Posted in संस्कृत साहित्य

एक घटना आपके यहाँ घटित होती है।

हजरत इब्राहीम को सपना आता है उसके बाद वे अपना पुत्र कुर्बान करने को तैयार हो जाते हैं।

दैवीय कृपा से म्रत्यु के द्वार को पंहुचा हुआ वो पुत्र बकरे में बदल जाता है और इसके बाद से पूरी दुनिया के बकरा प्रजाति की शामत आ जाती है।

एक घटना हमारे यहां घटती है, ऋषि वाजश्रवा अपने पुत्र नचिकेता को म्रत्यु अर्थात यमराज को दान में दे देते हैं।

नचिकेता भी म्रत्यु के द्वारे पंहुचता है और जो ज्ञान लेकर वह वापिस लौटता है वो ज्ञान आज भी पूरी दुनिया के दर्शन शास्त्र का आधार बना हुआ है।

उस कठोपनिषद का प्रकाश आज भी मद्धिम न हुआ है।

दोनों घटनाओं में समानता है, दोनों में चमत्कार की कल्पना है पर दोनों घटनाओं से निकलने वाली प्रेरणा सर्वथा भिन्न है।

यह भी विचार मेरे मन में आता है कि यदि यही बालक हमारे किसी पुराण में बकरे से बदला हुआ दिखाया गया होता तो निष्कर्ष यह रहता कि बकरों का संरक्षण होना प्रारम्भ हो जाता क्योंकि ऋषि निष्कर्ष यह निकालते कि बकरे और मनुष्य पुत्र में एक समान ही चेतना है।

ईश्वर ने मनुष्य और बकरे को आपस मे बदल कर यही संदेश दिया है।

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