Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक छोटे से गावं में एक बच्चा भोपु रहता था…
.
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उसके स्कूल के बच्चे भोपुको हमेशा “उल्लू” बोलकर ही चिढ़ाते थे… 😩😩
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और उसकी टीचर भी उस की बेवकूफियों से हमेशा
बहुत परेशान रहती थी।😔😔
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एक दिन उसके पिता उसका
रिजल्ट जानने उसके स्कूल गये और टीचर से भोपु
के बारे में पूछा
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टीचर ने कहा कि “अपने जीवन के पच्चीस साल
के कार्यकाल में उसने पहली बार ऐसा बेवकूफ
लड़का देखा है, ये जीवन में कुछ नहीं कर पायेगा” 😖😖
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यह सुनकर भोपु के पिता बहुत
आहत हो गये और उसने शर्म के मारे वो गाँव
छोड़कर एक शहर में चले
गये..😔😔
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बीस साल बाद जब उस टीचर
को दिल की बीमारी हुई तो सबने उसे शहर के
एक डॉक्टर का नाम सुझाया जो ओपन हार्ट
सर्जरी करने में माहिर था.. 😔😩
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टीचर ने जा कर सर्जरी करवाई और ऑपरेशन
कामयाब रहा..
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जब वो बेहोशी से वापस आई और आँख खोली
तो टीचर ने एक सुदर और सुडौल नौजवान
डॉक्टर को अपने बेड के बगल खड़े हो कर
मुस्कुराते हुए देखा.. 😄😄
.
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वो
टीचर डॉक्टर को शुक्रिया बोलने ही वाली
थी अचानक उसका चेहरा नीला पड़ गया और
जब तक डॉक्टर कुछ समझें.. वो टीचर मर गयी.. 😖😩😔
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डॉक्टर अचम्भे से देख रहे थे और समझने की
कोशिश
कर रहे थे की आखिर हुआ क्या है..
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तभी वो पीछे मुड़े और देखा कि भोपु, जो कि
उसी अस्पताल में एक सफाई कर्मचारी था..
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उसने वेंटीलेटर का
प्लग हटा के अपना मोबाइल का चार्जर लगा
दिया था..😜😜😜
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अब अगर आप ये सोच रहे थे कि भोपु डॉक्टर
बन गया था..
तो इसका
मतलब ये है की आप फिल्में
बहुत ज्यादा देखते हैं, या फिर बहुत ज्यादा
प्रेरणादायक कहानियां पढ़ते हैं।

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🌹 आज का प्रेरक प्रसंग 🌹 *!! चतुर चिड़िया !!*

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एक दिन की बात है एक चिड़िया आकाश में अपनी उड़ान भर रही होती है। रास्ते में उसे गरुड़ मिल जाता है। गरुड़ उस चिड़िया को खाने को दौड़ता है। चिड़िया उससे अपनी जान की भीख मांगती है। लेकिन गरुड़ उसपर रहम करने को तैयार नहीं होता। तब चिड़िया उसे बताती है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनके लालन पालन के लिए मेरा जीवित रहना जरूरी है। तब गरुड़ इस पर चिड़िया के सामने एक शर्त रखता है कि मेरे साथ दौड़ लगाओ और अगर तुमने मुझे हरा दिया तो मैं तुम्हारी जान बख्श दूंगा और तुम्हें यहां से जाने दूंगा।

गरुड़ इस बात को जानता था कि चिड़िया का उसे दौड़ में हराना असंभव है। इसलिए उसके सामने इतनी कठिन शर्त रख देता है। चिड़िया के पास इस दौड़ के लिए हां करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन चिड़िया को इस बात का अंदाजा था कि गरुड़ को दौड़ में हराना नामुमकिन है लेकिन फिर बी वह इस दौड़ के लिए हां कर देती है। पर वह गरुड़ से कहती है कि जब तक ये दौड़ ख़त्म नहीं होता वह उसे नहीं मरेगा। गरुड़ इस बात पर राजी हो जाता है।

दौड़ शुरू होती है चिड़िया फट से जाकर गरुड़ के सिर पर बैठ जाती है और जैसे ही गरुड़ दौड़ के आखिरी स्थान पर पहुंचता है चिड़िया फट से उड़ कर लाइन के पार पहुंच जाती ही और जीत जाती है। गरुड़ उसकी चतुरता से प्रसन्न हो जाता है और उसको जिंदा छोड़ देता है। चिड़िया तुरंत ही वहां से उड़ जाती है और अपने रास्ते चल देती है।

