Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

—– अहसास ——

रेवती व उनके पति ने नाश्ता ख़त्म ही किया था कि, बहू ने आकर पूछा, “मम्मी जी आज खाने में क्या बनवा लूँ?”

“ओह कमला आ गयी क्या?” रेवती ने पूछा।

“जी मम्मी जी ।” बहू ने बताया ।

“बहू तुम्हारे ससुर जी कल कढ़ी खाने का बोल रहे थे, वो बनवा लो और सब्ज़ी जो तुम्हारा मन हो बनवा लो ।” रेवती बोली ।

“तो फिर मम्मी जी गोभी की सब्ज़ी बनवा लेती हूँ, रोटी और चावल तो बनेंगे ही, और हाँ मम्मी जी कमला कुछ रुपए बढ़ाने का बोल रही थी, आप कहें तो २०० रुपए बढ़ा दूँ?” बहू बोली ।

“हाँ बहू बढ़ा दो, महँगाई कितनी बढ़ गयी है।” रेवती ने कहा।

“अच्छा मम्मी जी, मैं खाने का कमला को बताती हूँ, व आपके लिए व पापा जी के लिए दूध भिजवाती हूँ ।” ऐसा कह कर बहू चली गयी ।

बहू के जाते ही अब तक चुप बैठे रेवती के पति बोले, “ये बहू रोज़ खाने के लिए तुमसे क्यों पूछती है, बोल क्यों नहीं देती उससे, इतने अच्छे से सब संभालें है, खाना भी सबकी पसंद का बनवा लेगी !“

“मैं उसे इसलिए मना नहीं करती, क्योंकि उसका मुझसे पूछना मुझे घर में मेरे वजूद का अहसास करा जाता है ।” रेवती बोली ।

“तुम्हारी बातें तो मुझे समझ में ही नहीं आती ।” पति बोले ।

“हम स्त्रियों को इन छोटी-छोटी बातों में जो ख़ुशी मिलती है, उसे आप पुरुष कभी नहीं समझोगे ।” रेवती मुस्कुरा कर बोली ।

“तुम्हारी बातें तुम्हीं जानो।” ये कह कर पति ने अख़बार उठा लिया। ----- बरखा शुक्ला

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भाई इसलिए सबका DNA टेस्ट जरूरी है…..!

घटना महाराजा
रणजीत सिंह के समय की है…
एक गाय ने अपने सींग एक दीवार की बागड़ में कुछ ऐसे फंसाए की बहुत कोशिश के बाद भी वह उसे निकाल नही पा रही थी…
भीड़ इकट्ठी हो गई,लोग गाय को निकालने के लिए तरह तरह के सुझाव देने लगे ….
सबका ध्यान एक ही और था कि गाय को कोई कष्ट ना हो….
तभी एक व्यक्ति आया वो आते ही बोला कि गाय के सींग काट दो …
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
खैर घर के मालिक ने दीवार को गिराकर गाय को सुरक्षित निकाल लिया…
गौ माता के सुरक्षित निकल आने पर सभी प्रसन्न हुए, किन्तु गौ के सींग काटने की बात महाराजा तक पहुंची…
महाराजा ने उस व्यक्ति को तलब किया
उससे पूछा गया क्या नाम है तेरा?
व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए नाम बताया दुलीचन्द….
पिता का नाम –सोमचंद जो एक सिपाही था ,
और लड़ाई में मारा जा चुका था …
महाराजा ने उसकी अधेड़ माँ को बुलवाकर पूछा तो माँ ने भी यही सब दोहराया,किन्तु महाराजा असंतुष्ट थे….
उन्होंने जब उस महिला से सख्ती से पूछ ताछ करवाई तो पता चला कि उसका पति जब लड़ाई पर जाता था तब उसके अवैध संबंध उसके पड़ोसी समसुद्दीन से हो गए थे …अतः ये लड़का दुलीचंद उसी समसुद्दीन की औलाद है…
सोमचन्द
की नही…..
महाराजा का संदेह सही साबित हुआ…उन्होंने अपने दरबारियों से कहा कि कोई भी शुध्द सनातनी हिन्दू रक्त
अपनी संस्कृति,
अपनी मातृ भूमि,
और
अपनी गौ माता के अनीष्ट,अपमान
और
उसके पराभाव को सहन नही कर सकता…
जैसे ही
मैंने सुना कि दुलीचंद ने गाय के सींग काटने की बात की तभी मुझे यह अहसास हो गया था कि हो ना हो इसके रक्त में अशुद्धता आ गई है…
सोमचन्द की औलाद ऐसा नही सोच सकती तभी तो वह समसुद्दीन की औलाद निकला
आज भी हमारे समाज में
सन ऑफ सोमचन्द
की आड़ में
बहुत से
“सन ऑफ समसुद्दीन” घुस आए है …
जो अपनी हिन्दू सभ्यता संस्कृति पर आघात करते है …
और उसे देख कर खुश होते है…!

हरीश शर्मा

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एक बुढ़िया थी। वह बहुत ही ग़रीब और अंधी थीं। उसके एक बेटा और बहू थे। वह बुढ़िया सदैव गणेश जी की पूजा किया करती थी। एक दिन गणेश जी प्रकट होकर उस बुढ़िया से बोले-
‘बुढ़िया मां! तू जो चाहे सो मांग ले।’
बुढ़िया बोली- ‘मुझसे तो मांगना नहीं आता। कैसे और क्या मांगू?’
तब गणेशजी बोले – ‘अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग ले।’
तब बुढ़िया ने अपने बेटे से कहा- ‘गणेशजी कहते हैं ‘तू कुछ मांग ले’ बता मैं क्या मांगू?’
पुत्र ने कहा- ‘मां! तू धन मांग ले।’
बहू से पूछा तो बहू ने कहा- ‘नाती मांग ले।’
तब बुढ़िया ने सोचा कि ये तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं। अत: उस बुढ़िया ने पड़ोसिनों से पूछा, तो उन्होंने कहा- ‘बुढ़िया! तू तो थोड़े दिन जीएगी, क्यों तू धन मांगे और क्यों नाती मांगे। तू तो अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, जिससे तेरी ज़िन्दगी आराम से कट जाए।’

