપી હતી તો વિરાટરૃપનાં દર્શન કરવા શ્રીકૃષ્ણ અર્જુનને દિવ્યદૃષ્ટિ આપે છે. બન્ને બાજુ સારથિ બન્ને બાજુ દિવ્યદૃષ્ટિ. કેવો યોગાનુયોગ…

૫. ગીતામાં કુલ ૭૦૦ (સાતસો) શ્લોક છે જે પૈકી ૫૭૫ શ્લોક શ્રીકૃષ્ણ ભગવાન બોલ્યા છે, ૮૫ શ્લોક અર્જુન બોલ્યા છે, ૩૯ શ્લોક સંજય અને માત્ર ૧ (એક) શ્લોક ધૃતરાષ્ટ્ર બોલ્યા છે.

૬. ગીતાના ૧૮ અધ્યાય છે, ૭૦૦ શ્લોકો છે, ૯૪૧૧ શબ્દો છે, ૨૪૪૪૭ અક્ષરો છે. શ્રીકૃષ્ણ ઉવાચ ૨૮ વખત, અર્જુન ઉવાચ ૨૧ વખત, ધૃતરાષ્ટ્ર ઉવાચ ૦૧ એમ કુલ મળી ૫૯ વખત ઉવાચ આવે છે. સંજય ઉવાચ ૯ વખત આવે છે.

૭. ઈ.સ. પૂર્વે ૩૧૦૨ વર્ષ પહેલાં શ્રીકૃષ્ણે ગીતા અર્જુનને કહી તે યુદ્ધ કરવા, યુદ્ધના મેદાનમાં કહી અને એ ઉપદેશ જ હિન્દુ ધર્મનો મહાન ધર્મગ્રંથ બની ગયો એ બાબત સમગ્ર વિશ્વના બધા ધર્મગ્રંથોમાં માત્ર અને માત્ર એક જ કિસ્સો છે.

૮. આખી ભગવદ્ ગીતામાં હિંદુ શબ્દ એક પણ વખત આવતો નથી તે હિંદુ ધર્મનો ધર્મગ્રંથ હોવા છતાં પણ એ જ સાબિત કરે છે કે ગીતા વૈશ્વિક ધર્મગ્રંથ છે.

૯. શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતા એ એવો એક ધર્મગ્રંથ છે જેનો અનુવાદ ભાષાંતર વિશ્વની તમામે તમામ ભાષાઓમાં થયું છે.

૧૦. શ્રી હેમચંદ્ર નરસિંહ લિખિત શ્રી ગીતાતત્ત્વ દર્શનમાં ગીતાના કુલ ૨૩૩ પ્રકાર છે જેમાં શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતા મુખ્ય છે. અનુગીતા, અવધૂત ગીતા, અષ્ટાવક્ર ગીતા, પાંડવગીતા, સપ્તશ્લોકી ગીતા જેવા ૨૩૩ ગીતા પ્રકાર છે.

૧૧. ભક્તિના કુલ ૯ (નવ) પ્રકાર છે. શ્રવણ, કીર્તન, સ્મરણ, પાદસેવન, અર્ચન, વંદન, દાસ્ય, સખ્ય અને આત્મનિવેદન. આ નવેનવ પ્રકારની ભક્તિનું વર્ણન, વ્યાખ્યા શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતામાં છે.

૧૨. ગીતાના દરેક અધ્યાયના અંતે અધ્યાય પૂરા થયાની નોંધ માટે જે પંક્તિ આવે છે તેને પુષ્પિકા કહે છે જે મુજબ ગીતા બ્રહ્મવિદ્યા છે, યોગનું શાસ્ત્ર છે, આવી અઢાર પુષ્પિકાના કુલ શબ્દો ૨૩૪ છે અને તેના કુલ અક્ષરો ૮૯૦ છે.

૧૩. શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતા શ્રદ્ધાનો, ભક્તિનો, ધર્મનો અને સત્યનો એવો આધાર સ્તંભ છે કે આપણા દેશની તમામ અદાલતોમાં પણ તેના ઉપર હાથ મૂકી સોગંદ લે પછી સત્ય જ બહાર આવશે તેટલી અધિકૃતિ મળેલી છે, આવું વિશ્વમાં બીજે ક્યાંય નથી..