शिक्षा:-
कठिन परिस्थितियों में हालातों पर रोना नहीं चाहिए बल्कि समझदारी और चतुरता के साथ मुसीबत का सामना करना चाहिए। विरोधी या कार्य आपकी क्षमता से ज्यादा मजबूत हो तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पहले से ही हार मान कर बैठ जाएं बल्कि समझदारी और धैर्य से बैठ कर समस्या का समाधान ढूढ़ना चाहिए। अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए कि हम किसी भी हालत में जीत सकते है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

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🧘‍♂ सच्ची लगन 🧘‍♀

✍ एक शख्स सुबह सवेरे उठा साफ़ कपड़े पहने और सत्संग घर की तरफ चल दिया ताकि सतसंग का आनंद प्राप्त कर सके।

चलते चलते रास्ते में ठोकर खाकर गिर पड़ा, कपड़े कीचड़ से सन गए वापस घर आया।

कपड़े बदलकर वापस सत्संग की तरफ रवाना हुआ फिर ठीक उसी जगह ठोकर खा कर गिर पड़ा और वापस घर आकर कपड़े बदले, फिर सत्संग की तरफ रवाना हो गया।

जब तीसरी बार उस जगह पर पहुंचा तो क्या देखता है की एक शख्स चिराग हाथ में लिए खड़ा है और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है।

इस तरह वो शख्स उसे सत्संग घर के दरवाज़े तक ले आया।

पहले वाले शख्स ने उससे कहा आप भी अंदर आकर सतसंग सुन लें।

लेकिन वो शख्स चिराग हाथ में थामे खड़ा रहा और सत्संग घर में दाखिल नही हुआ।

दो तीन बार इनकार करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे है …?

दूसरे वाले शख्स ने जवाब दिया “इसलिए क्योंकि

मैं काल हूँ,

ये सुनकर पहले वाले शख्स की हैरत का ठिकाना न रहा।

काल ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मैं ही था जिसने आपको ज़मीन पर गिराया था।

जब आपने घर जाकर कपड़े बदले और दुबारा सत्संग घर की तरफ रवाना हुए तो भगवान ने आपके सारे पाप क्षमा कर दिए।

जब मैंने आपको दूसरी बार गिराया और आपने घर जाकर फिर कपड़े बदले और फिर दुबारा जाने लगे तो भगवान ने आपके पूरे परिवार के गुनाह क्षमा कर दिए।

मैं डर गया की अगर अबकी बार मैंने आपको गिराया और आप फिर कपड़े बदलकर चले गए तो कहीं ऐसा न हो वह आपके सारे गांव के लोगो के पाप क्षमा कर दे. इसलिए मैं यहाँ तक आपको खुद पहुंचाने आया हूँ।

अब हम देखे कि उस शख्स ने दो बार गिरने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार फिर पहुँच गया और एक हम हैं यदि हमारे घर पर कोई मेहमान आ जाए या हमें कोई काम आ जाए तो उसके लिए हम सत्संग छोड़ देते हैं, भजन जाप छोड़ देते हैं।

क्यों….?

क्योंकि हम जीव अपने भगवान से ज्यादा दुनिया की चीजों और रिश्तेदारों से ज्यादा प्यार करते हैं।

उनसे ज्यादा मोह हैं। इसके विपरीत वह शख्स दो बार कीचड़ में गिरने के बाद भी तीसरी बार फिर घर जाकर कपड़े बदलकर सत्संग घर चला गया।

क्यों…?

क्योंकि उसे अपने दिल में भगवान के लिए बहुत प्यार था। वह किसी कीमत पर भी अपनी बंदगीं का नियम टूटने नहीं देना चाहता था।

इसीलिए काल ने स्वयं उस शख्स को मंजिल तक पहुँचाया, जिसने कि उसे दो बार कीचड़ में गिराया और मालिक की बंदगी में रूकावट डाल रहा था, बाधा पहुँचा रहा था !

इसी तरह हम जीव भी जब हम भजन-सिमरन पर बैठे तब हमारा मन चाहे कितनी ही चालाकी करे या कितना ही बाधित करे, हमें हार नहीं माननी चाहिए और मन का डट कर मुकाबला करना चाहिए।

एक न एक दिन हमारा मन स्वयं हमें भजन सिमरन के लिए उठायेगा और उसमें रस भी लेगा।

बस हमें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और न ही किसी काम के लिए भजन सिमरन में ढील देनी हैं। वह मालिक आप ही हमारे काम सिद्ध और सफल करेगा।

👉 इसीलिए हमें भी मन से हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए जी।
🙏🙏cp

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वो लड़का गरीब था ,,,,,,।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, खुशनुमा हयात,,,,✍️