इस पर बुढ़िया बोली- ‘यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों की रोशनी दें, नाती दें, पोता, दें और सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।’
यह सुनकर तब गणेशजी बोले- ‘बुढ़िया मां! तुने तो हमें ठग दिया। फिर भी जो तूने मांगा है वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा।’ और यह कहकर गणेशजी अंतर्धान हो गए। उधर बुढ़िया माँ ने जो कुछ मांगा वह सबकुछ मिल गया। हे गणेशजी महाराज! जैसे तुमने उस बुढ़िया माँ को सबकुछ दिया, वैसे ही सबको देना

संगीता डावर

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लड्डू गोपाल की बहन की कथा…
मैं आ गया मेरी बहन………
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ब्रजमंडल क्षेत्र में एक जंगल के पास एक गाँव बसा था। जंगल के किनारे ही एक टूटी-फूटी झोपड़ी में एक सात वर्षीया बालिका अपनी बूढ़ी दादी के साथ रहा करती थी। जिसका नाम उसकी दादी ने बड़े प्रेम से चंदा रखा था।
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चंदा का उसकी दादी के अतिरिक्त और कोई सहारा नहीं था, उसके माता पिता की मृत्यु एक महामारी में उस समय हो गई थी जब चंदा की आयु मात्र दो वर्ष ही थी, तब से उसकी दादी ने ही उसका पालन-पोषण किया था।
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उस बूढ़ी स्त्री के पास भी कमाई का कोई साधन नहीं था इसलिए वह जंगल जाती और लकड़िया बीन कर उनको बेचती और उससे जो भी आय होती उससे ही उनका गुजारा चलता था।
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क्योंकि घर में और कोई नहीं था इसलिए दादी चंदा को भी अपने साथ जंगल ले जाती थी। दोनों दादी-पोती दिन भर जंगल में भटकते और संध्या होने से पहले घर वापस लौट आते … यही उनका प्रति दिन का नियम था।
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चंदा अपनी दादी के साथ बहुत प्रसन्न रहती थी, किन्तु उसको एक बात बहुत कचोटती थी कि उसका कोई भाई या बहन नहीं थे। गांव के बच्चे उसको इस बात के लिए बहुत चिढ़ाते थे तथा उसको अपने साथ भी नहीं खेलने देते थे, इससे वह बहुत दुःखी रहती थी।
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अनेक बार वह अपनी दादी से पूछती की उसका कोई भाई क्यों नहीं है। तब उसकी दादी उसको प्रेम से समझाती.. कौन कहता है कि तेरा कोई भाई नहीं है, वह है ना कृष्ण कन्हैया वही तेरा भाई है, यह कह कर दादी लड्डू गोपाल की और संकेत कर देती।
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चंदा की झोपडी में एक पुरानी किन्तु बहुत सुन्दर लड्डू गोपाल की प्रतीमा थी जो उसके दादा जी लाये थे। चंदा की दादी उनकी बड़े मन से सेवा किया करती थी। बहुत प्रेम से उनकी पूजा करती और उनको भोग लगाती।
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निर्धन स्त्री पकवान मिष्ठान कहाँ से लाये जो उनके खाने के लिए रुखा सूखा होता वही पहले भगवान को भोग लगाती फिर चंदा के साथ बैठ कर खुद खाती। चंदा के प्रश्न सुनकर वह उस लड्डू गोपाल की और ही संकेत कर देती।
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बालमन चंदा लड्डू गोपाल को ही अपना भाई मानने लगी। वह जब दुःखी होती तो लड्डू गोपाल के सम्मुख बैठ कर उनसे बात करने लगती और कहती की भाई तुम मेरे साथ खेलने क्यों नहीं आते, सब बच्चे मुझ को चिढ़ाते है…
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मेरा उपहास करते है, मुझको अपने साथ भी नहीं खिलाते, में अकेली रहती हूँ, तुम क्यों नहीं आते। क्या तुम मुझ से रूठ गए हो, जो एक बार भी घर नहीं आते, मैने तो तुम को कभी देखा भी नहीं।
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अपनी बाल कल्पनाओं में खोई चंदा लड्डू गोपाल से अपने मन का सारा दुःख कह देती। चंदा का प्रेम निश्च्छल था, वह अपने भाई को पुकारती थी। उसके प्रेम के आगे भगवान भी नतमस्तक हो जाते थे, किन्तु उन्होंने कभी कोई उत्तर नहीं दिया।
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एक दिन चंदा ने अपनी दादी से पूछा.. दादी मेरे भाई घर क्यों नहीं आते, वह कहाँ रहते हैं। तब दादी ने उसको टालने के उद्देश्य से कहा तेरा भाई जंगल में रहता है, एक दिन वह अवश्य आएगा।
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चंदा ने पूछा क्या उसको जंगल में डर नहीं लगता, वह जंगल में क्यों रहता है। तब दादी ने उत्तर दिया नहीं वह किसी से नहीं डरता, उसको गांव में अच्छा नहीं लगता इसलिए वह जंगल में रहता है।
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धीर-धीरे रक्षा बंधन का दिन निकट आने लगा, गाँव में सभी लड़कियों ने अपने भाइयों के लिए राखियां खरीदी, वह चंदा को चिढ़ाने लगी कि तेरा तो कोई भाई नहीं तू किसको राखी बंधेगी।
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अब चंदा का सब्र टूट गया वह घर आकर जोर जोर से रोने लगी, दादी के पूंछने पर उसने सारी बात बताई, तब उसकी दादी भी बहुत दुःखी हुई उसने चंदा को प्यार से समझाया कि मेरी बच्ची तू रो मत, तेरा भाई अवश्य आएगा,
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किन्तु चंदा का रोना नहीं रुका वह लड्डू गोपाल की प्रतिमा के पास जाकर उससे लिपट कर जोर-जोर से रोने लगी और बोली की भाई तुम आते क्यों नहीं, सब भाई अपनी बहन से राखी बंधवाते हैं, फिर तुम क्यों नहीं आते।
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उधर गोविन्द चंदा की समस्त चेष्टाओं के साक्षी बन रहे थे। रोते-रोते चंदा को याद आया कि दादी ने कहा था कि उसका भाई जंगल में रहता है, बस फिर क्या था वह दादी को बिना बताए नंगे पाँव ही जंगल की और दौड़ पड़ी, उसने मन में ठान लिया था कि वह आज अपने भाई को लेकर ही आएगी।
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जंगल की काँटों भरी राह पर वह मासूम दौड़ी जा रही थी, श्री गोविन्द उसके साक्षी बन रहे थे। तभी श्री हरी गोविन्द पीढ़ा से कराह उठे उनके पांव से रक्त बह निकला, आखिर हो भी क्यों ना श्री हरी का कोई भक्त पीढ़ा में हो और भगवान को पीड़ा ना हो यह कैसे संभव है, जंगल में नन्ही चंदा के पाँव में काँटा लगा तो भगवान भी पीढ़ा कराह उठे।
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उधर चंदा के पैर में भी रक्त बह निकला वह वही बैठ कर रोने लगी, तभी भगवान ने अपने पाँव में उस स्थान पर हाथ फैरा जहा कांटा लगा था, पलक झपकते है चंदा में पाँव से रक्त बहना बंद हो गया और दर्द भी ना रहा वह फिर से उठी और जंगल की और दौड़ चली।
