Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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=== नफरत का बोझ ===

बहुत पुरानी कथा है। एक बार एक गुरु ने अपने सभी शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बड़े-बड़े आलू साथ लेकर आएं।

उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए, जिससे वे नफरत करते हैं।
जो शिष्य जितने व्यक्तियों से घृणा करता है, वह उतने आलू लेकर आए।

अगले दिन सभी शिष्य आलू लेकर आए। किसी के पास चार आलू थे तो किसी के पास छह।
गुरु ने कहा कि अगले सात दिनों तक ये आलू वे अपने साथ रखें। जहां भी जाएं, खाते-पीते, सोते-जागते, ये आलू सदैव साथ रहने चाहिए। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन वे क्या करते, गुरु का आदेश था।

दो-चार दिनों के बाद ही शिष्य आलुओं की बदबू से परेशान हो गए। जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताए और गुरु के पास पहुंचे। सबने बताया कि वे उन सड़े आलुओं से परेशान हो गए हैं।

गुरु ने कहा – यह सब मैंने आपको शिक्षा देने के लिए किया था। जब सात दिनों में आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से नफरत करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर रहता होगा।

यह नफरत आपके मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, जिसके कारण आपके मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक इन आलुओं की तरह।

इसलिए अपने मन से गलत भावनाओं को निकाल दो, यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत तो मत करो। इससे आपका मन स्वच्छ और हल्का रहेगा।🙏 🙏

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—– मेहनत की रोटी —–

“देखो, देखो, वो भी हमारी तरह भिखमंगा ही लगता है | देखो, किस शान से न्यूज़पेपर पढ़ रहा है ! चलो मित्रों, चलते हैं उसके पास|” सभी भिखमंगे एक साथ उस लड़के के पास पहुँचे|
“तुम भीख मांगते हो पेट भरने के लिए या पेपर खरीद कर पढ़ने के लिए?” एक ने लड़के से पूछा |
दूसरे ने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा, “शौक़ीन लगता है। भीख मांग कर अपना शौक पूरा कर रहा है, हा..हा..हा..|”
“हाँ.. पेट भरने के लिए कुछ तो करना पड़ता है ! छोटी प्राइवेट कंपनी में नौकरी थी, छूट गई। अनाथ हूँ, आजन्म रोड से गहरा नाता रहा है, यहीं खेलकूद कर बड़ा हुआ हूँ।“ लड़के ने हँसते हुए जवाब दिया |
”बहुत अच्छा किया, जो इधर आ गया। यह धंधा आजकल बहुत फल-फूल रहा है । बिना हाथ-पैर डुलाए आराम से पेट भर जाता है|न आगे नाथ .. न पीछे पगहा, हमारी तरह रहो। हम दिन में भीख मांगते हैं और रात में अपनी मर्जी का जीते हैं |” भिखमंगे लड़के से बोले।
“सुनो, भीख माँग कर खाना अच्छी बात नहीं है, भीख देते वक्त लोग हिकारत भरी नजरों से घूरते हैं |” लड़के ने तपाक से जबाब दिया |
“अच्छा…बता, फिर तू रोड के किनारे बैठकर, रोज क्या करते रहता है?” भिखमंगे ने उपहास करते हुए पूछा ।
“दिन में बैठकर यहाँ पढ़ाई करता हूँ और शाम से ट्यूशन पढ़ाता हूँ।” पेपर समेटते हुए लड़का जोर से हँसने लगा ।
“अरे… तू हँसता बहुत है।” एक साथ कई आवाजें …
” हाँ दोस्त, जिंदगी का इम्तिहान है, हँस कर देने में ही भला है।” कहते हुए लड़का वहाँ से चल पड़ा। ----- मिन्नी मिश्रा

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કુંદનીકાબેન કાપડિયા દ્વારા અનુવાદિત એક બુકલેટ વાંચેલી..
.
એમની શબ્દ પ્રસ્તુતિ તો કંઈ ઓર જ હોય
પણ
મને એમાંથી જેટલું યાદ છે એટલું અહીં મારા શબ્દોમાં મુકું છું..
👇🏼
યુરોપનાં એક દેશની આ વાત છે.