૧૪. ગીતા યોગશાસ્ત્રવિદ્યા છે. ગીતામાં કુલ ૧૮ અધ્યાયના ૧૮ યોગ તો છે જ જે તેના શીર્ષકમાં આવે છે જેમકે ભક્તિયોગ, કર્મયોગ સાંખ્ય યોગ. આ ઉપરાંત અભ્યાસયોગ, ધ્યાનયોગ બ્રહ્મયોગ જેવા કુલ ૩૦ (ત્રીસ) યોગો ગીતામાં છે.

૧૫. ગીતાના પહેલા અધ્યાયના પહેલા શ્લોકનો પહેલો શબ્દ ધર્મક્ષેત્ર છે, જ્યારે છેલ્લા અધ્યાયના છેલ્લા શ્લોકનો છેલ્લો શબ્દ ‘મમ’ છે. અર્થાત્ મારું ધર્મક્ષેત્ર કયું..?? તો ૧ થી ૭૦૦ શ્લોક વચ્ચે જે આવે છે. વેદવ્યાસનો શબ્દસુમેળ કેવો અદ્ભુત છે..

૧૬. સમગ્ર ગીતાનો સાર શું છે..?? ગીતા શબ્દને ઉલટાવીને વાંચો. તાગી. જે આસક્તિનો ત્યાગ કરે છે તે જ પ્રભુને પામી શકે છે. મહાત્મા ગાંધીજીએ એટલે જ ગીતા વિશે જે પુસ્તક લખ્યું છે તેનું ચોટડૂક શીર્ષક અનાસક્તિ યોગ આપ્યું છે. ઉપનિષદમાં પણ કહ્યું છે ત્યેન ત્યક્તેન ભુંજિથા – ત્યાગીને ભોગવો.

૧૭. ઋગ્વેદ, યજુર્વેદ, સામવેદ અને અથર્વવેદ ચાર વેદો છે પણ ગીતાને પાંચમોવેદ કહેવાય છે

૧૮. મહાભારતના પર્વ ૧૮ છે, ગીતાના અધ્યાય ૧૮ છે. સરવાળો ૯ થાય છે. ૯ એ પૂર્ણાંક છે. શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતાના કુલ અક્ષરો પણ ૯ થાય છે. ગીતામાં ભગવાન શ્રીકૃષ્ણનાં કુલ ૧૦૮ નામ છે, કુલ ૧૦૮ સુવાક્યો છે, ગીતાને સંસ્કૃતમાં શ્લોકબદ્ધ કરનાર શ્રીકૃષ્ણ દ્વૈપાયન વ્યાસ નું નામ પણ ૯ અક્ષરનું છે, ગીતામાં ‘યોગ’ શબ્દ ૯૯ વખત આવે છે, ગીતામાં કુલ ૮૦૧ વિષયોનું વર્ણન છે, યોગ માટે ૫૪ શ્લોકો છે, ગીતામાં ભગવાન પોતાની વિભૂતિઓનું વર્ણન કરે છે જેમ કે વૃક્ષોમાં હું પીપળો છું, નદીઓમાં હું ગંગા છું તો ગીતામાં આવી કુલ મળી ૨૩૪ વિભૂતિઓનું વર્ણન છે. ગીતામાં કુલ ૯૦ (નેવું) વ્યક્તિઓનાં નામોનો ઉલ્લેખ છે જેમ કે નારદ, પ્રહલાદ, ભૃગુ, રામ વગેરે. આ તમામનો સરવાળો ૯ થાય છે એટલું જ નહિ ગીતાનાં કુલ ૧૮ નામ છે જેનો સરવાળો પણ ૯ થાય છે. ૯ નું અદ્ભુત સંકલન અહીં જોવા મળે છે..

૧૯. ગીતાના ૭૦૦ શ્લોકો છે જેમાં વર્ણવાર ગણતરી કરતાં સૌથી વધુ ૧૦૩ શ્લોકો ‘ય’ – અક્ષર ઉપરથી શરૃ થાય છે જ્યારે બીજા નંબરે ‘અ’ – ઉપર ૯૭ શ્લોકો છે.

૨૦. શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતામાં આત્મા શબ્દ ૧૩૬ વખત, જ્ઞાાન શબ્દ ૧૦૮ વખત, યોગ શબ્દ ૯૯ વખત, બુદ્ધિ અને મન ૩૭ વખત બ્રહ્મ – ૩૫ વખત, શાસ્ત્ર શબ્દ ૪ વખત, મોક્ષ શબ્દ ૭ વખત અને ઈશ્વર-પરમેશ્વર શબ્દ – ૬ વખત આવે છે. ધર્મ શબ્દ ૨૯ વખત આવે છે.