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इस बार उसका पाँव काँटों से छलनी हो गया किन्तु वह नन्ही सी जान बिना चिंता किये दौड़ती रही उसको अपने भाई के पास जाना था अंततः एक स्थान पर थक कर रुक गई और रो-रो कर पुकारने लगी भाई तुम कहाँ हों, तुम आते क्यों नहीं।
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अब श्री गोविन्द के लिए एक पल भी रुकना कठिन था, वह तुरंत उठे और एक ग्यारहा -बारहा वर्ष के सुन्दर से बालक का रूप धारण किया तथा पहुँच गए चंदा के पास।
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उधर चंदा थक कर बैठ गई थी और सर झुका कर रोये जा रही थी तभी उसके सर पर किसी के हाथ का स्पर्श हुआ। और एक आवाज सुनाई दी, “में आ गया मेरी बहन, अब तू ना रो”
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चंदा ने सर उठा कर उस बालक को देखा और पूंछा क्या तुम मेरे भाई हो ? तब उत्तर मिला “हाँ चंदा, में ही तुम्हारा भाई हूँ” यह सुनते ही चंदा अपने भाई से लिपट गई और फूट फूट कर रोने लगी।
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तभी भक्त और भगवान के मध्य भाव और भक्ति का एक अनूठा दृश्य उत्त्पन्न हुआ , भगवान वही धरती पर बैठ गए उन्होंने नन्ही चंदा के कोमल पैरो को अपने हाथो में लिया और उसको प्रेम से देखा।
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वह छोटे-छोटे कोमल पांव पूर्ण रूप से काँटों से छलनी हो चुके थे उनमे से रक्त बह रहा था, यह देख कर भगवान की आँखों से आंसू बह निकले उन्होंने उन नन्हे पैरो को अपने माथे से लगाया और रो उठे,
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अद्भुद दृश्य, बहन भाई को पाने की प्रसन्नता में रो रही थी और भगवान अपने भक्त के कष्ट को देख कर रो रहे थे। श्री हरी ने अपने हाथो से चंदा के पैरो में चुभे एक एक कांटे को बड़े प्रेम से निकाला फिर उसके पैरो पर अपने हाथ का स्पर्श किया, पलभर में सभी कष्ट दूर हो गया।
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चंदा अपने भाई का हाथ पकड़ कर बोली भाई तुम घर चलो, कल रक्षा बंधन है, में भी रक्षा बंधन करुँगी। भगवान बोले अब तू घर जा दादी प्रतीक्षा कर रही होगी, में कल प्रातः घर अवश्य आऊंगा। ऐसा कहकर उसको विश्वाश दिलाया और जंगल के बाहर तक छोड़ने आए।
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अब चंदा बहुत प्रसन्न थी उसकी सारी चिंता मिट गई थी, घर पहुंची तो देखा कि दादी का रो रो कर बुरा हाल था चंदा को देखते ही उसको छाती से लगा लिया। चंदा बहुत पुलकित थी बोली दादी अब तू रो मत कल मेरा भाई आएगा, में भी रक्षा बंधन करुँगी।
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दादी ने अपने आंसू पोंछे उसने सोंचा कि जंगल में कोई बालक मिल गया होगा जिसको यह अपना भाई समझ रही है, चंदा ने दादी से जिद्द करी और एक सुन्दर सी राखी अपने भाई के लिए खरीदी।
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अगले दिन प्रातः ही वह नहा-धो कर अपने भाई की प्रतीक्षा में द्वार पर बैठ गई, उसको अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थोड़ी देर में ही वह बालक सामने से आते दिखाई दिया, उसको देखते ही चंदा प्रसन्नता से चीख उठी ” दादी भाई आ गया” और वह दौड़ कर अपने भाई के पास पहुँच गई, उसका हाथ पकड़ कर घर में ले आई।
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अपनी टूटी-फूटी चारपाई पर बैठाया बड़े प्रेम से भाई का तिलक किया आरती उतारी और रक्षा बंधन किया। सुन्दर राखी देख कर भाई बहुत प्रसन्न था, भाई के रूप में भगवान उसके प्रेम को देख कर विभोर हो उठे थे, अब बारी उनकी थी।
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भाई ने अपने साथ लाए झोले को खोला तो खुशिओं का अम्बार था, सुन्दर, कपडे, मिठाई, खिलोने, और भी बहुत कुछ। चंदा को मानो पंख लग गए थे। उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था।
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कुछ समय साथ रहने के बाद वह बालक बोला अब मुझको जंगल में वापस जाना है। चंदा उदास हो गई, तब वह बोला तू उदास ना हो, आज से प्रतिदिन में तुमसे मिलने अवश्य आऊंगा। अब वह प्रसन्न थी। बालक जंगल लौट गया।
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उधर दादी असमंजस में थी कौन है यह बालक, उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। किन्तु हरी के मन की हरी ही जाने।
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भाई के जाने के बाद जब चंदा घर में वापस लौटी तो एकदम ठिठक गई उसकी दृष्टि लड्डू गोपाल की प्रतीमा पर पड़ी तो उसने देखा कि उनके हाथ में वही राखी बंधी थी जो उसने अपने भाई के हाथ में बांधी थी।
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उसने दादी को तुरंत बुलाया यह देख कर दादी भी अचम्भित रह गई, किन्तु उसने बचपन से कृष्ण की भक्ति करी थी वह तुरंत जान गई कि वह बालक और कोई नहीं स्वयं श्री हरी ही थे, वह उनके चरणो में गिर पड़ी और बोली, है छलिया, जीवन भर तो छला जीवन का अंत आया तो अब भी छल कर चले गए।
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वह चंदा से बोली अरी वह बालक और कोई नहीं तेरा यही भाई था। यह सुन कर चंदा भगवान की प्रतीमा से लिपट कर रोने लगी रो रो कर बोली कहो ना भाई क्या वह तुम ही थे, में जानती हूँ वह तुम ही थे, फिर सामने क्यों नहीं आते, छुपते क्यों हो।
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दादी पोती का निर्मल प्रेम ऐसा था कि भगवान भी विवश हो गए। लीला धारी तुरंत ही विग्रह से प्रकट हो गए और बोले हां चंदा में ही तुम्हारा वह भाई हूँ, तुमने मुझको पुकारा तो मुझको आना पड़ा। और में कैसे नहीं आता, जो भी लोग ढोंग, दिखावा, पाखंड रचते है उनसे में बहुत दूर रहता हूँ, किन्तु जब मेरा कोई सच्चा भक्त प्रेम भक्ति से मुझको पुकारता है तो मुझको आना ही पड़ता है।
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भक्त और भगवान की प्रेममय लीला चल रही थी, और दादी वह तो भगवान में लीन हो चुकी थी रह गई, चंदा तो उस दिन के बाद से गाँव में उनको किसी ने नहीं देखा, कोई नहीं जान पाया की आखिर दादी-पोती कहा चले गए। प्रभु की लीला प्रभु ही जाने…
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लष्मीकांत विजय गढिया