બે યુવાન ભાઈ-બહેન,
માતા-પિતા અઢળક સંપત્તિ મૂકીને સ્વર્ગવાસી થયા હતાં એટલે,
મહેલ સમા મકાનમાં, કોઈપણ અભાવ વગરનું જીવન જીવતા હતાં.
બન્ને વચ્ચે ખૂબ જ પ્રેમ
અને
ક્યારેય, કોઈપણ સંજોગોમાં એકબીજાનું ખરાબ ન ઈચ્છે..
ખૂબ સંતોષ, શાંતિ, સમજણ અને સમતાથી રહેતા હતા.
.
યુવાની ભરપૂર..
એમાં
બહેનને એક અતિસમાન્ય બેન્ક ક્લાર્ક સાથે પ્રેમ થયો
અને
લગ્ન પણ કર્યા.
પરંતુ,
માતા-પિતા બહુ જ ટ્રેડિશનલ અને ઉચ્ચવર્ણીય સંકુચિત માનસિકતા ધરાવતા હતા
એટલે
મરતી વખતે સંપત્તિને લગતો એક ક્લોઝ લખીને ગયા હતાં
કે
“જો આ ભાઈ-બહેનમાંથી કોઈપણ, પોતાનાથી નીચી કેટેગરીના વ્યક્તિ સાથે લગ્ન કરશે તો એણે સંપત્તિથી બે-દખલ થવું પડશે; સંપત્તિ પર એનો કોઈ અધિકાર નહીં રહે !”
.
બહેનને આ પણ મંજુર હતું અને ભાઈએ પણ બહેનની ખુશીને માન આપ્યું.
માતા-પિતાના વિલમાં તો કોઈ ફેરફાર શક્ય નહોતો
એટલે
ભાઈએ પોતાનું સ્વતંત્ર વિલ કરી નાંખ્યું કે પોતે હયાત ન રહે તો તમામ સંપત્તિ પોતાની બહેનને મળે.
.
બહેનના પતિનો,
અતિસમાન્ય એવો વન બેડ હોલ કિચનનો ફ્લેટ હતો.
બહેન ખુશીથી એમાં રહેવા ગઈ.
પણ,
એ ફ્લેટની બારીમાંથી પેલા ભાઈનું મહેલનુમા મકાન સામે જ દેખાતું.
.
બહેન પોતાના જીવનથી સંતુષ્ટ હતી. કોઈ ફરિયાદ નહોતી
પણ,
રોજ સવારે ઉઠીને સૌ પ્રથમ એ બારીમાંથી ભાઈનું મકાન જુએ અને મનમાં વિચાર કરે, ઈશ્વરને પ્રાર્થના કરે
કે
“મને પણ આવા મકાનમાં રહેવાનું મળે તો કેટલું સારું ! હે ભગવાન, મને ~કોઈપણ ભોગે~ આવું મકાન આપ..
.
ભગવાને એની પ્રાર્થના સાંભળી..!!
.
એનો યુવાન ભાઈ..
કે જેને એ પોતાના જીવથી વધારે વ્હાલ કરતી હતી તે..
એક માર્ગ અકસ્માતમાં અકાળે મૃત્યુ પામ્યો !
અને
બહેનને મરેલા વહાલસોયા ભાઈનાં વિલ પ્રમાણે એ મહેલ રહેવા માટે વારસામાં મળ્યો..!!
.
લાડકવાયો ભાઈ ગુમાવ્યો અને મહેલ મેળવ્યો..
.
.
આમાં ભૂલ ક્યાં થઈ ?
.
એવું તે શું થયું કે ભાઈનાં મૃત્યુ જેવી હ્રદયવિદારક ઘટના બહેને જોવી પડી ??
.
લેખક લખે છે
કે
ભૂલ બહેનની “માંગવાની પદ્ધતિમાં” હતી !!
.
એ ઈશ્વર પાસે માંગતી એ અજુગતું કે ગેરવ્યાજબી નહોતું
પણ,
એક શબ્દ જે એ બોલતી તે..
“કોઈપણ ભોગે” મને આ મળે..
એ ખોટો હતો.
.
ભોગ લેવાયો..
અને મળ્યું..!!!
.
દોસ્તો,
ઈશ્વર પાસે હૃદયપૂર્વક જે માંગશો

