Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मां बूढ़ी हो गईं हैं…

बुढ़ापा के प्रति हमारे मन में विरक्ति होती है। अधिकांश मनुष्य अपने बूढ़े होने के बारे में नहीं सोचते। वे अपने यौवन के दिनों में और अधेड़ होते-होते भी समय की स्थितिज ऊर्जा में होते हैं। गोया, वह अवस्था वहीं ठहर जाने वाली हो। यों आंखों की ओट से देह का ढलान दिखाई पड़ता है पर वह नहीं देख पाते। यह केवल अपने साथ ही नहीं होता। अपनों के लिए भी होता है। अपने प्रियजनों के लिए। जैसे माता-पिता, भाई, बहन आदि।

मैंने पिछले कुछ बरसों में मां को ढलते हुए देखा। वह रह-रह कर कुछ घट रही हैं। चूंकि वह अधिक समय भैया के पास रहा करती थीं तो वह देखना किसी सीधी रेखा को देखने जैसा नहीं था। उसमें एक रुकावट या अंतराल की ठगी हो जाती। और तब उनका पूरा समय तो बाबूजी की देख-रेख में ही बीत जाता रहा। तो सारा ध्यान बाबूजी पर रहा। अब बाबूजी नहीं रहे तो मां की इकहरी काया हमारे सामने भासित हो गई है और उनके पास भी समय की बरसात है। वह पिछले साढ़े तीन महीने से मेरे पास हैं। मैं उन्हें अत्यंत निकट से देख पा रहा हूं। तभी मुझे लग रहा कि वह अपने आप से, अपने अपराजेय व्यक्तित्व से, उसके आकर्षण-आभा से चुकती जा रही हैं।

अब उनका सुन्दर साड़ियों से मोह जाता रहा है। चार को ही वह बदल-बदल कर पहनती हैं। कभी उन्हें सिल्क साड़ियां खूब भाती थीं। अब वह उनकी ओर कहां देखती हैं। हमेशा ही सूती पहनती हैं। सूती में भी उन्हें समस्या होती है। वह कहती हैं, इसे वापस कर दो। मां कहीं घूमने-फिरने नहीं जाती। कल उन्हें बाजार ले गया था। सौ मीटर पैदल चलकर जाने में भी घबराती हैं। पत्नी हाथ थामे चल रही थी। और वह किसी उत्सुक अबोध बच्चे की तरह पांव बढ़ा रही थीं। उन्हें सुनाई कम देता है। बहुत कम। हीयरिंग एड रखा है। लगाती नहीं।

वह एक दो धारावाहिक देखती हैं। टीवी म्यूट रहता है। दृश्य पढ़ती हैं। सुनना उनकी प्राथमिकता नहीं। कहती हैं, समझ लेती हूं। सुबह तीन बजे ही जाग जाती है। पूजा-पाठ चलता रहता है। सुबह जब मैं उठता हूं तो उनके नहाने के लिए गीज़र चलाता हूं। बाल्टी में पानी भरता हूं। वह नहाकर आती हैं तो मुझसे पूछती हैं; चाय बना दूं तुम्हारे लिए? मैं कई बार उनसे ही चाय बनवाता हूं। कई बार खुद बनाता हूं। उनके हाथ कांपते हैं पर चाय मुझसे बेहतर बनाती हैं। लीफ़ का फ्लेवर उनकी चाय में छाया रहता है। संतुलन बढ़िया। कभी इधर-उधर नहीं होता।

मैं नाश्ता बनाया करता हूं तो कहती हैं कि एक चम्मच पोहा या उपमा मेरे लिए रखना। दोपहर को कभी भोजन के साथ तो कभी उससे पहले खाती हैं। जैसा भी बना हो, उन्हें अच्छा ही लगता है। वह यदा-कदा पुरानी घटनाएं सुनाती हैं। अक्सर दो तीन दिन पहले सुनाई हुई घटना की पुनरावृत्ति होती है। पर उन्हें लगता है जैसे मुझे पहली बार ही सुना रही हों। पुस्तक उठा कर पढ़ती हैं। आधे घंटे में उकता जाती हैं।

अब मुझे ध्यान आता है कि मां कितनी ऊर्जा से भरी हुई स्त्री थीं। घर परिवार की धुरी थीं। साज शृंगार तो उन्होंने कभी किया नहीं। ढंग की साड़ी पहनती थीं। सुबह से शाम, देर रात तक खड़ी रहतीं। भोज भात में सबसे पीछे भोजन करतीं। अथक परिश्रम करतीं और चेहरे पर वही वैभव रहता। रात के दो बजे सोकर सुबह पांच बजे खड़ी दिखाई देती। अब उनके उन दिनों की छाया भर रह गई है। दिन में जब तब सोती रहती हैं। उठकर बैठ जाती हैं। पांच मिनट तक चुप रहती हैं। जैसे मति मंद पड़ गई हो। फिर मुझे देखकर हंसती हैं। कभी कोई फोन आया तो बात करती हैं। अक्सर भाई बहनों की मिस्ड काल पड़ी रहती है।

उनका शरीर अब हड्डियों का ढांचा रह गया है। ईश्वर की दया से कोई रोग नहीं है उन्हें ‌। किन्तु कितना कुछ ढल गया है। उन्हें फोटो खिंचवाते हुए लाज आती है। लगता है बुढ़ापा ने कुरूप कर दिया। मैं समझाता हूं कि तुम अब भी ग्रेसफुल हो। एक तरफ उनमें जीवन का विराग है। दूसरी ओर छोटी-छोटी लालसाएं पनपती रहती हैं। एक दिन पत्नी ने आलू का मजेदार भुजिया बनाया तो मां ने अपने लिए थोड़ा सा भुजिया कटोरी में अलग से रख लिया। और बोलीं, आज खाऊंगी। मुझे हंसी आई। आंखें सजल भी हो गईं। मैंने मजाक किया कि अब तुम पाथेर पांचाली की बूढ़ी पीसी मां हो गई हो! वह हंस पड़ीं।

बचपन में मैं उनसे चिपका रहता था। सातवीं आठवीं तक यह सिलसिला चलता रहा। लोग उपहास करते। अब वह दिन भर मुझे देखती रहती हैं। अंशु यह…अंशु वह। अब मैं ही उनका पालक हो गया हूं। परन्तु मेरे शरीर में छोटी सी तकलीफ होते ही न जानें कहां से वह ताड़ लेती हैं। तब मेरा माथा खाती हैं। तुम दूध नहीं पीते..दही नहीं खाते!

जैसा कि मैंने ऊपर लिखा,हम बुढ़ापा को नहीं देख पाते। मैं भी नहीं देख पाया। यह भी संभव है कि चौदह वर्ष से पिता की रुग्णता में डूबी मेरी आंखें मां को बुढ़ाते हुए नहीं देख सकीं। फिर एक दिन अचानक मैंने देखा कि मां भी घट कर आधी रह गईं। आधे से ज्यादा घटा विटप…! सारा वैभव तो चला जा रहा है। चमड़ी झूल गई है। हाथ की नसें उभर आई है। गाल धंस गए है लेकिन इन्दु की आभा का एक अंश उनके चेहरे पर रह गया है।( इन्दु उनका नाम है) वह आभा उनकी आत्मा की है। बाहर बैठी दिखाई देती है।

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