Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

तपस्विनी

मीरा ने फोन पर बताया डॉ सिन्हा नही रहीं तो दिल धक्क रह गया.. बुखार आया था.. दो दिन बाद चल बसीं।
मैं अतीत के समुद्र में डूब गयी।

“तुम एक बार मेरा कहना नही मान सकती क्या? शहर की सारी गायनोकोलॉजिस्ट को तो दिखा चुकी हो .. डॉ सिन्हा के पास भी तो जाकर देखो ” मीरा झल्ला कर बोली।
मैं अपने यूरिन इंफेक्शन को लेकर काफी परेशान थी ..मोटे मोटे कैप्सूल निगल कर भी पीड़ा से तड़प जाती थी।

“ठीक है! चलो अब की बार तुम्हारी बात भी मान लेती हूँ। ” एक मोटा कैप्सूल निगल कर पीड़ा को शांत करते हुए मैं बोली

मैं डॉ सिन्हा के सामने थी ,करीब पचहत्तर वर्ष की उम्र.. गौरवर्णी , आँखों पर नजर का चश्मा.. श्वेत केश ,श्वेत धोती का सिर पर पल्ला ले कर कोई किताब पढ़ रही थीं।

अभिवादन का जवाब देकर बैठने का इशारा किया।सारी रिपोर्ट देखने के बाद बोलीं “बस यह टेस्ट और करा लो सब पता चल जायेगा।”
मैं फीस देने लगी
“अरे भाई !इलाज तो हो जाने दो।”डॉ सिन्हा मुस्कराकर बोली

टेस्ट की रिपोर्ट ले कर पहुँची तो डॉ सिन्हा बोलीं “तुम्हारे गर्भाशय में टी. बी.हो गयी है..”
मुझे पसीने से नहाया देख कर आश्वस्त करने लगी”अरे !घबराओ मत ,अभी तो शुरुआत है …शुक्र मनाओ कि जल्दी पता चल गया.. देर हो जाती तो तब मुश्किल की बात थी ..मैंने दवाई लिख दी है किसी भी कैमिस्ट से खरीद लेना, नौ महीने दवाई खाओगी ठीक हो जाओगी …बस बीच बीच मे आकर दिखा जाना।”

मैं घबराऊँ ना इसलिए वह मुझसे बातें करने लगी।

“मेरे पिता जी तो मुझे डाक्टर बनाने को तैयार नही थे पर मेरी जिद के सामने उनकी एक न चली.. मैंने लाहौर से एम. बी. बी. एस.किया फिर देश के बंटवारे के बाद हम लखनऊ आ गये वहाँ के मेडिकल कॉलेज से एम. डी. किया..मेरी शादी में नाममात्र को दिलचस्पी नही थी.. “

“आप तो काफी प्रतिभाशाली और जिद्दी थीं इसका मतलब.. ” घबराहट कम होने के कारण मैं भी उनके साथ खुल गयी।

“हाँ ! मैं बहुत जिद्दी थी..मेरी भाभी छह साल से निसंतान थी ..भाई बोले ‘तेरी डॉक्टरी को तो मैं तब मानूँगा जब तू अपनी भाभी को माँ बना दे ‘
मैंने भी भाभी और भाई का इलाज करके उन्हें संतान का सुख दिया।”हँस कर बोली।

“यह तो चुनौती दे दी आपके भाई ने आपको “मैं बोली।

” चुनौतियां ही तो अच्छी लगती है मुझे, मैंने इसी काम को आगे बढ़ाया.. कोई औरत, माँ बन जाये इससे बढ़िया क्या बात है बोलो ..”

“हाँ ! ये तो बिल्कुल सही कह रही है आप” मैंने कहा

” अच्छा बताओ !आज खाने में तुमने क्या बनाया है ..? डॉ सिन्हा ने पूछा

“साबुत उरद और राजमा..” मैंने बताया

“अरे वाह ! हमारी माँ बनाया करती थी.. सुबह भिगो देती थीं ,शाम को खाना बना कर मिट्टी की हांडी को चूल्हे पर चढ़ा देती थी उसके ढक्कन को आटे से चिपका देती थी.. सारी रात धीमी आँच पर उबलते रहते थे..फिर सुबह सिल पर मसाला पीस कर बनाती थी बहुत स्वाद था मेरी माँ के हाथों में.. ” माँ की यादों में डूबती उतराती डॉ सिन्हा बोली।

“हाँ जी! माँ के हाथ की तो बात ही कुछ और होती है।”मैं बोली

“माँ की बहुत याद आती है। ” एक शबनमी उदासी डॉ सिन्हा चेहरे पर उतर आई।

” ठीक है.. अब जब भी आया करूँगी आप के लिए कुछ न कुछ अच्छा सा बना कर ले आया करूँगी ..आप अकेली रहती है क्या इतने बड़े घर मे ?”

“फिर तो यही मेरी फीस हो जाएगी वैसे गुलिस्तां भी बहुत अच्छा खाना बनाती है” हँस कर बोली डॉ सिन्हा..
“घर किराये पर दे रखा जो भी किराया आता है उसे अनाथालय को दे देती हूँ मेरे लिए तो पेंशन ही काफी है। “

तभी मोबाइल बजा, देखा मीरा थी.. हम दोनों डॉ सिन्हा के निवास पर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित कर रहे थे।

दीप्ति सिंह (स्वरचित ,मौलिक )

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