Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मेरीलिखावट

गुड़ियाघर

पूजा कर, प्रसाद खा। खूब फुलझड़ी और पटाखे चला रहें हैं, पूर्वी और पापा। बहुत दिनों बाद इतना सुख महसूस कर रही हूँ।

आज दिवाली का उत्साह उतना भी फीका नही लग रहा, जितना सालों साल बचपन में लगा करता था। पापा और मेरे बीच की दूरियाँ, कुछ पटती नज़र आ रही हैं।

ये सब पूर्वी, मेरी नौ साल की बेटी की समझाइश का नतीज़ा है।

दिवाली के दिन, कितने साल, मैं रंगोली बना फुलों से सज़ा, पापा का इंतज़ार करती। सोचती वे देखेंगे तो खुश हो जायेंगे।

हर छुट्टी, हर इतवार, सब बच्चे अपने परिवार संग, इधर उधर, मिलने मिलाने घूमने फिरने जाते। पापा की अंतहीन ड्यूटी में हमें ये अनुलाभ लगते, नाममात्र नसीब होते।

पुलिस इंस्पेक्टर बड़ा चुनौतियों, जोख़िम व अतिशय व्यस्ततम दिनचर्या वाली नौकरी थी। मेरे और मम्मी के लिए, पापा के पास बहुत सीमित समय होता।

उसमें ना मम्मी, ना मेरा ही दिल भरता। हम तीनों कुछ अधूरा सा महसूस करते। पापा तो काम में व्यस्त हो, कुछ भूलने का प्रयास भी करते। पर हम…

हर बार जन्मदिन पर वादा करते। मेरी पसन्द का गुड़ियाघर लाने को। ना खुद आते और उपहार तो भूल ही जाते। बड़े होते हुए, मैंने तो सारी आशा ही छोड़ दी।

मम्मी भी अजीब सी कुढ़ी, चिड़चिड़ी सी दिखती। पापा के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से अनुपस्थित होने का दंश, कैसे झेल रही थी, पता नही?? सारी चेतना श्यामल हो खत्म हो गई।

मम्मी के नही रहने से पापा ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली और सुदूर यात्राओं पर चले गए। उनका भी मन बहुत खिन्न रहा होगा। मैं पूर्णतः अकेली पड़ गई।

मेरी शादी से पहले ही, माँ इस संसार को अलविदा कह गयीं। मैं कारगर वकील थी। शादी कर सुभान के घर आ गई। पापा को माँ की असामयिक मृत्यु का दोषी मान बैठी।

दस दिन पहले ही किसी सरकारी काम के सिलसिले में, पापा, दस साल बाद, शहर आये हैं। मुझसे और पूर्वी से मिले। पूर्वी उनसे मिलते ही, एकदम उन्हीं की हो गई है।

सुभान और मेरे तलाक के बारे में भी उन्हें पूर्वी से पता चला। बहुत से वार्तालाप क्रम शुरू होते और लगभग बहस में समाप्त होते। कितने सालों की शिकायतें। मेरी, मम्मी और उनकी भी शायद।

अपने साथ कई जगह पापा, पूर्वी को भी ले जाते। सर्विस में रहते हुए, कितने लोगों के हित संरक्षित रखे, इसका नमूना उन्ही के महकमें के लोगों द्वारा पता लगा। रोज़ आकर सारी कहानी पूर्वी बताती।

यह सब सुनकर गर्व महसूस हो रहा है। उन दिनों, जब वे अपना कर्तव्य मेहनत, लगन और सच्चाई से कर रहे थे। उनका हमारे साथ ना होना। वह कमी बड़ी लगती थी।

पूर्वी ने मुझे समझाया। गलती, अनदेखी, अज्ञानता हम सभी से कभी ना कभी हो ही जाती है। कितना भी कोशिश करें, कुछ ना कुछ कहीं ना कहीं, कम पड़ ही जाता है। आप खुद और पापा(सुभान) को ही देख लो।

छोटी सी उम्र में बने पूर्वी के इन मनोभावों ने, पापा के प्रति, हृदय की सभी मलिनता को धो डाला है। पिछले दस दिनों के घटनाक्रम, मात्र पापा का यहाँ होना ही, सुखद लग रहा है।

ढेरों उपहार पापा, मेरे और पूर्वी के लिए लाये हैं। एक कोने में गुड़ियाघर रखा है। आश्चर्यचकित मैं कभी उनको, कभी गुड़ियाघर देखती हूँ।

मैलिक और स्वरचित
कंचन शुक्ला- अहमदाबाद
07.07.2021

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