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(((((पवित्रता)))))

एक आदमी बहुत बड़े संत-महात्मा के पास गया और बोला- ‘हे मुनिवर! मैं राह भटक गया हूँ, कृपया मुझे बताएँ कि सच्चाई, ईमानदारी, पवित्रता क्या है? और कैसे प्राप्त हो..?’

संत ने एक नज़र आदमी को देखा, फिर कहा- ‘अभी मेरा साधना करने का समय हो गया है। सामने उस तालाब में एक मछली है, उसी से तुम यह सवाल पूछो, वह तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे देगी।’

वह आदमी तालाब के पास गया। वहाँ उसे वह मछली दिखाई दी, मछली आराम कर रही थी। जैसे ही मछली ने उसकी ओर देखा उस आदमी ने अपना सवाल पूछा।

मछली बोली- ‘मैं तुम्हारे सवाल का जवाब अवश्य दूँगी किन्तु मैं सोकर उठी हूँ, इसलिए मुझे प्यास लगी है। कृपया पीने के लिए एक लौटा जल लेकर आओ।’

वह आदमी बोला- ‘कमाल है! तुम तो जल में ही रहती हो फिर भी प्यासी हो?’

मछली ने कहा- ‘तुमने सही कहा। यही तुम्हारे सवाल का जवाब भी है। सच्चाई, ईमानदारी, पवित्रता तुम्हारे अंदर ही है। तुम उसे यहाँ-वहाँ खोजते फिरोगे तो वह सब नही मिलेगी, अतः स्वयं को पहचानो।

उस आदमी को अपने सवाल का जवाब मिल गया।

“दोस्तों..!! सुख-शांति, ईमानदारी, पवित्रता व सच्चाई इत्यादि की खोज में मानव कहाँ-कहाँ नही भटकता… क्या-क्या जतन नही करता, फिर भी उसे निराशा ही हाथ लगती है। वह नही जानता, जिसकी खोज में वह भटक रहा है, वह तो उसके भीतर ही मौजूद है। उसकी स्थिति ‘पानी में रहकर मीन प्यासी’ जैसी हो जाती है।
किसी को पवित्रता लानी नहीं है, न ईमानदार बनना है… वास्तव में आपकी आत्मा स्वयं पवित्र, सच्ची और ईमानदार है…. जो बुरा या गलत या मैल है वह ऊपर ही है… इस ऊपर से ओढे हुए को हटा दीजिए तो सब स्वतः स्वच्छ और पवित्र प्राप्त हो जाएगा…।

देव कृष्णा

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तीन मुट्ठी चावल का फल

जब भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा जी को तीनों लोको का स्वामी बना दिया तो सुदामा जी की संपत्ति देखकर यमराज से रहा न गया !

यम भगवान को नियम कानूनों का पाठ पढ़ाने के लिए अपने बहीखाते लेकर द्वारिका पहुंच गये !

भगवान से कहने लगे कि – अपराध क्षमा करें भगवन लेकिन सत्य तो ये है कि यमपुरी में शायद अब मेरी कोई आवश्यकता नही रह गयी है इसलिए में पृथ्वी लोक के प्राणियों के कर्मों का बहीखाता आपको सौंपने आया हूँ !

इस प्रकार यमराज ने सारे बहीखाते भगवान के सामने रख दिये

भगवान मुस्कुराए बोले – यमराज जी आखिर ऐसी क्या बात है जो इतना चिंतित लग रहे हो ?

