Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌼 प्रकृति प्रेम 🌼
टी एन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। तब एक बार वे उत्तर प्रदेश की यात्रा पर गए। उनके साथ उनकी पत्नी भी थीं। रास्ते में एक बाग के पास वे लोग रुके। बाग के पेड़ पर ‘बया’ पक्षियों के घोंसले थे। उनकी पत्नी ने कहा, “दो घोंसले मँगवा दीजिए, मैं इन्हें घर की सज्जा के लिए ले चलूंगी।”

उन्होंने, साथ चल रहे पुलिस वालों से घोंसला लाने के लिए कहा। पुलिस वाले, वहीं पास में गाय चरा रहे एक बालक से पेड़ पर चढ़कर घोंसला लाने के बदले दस रुपये देने की बात कही, लेकिन वह लड़का घोंसला तोड़ कर लाने को तैयार नहीं हुआ।

टी एन शेषन ने, उसे दस की जगह पचास रुपए देने की बात कही, फिर भी वह लड़का तैयार नहीं हुआ।

उसने शेषन से कहा, “साहब जी, घोंसले में चिड़िया के बच्चे हैं, शाम को जब चिड़िया भोजन लेकर आएगी, तब अपने बच्चों को न देख कर बहुत दुखी होगी, इसलिए आप चाहे जितना पैसा दें, मैं घोंसला नहीं तोड़ पाऊँगा!”

इस घटना के बाद टी.एन. शेषन को आजीवन यह ग्लानि रही कि जो एक चरवाहा बालक सोच सका और उसके अन्दर जैसी संवेदनशीलता थी, इतने पढ़े-लिखे और आईएएस होने के बाद भी, वे वह बात क्यों नहीं सोच सके? उनके अन्दर वह संवेदना क्यों नहीं उत्पन्न हुई?

उन्होंने कहा कि उस छोटे बालक के सामने मेरा पद और मेरा आईएएस होना गायब हो गया। मैं उसके सामने एक सरसों के बीज के समान हो गया। शिक्षा, पद और सामाजिक स्थिति मानवता के मापदण्ड नहीं हैं।

‘प्रकृति को जानना’ ही ज्ञान है। बहुत-सी ‘सूचनाओं के संग्रह’ से कुछ नहीं प्राप्त होता। जीवन तभी आनंददायक होता है, जब ज्ञान, संवेदना और बुद्धिमत्ता हो।

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