ચોક્ક્સ મળશે જ..
પણ,
માંગતી વખતેની પદ્ધતિનો ખાસ ખ્યાલ રાખવો.
માંગતી વખતે એક શબ્દ ખાસ ઉમેરવો
કે
મને મારી પાત્રતા મુજબ સંપૂર્ણ કલ્યાણમય રીતે જે તે વસ્તુ પ્રાપ્ત થાય..
.
પાત્રતા અને કલ્યાણમય રીતે આ બે શબ્દો અગત્યનાં છે.
નહીંતર,
ઇચ્છિત વસ્તુ મળશે તો ખરી
પણ
ઈશ્વરને મરજી હોય એવા “કોઈપણ ભોગે” મળશે !
.
એટલે જ આપણાં પૂર્વજોએ આપણી સંસ્કૃતિ અને આપણાં સંસ્કારમાં આ વાત વણી લીધી છે
કે
।। “विश्वानि देवा:, यद भद्र तन्न आसुव” ।।
અર્થાત :
હે વિશ્વનાં પાલનહાર, દશે દિશાઓમાંથી જે કંઈ કલ્યાણમય છે, તે અમને પ્રાપ્ત થાઓ..
.
કોઈપણ વસ્તુ કે પરિસ્થિતિનો એવો લોભ કે એવી લાલચ ન હોવી જોઈએ કે જે કોઈપણ ભોગે મળે એવી લાલસા થાય.
.
અતિ ક્ષણિક એવા ભૌતિક સુખોની લાલસામાં આપણે આપણી વિવેકબુદ્ધિ નેવે મૂકી ને વસ્તુ/લાભ પાછળ આંધળાભીંત થઈને દોડતા હોઈએ છીએ
અને
પરમ સુખની બદલે ઈશ્વર પાસે એવા ક્ષુલ્લક સુખોની કાકલૂદી કરતા હોઈએ છીએ !
.
એક સમયે ગોંડલમાં રહેલા શાયર મંશા સાહેબ લખે છે
કે
मांगने से दुआओं का भरम टूटता है, मांगना हो तो फकत हाथ उठाये रखिये ।
(ઈશ્વર એની મેળે – આપણી પાત્રતા મુજબ જરૂર આપશે)
.
.
સૌને એડવાન્સમાં,
જગદગુરુ યોગેશ્વર ભગવાન શ્રીકૃષ્ણનાં જન્મોત્સવની શુભકામનાઓ..🌹🙏
.
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।
.
– ઉત્ત્પલ દવે 🙏

— જન્માષ્ટમી પર્વ નિમિત્તે પારિવારીક મિત્ર શ્રી પરાગભાઈ મનસુખલાલભાઈ પુરોહિત તરફથી પ્રાપ્ત મનનીય સંદેશ…. 🙏🏻🙏🏻🌹🙏🏻🙏🏻

