Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

क्या योग शारीरिक व्यायाम मात्र है? आज के समय में योग को मात्र व्यायाम की तरह प्रस्तुत किया जाता है ।पर क्या वास्तव में ऐसा है? नहीं ,आइए जानते हैं!

वेद तीन कांडों में विभक्त है यथा- कर्मकांड ,उपासना कांड, और ज्ञान कांड ।

वेद के कर्मकांड के अनुसार सुकौशल कर्म को योग कहते हैं ।
वेद के उपासना कांड के अनुसार चित्तवृत्ति निरोध को योग कहते हैं।
वेद के ज्ञान कांड के अनुसार जीवात्मा और परमात्मा के एकीकरण को योग कहते हैं।

योग तत्ववेता पूज्यपाद महर्षियों ने योग साधना की 4 स्वतंत्र शैलियों का उपदेश दिया है और योग मार्ग से ब्रह्म की शरण में पहुंचने के लिए 8 सीढ़ियां बताई है।
चार योग साधन शैलियों के नाम है- मंत्र योग, हठयोग ,लय योग ,राजयोग। योग की आठ सीढ़ियों के नाम हैं- यम ,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार ,धारणा ,ध्यान और समाधि।

मंत्र योग का सिद्धांत यह है कि यह संसार नामरूपात्मक है । नाम और रूप से ही जीव अविद्या में फस कर जकड़ा रहता है तो नाम और रूप के ही अवलंबन से मुक्त भी हो सकता है ।मंत्र योग के ध्यान को स्थूलध्यान कहते हैं ।यह ध्यान पंच सगुण उपासना व अवतार उपासना के अनुसार कई प्रकार का होता है ।मंत्र योग की समाधि को महा भाव समाधि कहते हैं।

हठयोग का सिद्धांत यह है कि स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर एक ही भाव में गुथा हुआ है और एक का प्रभाव दूसरे पर पूरा बना रहता है ।स्थूल शरीर को अपने अधीन कर सूक्ष्म शरीर को आधीन करते हुए योग की प्राप्ति करने को हठ योग कहते हैं। हठयोग के ध्यान को ज्योति ध्यान कहते हैं और प्राण के निरोध से होने वाली हठयोग की समाधि महाबोधि समाधि कहलाती है ।

लय योग का सिद्धांत यह है कि ब्रह्मांड की प्रति कृति मानव पिंड है। लय योग के ध्यान को बिंदु ध्यान और योग की समाधि को महालय समाधि कहते हैं।

राजयोग अन्य 3 योगों की चरम सीमा है उसका सिद्धांत यह है कि मन, बुद्धि ,चित्त और अहंकार से प्रभावित अंतःकरण ही जीव के बंधन का कारण और मुक्ति का भी कारण है। राज योग के ध्यान को ब्रह्म ध्यान और राजयोग की समाधि निर्विकल्प समाधि कहलाती है ।

अब संक्षेप में योग की 8 सीढ़ियों के बारे में जान लेते हैं बहिर इंद्रियों पर आधिपत्य जमाने के साधनों को यम कहते हैं।
अंतर इंद्रियों को पर आधिपत्य जमाने के साधनों को नियम कहते हैं।
स्थूल शरीर को योग के उपयोगी बनाने के साधनों को आसन कहते हैं ।
शरीर के प्राण को योग उपयोगी बनाने के साधनों को प्राणायाम कहते हैं।
बहिर्मुख मन को अंतर मुख करने के साधनों को प्रत्याहार कहते हैं।
प्रत्याहार से ही अंतरंग साधन प्रारंभ होता है ।

अंतर जगत में ले जाकर मन को एक स्थान में ठहराने के साधनों को धारणा कहते हैं।
अंतर जगत में ठहरने का अभ्यास प्राप्त करते हुए अपने इष्ट देव ,ज्योतिर्मयी रूप ,बिंदु में ,निर्गुण सच्चिदानंद रूप जिसका जैसा अधिकार हो उसी इष्ट देव को केवल ध्येय बना कर जगत के भूल जाने को ध्यान कहते हैं।
परमात्मा में अपने जीव भाव के मिला देने को समाधि कहते हैं ।

यही सब जीव हितकारी ,सब संप्रदाय के अनुयायियों, सब प्रकार के उपासकों और सब प्रकार के साधकों के परम हितकर योग का संक्षिप्त विज्ञान है।

देवऋषि

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