૨૧. સમગ્ર ગીતાસાર અધ્યાય ૨ માં આવી જતો હોવાથી અધ્યાય ૨ ને એકાધ્યાયી ગીતા કહેવામાં આવે છે.

૨૩. અધ્યાય નં. ૮ શ્લોક નં. ૯, ૮/૧૩, ૯/૩૪, ૧૧/૩૬, ૧૩/૧૩, ૧૫/૧ અને ૧૫/૧૫ = આ ૭ શ્લોકને સપ્તશ્લોકી ગીતા કહે છે.

૨૪. શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતાના પાઠમાં મંત્ર, ઋષિ, બીજ, છંદ, દેવતા અને કીલક આ ૬ મંત્રધર્મનું ખાસ ધ્યાન રાખવામાં આવે છે. ફળ માટે ગીતામાહાત્મ્યનો પણ ખાસ મહિમા છે.

૨૫. ગીતાના ૧ થી ૬ અધ્યાયમાં કર્મ, ૭ થી ૧૨ અધ્યાયમાં ભક્તિ અને ૧૩ થી ૧૮ અધ્યાયમાં જ્ઞાાનનો વિશેષ મહિમા છે.

૨૬. કોઈપણ ધર્મના સિદ્ધાંતોને વેદ-ઉપનિષદ-ભગવદ્ગીતા આ ત્રણનો આધાર લઈ શાસ્ત્રોક્ત રીતે સાબિત કરવામાં આવે છે તેને પ્રસ્થાનત્રયી કહે છે જેમાં ગીતાનું સ્થાન મોખરે આવે છે. ધર્મની એકપણ ગૂંચવણ એવી નથી કે જેનો ઉકેલ ભગવદ્ ગીતામાં ના હોય..

૨૭. ગીતાના ૭૦૦ શ્લોકો પૈકી ૬૪૫ શ્લોકો અનુષ્ટુપ છંદમાં છે. બાકીના ૫૫ શ્લોકો ત્રિષ્ટુપ, બૃહતી, જગતી, ઈન્દ્રવજ્રા, ઉપેન્દ્રવજ્રા વગેરે અલગ અલગ છંદોમાં આવે છે.

૨૮. ગીતાએ આપણને એના પોતીકા સુંદર શબ્દો આપ્યા છે. લગભગ આવા શબ્દોની સંખ્યા ૧૦૦ થવા જાય છે જે પૈકી ઉદાહરણ તરીકે ૧૦ શબ્દો અત્રે પ્રસ્તુત છે. અનુમંતા, કાર્પણ્યદોષ, યોગક્ષેમ, પર્જન્ય, આતતાયી, ગુણાતીત, લોકસંગ્રહ, ઉપદૃષ્ટા, છિન્નસંશય, સ્થિતપ્રજ્ઞા

૨૯. સમગ્ર વિશ્વમાં શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતા એ એકમાત્ર એવો ધર્મગ્રંથ છે જેની ભક્તો વિધિસર પૂજા કરે છે.

૩૦. ગીતામાં કુલ ૪૫ શ્લોકો તો એવા છે કે જેની પંક્તિઓ એક સરખી હોય, શ્લોક બીજી વખત આવ્યો હોય કે શ્લોકના ચરણની પુનરૃક્તિ – પુનરાવર્તન થયું હોય. જેનાં કેટલાંક ઉદાહરણો અત્રે આપેલ છે. અધ્યાય/શ્લોક ૩/૩૫, ૬/૧૫ ૧૮/૪૭, ૬/૨૮ અધ્યાય/શ્લોક ૯/૩૪ , ૧૮/૬૫

૩૧. એકલી ગુજરાતી ભાષામાં જ શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતા વિષે અલગ અલગ સમજૂતી આપતાં, ટીકા-ટીપ્પણી કરતાં ૨૫૦ પુસ્તકો હાલ ઉપલબ્ધ છે જે દર્શાવે છે કે આ ગ્રંથ કેટલો મહાન છે, આવાં ખૂબજ લોકપ્રિય પુસ્તકોના ઉદાહરણ રૃપ ૧૦ લેખકો અત્રે પ્રસ્તુત છે
(૧) મહાત્મા ગાંધીજી – અનાસક્તિ યોગ (૨) વિનોબા ભાવે – ગીતા પ્રવચનો (૩) આઠવલેજી – ગીતામૃતમ્ (૪) એસી ભક્તિ વેદાંત – ગીતા તેના મૂળરૃપે (૫) કિશોર મશરૃવાળા – ગીતા મંથન (૬) પં. સાતવલેકરજી – ગીતાદર્શન (૭) ગુણવંત શાહ – શ્રીકૃષ્ણનું જીવન સંગીત (૮) શ્રી અરવિંદ – ગીતાનિબંધો (૯) રવિશંકર મહારાજ – ગીતાબોધવાણી (૧૦) કાકા કાલેલકર – ગીતાધર્મ