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—– मुर्गी को किसने मारा —–

“सरपंच साहब न्याय कीजिये.. आपके राज में हम दलितों की कोई सुरक्षा नहीं है? अगडा दामू मेरी मुर्गी को मार कर खा गया! “-राघोडा हरिजन दुहाई दे रहा था। सरपंच ने जर्दा,चूना,और सुपारी को एक हाथ की अंगूली से दूसरे हाथ की हथेली में रगड़ा और फांक कर बोला-” क्या यह सच हे दामू? “
“बिल्कुल झूठ है माईबाप !मैने नहीं मारा इसकी मुर्गी को! “-दामू अकड़ कर बोला।
“राघोडा तुम्हारे पास कोई गवाह या सबूत है? “-सरपंच ने चश्मा ठीक करते हुऐ पूछा।
“हजूर शामू के छोरे ने देखा था !”-राघोडा बोला
“बुलाओ छोकरे को! “-सरपंच ने हुकम सुनाया।
“हुजूर मैने तो मुर्गी की लाश और वहां दामू को खड़े देखा था। छुरा एक तरफ पड़ा था। “-शामू का छोरा बोला।
“छुरा किसका था? “-सरपंच ने आंखें मिचमिचाई।
“छुरा तो मेरा ही था माईबाप… वह तो बाहर छज्जे पर रखा था.. कोई भी उठा सकता है !”-राघोडा ने सफाई दी।
“तो किसने भी मुर्गी को मारते हुऐ नहीं देखा? मरी हुई मुर्गी कहां गई? -सरपंच ने पूछा।
“हुकम मुर्गी मरी पडी थी.. मैं घर ले गया और हमने पका कर खा लिया। “-दामू ने मिमियाते हुए कहा।
सरपंच ने सभी पंचो से सलाह करी और फिर फैसला सुनाया-“चूंकी मुर्गी को मारते हुए किसी ने नहीं देखा इसलिए अनुमान के आधार पर दोषी नहीं ठहरा सकते। हथियार भी राघोडा का था इसलिए यहां भी शंका की गुंजाइश है। कोई नहीं जानता मुर्गी को किसने मारा ? परन्तु दामू का दोष यह है कि वह मुर्गी को अकेले अकेले खा गया। सडक पर पडी मुर्गी सार्वजनिक है इसलिए हमारे साथ मिल बांट कर खाना चाहिए था।अतःउसकी सजा है कि वह पंचायत को उसके खर्चे पर मुर्गी खाने की दावत दे। यह केस किसी को अपराधी न मानते हुए समाप्त किया जाता है। “
—– पदम गोधा

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एक बार एक छोटे राज्य पर एक बड़े राज्य ने आक्रमण कर दिया

उस राज्य के सेनापति ने राजा से कहा:- आक्रमणकारी सेना के पास बहुत संसाधन हैं और हमारे पास सेनाएं कम है, संसाधन कम है, हम जल्दी ही हार जायेंगे…….

बेकार में अपने सैनिक कटवाने का कोई मतलब नहीं, इस युद्ध में हम निश्चित हार जाएंगे और इतना कहकर सेनापति ने अपनी तलवार नीचे रख दी..

राजा घबरा गया कि अब क्या किया जाए❓ फिर बहुत सोच विचार कर वह अपने राज्य के एक बूढे फकीर के पास गया और उससे उसने सारी बातें बताई..
फकीर ने कहा:-
सबसे पहले उस सेनापति को फौरन हिरासत में ले लो औऱ उसे जेल भेज दो नहीं तो हार निश्चित है….
यदि किसी राज्य का सेनापति ऐसा सोचेगा तो सेना क्या करेंगी❓ क्योंकि आदमी जैसा सोचता है वैसा हो जाता है….

फिर राजा ने कहा:- तो युद्ध कौन करेगा❓

फकीर ने कहा:- मैं

फकीर बूढ़ा था,उसने कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा था और तो और वह कभी घोड़े पर भी कभी चढ़ा था….
उसके हाथ में सेना की बागडोर कैसे दे दे❓लेकिन राजा के पास कोई दूसरा चारा न था

बूढ़ा फकीर घोड़े पर सवार होकर सेना के आगे आगे चला….

रास्ते में पहाड़ी पर एक मंदिर था..

फकीर सेनापति वहां रुका और सेना से कहा कि पहले मंदिर के देवता से पूछ लेते हैं कि हम युद्ध में जीतेंगे या हारेंगे❓

सेना हैरान होकर पूछने लगी कि देवता कैसे बताएंगे और बताएंगे भी तो हम उनकी भाषा कैसे समझेंगे❓

बूढ़ा फकीर बोला:- ठहरो, मैंने आजीवन देवताओं से संवाद किया है , मैं कोई ना कोई हल निकाल लूंगा

फिर फकीर अकेले ही पहाड़ी पर चढा और कुछ देर बाद वापस लौट आया….