‌सर्दी का मौसम था, सड़कों पर ज्यादा भीड़ नही थी। मैं ,कालेज जा रही थी। पैदल सफर करती थी कॉलेज जाने में आधा घंटा लगता था। रोज की तरह मैं, आज भी कॉलेज के लिए घर से निकली।
मै स्नातक की छात्रा थी सफेद ड्रेस बालों में सफैद रिबन लगाए काले जूते पहन कर कॉलेज के लिए चल पड़ी । रास्ते में जो कुछ भी सड़कों पर दिखाई देता था। उसे ध्यान से देखती थी। जैसे ही आधे रास्ते पहुंची ,पीपल के पेड़ के नीचे, एक बच्चे को बैठे देखा। क्या देखती हूं,,,,,, जिस सर्दी में लोग घर से बाहर नही निकल रहे है। ऐसी सर्दी में वो छोटा बच्चा जिसकी उम्र करीब 6 साल होगी जमीन पर टाट बिछाए बैठा था। जिसके पास एक छोटा सा संदूक था। उसी में उसका, ब्रश, पॉलिश,आदि मोची का सारा सामान था। जो आते जाते लोगो से उम्मीद लगाता था की कोई उससे अपने जूते पॉलिश करा ले। इतनी ठिठुरती हुई ठंड में वो गरीब बच्चा जो अपने पेट की खातिर जमीन पर टाट बिछाए बैठा था, न पैरों में जूते, न कोई टोपा ,न कोई मफलर, जिस्म पर फटे हुए कपड़े, एक फटी हुई जर्सी पहने हुआ था ।
उसकी इस ठिठुरती सर्दी में हालत देख कर मैं,देखती ही रह, ओर जहां में दर्जनों सवालों के घेरे में घिर गई,,, ये बच्चा इतनी सर्दी में कैसे बैठा हुआ है ,,,दिल पर गहरा असर हुआ, ऐसा मंजर देख कर दिल सहम गया ।उसी दिन से,मेरे मन की अंतरात्मा जैसे जाग गई हो,,, मैंने सोचा की,,, अपने लिए तो सभी जीते हैं,जीना तो उसका है जो इंसानियत की राह में दूसरी के लिए जिए,,,,।
दूसरों के लिए जिऊंगी मै खूब पढूंगी और ऐसे लोगो के लिए जरूर कुछ करूंगी,,,, बच्चे की हालत देखकर कर अपने आपसे सवाल,जवाब कर रही थी। वो बच्चा जिसकी उम्र पढ़ने लिखने की थी । जिसे इस उम्र में खेलने कूदने के साथ साथ स्कूल जाना चाहिए था वो इतनी सी उम्र में पेट की खातिर सड़कों पर बैठा लोगो का इंतिजार करता था इस आशा के साथ ,,कोई आए अपने जूतों पर पालिश कराए,,, क्योंकि इस उम्र में उसके ऊपर अपने परिवार के लिए जिम्मेदारी का बोझ था,,,
ऐसे न जाने कितने बच्चे होंगे जो स्कूल नही जा पाते होंगे मुझे बहुत एहसास हुआ। मै, रोजाना उसे देखने लगी वो बच्चा रोज उसी पेड़ के नीचे बैठा हुआ मिलता था । आज बरसों बाद जब मैं उसी रास्ते से गुजरी तो आज भी उस लड़के को उसी पीपल के पेड़ के नीचे बैठा पाया अब वो जवान हो गया है आज भी वो वही बैठ कर मोची का काम ही करता है सब कुछ बदल गया दुकानें बाजार रास्ते सड़कें पर शायद आज भी उसके हालात नही बदले क्योंकि वो लड़का गरीब था और शायद आज भी गरीब ही रह गया ,,,,
,,,,,,, ,शायद इसमें हमारी भी कही न कही कमी रह जाती है,,हम अपने स्तर से जितनी मदद कर सकते है,करते है,,ये संख्या कम है,परंतु, समाज के अधिक लोग सब मिलकर किसी गरीब को रोजगार दिलाकर,आत्म निर्भर करने में,अपने क्रत्व्यो का निर्वाह नहीं कर पाते,,,, आईए,,, शपथ ले,अपने आस पास कोई ऐसा बच्चा हो तो,उसको शिक्षित करने, स्व रोजगार प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करे,समाज एवम देश हित में,मानवता के मार्ग से सच्ची सेवा होगी।