૩૨. આજે શ્રીમદ્ ભગવદ્ ગીતા-ને કુલ ૫૧૧૬ વર્ષ થયા છતાં ગીતામાં દર્શાવેલા ધર્મસિદ્ધાંતોનું મતનું કોઈએ પણ કોઈ ખંડન કર્યું નથી તે જ દર્શાવે છે કે ગીતા સર્વમાન્ય ગ્રંથ છે.

૩૩. ગીતાનું મૂળ બીજ બીજા અધ્યાયનો અગિયારમો શ્લોક છે. આ શ્લોકથી જ ભગવદ્ ગીતાની શરૃઆત થાય છે. ગીતાની પૂર્ણાહૂતિ અઢારમા અધ્યાયના ત્રેસઠમા શ્લોકમાં ઈતિ થી થાય છે જે સમાપ્તિસૂચક શબ્દ છે. માગશર સુદ – અગિયારસના રોજ શ્રીકૃષ્ણ દ્વારા અર્જુનને ગીતા કહેવામાં આવી.

૩૪. ગીતાનો સૌથી શ્રેષ્ઠ મંત્ર તજજ્ઞોની દૃષ્ટિએ અઢારમા અધ્યાયનો છાસઠમો શ્લોક છે જેમાં શ્રીકૃષ્ણ સ્વયં પોતાના મુખેથી જણાવે છે કે હું તને સર્વ પાપોથી છોડાવીશ તેમાં તું સહેજ પણ શોક ન કર. ગીતાનો સાર પણ આ જ શ્લોકમાં છે. અર્થાત્ વિશ્વાસ એ જ વિશ્વનો શ્વાસ છે.

૩૫. ગીતાના બધા શ્લોકો મંત્ર છે, શ્રેષ્ઠ છે પરંતુ ગીતાભક્તોની દૃષ્ટિએ, આલોચકોની દૃષ્ટિએ, વિદ્વાનોની દૃષ્ટિએ સમગ્ર ૭૦૦ શ્લોકોમાંથી ટોપ ટેન ૧૦ શ્લોકો નીચે પ્રમાણે છે. પ્રથમ આંક અધ્યાય દર્શાવે છે, બીજો આંક શ્લોક નંબર દર્શાવે છે. (દરેક શ્લોક શ્રેષ્ઠ હોઈ મુમુક્ષુઓની પસંદગી અલગ અલગ હોઈ શકે)

૨/૨૩, ૩/૩૫, ૪/૭, ૨/૪૭, ૬/૩૦, ૯/૨૬, ૧૫/૫, ૧૭/૨૦, ૧૮/૬૬, ૧૮/૭૮

૩૬. ગીતાના અઢારમા અધ્યાયનો છેલ્લો શ્લોક એટલો મર્મસભર, ગીતસભર છે કે ન પૂછો વાત!! આ શ્લોકમાં ૨ અક્ષર કુલ ૧૩ વખત આવે છે, ય અક્ષર ૪ વખત આવે છે, ત્ર અક્ષર ૩ વખત આવે છે, ધ અક્ષર ૩ વખત આવે છે છતાં છંદ જળવાય છે અને એટલું મધુર સંગીત સહજ ઉત્પન્ન થાય છે કે વારંવાર આ શ્લોક બસ ગાયા જ કરીએ. તમે પણ પ્રયત્ન કરી જુઓ વારંવાર ગાવા લલચાશો.. આવા વારંવાર ગમી જાય, ગાવા માટે ઉત્સુકતા રહે તેવા ઉદાહરણરૃપ પાંચ શ્લોકો નીચે મુજબ છે એકવાર તો ગાઈ જુઓ.. ૪/૭, ૬/૩૦, ૯/૨૨, ૧૫/૧૪, ૧૮/૭૮