फकीर ने सेना को संबोधित करते हुए कहा:-
मंदिर के देवता ने मुझसे कहा है कि यदि रात में मंदिर से रौशनी निकलेगी तो समझ लेना कि दैवीय शक्ति तुम्हारे साथ है और युद्ध में अवश्य तुम्हारी जीत हासिल होगी……….
सभी सैनिक सांस रोके रात होने की प्रतीक्षा करने लगे……
रात हुई और उस अंधेरी रात में मंदिर से प्रकाश छन छन कर आने लगा…

सभी सैनिक जयघोष करने लगे और वे युद्ध स्थल की ओर कूच कर गए

15 दिन तक घनघोर युद्ध हुआ औऱ फिर सेना विजयी होकर लौटीं…

रास्ते में वह मंदिर पड़ता था….
जब मंदिर पास आया तो सेनाएं बूढ़े फकीर से बोली:- चलकर उस देवता को धन्यवाद दिया जाए जिनके आशीर्वाद से यह असम्भव सा युद्ध हमने जीता है

फ़कीर सेनापति बोला:- इसकी कोई जरूरत नहीं है

सेना बोली:- बड़े कृतघ्न मालूम पड़ते हैं आप, जिनके प्रताप औऱ आशीर्वाद से हमने इस भयंकर युद्ध को जीता उस देवता को धन्यवाद भी देना आपको मुनासिब नही लगता❓

तब बुजुर्ग फकीर ने कहा:-
वो दीपक मैंने ही जलाया था जिसकी रौशनी दिन के उजाले में तो तुम्हें नहीं दिखाई दिया पर रात्रि के घने अंधेरे में तुम्हें दिखाई दी…
तुम जीते क्योंकि तुम्हें जीत का ख्याल निश्चित हो गया था….
याद रखो ,जिसे हारने का डर है उसकी हार निश्चित है….!

वेद प्रकाश वर्मा

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एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गए!

हंसिनी ने हंस को कहा:- ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं❓ ना तो यहां जल है ना जंगल और ना ही ठंडी हवाएं हैं, यहां तो हमारा जीना मुश्किल हो जाएगा !😎

भटकते-भटकते शाम हो गई तो हंस ने हंसिनी से कहा :- किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !😃

रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।😎

वो जोर से चिल्लाने लगा।😃

हंसिनी ने हंस से कहा:- अरे यहां तो रात में सो भी नहीं सकते❓ये उल्लू चिल्ला रहा है। 😎

हंस ने फिर हंसिनी को समझाया:- किसी तरह रात काट लो,मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूं है ❓😎

ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।😎

पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।😃

सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और हंस से बोला:- हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ कर दो…. 😃
हंस ने कहा:- कोई बात नही भैया,आपका धन्यवाद!

यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा,पीछे से उल्लू चिल्लाया:-
अरे हंस, मेरी पत्नी को लेकर कहां जा रहे हो❓😃

हंस चौंका,उसने कहा:- आपकी पत्नी❓अरे भाई,यह हंसिनी है,मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!😎

उल्लू ने कहा:- खामोश रहो,ये मेरी पत्नी है।😃

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गए…

कई गावों की जनता बैठी,पंचायत बुलाई गई😎

पंचलोग भी आ गए,बोले:- भाई किस बात का विवाद है ❓😎

लोगों ने बताया:- उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है..,…!😃

लंबी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गए और बोले:-
भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है😃 लेकिन……
ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गांव से चले जाएंगे।
हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है,इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए….! 😎

फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा:-
सारे तथ्यों और सबूतों की जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गांव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है…..!😃😃

यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया है…. उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!😎

रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई:- ऐ मित्र हंस, रुको!😃

हंस ने रोते हुए कहा:- भैया, अब क्या करोगे❓ पत्नी तो तुमने ले ही ली,अब जान भी लोगे ❓😎

उल्लू ने कहा:- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी! 😃

लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहां उल्लू रहता है! 😎

मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहां उल्लू रहता है बल्कि…..
यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहां पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं….!😎
शायद हम भी….
अपने परिवार व समाज में गलत को गलत ना कहकर,मोहवश होकर गलत फैसले लेकर अपना मान सम्मान व अपना स्थान,जिसके हम हकदार हैं, वो प्राप्त नही कर पाते हैं…. 😎😎

वेद प्रकाश वर्मा

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चन्दन के कोयले न बनाओ

सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी का लोटा पीकर प्रसन्न हुआ राजा कहने लगा – हे पानी पिलाने वाले ! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा, लकड़हारे ने कहा – बहुत अच्छा।

इस घटना को घटे पर्याप्त समय व्यतीत हो गया, अन्ततः लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा – मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था, राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि- इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ ? अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल उद्यान(बाग) उसको सौंप दिया। लकड़हारा भी मन में प्रसन्न हो गया। चलो अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों के कोयले खूब होंगे, जीवन कट जाएगा।

यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन चन्दन काट-काटकर कोयले बनाने लगा और उन्हें बेचकर अपना पेट पालने लगा। थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर बगीचा एक वीरान बन गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।

राजा को एक दिन यूँ ही विचार आया। चलो, तनिक लकड़हारे का हाल देख आएँ। चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा। यह सोचकर राजा चन्दन के उद्यान की और जा निकला। उसने दूर से उद्यान से धुआँ उठते देखा। निकट आने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन जल रहा है और लकड़हारा पास खड़ा है। दूर से राजा को आते देखकर लकड़हारा उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ा। राजा ने आते ही कहा – भाई ! यह तूने क्या किया ? लकड़हारा बोला – आपकी कृपा से इतना समय आराम से कट गया। आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा कल्याण किया। कोयला बना-बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो कुछ ही वृक्ष रह गये हैं। यदि कोई और उद्यान मिल जाए तो शेष जीवन भी व्यतीत हो जाए।

राजा मुस्कुराया और कहा – अच्छा, मैं यहाँ खड़ा होता हूँ। तुम कोयला नहीं, प्रत्युत इस लकड़ी को ले-जाकर बाजार में बेच आओ। लकड़हारे ने दो गज [लगभग पौने दो मीटर] की लकड़ी उठाई और बाजार में ले गया। लोग चन्दन देखकर दौड़े और अन्ततः उसे तीन सौ रुपये मिल गये, जो कोयले से कई गुना ज्यादा थे, लकड़हारा मूल्य लेकर रोता हुआ राजा के पास आय और जोर-जोर से रोता हुआ अपनी भाग्यहीनता स्वीकार करने लगा।

मेरी कहानी यहीं रुक जाती है ।

इस कथा में चन्दन का बाग मनुष्य का शरीर और हमारा एक-एक श्वास चन्दन के वृक्ष हैं पर अज्ञानता वश हम इन चन्दन को कोयले में तब्दील कर रहे हैं। लोगों के साथ बैर, द्वेष, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, मनमुटाव, को लेकर खिंच-तान आदि की अग्नि में हम इस जीवन रूपी चन्दन को जला रहे हैं। जब अंत में स्वास रूपी चन्दन के पेड़ कम रह जायेंगे तब अहसास होगा कि व्यर्थ ही अनमोल चन्दन को इन तुच्छ कारणों से हम दो कौड़ी के कोयले में बदल रहे थे, पर अभी भी देर नहीं हुई है हमारे पास जो भी चन्दन के पेड़ बचे है उन्ही से नए पेड़ बन सकते हैं। आपसी प्रेम, सहायता, सौहार्द, शांति,भाईचारा, और विश्वास, के द्वारा अभी भी जीवन सँवारा जा सकता है।
🌳🌴🌳🌴🌳🌴🌳🌴🌳मौलिक, अप्रकाशित