यमराज कहने लगे – प्रभु आपके क्षमा कर देने से अनेक पापी एक तो यमपुरी आते ही नही है वे सीधे ही आपके धाम को चले जाते हैं और फिर आपने अभी अभी सुदामा जी को तीनों लोक दान दे दिए हैं । सो अब हम कहाँ जाएं ?

यमराज भगवान से कहने लगे – प्रभु ! सुदामा जी के प्रारब्ध में तो जीवन भर दरिद्रता ही लिखी हुई थी लेकिन आपने उन्हें तीनों लोकों की संपत्ति देकर विधि के बनाये हुए विधान को ही बदलकर रख दिया है !

अब कर्मों की प्रधानता तो लगभग समाप्त ही हो गयी है !

भगवान बोले – यम तुमने कैसे जाना कि सुदामा के भाग्य में आजीवन दरिद्रता का योग है ?

यमराज ने अपना बही खाता खोला तो सुदामा जी के भाग्य वाले स्थान पर देखा तो चकित रह गए देखते हैं कि जहां श्रीक्षय’ सम्पत्ति का क्षय लिखा हुआ था !

वहां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उन्ही अक्षरों को उलटकर ‘उनके स्थान पर यक्षश्री’ लिख दिया अर्थात कुबेर की संपत्ति !

भगवान बोले – यमराज जी ! शायद आपकी जानकारी पूरी नही है क्या आप जानते हैं कि सुदामा ने मुझे अपना सर्वस्व अपर्ण कर दिया था ! मैने तो सुदामा के केवल उसी उपकार का प्रतिफल उसे दिया है !

यमराज बोले – भगवन ऐसी कौनसी सम्पत्ति सुदामा ने आपको अर्पण कर दी उसके पास तो कुछ भी नही !

भगवान बोले – सुदामा ने अपनी कुल पूंजी के रूप में बड़े ही प्रेम से मुझे चावल अर्पण किये थे जो मैंने और देवी लक्ष्मी ने बड़े प्रेम से खाये थे !

जो मुझे प्रेम से कुछ खिलाता है उसे सम्पूर्ण विश्व को भोजन कराने जितना पुण्य प्राप्त होता है.बस उसी का प्रतिफल सुदामा को मैंने दिया है !

ऐसे दयालु हैं हमारे प्रभु श्रीकृष्ण भगवान जिन्होंने न केवल सुदामा जी पर कृपा की बल्कि द्रौपदी की बटलोई से बचे हुए साग के पत्ते को भी बड़े चाव से खाकर दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों सहित सम्पूर्ण विश्व को तृप्त कर दिया था ओर पांडवो को श्राप से बचाया था !!