૩૭. ગીતામાં ગણિતનો પણ અદ્ભુત પ્રયોગ શ્રી વેદવ્યાસે કર્યો છે. તમને જાણીને આશ્ચર્ય થશે કે ગીતામાં ૧ થી ૧૦૦૦ સંખ્યાનો પ્રયોગ વારંવાર સંખ્યાવાચક શબ્દોથી થયો છે. માન્યામાં નથી આવતું ને..?? ગીતામાં કુલ ૧૬૫ વખત આવાં સંખ્યાવાચક રૃપકો આવે છે પણ સ્થળસંકોચના કારણે ઉદાહરણરૃપ વિગત અત્રે પ્રસ્તુત છે
૧. એકાક્ષરમ (એક) ૨. દ્વિવિદ્યા નિષ્ઠા (બે નિષ્ઠા) ૩. ત્રિભિઃ ગુણમયૈઃ (ત્રણ ગુણ) ૪. ચાતુર્વર્ણ્યમ્ (ચાર વર્ણ) ૫. પાંડવા (પાંચ પાંડવ) ૬. મનઃ ષષ્ઠાનિ (છ ઇન્દ્રિય) ૭. સપ્ત મહર્ષય (સપ્તર્ષિ) ૮. પ્રકૃતિ અષ્ટધા (આઠ પ્રકૃતિ) ૯. નવ દ્વારે (નવ દ્વાર) ૧૦ ઈન્દ્રયાણિ દશૈકં (૧૦ ઈન્દ્રિય) ૧૧. રૃદ્રાણામ (૧૧ રૃદ્ર) ૧૨. આદિત્યાન્ (૧૨ આદિત્ય) ૧૩. દૈવી સંપદ્મ (૨૬ ગુણો) ૧૪. નક્ષત્રાણામ્ (૨૭ નક્ષત્રો) ૧૫. એતત્ ક્ષેત્રમ્ (શરીરના ૩૧ ગુણ) ૧૬. મરુતામ્ (૪૯ મરૃતો) ૧૭. અક્ષરાણામ્ (૫૨ અક્ષર) ૧૮. કુરૃન્ (૧૦૦ કૌરવો) ૧૯. સહસ્ત્રબાહો (૧૦૦૦ હાથવાળા)

૩૮. ઘણા એવી શંકા કરે છે કે યુદ્ધના મેદાનમાં આટલી લાંબી ૭૦૦ શ્લોકોવાળી ગીતા માટે કેટલો બધો સમય લાગ્યો હશે પણ આ શંકાનું પણ નિવારણ છે. ગીતાનો ૧ શ્લોક શાંતિથી, નીરાતથી ગાવામાં આવે તો માત્ર અને માત્ર ૧૦ (દસ) સેકન્ડ જ થાય છે. આ હિસાબે જો ૭૦૦ શ્લોક ગાઇએ તો ૭૦૦૦ સેકન્ડ થાય. ૧ કલાકની ૩૬૦૦ સેકન્ડ થાય એ મુજબ આખી ગીતા વાંચતા માત્ર બે કલાક જ થાય છે. આ તો પદ્યની વાત થાય છે. જ્યારે યુદ્ધના મેદાનમાં તો શ્રીકૃષ્ણ – અર્જુનનો સંવાદ ગદ્યમાં થયો હતો જેથી આવી સમય મર્યાદાની શંકા અસ્થાને છે.

૩૯. ગીતા એ માનવજીવનનું રહસ્ય છે. રાગ અને ત્યાગ વચ્ચે ઝૂલતા માનવીની કથા છે. ભક્ત અને ભગવાન વચ્ચેનો મધુર સંવાદ છે, તો કર્મ -અકર્મનો વિવાદ પણ છે. ગાદી માટેનો વિખવાદ છે, ફરજથી પલાયનવાદ છે તો અંતે સૌના માટેનો આશીર્વાદરૃપ ધન્યવાદ પણ છે.

૪૦. ગીતા વિશે એક અદ્ભુત પ્રયોગ પણ પ્રચલિત છે. જ્યારે તમે ખૂબજ મુશ્કેલીમાં હોવ, કોઈપણ રસ્તો સૂઝતો જ ના હોય, ચારે તરફથી નિરાશા જ મળી હોય ત્યારે ગીતા માતાના શરણે જાવ. ગીતા હાથમાં લો. શ્રદ્ધાપૂર્વક ૧૧ વખત શ્રીકૃષ્ણ ભગવાનનો મંત્ર બોલો. શ્રીકૃષ્ણઃ શરણં મમ હવે ગીતા ખોલો. પેન્સિલ – પેનની અણી કોઈપણ શ્લોક ઉપર મૂકો. ત્યાં જે શબ્દ કે શ્લોક છે તેનો જે અર્થ થાય છે તે જ તમારા પ્રશ્નનો ઉપાય – જવાબ છે. મોટાભાગના અનુભવો સફળ જ થયા છે. સુખને એક અવસર તો આપો.. મહાત્મા ગાંધીજી ખુદ કહેતા મુશ્કેલીમાં હું ગીતામાતાના શરણે જઉં છું…. જયશ્રીકૃષ્ણ… (courtesy : gujarat samacahr)