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गंगा दशहरा


शुभ संध्या मित्रो !! 🙏 गंगा दशहरा के पावन अवसर पर 🍀 आइए पढ़ते हैं एक विशेष कथा 🕉

एक ब्राह्मण प्रयागराज से 5 कोस की दूरी पर रहता था । वह प्रत्येक संक्रांति के दिन स्नान करने के लिए प्रयाग में जाया करता था । माघ मास की संक्रांति के दिन तो वह अपने परिवारसहित अवश्य ही वहाँ जाता था ।

जब वह ब्राह्मण बूढ़ा और चलने में असमर्थ हो गया, तब एक बार माघ की संक्रांति आने पर उसने अपने पुत्र को बुलाकर कहा : ‘‘हे पुत्र ! तुम प्रयागराज जाओ, त्रिवेणी में स्नान करके मेरे लिए भी त्रिवेणी के जल की गागर भरकर लाना और संक्रांति के पुण्यकाल में मुझे स्नान कराना, देर मत करना ।

पिता के वचन का पालन करते हुए उसका पुत्र प्रयाग के लिए चल पड़ा । त्रिवेणी में स्नान कर जब वह जल से भरी गागर पिता के स्नान के लिए ला रहा था तो रास्ते में उसे एक प्रेत मिला । वह प्यास के कारण बहुत व्याकुल हो रहा था और गंगाजल पीने की इच्छा से रास्ते में पड़ा था ।

लड़के ने प्रेत से कहा : ‘‘मुझे रास्ता दो । प्रेत : ‘‘तुम कहाँ से आये हो ? तुम्हारे सिर पर क्या है ?
‘‘त्रिवेणी का जल है ।‘‘
“मैं इसी इच्छा से रास्ते में पड़ा हूँ कि कोई दयालु मुझे गंगाजल पिलाये तो मैं इस प्रेत-योनि से मुक्त हो जाऊँ क्योंकि मैंने गंगाजल का प्रभाव अपने नेत्रों से देखा है ।
‘‘क्या प्रभाव देखा है ?”

एक ब्राह्मण बड़ा विद्वान था । उसने शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय प्राप्त करके बहुत धन उपार्जित कर रखा था । लेकिन क्रोधवश उसने किसी ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण को मार दिया । उस पाप के कारण मरने पर वह ब्रह्मराक्षस हुआ और हमारे साथ 8 वर्षों तक रहा । 8 वर्षों के बाद उसके पुत्र ने उसकी हड्डियाँ लाकर श्रीगंगाजी के निर्मल तीर्थ कनखल में डालकर गंगाजी से प्रार्थना की : ‘हे पापनाशिनी गंगा माते ! मेरे पिता को सद्गति प्रदान कीजिये । तब तत्काल ही वह ब्राह्मण ब्रह्मराक्षस भाव से मुक्त हो गया ।

उसीने मरते समय मुझे गंगाजल का माहात्म्य सुनाया था । मैं उसको मुक्त हुआ देखकर गंगाजल-पान की इच्छा से यहाँ पड़ा हूँ । अतः मुझको भी गंगाजल पिलाकर मुक्त कर दे, तुझे महान पुण्य होगा ।

‘‘मैं लाचार हूँ क्योंकि मेरे पिता बीमार हैं और उनका संक्रांति के स्नान का नियम है । यदि मैंने यह गंगाजल तुझे पिला दिया तो स्नान के पुण्यकाल तक न पहुँचने के कारण मेरे पिता का नियम भंग हो जायेगा ।”
‘‘तुम्हारे पिता का नियम भी भंग न हो और मेरी भी सद्गति हो जाय, ऐसा उपाय करो । पहले मुझे जल पिला दो,फिर नेत्रबंद करने पर मैं तुम्हें तत्काल श्रीगंगाजी के तट पर पहुँचाकर,तुम्हारे पिता के पास पहुँचा दूँगा ।”