‌खुशनुमा हयात
एडवोकेट/ कवियत्री
बुलंद शहर प्रदेश भारत

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।।कहानी।। नीली बनारसी साड़ी

एक लड़की के बचपन की सबसे मधुर स्मृतियों में एक स्मृति उसकी माँ के सुंदर-सुंदर कपड़े और साड़ियों की स्मृति! और मेरी स्मृति में मेरी माँ की नीली, मोर-पंखिया, सुंदर, चमकीली, सोने की तारों जड़ी ,बनारसी साड़ी!!
यह साड़ी माँ को वरी की बाकी साड़ियों के साथ मिली थी। उस जमाने की महंगी, कीमती साड़ी थी।
पुराने समय में यह सब विशेषताएं हमेशा घर में याद रखी जाती और बहू को याद करवाई भी जाती थीं ।
और इधर मैं जब भी मौका मिलता, माँ के कमरे की अलमारी की सौंधी खुशबु वाली शेल्फ के आयत के परिमाप में जैसे परी लोक ही घूम आती।
रंग-बिरंगी साड़ियाँ, मेकअप का सामान और न जाने क्या! क्या!
अरे! अरे! बस! बस! रुक जाओ!
इतना सब मत सोचो!
मेरी माँ की अलमारी में ऐसा बहुत सारा भी नहीं था। बस कुछ साड़ियाँ और सबसे सजीली, मनभावन नीली बनारसी साड़ी!
अथक परिश्रमी मेरी माँ, केवल हमारी माँ के रूप में ही प्रभुत्व पूर्ण थीं। बाकी रिश्तों में उन्हें कभी उस अधिकार सत्ता का अहसास नहीं हुआ था, जो हमारी पढ़ाई, कपड़ों, अनुशासन के बारे में उन्हें हमारे सम्मुख शक्तिशाली बनाता था।