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मित्र


मित्र

रामायण के अनुसार मित्र के गुणों का वर्णन

आज मित्रता दिवस होने के कारण मित्र कैसा होना चाहिये यह रामायण में उल्लेख आया है जब सुग्रीव और राम जी की मित्रता अग्नि को साक्षी मानकर हनुमान जी ने कराई थी उसी का विवरण नीचे दिया गया है ।

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी ।
तिन्हहि विलोकत पातक भारी।।
निज दुख गिरि सम रज कर जाना ।
मित्रक दुख रज मेरु समाना।।

अर्थात जो मित्र अपने मित्र के दुख को देख कर दुखी न हो उस मित्र को देखने से भी वड़ा पाप लगता है अपना दुख पर्वत के समान होने पर भी उसे रज (धूल )के समान समझना चाहिऐ,और मित्र का दुख रज (धूल) के समान भी हो तो उसे पर्वत के समान समझना चाहिऐ ।अर्थात मित्र के दुख का निराकरण पहिले करना चाहिऐ।अपने दुख का बाद मे ऐसा नही कि मित्र के सामने अपना दुख लेके बैठ जाऐं।

जिन्ह कें असि मति सहज न आई।
ते सठ कत हठि करत मिताई।।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा।
गुण प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा।।

अर्थात जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है वह मनुष्य हठ करके मित्रता क्यों करते हैं ऐसे व्यक्ति मित्रता करने के अधिकारी नहीं है ।मित्र का धर्म है कि मित्र को गलत रास्ते पर जाने से रोके और उसे अच्छे मार्ग पर ले जाऐ।सदा ही मित्र के गुणों को प्रकट करे और मित्र में जो अवगुण हो वह दूसरों के सामने छुपाऐ।

देत लेत मन शंक न धरई।
वल अनुमान सदा हित करई।।
बिपति काल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।

अर्थात मित्र को देते समय या लेते समय मन में शंका नही आना चाहिऐ।जैसे मित्र की मदद कुछ पैसे से कर दी तो मन में यह विचार नही आना चाहिऐ कि मुझे पैसे वापिस मिलेगे या नही यही शंका है।अपने वल (सामर्थ) का अनुमान लगा कर सदा मित्र का हित ही करना चाहिऐ।
मित्र की विपत्ती के समय तो सदा सौ गुणा स्नेह करना चाहिए। वेद कहते हैं श्रेष्ठ मित्र के यही लक्षण है।

आगें कह मृदु वचन वनाई।
पाछें अनहित मन कुटिलाई।।
जाकर चित्त अहि गति सम भाई।
अस कुमित्र परिहरेहिं मिताई।।

अर्थात जो मित्र के सामने बना बना कर मीठे मीठे वचन कहता है और पीठ पीछे यानि बाद मैं मित्र की बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है हे भाई जिसका मन साँप की भाँति टेढा है ऐसे कुमित्र को त्यागने में ही भलाई है।

सेवक सठ नृप कृपन कुनारी।
कपटी मित्र शूल सम चारी।।
सखा सोच त्यागहु बल मोंरे।
सब बिधि घटब काज में तोरे।

अर्थात मूर्ख सेवक,कंजूस राजा, कुलटा(चरित्रहीन) स्त्री, और कपटी मित्र,ये चारों शूल के समान पीड़ा देने वाले है। इन्हें जितनी जल्दी हो इनका त्याग कर देने में ही भलाई है । राम जी कहते हे सखा (मित्र) मेरे बल पर अब तुम चिन्ता छोड़ दो ,मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा तुम्हारे दुखों को समाप्त कर दूंगा।

राम जी ने पहिले मित्र के दुख का निवारण किया वाली को मारकर सुग्रीव की पत्नी दिलाई राज दिलाया,मित्रता करें तो राम और सुग्रीव जैसी करें ।
।।जय श्री राम ॥