Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

दुद्धा, एक देशभक्त

एक बार महाराणा प्रताप पुंगाकी पहाडी बस्तीमें ठहरे हुए थे । बस्तीके भील बारी-बारीसे प्रतिदिन राणा प्रतापके लिए भोजन पहुंचाया करते थे ।

इसी कडीमें आज दुद्धाकी बारी थी; परन्तु उसके घरमें अन्नका एक दाना भी नहीं था ।

दुद्धाकी मां पडोससे आटा मांगकर ले आई और रोटियां बनाकर दुद्धाको देते हुए बोली, “ले ! यह पोटली महाराणाको दे आ ।”

दुद्धाने प्रसन्नतापूर्वक वह पोटली उठाई और पहाडीपर दौडते-भागते मार्ग नापने लगा ।

घेराबन्दी किए बैठे अकबरके सैनिकोंको दुद्धाको देखकर शंका हुई ।

एकने पूछा, “क्यों रे ! इतनी शीघ्रतासे कहां भागा जा रहा है ?”

दुद्धाने बिना कोई उत्तर दिए, अपनी चाल बढा दी । मुगल सैनिक उसे पकडनेके लिए उसके पीछे भागने लगा; परन्तु उस चपल-चंचल बालकका पीछा वह सैनिक नहीं कर पा रहा था ।

दौडते-दौडते वह एक चट्टानसे टकराया और गिर पडा, इस क्रोधमें उस सैनिकने अपनी ‘तलवार’ चला दी ।

‘तलवार’के वारसे बालककी नन्हीं कलाई कटकर गिर गई । रक्त फूटकर बह निकला; परन्तु उस बालकका साहस देखिए, नीचे गिर पडी रोटीकी पोटली उसने दूसरे हाथसे उठाई और पुनः सरपट दौडने लगा । बस, उसे तो एक ही धुन थी कि कैसे भी करके महाराणातक रोटियां पहुंचानी हैं ।

रक्त बहुत बह चुका था, अब दुद्धाकी आंखोंके समक्ष अन्धकार छाने लगा ।

उसने चाल और तीव्र कर दी, जंगलकी झाडियोंमें लुप्त हो गया । सैनिक अचम्भित रह गए कि कौन था यह बालक ?

जिस गुफामें राणा सपरिवार थे, वहां पहुंचकर दुद्धा चकराकर गिर पडा । उसने एक बार और शक्ति बटोरी और बोला, “राणाजी !”

स्वर सुनकर महाराणा बाहर आए, एक कटी कलाई और एक हाथमें रोटीकी पोटली लिए रक्तसे लथपथ १२ वर्षका बालक युद्धभूमिके किसी भैरवसे कम नहीं लग रहा था ।

राणाने उसका सिर गोदमें ले लिया और पानीके छींटे मारकर चेतनामें ले आए, टूटे शब्दोंमें दुद्धाने इतना ही कहा, “राणाजी ! …ये… रोटियां… मांने.. भेजी हैं ।”

लौह (फौलादी) प्रण और तनवाले राणाकी आंखोंसे शोकका झरना फूट पडा। वह बस इतना ही कह सके, “बेटा, तुम्हें इतने बडे संकटमें पडनेकी क्या आवश्यकता थी ?”

वीर दुद्धाने कहा, “अन्नदाता !…. आप तो पूरे परिवारके साथ… संकटमें हैं …. मां कहती है, आप चाहते तो अकबरसे ‘समझौता’कर सुखसे रह सकते थे; परन्तु आपने धर्म और संस्कृति रक्षाके लिए कितना बडा त्याग किया, उसके आगे मेरा त्याग तो कुछ नहीं है ।”

इतना कहकर वीरगतिको प्राप्त हो गया दुद्धा ।

राणाजीकी आंखोंमेंं अश्रु थे । मनमें कहने लगे, “धन्य है तेरी देशभक्ति, तू अमर रहेगा, मेरे बालक । तू अमर रहेगा ।”

अरावलीकी चट्टानोंपर वीरताकी यह कहानी आज भी देशभक्तिका उदाहरण बनकर बिखरी हुई है ।

रवि कांत

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