ट्यूशन पढ़ाना, कपड़े सिलने, घर के सभी काम। जैसे कि रूढ़िवादिता के डंक से ग्रसित रसोई की दैनिकी, हम दो टाँगों वालों के अतिरिक्त घर में रखे चौपाओं का पालन-पोषण आदि।
सब काम नि:स्वार्थ, बिना किसी पारितोषिक की आकांक्षा के।
बस काम! काम! और काम!
इन सबमें अपने बारे में सोचने का समय ही नहीं था।
मगर उनके मन की सुंदरता, पवित्रता के दर्शन कमरे की हर दीवार-कोने, आँगन के पक्के-कच्चे रूप में, गमलों-क्यारियों, पीपल के पेड़ के नीचे, चौपाओं की आरामगाह, गोबर के उपलों की मीनारों की एक सारता में हर कहीं, आपको आराम से हो सकते थे।
जब कोई अतिथि उनके इस संतोष की मुक्त कंठ से प्रशंसा करता तो घर के सब सदस्य (मेरी दादी, दादू, पापा जी और हम) सब गर्व से फूले न समाते।
ऐसी माँ के कमरे की अलमारी में उनकी शेल्फ और उसमें नीलिमा भरती नीली बनारसी साड़ी।
जब माँ यह साड़ी पहनती तो कैलंडर में छपने वाली देवी के समान हमारी आँखों की पुतलियों और पापा के दिल पर छप जाती।
मम्मी को चाव होता था कि नहीं, मगर मुझे बहुत चाव होता था कि माँ वही साड़ी पहनेगी।
फिर माँ मोहल्ले-बिरादरी की शादियों में करीने से तैयार होती और मेरी मनपसंद नीली बनारसी साड़ी को सम्मान देते हुए, अपनी परम सखी के रूप में खुद पर समेट कर, सहेज कर साथ लिए जाती।
घुंघराले बालों के लटकन, कानों में सुशोभित सोने की झुमकों पर लताओं के समान बल खाकर जैसे उनकी रक्षा करते।
मैहरून रंग की लिपस्टिक, कजरारी आँखें, खरे सोने की चूड़ियों से भरे दोनों कलाइयाँ। मगर साड़ी वही नीली बनारसी।
क्योंकि बुजुर्गों का मानना था कि सच्चा श्रृंगार सोने के गहनों से ही होता है।
यह सत्य भी है, मगर जमाना बदल रहा था, गहनों के इलावा औरतें शादी-समारोह में अधिक बारीकी से अध्ययन, मूल्यांकन, समीक्षा अब कपड़ों की करने लगी थीं।
हमें ऐसी दुविधा का अहसास कभी नहीं हुआ, क्योंकि माँ थी ना।
भाइयों के कपड़े तैयार करना, और मेरे कपड़े तो माँ खुद ही नए-नए फैशन के सिलती थी। तब भी मेरा सपना था कि बड़ी होकर वही नीली साड़ी पहनूंगी, यां सूट बनवा लूंगी।
उस दिन भी माँ तैयार हुई मगर दुर्भाग्य या सौभाग्य से आज उस नीली साड़ी की फॉल साथ छोड़ने लगी थी।
फिर सिलाई कर ठीक की, इस्तरी किया और फिर तैयार हुई।
मगर शादी में गली-मोहल्ले-शरीके की औरतों की आँखों को देख माँ चुप-चुप ही रहीं।
मुस्कान शायद जैसे माँ ने उन्हीं औरतों को बराबर बाँट दी थी और वे औरतें सामने नहीं पीठ पीछे हंस रही थीं।
घर आईं, सुबह हुई, दोपहर भी हो चुकी थी।
मगर माँ चुप-चाप, बुझी-बुझी सी काम कर रही थीं। हम बच्चों को समझ आते हुए भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात है? न ही एक सम्मान रूपी डर के कारण पूछ पा रहे थे कि क्या हुआ ? माँ तुम्हें?
शाम की चाय का आनंद लिया जा रहा था तभी वही कल हुई शादी वाले घर की औरतें मिठाई देने आ गईं।
पानी मैंने पिलाया। चाय का पूछा, मगर माँ न जाने कहाँ थी? तभी दादी की आवाज़ पर माँ धम से न जाने कहां से प्रकट हो गई।
बिना नजर मिलाए सबको नमस्ते प्रणाम हुआ और माँ फिर रसोई में।
एक औरत, धीरे-धीरे न जाने क्या बतिया रही थी, दादी से!
हमारी बला से! हमें क्या पता?
मगर उनके जाने के बाद फिर माँ का नाम गूंजा और माँ के दादी के पास आते-आते, मैं दादी के कहे अनुसार वही नीली बनारसी साड़ी भी ले आई।
बरामदा सजा हुआ था। कुर्सी पर दादा जी, चारपाई पर दादी जी और हम माँ के आस-पास खड़े थे।
दादी जी ने साड़ी की कमजोरी पकड़ी और फॉल के कोने से पकड़ कर मेरे सजीले नीले रंग के सपने को अंतिम कोने तक यूँ उधेड़ा जैसे कल के जख्म पर लगी टेप पट्टी को डाक्टर बड़ी बेरहमी से खींच देता है। ताकि जख्म ठीक हो सके। पर जख्म क्या जाने इतनी दूर की बात। उसे तो रोना, चीखना चिल्लाना तो होता ही है।
माँ का तो पता नहीं पर मैं अपने कमरे में जाकर बहुत रोईं थी और अपने दुख में मैं इतनी व्यस्त रही कि पता ही न चला कि माँ खुश थी कि संतुष्ट।
मगर जो भी था पर अब वो नीली बनारसी साड़ी साबुत नहीं थी ।पल्लू, बार्डर सब पर-कटे पंछी की मानिंद दादी की चारपाई के पाए पर यूँ लटक रहे थे मानो फांसी चढ़ गए हों।।
जब तक और शादी आए, माँ धर्म संकट में पड़े उससे पहले माँ की बड़ी सखी मेरी बुआ आई और एक दिन बाद बाजार से जब माँ और बुआ साथ में आईं तो पीली बसंती सी साड़ी भी लिफ़ाफ़े में लहरा, बल खाकर, शरमा रही थी।
साड़ी खूबसूरत थी, माँ खूश थी, पर मैं अभी भी उसी नीली साड़ी को कतरन के लिफ़ाफ़े में से ढूंढ रही थी।
……..!!

।।मुक्ता शर्मा त्रिपाठी ।।

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🍁 परमात्मा की परख🌿

एक समय की बात है किसी गाँव में एक साधु रहता था, वह परमात्मा का बहुत बड़ा भक्त था और निरंतर एक पेड़ के नीचे बैठ कर तपस्या किया करता था | उसका परमात्मा पर अटूट विश्वास था और गाँव वाले भी उसकी इज्ज़त करते थे| एक बार गाँव में बहुत भीषण बाढ़ आ गई | चारो तरफ पानी ही पानी दिखाई देने लगा, सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊँचे स्थानों की तरफ बढ़ने लगे |
जब लोगों ने देखा कि साधु महाराज अभी भी पेड़ के नीचे बैठे परमात्मा का नाम जप रहे हैं तो एक ग्रामीण ने उन्हें यह जगह छोड़ने की सलाह दी |
पर साधु ने कहा- ” तुम लोग अपनी जान बचाओ मुझे तो मेरा परमात्मा बचाएगा!” धीरे-धीरे पानी का स्तर बढ़ता गया , और पानी साधु के कमर तक आ पहुंचा , इतने में वहां से एक नाव गुजरी|

मल्लाह ने कहा- ” हे साधू महाराज आप इस नाव पर सवार हो जाइए मैं आपको सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दूंगा “
साधू ने कहा – नहीं, मुझे तुम्हारी मदद की आवश्यकता नहीं है , मुझे तो मेरा परमात्मा बचाएगा !!
नाव वाला चुप-चाप वहां से चला गया.

