Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक प्रदेश के राजा के पास बहुत सुन्दर औऱ निहायत ही वफादार घोड़ी थी।राजा अपने घोड़ी पर जान छिड़कता था और घोड़ी राजा पर ।दोनों एक दूसरे को जी जान से प्रेम करते थे ।

कई बार बड़े औऱ भीषण युद्ध में घोड़ी ने अपनी जान पर खेलकर राजा के प्राण बचाये थे ।

समय बीतता गया । कुछ दिनों के बाद राजा की घोड़ी ने एक बच्चे को जन्म दिया लेकिन बच्चा काना पैदा हुआ, पर शरीर हृष्ट पुष्ट सुडौल औऱ बेहद खूबसूरत ।

घोड़ी का बच्चा जब बड़ा हुआ, उसने अपनी मां से पूछा: मां मैं बहुत बलवान हूँ, पर काना हूँ.. यह कैसे हो गया।

इस पर घोड़ी बोली: बेटा, एक बार जब मैं गर्भवती थी, तू मेरे पेट में था तब राजा ने मेरे ऊपर सवारी करते समय मुझे एक कोड़ा मार दिया था क्योंकि मेरे पैर फिसलने के कारण राजा ज़मीन पर गिर पड़ा था जिसके कारण तू काना हो गया क्योंकि उस वक़्त मुझें चोट लग गई थी ।

अपनी माँ की यह बात सुनकर बच्चे को राजा पर बहुत गुस्सा आया और उसने अपनी मां से कहा : मां मैं राजा से इसका बदला जरूर लूंगा ।

मां ने कहा…नहीं बेटा, ऐसा क़भी मत सोचना क्योंकि राजा ने हमारा पालन-पोषण किया है, तू जो स्वस्थ है.. सुन्दर है, उसी के पोषण औऱ कृपा से तो है । यदि राजा को एक बार गुस्सा आ गया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उसे क्षति पहुचायें।

पर उस बच्चे के समझ में कुछ नहीं आया, उसने मन ही मन राजा से बदला लेने की सोच ली औऱ इसके लिए अवसर तलाश करने लगा ।

आखिरकार एक दिन घोड़े को यह मिल गया.. राजा उसे एक युद्ध पर ले गया। युद्ध के दौरान लड़ते-लड़ते राजा बुरी तरह घायल हो गया । शत्रुओं ने उसे चारों तरफ़ से घेर लिया लेकिन घोड़ा अपनी जान पर खेलकर उसे तुरन्त उठाकर वापस महल ले आया औऱ राजा की जान बच गई ।

जब घोड़े की माँ को इस घटना की जानकारी हुई तो उसे अपने बेटे पर बहुत ताज्जुब हुआ लेकिन वह अपने बेटे के रवैये से मन ही मन बहुत खुश हुई ।

घोड़े ने अपनी मां से पूछा: मां,आज राजा से बदला लेने का बहुत अच्छा मौका था, पर युद्ध के मैदान में बदला लेने का ख्याल ही नहीं आया और न ही मैं ले पाया, मन ने गवाही नहीं दी….बल्कि राजा को विपत्ति में घिरा देख उल्टे मेरा खून खौल उठा औऱ मैंने हर हाल में उसकी हिफाज़त करने की ठान ली ,भले ही मेरी जान चली जाती ।इतना कह घोड़ा रोने लगा ।

इस पर घोडी ने मुस्कुरा कर गंभीरता से कहा : बेटा तेरे खून में और तेरे संस्कार में धोखा है ही नहीं, तू जानबूझकर तो धोखा दे ही नहीं सकता है,साथ हु तुझसे नमक हरामी हो नहीं सकती, क्योंकि तेरी नस्ल में तेरी मां का ही तो अंश है।वास्तव में आज जो तूने किया,यही तेरा फ़र्ज़ था औऱ अगर तू अपने फ़र्ज़ के लिए आज कुर्बान भी हो जाता तो मुझें तुझपर फक्र होता ।

वाकई.. यह सत्य है कि जैसे हमारे संस्कार होते हैं, वैसा ही हमारे मन का व्यवहार होता है ।

रवि कांत

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