ब्राह्मणपुत्र ने प्रेत की दुर्दशा पर दया करके उसे जल पिला दिया । तब प्रेत ने कहा : ‘‘अब नेत्रबंद करो और त्रिवेणी का जल लिये हुए स्वयं को अपने पिता के पास पहुँचा हुआ पाओ । ब्राह्मणपुत्र ने नेत्रबंद किये, फिर देखा कि वह त्रिवेणी के जल से गागर भरकर पिताजी के पास पहुँच गया है ।

गंगाजी की महिमा के विषय में भगवान व्यासजी ‘पद्म पुराण में कहते हैं : ‘‘अविलंब सद्गति का उपाय सोचनेवाले सभी स्त्री-पुरुषों के लिए गंगाजी ही एक ऐसा तीर्थ हैं, जिनके दर्शनमात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।

भगवान शंकर नारदजी से कहते हैं : ‘‘समुद्रसहित पृथ्वी का दान करने से मनीषी पुरुष जो फल पाते हैं, वही फल गंगा-स्नान करनेवाले को सहज में प्राप्त हो जाता है । राजा भगीरथ ने भगवान शंकर की आराधना करके गंगाजी को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा था । जिस दिन वे गंगाजी को पृथ्वी पर लेकर आये वही दिन ‘गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है ।

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अरुण जेटली का एक प्रसंग
तब की बात है जब अरुण जेटली को दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे कुछ वर्ष बीत चुके थे और तब वह एकं परिचित चेहरा बन चुके थे। मै कमला नगर के बस स्टैंड पर खड़ा था , तभी एक कार आई और मेरे निकट पटड़ी को टक्कर मार कर रुक गयी । कार चालक बाहर नहीं आया, तभी एक नव युवक आया और उसने कार चालक से कुछ पूछना चाहा लेकिन वह धुत नशे में था,। यह अरुण जेटली थे ।
उन्होंने स्थिति को भांपा और ड्राइवर को साथ कि सीट पर खिसकने को कहा और घर का पता पूछा और सीधे उसे गाड़ी में स्वय चला कर ले गये ।
घटना कोई विशेष भले ही नहीं लगे लेकिन समस्या को सुलझाने के लिए वह नए विकल्प चुनते थे ।

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🙏🙏.शानदार फैसला.🙏🙏

“पापा जी ! पंचायत इकठ्ठी हो गई, अब बँटवारा कर दो।” रजिन्दर सिंह के बड़े लड़के ने रूखे लहजे में कहा।

“हाँ पापा जी ! कर दो बाँट बटव्वल अब इकठ्ठे नहीं रहा जाता” छोटे मनप्रीत ने भी उसी लहजे में कहा।

“जब साथ में निबाह न हो तो औलाद को अलग कर देना ही ठीक है, अब यह बताओ तुम किस बेटे के साथ रहोगे ?” सरपंच ने रजिन्दर सिंह के कन्धे पर हाथ रख कर के पूछा।

“अरे इसमें क्या पूछना, छ: महीने पापा जी मेरे साथ रहेंगे और छ: महीने छोटे के पास रहेंगे।”

” चलो तुम्हारा तो फैसला हो गया, अब करें जायदाद का बँटवारा !” सरपंच बोला।

रजिन्दर सिंह जो काफी देर से सिर झुकाये बैठा था, एकदम उठ के खड़ा हो गया और चिल्ला के बोला,

” कैसा फैसला हो गया, अब मैं करूंगा फैसला, इन दोनों लड़कों को घर से बाहर निकाल कर !,”

“छः महीने बारी बारी से आकर मेरे पास रहें, और छः महीने कहीं और इंतजाम करें अपना….”

“जायदाद का मालिक मैं हूँ यह नहीं।”

दोनों लड़कों और पंचायत का मुँह खुला का खुला रह गया, जैसे कोई नई बात हो गई हो…..🙏
🙏अब यहॉ तक आ ही गये हो तो हमारा पेज भी
लाईक कर दीजिए

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