कुछ देर बाद बाढ़ और प्रचंड हो गयी , फिर साधु ने पेड़ पर चढ़ना उचित समझा और वहां बैठ कर परमात्मा को याद करने लगा | तभी अचानक उन्हें गड़गड़ाहट की आवाज़ सुनाई दी, एक हेलिकाप्टर उनकी मदद के लिए आ पहुंचा, बचाव दल ने एक रस्सी लटकाई और साधु को उस रस्सी को जोर से पकड़ने का आग्रह किया | पर साधु फिर बोला-” मैं इसे नहीं पकडूँगा, मुझे तो मेरा परमात्मा बचाएगा |” उनकी इतनी हठ के आगे बचाव दल भी उन्हें लिए बगैर वहां से चला गया |

कुछ ही देर में पेड़ बाढ़ की धारा में बह गया और साधु की मृत्यु हो गयी | प्राण त्यागते वक़्त साधु महाराज ने परमात्मा से पूछा -. ” हे🙏 मालिक मैंने तुम्हारी पूरी लगन के साथ आराधना की… तपस्या की पर जब मै पानी में डूब कर मर रहा था तब तुम मुझे बचाने नहीं आये, ऐसा क्यों मालिक ?
मालिक बोले , ” हे साधु महात्मा मै तुम्हारी रक्षा करने एक नहीं बल्कि तीन बार आया , पहला, ग्रामीण के रूप में , दूसरी बार मल्लाह के रूप में, और तीसरी बार हैलीकॉप्टर से रस्सी फेककर , लेकिन तू पहचान ही नही पाया ।

साधू को अपनी गलती का अहसास हुआ और सोचने लगा कि मैं भक्ति साधना कर अपने अंदर बैठे परमात्मा को को देखने की कोशिश करता रहा , लेकिन ये भूल गया की वो परमात्मा सृष्टि के हर जीव में बसता है ।

वास्तव में आत्मा ही परमात्मा का स्वरुप है कमी सिर्फ हमारे पहचान की है..!!
🙏🏻🙏🏾🙏जय गुरूदेव🙏🏽🙏🏿🙏🏼

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सुख दुख आते जाते रहेंगे

घुप्प अंधेरी रात में एक व्यक्ति नदी में कूद कर आत्महत्या करने का विचार कर रहा था. वर्षा के दिन थे और नदी पूरे उफान पर थी. आकाश में बादल घिरे थे और रह-रहकर बिजली चमक रही थी.

वह उस देश का बड़ा धनी व्यक्ति था लेकिन अचानक हुए घाटे से उसकी सारी संपत्ति चली गई. उसके भाग्य का सूरज डूब गया था. चारों ओर निराशा ही निराशा. भविष्य नजर नहीं आ रहा था.

उसे कुछ सूझता न था कि क्या करे. उसने स्वयं को समाप्त करने का विचार कर लिया था. नदी में कूदने के लिए जैसे ही चट्टान के छोर पर खड़ा होकर वह अंतिम बार ईश्वर का स्मरण करने लगा तभी दो बुजुर्ग परंतु मजबूत बांहों ने उसे रोक लिया.

बिजली की चमक में उसने देखा कि एक वृद्ध साधु उसे पकड़े हुए है ! उस वृद्ध ने उससे निराशा का कारण पूछा. किनारे लाकर उसकी सारी कथा सुनी फिर हंसकर बोला- तो तुम यह स्वीकार करते हो कि पहले तुम सुखी थे.

सेठ बोला- हाँ मेरे भाग्य का सूर्य पूरे प्रकाश से चमक रहा था. सब ओर मान-सम्मान संपदा थी. अब जीवन में सिवाय अंधकार और निराशा के कुछ भी शेष नहीं है.

वृद्ध फिर हंसा और बोला- दिन के बाद रात्रि है और रात्रि के बाद दिन. जब दिन नहीं टिकता तो रात्रि भी कैसे टिकेगी ? परिवर्तन प्रकृति का नियम है ठीक से सुनो और समझ लो.

जब तुम्हारे अच्छे दिन हमेशा के लिए नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे. जो इस सत्य को जान लेता है वह सुख में सुखी नहीं होता और दुख में दुखी नहीं होता !

उसका जीवन उस अडिग चट्टान की भांति हो जाता है जो वर्षा और धूप में समान ही बनी रहती है ! सुख और दुख को जो समभाव से ले, समझ लो कि उसने स्वयं को जान लिया.