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

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🙏🏼🙏🏼हल्की हल्की सर्दी का मौसम शुरू हो चुका था । आज ना जाने कान्हा की नींद बड़ी जल्दी खुल गई थी। इसलिए वह उठकर निकुंज में आकर एक वृक्ष की डाल पर बैठकर अपनी बांसुरी को निकालकर बजाना शुरू हो गए ।अभी भोर का समय था सभी पशु पक्षी अभी नींद से अलसा कर उठ रहे थे। और कान्हा ने अपनी बांसुरी की धुन छेड़ दी। सभी पशु-पक्षी गोपियां हैरान हो गए कि आज सुबह-सुबह उठने से पहले ही यह हमारा कैसा सौभाग्य जो हमें कान्हा की बांसुरी की धुन सुनने को मिल गई ।सभी पशु पक्षी और गोपियां भागी भागी निकुंज की तरफ आए और कान्हा की बांसुरी की धुन में मगन हो गए। उधर जब किशोरी जु ने नींद में ही कान्हा की बांसुरी की धुन सुनी तो उसको लगा कि शायद वह कोई स्वपन देख रही है और वह स्वपन में ही मन्द मन्द मुस्कुरा रही है कि कान्हा तो मेरे रोम रोम में है। उसकी बांसुरी की धुन मुझे अपने अंदर से सुनाई दे रही है। लेकिन जब बांसुरी की धुन लगातार बजती जा रही थी तो गहरी नींद में सोई हुई राधा एकदम से उठी और उसने देखा की बांसुरी की धुन तो बाहर से आ रही है तो एकदम से घबरा गई कि आज सुबह-सुबह कान्हा को क्या हो गया जो इतनी प्यारी बांसुरी की धुन को छेड़ दिया। अब किशोरी जी से रहा नहीं गया तो वह आधी नींद में थीऔर अभी पूरी तरह से सवेरा भी नहीं हुआ था ।अपने महल से भागी भागी निकुंज की तरफ जाने लगी नींद में होने के कारण और अभी पूरी तरह सवेरा न होने के कारण किशोरी जी सीधे निकुंज में ना जाकर गांव की तरफ मुड़ गई । अभी वह गांव का आधा ही रास्ता पार कर पाई थी तभी उसे एक घर में एक बहुत ही सुरीला भजन सुनाई दिया।” अब राधे रानी मत जइयो तुम दूर
मेरी लाडो रानी मत जइयो तुम दूर”।
किशोरी जी ने जब यह भजन उस घर से सुना तो हो अचानक से उन के पांव ठिठक गए और वह उस घर की तरफ गई और घर के एक झरोखे से अंदर झांकने लगी तो उसने देखा की एक वृद्ध व्यक्ति किशोरी जी और ठाकुर जी की प्रतिमा को बड़ी ही प्रीत और शरदा से स्नान करवाकर उसमें बहुत सुंदर श्रृंगार कर रहा है और साथ में भजन गाए जा रहा है किशोरी जी को यह देखकर बड़ा आनंद आ रहा था और उस भजन को भी सुन कर बहुत आनंद आ रहा था ।एक तरफ कान्हा की बांसुरी की धुन और दूसरी तरफ इस वृद्ध व्यक्ति का भजन किशोरी जी दोनों तरफ से मग्न थी।
उस व्यक्ति का नाम सुच्चा राम था और वह बड़ी श्रद्धा से किशोरी जी और ठाकुर जी का श्रृंगार कर रहा था ।उसने श्रृंगार करने में बहुत समय लिया और तभी वह उठकर ठाकुर जी के लिए भोग बनाने गया तो उसने पूरी और खीर का भोग बनाया और बड़े ही प्यार से ठाकुर जी और किशोरी जी को भोग लगाने लगा। राधा रानी काफी देर से झरोखे से देख रही थी उसके इतने प्रीत भरे और श्रद्धा भरे व्यवहार को देखकर राधा रानी को पता ही नहीं चला कि वह कितनी देर वहां खड़ी रही बहुत देर वहां खड़ा होने के कारण और खीर पुरी की खुशबू से किशोरी जी को भी भूख लग गई । उनका मन भी खीर और पूड़ी खाने को करने लगा। अभी भी वह सुच्चा राम के घर के पास खड़ी थी और वह व्यक्ति अभी भी भजन गा रहा था कि “राधे रानी मत जइयो तुम दूर, मेरी लाडो रानी मत जइयो तुम दूर “।
किशोरी जी उसका यह भजन सुनकर इतनी मग्न हो गई थी कि वह वास्तव में भी उससे दूर नहीं जा पा रही थी। अब किशोरी जी का मन पुरी और खीर पर आ गया था और वह पूरी और खीर खाना चाहती थी तभी उन्होंने 6 -7 साल की कन्या का रूप लेकर सुच्चा राम के घर का दरवाजा खटखटाया ।उसने दरवाजा खोला और छोटी सी कन्या को देखा और बोला, लाली क्या हुआ, क्या चाहिए तो किशोरी जी ने प्रार्थना की बाबा आप बहुत सुन्दर भजन गा रहे थे इसलिए मैं यहां आप का भजन सुनने के लिए आई हूं ।अपने भजन की तारीफ सुनकर सुच्चा राम बहुत प्रसन्न हुआ और कहा लाली अंदर आओ लाडली अंदर आ गई किशोरी जू ने कहा,बाबा कि आप किसको ना जाने के लिए कह रहे हो ।तो बाबा ने कहा यह मैं अपनी लाडो किशोरी जी का भजन गा रहा हूं कि अगर कभी वो मेरे पास आई तो मैं उसको कहूंगा कि आप मुझे छोड़कर मत जाना। राधा रानी का मन तो अबभी खीर पूरी पर था तो उन्होंने कहा कि बाबा आप मान लो अगर किशोरी जू यहां आ जाए तो आप उसका स्वागत कैसे करोगे। इतना सुनकर बाबा भाव विभोर हो उठा और एकदम से राधा रानी को उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया और वह अपनी धुन में बोलने लगा कि मैं ऐसे ही जैसे तुमको अपनी गोद में बिठाया है उसको अपनी गोद में बिठा कर अपने हाथ से बनी खीर पूरी खिलाऊंगा और साथ साथ में वह गोद में बैठी राधा रानी को खीर पूरी खिला रहे हैं और आंखों में आंसू बहते जा रहे हैं और कहते जा रहे हैं कि मैं एक एक कोर उनके मुंह में डालूंगा और उसको निहारता जाऊंगा और वह वास्तव में गोद में बैठी किशोरी जी को निहार रहा है तब राधा रानी ने कहा की यह राधा रानी के साथ आपने तो लाल जू की प्रतिमा को रखा हुआ है केवल राधा रानी को ही खीर पूरी खिलाओगे कान्हा को नहीं खिलाओगे ।