Posted in संस्कृत साहित्य

ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्य स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः । स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥*


*_📕“तैतरियोपनिषद्”🌼_*

*🌺ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्य स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः । स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥*
शिक्षावल्ली,अनुवाक-९,श्लोक-१

*🌼अर्थ और व्याख्या –🌻*
_”ईश्वर के प्रेम को, हृदय में भरपूर रखने के लिए , स्वाध्याय और प्रवचन की आवश्यकता है । स्वाध्याय दो प्रकार का होता है -“_
*(१) शास्त्रों का नियमपूर्वक अध्ययन और मनन करना ।*

*(२) आत्माध्ययन – आत्म निरीक्षण अर्थात् अपने कृत्यों पर दृष्टि रखते हुए जो बुरे हों उन्हें छोड़ने और जो भले हों उन्हें पुनः करने की दृढ़ इच्छा अपने भीतर उत्पन्न करते रहना ।*

अध्यापन आदि के द्वारा वेद प्रचार को *”प्रवचन”* कहते हैं । इस अनुवाक में शिक्षा यह दी गई है कि *समस्त कार्य करते हुए भी स्वाध्याय और प्रवचन अर्थात् वेद के विचार और प्रचार को सदैव अपना लक्ष्य बनाए रखना चाहिए ।* कुछ कार्यों का विवरण इस अनुवाक में दिया गया है –
*(१) ऋतम् -* तीनों काल में एक जैसी रहने वाली वेदाज्ञा पर चलना ।
*(२) सत्यम् -* मन, वाणी और कर्म में समता का होना ।

*(३) तपः -* द्वन्द्वों का सहना और नियमित जीवन बनाना ।

*(४) दमः -* इन्द्रियों पर अपना अधिकार रखना ।

*(५) शमः -* अन्तःकरणों का शान्त रखना ।

*(६) अग्नयः -* ब्रह्यचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ सम्बन्धी तीनों प्रकार की अग्नियों को स्थापित करना ।

*(७) अग्निहोत्रम् -* प्रतिदिन हवन करना ।

*(८) अतिथयः -* अतिथियों की सेवा करना ।

*(९) मानुषम् -* मनुष्य ऋण चुकाना ।

*(१०) प्रजा -* सन्तान का पालन और पोषण ।
*(११) प्रजन -* सन्तान पैदा करना ।

*(१२) प्रजाति -* पौत्रादि का उत्पन्न होना ।

*(१) (सत्यम्, इति, सत्यवचा राथीतरः)* सत्य ही (श्रेष्ठतम है) ऐसा , सत्यवादी रथीतर का पुत्र राथीतर मानता था ।
*(२) (तप, इति, तपोनित्यः, पौरूशिष्टिः)* तप ही (प्रधान है) ऐसा, नित्य तपस्वी पुरूशिष्ट का पुत्र पौरूशिष्टि (मानता था) ।
*(३) (स्वाध्यायप्रवचने, एव, इति, नाकः मौद्गल्यः)* स्वाध्याय और प्रवचन ही (मुख्य हैं) ऐसा *मुद्गल का पुत्र ‘नाक’* शिक्षा देता था क्यों कि *(तत्, हि, तपः)* वह (स्वाध्याय) ही तप है *(तत्, हि, तपः)* वह *(प्रवचन)* ही तप है ।

_”यहाँ यह नहीं समझना चाहिए कि इन उपर्युक्त विद्वानों में विचार भेद है क्यों कि इनमें जो जिस बात को मुख्य मानता था उसके सिवा अन्य बातों को गौण रीति से जरूर मानता था, इस प्रकार चारों सत्य, तप, स्वाध्याय और प्रवचन को मानते थे, केवल मुख्यता और गौणता का भेद था । ( *‘प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च’* के बाद ६ वाक्य और हैं)”_
*।। इति नवमोऽनुवाकः ।।*
*💥शम्💥*
🔥
🚩 See less— with गौरव कुमार लूम्ब बागपत.

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