सुख-दुख तो आते-जाते रहते हैं. यही प्रकृति की गति है. ईश्वर का इंसाफ. जो न आता है और न जाता है वह है स्वयं का अस्तित्व. इस अस्तित्व में ठहर जाना ही समत्व है.

सोचो यदि किसी ने जीवन में एक जैसा ही भाव देखा. हमेशा सुख का ही. जिस चीज की आवश्यकता हुई उससे पहले वह मिल गई. तो क्या वह कुछ उपहार पाने की खुशी का अनुभव कैसे कर सकता है ?

दुख न आए तो सुख का स्वाद क्या होता कोई कैसे जाने ? जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन बंधनों से मुक्त हो जाता है..!!
🙏🏼🙏🏿🙏🏽जय जय श्री राधे🙏🏾🙏🙏🏻

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. सन्त की दूरदर्शिता एक सन्त के पास 30 सेवक रहते थे। एक सेवक ने गुरुजी के आगे प्रार्थना की, 'महाराज जी! मेरी बहन की शादी है तो आज एक महीना रह गया है तो मैं दस दिन के लिए वहाँ जाऊँगा। कृपा करें ! आप भी साथ चले तो अच्छी बात है।' गुरु जी ने कहा– 'बेटा देखो टाइम बताएगा। नहीं तो तेरे को तो हम जानें ही देंगे।' उस सेवक ने बीच-बीच में इशारा गुरु जी की तरफ किया कि गुरुजी कुछ ना कुछ मेरी मदद कर दें। आखिर वह दिन नजदीक आ गया सेवक ने कहा, 'गुरु जी कल सुबह जाऊँगा मैं।' गुरु जी ने कहा, 'ठीक है बेटा!' सुबह हो गई जब सेवक जाने लगा तो गुरु जी ने उसे 5 किलो अनार दिए और कहा, 'ले जा बेटा भगवान तेरी बहन की शादी खूब धूमधाम से करें दुनिया याद करें कि ऐसी शादी तो हमने कभी देखी ही नहीं और साथ में दो सेवक भेज दिये जाओ तुम शादी पूरी करके आ जाना।' जब सेवक घर से निकले 100 किलोमीटर गए तो जिसकी बहन की शादी थी वह सेवक दूसरों से बोला, 'गुरु जी को पता ही था कि मेरी बहन की शादी है, और हमारे पास कुछ भी नहीं है, फिर भी गुरु जी ने मेरी मदद नहीं की।' दो-तीन दिन के बाद वह अपने घर पहुँच गया। उसका घर राजस्थान रेतीली इलाके में था वहाँ कोई फसल नहीं होती थी। वहाँ के राजा की लड़की बीमार हो गई तो वैद्यजी ने बताया कि, 'इस लड़की को अनार के साथ यह दवाई दी जाएगी तो यह लड़की ठीक हो जाएगी।' राजा ने मुनादी करवा रखी थी कि, 'अगर किसी के पास आनार है तो राजा उसे बहुत ही इनाम देंगे।' इधर मुनादी वाले ने आवाज लगाई, अगर किसी के पास अनार है तो जल्दी आ जाओ, राजा को अनारों की सख्त जरूरत है। जब यह आवाज उन सेवकों के कानों में पड़ी तो वह सेवक उस मुनादी वाले के पास गए और कहा कि हमारे पास अनार है, चलो राजा जी के पास। राजाजी को अनार दिए गए अनार का जूस निकाला गया और लड़की को दवाई दी गई तो लड़की ठीक-ठाक हो गई। राजा जी ने पूछा, 'तुम कहाँ से आए हो, तो उसने सारी हकीकत बता दी। राजा ने कहा, 'ठीक है तुम्हारी बहन की शादी मैं करूँगा।' राजा जी ने हुकुम दिया कि, 'ऐसी शादी होनी चाहिए जिसे देखकर लोग यह कहे कि यह राजा की लड़की की शादी है।' सब बारातियों को सोने चांदी गहने के उपहार दिए गए बारात की सेवा बहुत अच्छी हुई लड़की को बहुत सारा धन दिया गया। लड़की के मां-बाप को बहुत ही जमीन जायदाद व आलीशान मकान और बहुत सारे रुपए पैसे दिए गए। लड़की भी राजी खुशी विदा होकर चली गई। सेवक सोचने लगे कि, 'गुरु की महिमा गुरु ही जाने। हम ना जाने क्या-क्या सोच रहे थे गुरु जी के बारे में। गुरु जी के वचन थे जा बेटा तेरी बहन की शादी ऐसी होगी कि दुनिया देखेगी।' सन्त वचन हमेशा सच होते हैं। सन्तों के वचन के अन्दर ताकत होती है लेकिन हम नहीं समझते। जो भी वह वचन निकालते हैं वह सिद्ध हो जाता है। हमें सन्तों के वचनों के ऊपर अमल करना चाहिए और विश्वास करना चाहिए ना जाने सन्त मौज में आकर क्या दे दें और रंक से राजा बना दें। ----------:::R:::---------- "जय जय श्री राधे"

