Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, रामायण - Ramayan

🍁🍁जय श्री सीताराम जी 🍁🍁
🏵️🏵️🌴🌴🪴🪴🌴🌴🏵️🏵️ 🌻🌻श्री हनुमान जी का अवतरण🌻🌻 त्रेतायुग में एक केसरी नाम का असुर उत्पन्न हुआ। उसने पुत्र कामना से श्री शिवजी को प्रसन्न करने के लिए पञ्चाक्षर मंत्र का जप करते हुए जितेन्द्रिय और निराहार रहकर तप किया। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे दर्शन दिया और कहा -- 'तू अपने इच्छानुसार वर मांग ले।' तब केसरी ने कहा -- देवदेव! यदि आप संतुष्ट हैं और वर देना चाहते हैं तो मैं एक ऐसा पुत्र चाहता हूं, जो बलवान, संग्राम में विजयी, महाधैर्यवान एवं महाबुद्धिमान भी हो। तब श्री शंकर जी बोले -- मैं तुझे पुत्र तो नहीं दे सकता। कारण, विधाता ने तुझे पुत्र सुख नहीं लिखा है, तथापि एक सुन्दरी कन्या दूँगा, जिससे तेरी इच्छा के अनुसार महान बलशाली पुत्र उत्पन्न होगा।' ऐसा कहकर श्री शंकर जी अंतर्ध्यान हो गए। वह असुर मनचाहा वर पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो गया। कुछ समय बाद उसके एक लोकविस्मयकारिणी कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम दैत्यराज ने अञ्जना रखा।वह कन्या शुक्लपक्ष में चंद्रकला की तरह बढ़ने लगी। पिता पुत्रवत् ही उस कन्या से प्रेम करता था। समय बीतता रहा, एक बार केसरी नामक वानर ने, जो बड़ा पराक्रमी एवं वानरों में श्रेष्ठ था, उस कन्या की याचना की। तब दैत्यराज ने बड़ी प्रसन्नता से उसे वह कन्या दे दी। केसरी इच्छानुसार रूप धारण करने वाली अंजना के साथ आनन्द से क्रीणा करने लगा। इस प्रकार बहुत समय बीत गया, पर अंजना के कोई पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ। एक बार धर्मदेवता पुल्कसी (वन्य नीचे स्त्री) का रूप धारण कर वहाँ आये। उनके एक हाथ में था बेंत तथा दूसरे हाथ में थी एक सुतली। वह स्त्री जोर-जोर से यह आवाज़ लगा रही थी कि 'किसी को अपने भाग्य के विषय में प्रश्न करना हो तो करें, उसके भाग्य में क्या है, मैं बता दूँगी।' इस प्रकार सबके हाथ की रेखाएं देखती और उन्हें फल बताती हुई वह अंजना के पास पहुँची। तब अंजना ने उसको सुंदर आसन देकर बैठाया और सुवर्णपात्र में मौक्तिक रूपी तण्डुल उसके सामने रखकर उसको सभी प्रकार से संतुष्ट करके पूछा -- ' देवि! मेरे भाग्य में पुत्र सुख है या नहीं? सत्य कहो। यदि मुझे एक बलवान पुत्र हो जायगा तो मैं तुम्हें तुम्हारे इच्छानुसार सब कुछ दूँगी।' तब वह पुल्कसी बोली --'तुझे बलवान पुत्र अवश्य प्राप्त होगा, यह मैं धर्म की शपथ खाकर कहती हूँ, तू चिन्ता मत कर। किन्तु मैं जैसा बताऊँ, उसी प्रकार तू नियमपूर्वक तप कर। श्री वेंकटाचलपर्वत पर सात हजार वर्ष तक तप करने से तुझे मनोवांछित पुत्र प्राप्त होगा।' ऐसा कहकर पुल्कसी जैसे आयी थी वैसे ही चली गई। अब अंजना उसके कथनानुसार वेंकटाद्रि पर आकाशगंगा के पास जाकर, जहाँ बहुत से सिद्ध महात्मा वास करते थे, केवल वायु भक्षण कर वायु देवता का ध्यान करती हुई दारुण तप करने लगी। कुछ दिनों बाद आकाशगंगा से यह आकाशवाणी हुई कि 'बेटी! तू चिन्ता मत कर, तेरा भाग्य खुल गया। रावण नाम का राक्षस बड़ा दुष्ट हो कर सब लोगों को रुलायेगा, वह सबकी सुन्दर-सुन्दर स्त्रियों को हरण करके लायेगा। उसका नाश करने के लिए भगवान श्री हरिकुल में श्री राम रुप से अवतार लेंगे। उनकी सहायता करने के लिए बड़ा पराक्रमी, बलशाली, धैर्यवान, जितेन्द्रिय और अप्रमेय गुणवाला एक तुम्हारा पुत्र भी होगा। यह आकाशवाणी सुनकर अंजना परम प्रसन्न हुई। उसने यह सब वृतांत केसरी को बतलाया। वह भी अत्यन्त प्रसन्न होकर पुत्रोत्पत्ति की प्रतीक्षा करने लगा। अंजना का गर्भ क्रमशः बढ़ने लगा और दस मास पूर्ण होने पर श्रावण मास की एकादशी के दिन श्रवण नक्षत्र में कमलनयनी अंजना ने सूर्योदय के समय कानों में कुण्डल और यज्ञोपवीत धारण किए हुए, कौपीन पहने हुए, जिसका रूप, मुख, पूंछ और अधोभाग वानर के समान लाल था, ऐसे सुवर्ण के समान रंग वाले सुंदर पुत्र को जन्म दिया। हनुमान जी के जन्म की कथाएँ पुराणों में विभिन्न प्रकार से मिलती हैं। कल्पभेद से वे सभी सत्य ही हैं। हमें तो भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करनी चाहिए।

नेहा रावत

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