सुच्चा राम ने कहा ,अरे ओ भोली लाली जिस जगह पर राधा रानी मेरी लाडली जू आ जाए उस जगह पर तो कान्हा अपने आप ही दौड़े चले आते हैं। और हुआ भी ऐसे ही उधर जब बहुत समय कान्हा को बांसुरी बजाते हो गए सब पशु पक्षी और सखियां मंत्रमुग्ध होकर एकटक ठाकुर जी को निहार रही थी ।अब ठाकुर जी भी थक चुके थे लेकिन जब उन्होंने देखा कि मेरी प्रिय राधिका नहीं आई तो वह व्याकुल हो उठे और अपनी किशोरी जी को ढूंढने के लिए निकल पड़े वह भी गांव की तरह निकले। तभी उनको राधा रानी के खिलखिलाने की आवाज सुनाई दी तो वह हैरान हो गए मेरी प्रिया यहां क्या कर रही है ।जब झरोखे से उन्होंने अंदर झाँककर देखा तो उन्होंने देखा कि सुच्चा राम की गोदी में बैठकर राधा रानी बड़े मजे से खीर पूरी खा रही है अब ठाकुर जी को ध्यान आया कि वह भी बहुत सुबह से उठे हुए हैं और उनको भूख लग चुकी थी उनका मन भी खीर पुरी खाने को करने लगा ।तभी उन्होंने भी सुच्चा राम का दरवाजा खटखटाया लेकिन दरवाजा खुला हुआ था तो सुच्चा राम ने कहा जो भी है अंदर आ जाओ। क्योंकि राधा रानी उनकी गोद में बैठी हुई थी तभी कान्हा जो कि अंदर आ गए और कहा लाडली तुम यहां क्या कर रही हो तो राधारानी मंद मंद मुस्कुरा कर कान्हा की तरफ देखती हुई बोली बाबा की खीर पूरी खा रही हूं अरे तुम भी खा लो। राधा रानी ने बाबा को कहा कि बाबा यह मेरा बहुत प्रिय सखा है हम दोनों सुबह इकट्ठे ही खेलते हैं क्या आप इसको भी खीर पूरी खिलाओगे। बाबा को कोई होश न थी वह तो यही सोच रहा था कि राधा रानी मेरी गोद में है और मैं उसको खीर पूरी खिला रहा हूं तो उसमें कान्हा को भी पकड़ कर अपनी गोद में बिठा लिया उसको लग रहा था कि जैसे कृष्ण और राधा की मेरी गोद में है और वह उनको खीर पूरी खिला रहा है और वह एक एक कोर दोनों को खिलाता उन दोनो को खिलाते खिलाते उसके हाथ इतने कांप रहे थे कि आधी खीर पूरी नीचे गिरती जाती है पर बाबा आंखों में आंसू बहाता जाता और साथ साथ में गाए जा रहा था ।”अब राधा रानी मत जइयो तुम दूर ।ओ लाडो रानी मत जइयो तुम दूर ।”राधा रानी सुच्चाराम से बोली, अरे ओ भोले बाबा अगर वास्तव में तुम्हारे सामने राधा रानी आ जाए अगर तुम उसको बार-बार यह कहोगे तो हो इतनी करुणामई है वह तो वापस नहीं जाएगी लेकिन बाकी भक्तों का क्या होगा लाडली के माता-पिता का क्या होगा ,अगर तुम उसको अपने पास रख लोगे ।यह सुनकर एकदम से सुच्चाराम हैरान हो गया और कहने लगा हां हां कह तो तुम ठीक ही रही हो लाली।लेकिन मेरा ऐसा सौभाग्य कहा जो लाडली जू मेरे पास आए मेरे कान्हा मेरे पास आए। अगर वह कभी मेरे पास आ भी गए अगर वह अपने पांव की धूल का एक कण भी यहां छोड़ जाएंगे तो मैं उसको ही किशोरी जू समझ कर हमेशा अपने दिल से लगा कर रखूंगा ।और उस कण को लेकर ही मैं बोलता रहूंगा कि” अब राधा रानी मत जइयो तुम दूर मेरे कान्हा प्यारे मत जइयो तुम दूर” लाडली जू और ठाकुर जी एक दूसरे की तरफ देखकर मंद मंद मुस्कुराए ।और अब उनका खीर पूरी खा कर पेट भर चुका था ।और कहने लगे अच्छा बाबा अब हमें थोड़ा सा पानी ही पिला दो। और जब बाबा पानी लेने उठे और जब पीछे मुड़े तो किशोरी जी ठाकुर जी दोनों गायब हो चुके थे ।सुच्चा राम हैरान हो गया कि दरवाजा तो बंद है लेकिन यह दोनों कहां गए तभी उसका ध्यान जमीन पर बिछी चटाई पर गया और वहां उसने देखा कि किशोरी जी के पांव की पायल का एक घूंघरू और ठाकुर जी की माला का एक मोती वहां पड़ा हुआ है और उसमें बहुत ही अच्छी सुगंध आ रही है। सुच्चा राम एकदम से स्तब्ध हो गया और उसको जैसे अंदर से अंदेशा हो गया कि कहीं यह ठाकुर जी और किशोरी जू तो यहां नहीआए थे और मेरी गोद में बैठकर खीर पूरी खा गए। और निशानी के तौर पर अपनी पायल का घुंघरू और गले का मोती यहां छोड़ गए हैं। वह तो एकदम पागल सा हो गया वह उस जगह को चूमने चाटने लगा जहां पर किशोरी जू और ठाकुर जी उसकी गोद में बैठे थे ठाकुर जी और किशोरी जी को खिलाते समय खीर पुरी का प्रसाद जो नीचे गिरता जाता था उसको अपने मुख से चाटे जा रहा था साथ में बहते हुए आंसू भी उस गिरे हुए खीर पूरी के साथ उसके अंदर जाए जा रहे थे ।वह बावंला सा हो गया ।और उसने उस पायल के घुंघरू और मोती को पकड़ कर अपने ह्रदय से लगा लिया और उसको ऐसे ही लगा जैसे किशोरी जी और ठाकुर जी उसकी सीने के साथ लगे हुए हैं अब तो उसका रोज का नियम हो गया कि एक जांघ पर वह किशोरी जी की पायल के घुंघरू को रखता और दूसरी जांघ पर ठाकुर जी के गले की माला के मोती को रखता और रोज नए-नए पकवान बनाकर उनको ऐसे खिलाता कि वह पायल का घुंघरू ना होकर किशोरी जू हो और मोती ना होकर ठाकुर जी हो।
सुच्चा राम को ऐसे लगता कि जैसे कि वह दोनों उसको छोड़कर कहीं नहीं गए। सुच्चा राम की सच्ची सुच्ची भक्ति के कारण ही ठाकुर जी और किशोरी जी का प्रेम उसको प्राप्त हुआ और वह घुंघरू और मोती के रूप में हमेशा उनके पास रहे ।इसलिए हमें भी सुच्चा राम की तरह ठाकुर जी और किशोरी जी की सच्ची भक्ति करनी चाहिए ना कि दिखावे की भक्ति।
बोलो करूणा अवतार ठाकुर जी और किशोरी जी की जय हो।
🙌🙏🏼🙇🏻‍♀🌹