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एक यात्रा अपने माता-पिता की ओर 🙏

एक बार एक पिता और उसका पुत्र जलमार्ग से कहीं यात्रा कर रहे थे और तभी अचानक दोनों रास्ता भटक गये। फिर उनकी नौका भी उन्हें ऐसी जगह ले गई, जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई।

पिता ने पुत्र से कहा, “अब लगता है, हम दोनों का अंतिम समय आ गया है, दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है।”अचानक पिता को एक उपाय सूझा, अपने पुत्र से कहा कि "वैसे भी हमारा अंतिम समय नज़दीक है, तो क्यों न हम ईश्वर की प्रार्थना करें।"

उन्होने दोनों टापू आपस में बाँट लिए।

एक पर पिता और एक पर पुत्र, और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।

पुत्र ने ईश्वर से कहा, ‘हे भगवन, इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।’

ईश्वर ने प्रार्थना सुनी गयी, तत्काल पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। उसने कहा ये तो चमत्कार हो गया।

फिर उसने प्रार्थना की, एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ।

तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी।

अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँगे लूँ ?

उसने ऐसा ही किया।

उसने प्रार्थना की, एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ।

तत्काल नाव प्रकट हुई और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा।

तभी एक आकाशवाणी हुई, बेटा तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ?

पुत्र ने कहा, उनको छोड़ो, प्रार्थना तो उन्होंने भी की, लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी। शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ना ?

आकाशवाणी ने कहा, ‘क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ?

पुत्र बोला, नहीं।

आकाशवाणी बोली तो सुनो, ‘तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की…” हे भगवन! मेरा पुत्र आपसे जो भी माँगे, उसे दे देना क्योंकि मैं उसे दुःख में हरगिज़ नहीं देख सकता औऱ अगर मरने की बारी आए तो मेरी मौत पहले हो ” और जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है।’

पुत्र बहुत शर्मिंदा हो गया।

हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर सिर्फ़ पछताना पड़ता है। हम चाह कर भी अपने माता पिता का ऋण(कर्ज) नहीं चुका सकते……cp

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!! सुंदरता !!

एक कौआ सोचने लगा कि पंछियों में मैं सबसे ज्यादा कुरूप हूँ। न तो मेरी आवाज ही अच्छी है, न ही मेरे पंख सुंदर हैं। मैं काला-कलूटा हूँ। ऐसा सोचने से उसके अंदर हीनभावना भरने लगी और वह दुखी रहने लगा। एक दिन एक बगुले ने उसे उदास देखा तो उसकी उदासी का कारण पूछा। कौवे ने कहा – तुम कितने सुंदर हो, गोरे-चिट्टे हो, मैं तो बिल्कुल स्याह वर्ण का हूँ। मेरा तो जीना ही बेकार है। बगुला बोला – दोस्त मैं कहाँ सुंदर हूँ। मैं जब तोते को देखता हूँ, तो यही सोचता हूँ कि मेरे पास हरे पंख और लाल चोंच क्यों नहीं है। अब कौए में सुन्दरता को जानने की उत्सुकता बढ़ी।

वह तोते के पास गया। बोला – तुम इतने सुन्दर हो, तुम तो बहुत खुश होते होगे ? तोता बोला- खुश तो था लेकिन जब मैंने मोर को देखा, तब से बहुत दुखी हूँ, क्योंकि वह बहुत सुन्दर होता है। कौआ मोर को ढूंढने लगा, लेकिन जंगल में कहीं मोर नहीं मिला। जंगल के पक्षियों ने बताया कि सारे मोर चिड़ियाघर वाले पकड़ कर ले गये हैं। कौआ चिड़ियाघर गया, वहाँ एक पिंजरे में बंद मोर से जब उसकी सुंदरता की बात की, तो मोर रोने लगा। और बोला – शुक्र मनाओ कि तुम सुंदर नहीं हो, तभी आजादी से घूम रहे हो वरना मेरी तरह किसी पिंजरे में बंद होते।

कथा-मर्म :- दूसरों से तूलना करके दुखी होना बुद्धिमानी नहीं है। असली सुन्दरता हमारे अच्छे कार्यों से आती है..!!
🙏🏿🙏🏽🙏🏾जय गुरूदेव🙏🙏🏼🙏🏻