देव कृष्णा

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चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई पहली बार नहीं था कि बड़े भइया ने ऐसा किया हो. हर बार उनका ऐसा ही रवैया रहता है. जब भी पापा को रखने की उनकी बारी आती है, वह समस्याओं से गुज़रने लगते हैं. कभी भाभी की तबीयत ख़राब हो जाती है, कभी ऑफिस का काम बढ़ जाता है और उनकी छुट्टी कैंसिल हो जाती है. विवश होकर मुझे ही पापा को छोड़ने मुंबई जाना पड़ता है. हमेशा की तरह इस बार भी पापा की जाने की इच्छा नहीं थी, किंतु मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया और उनका व अपना मुंबई का रिज़र्वेशन करवा लिया.
दिल्ली-मुंबई राजधानी एक्सप्रेस अपने टाइम पर थी. सेकंड एसी की निचली बर्थ पर पापा को बैठाकर सामने की बर्थ पर मैं भी बैठ गया. साथवाली सीट पर एक सज्जन पहले से विराजमान थे. बाकी बर्थ खाली थीं. कुछ ही देर में ट्रेन चल पड़ी. अपनी जेब से मोबाइल निकाल मैं देख रहा था, तभी कानों से पापा का स्वर टकराया, “मुन्ना, कुछ दिन तो तू भी रहेगा न मुंबई में. मेरा दिल लगा रहेगा और प्रतीक को भी अच्छा लगेगा.”
पापा के स्वर की आर्द्रता पर तो मेरा ध्यान गया नहीं, मन-ही-मन मैं खीझ उठा. कितनी बार समझाया है पापा को कि मुझे ‘मुन्ना’ न कहा करें. ‘रजत’ पुकारा करें. अब मैं इतनी ऊंची पोस्ट पर आसीन एक प्रशासनिक अधिकारी हूं. समाज में मेरा एक अलग रुतबा है. ऊंचा क़द है, मान-सम्मान है. बगल की सीट पर बैठा व्यक्ति मुन्ना शब्द सुनकर मुझे एक सामान्य-सा व्यक्ति समझ रहा होगा. मैं तनिक ज़ोर से बोला, “पापा, परसों मेरी गर्वनर के साथ मीटिंग है. मैं मुंबई में कैसे रुक सकता हूं?” पापा के चेहरे पर निराशा की बदलियां छा गईं. मैं उनसे कुछ कहता, तभी मेरा मोबाइल बज उठा. रितु का फोन था. भर्राए स्वर में वह कह रही थी, “पापा ठीक से बैठ गए न.”
“हां हां बैठ गए हैं. गाड़ी भी चल पड़ी है.” “देखो, पापा का ख़्याल रखना. रात में मेडिसिन दे देना. भाभी को भी सब अच्छी तरह समझाकर आना. पापा को वहां कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.”
“नहीं होगी.” मैंने फोन काट दिया. “रितु का फोन था न. मेरी चिंता कर रही होगी.”
पापा के चेहरे पर वात्सल्य उमड़ आया था. रात में खाना खाकर पापा सो गए. थोड़ी देर में गाड़ी कोटा स्टेशन पर रुकी और यात्रियों के शोरगुल से हड़कंप-सा मच गया. तभी कंपार्टमेंट का दरवाज़ा खोलकर जो व्यक्ति अंदर आया, उसे देख मुझे बेहद आश्‍चर्य हुआ. मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि रमाशंकर से इस तरह ट्रेन में मुलाक़ात होगी.
एक समय रमाशंकर मेरा पड़ोसी और सहपाठी था. हम दोनों के बीच मित्रता कम और नंबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा अधिक रहती थी. हम दोनों ही मेहनती और बुद्धिमान थे, किंतु न जाने क्या बात थी कि मैं चाहे कितना भी परिश्रम क्यों न कर लूं, बाज़ी सदैव रमाशंकर के हाथ लगती थी. शायद मेरी ही एकाग्रता में कमी थी. कुछ समय पश्‍चात् पापा ने शहर के पॉश एरिया में मकान बनवा लिया. मैंने कॉलेज चेंज कर लिया और इस तरह रमाशंकर और मेरा साथ छूट गया.
दो माह पूर्व एक सुबह मैं अपने ऑफिस पहुंचा. कॉरिडोर में मुझसे मिलने के लिए काफ़ी लोग बैठे हुए थे. बिना उनकी ओर नज़र उठाए मैं अपने केबिन की ओर बढ़ रहा था. यकायक एक व्यक्ति मेरे सम्मुख आया और प्रसन्नता के अतिरेक में मेरे गले लग गया, “रजत यार, तू कितना बड़ा आदमी बन गया. पहचाना मुझे? मैं रमाशंकर.” मैं सकपका गया. फीकी-सी मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर आकर विलुप्त हो गई. इतने लोगों के सम्मुख़ उसका अनौपचारिक व्यवहार मुझे ख़ल रहा था. वह भी शायद मेरे मनोभावों को ताड़ गया था, तभी तो एक लंबी प्रतीक्षा के उपरांत जब वह मेरे केबिन में दाख़िल हुआ, तो समझ चुका था कि वह अपने सहपाठी से नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक अधिकारी से मिल रहा था. उसका मुझे ‘सर’ कहना मेरे अहं को संतुष्ट कर गया. यह जानकर कि वह बिजली विभाग में महज़ एक क्लर्क है, जो मेरे समक्ष अपना तबादला रुकवाने की गुज़ारिश लेकर आया है, मेरा सीना अभिमान से चौड़ा हो गया. कॉलेज के प्रिंसिपल और टीचर्स तो क्या, मेरे सभी कलीग्स भी यही कहते थे कि एक दिन रमाशंकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा. हुंह, आज मैं कहां से कहां पहुंच गया और वह…
पिछली स्मृतियों को पीछे धकेल मैं वर्तमान में पहुंचा तो देखा, रमाशंकर ने अपनी वृद्ध मां को साइड की सीट पर लिटा दिया और स्वयं उनके क़रीब बैठ गया. एक उड़ती सी नज़र उस पर डाल मैंने अख़बार पर आंखें गड़ा दीं. तभी रमाशंकर बोला, “नमस्ते सर, मैंने तो देखा ही नहीं कि आप बैठे हैं.” मैंने नम्र स्वर में पूछा, “कैसे हो रमाशंकर?”
“ठीक हूं सर.”
“कोटा कैसे आना हुआ?”
“छोटी बुआ की बेटी की शादी में आया था. अब मुंबई जा रहा हूं. शायद आपको याद हो, मेरा एक छोटा भाई था.”
“छोटा भाई, हां याद आया, क्या नाम था उसका?” मैंने स्मृति पर ज़ोर डालने का उपक्रम किया जबकि मुझे अच्छी तरह याद था कि उसका नाम देवेश था.
“सर, आप इतने ऊंचे पद पर हैं. आए दिन हज़ारों लोगों से मिलते हैं. आपको कहां याद होगा? देवेश नाम है उसका सर.”
पता नहीं उसने मुझ पर व्यंग्य किया था या साधारण रूप से कहा था, फिर भी मेरी गर्दन कुछ तन-सी गई. उस पर एहसान-सा लादते हुए मैं बोला,“देखो रमाशंकर, यह मेरा ऑफिस नहीं है, इसलिए सर कहना बंद करो और मुझे मेरे नाम से पुकारो. हां तो तुम क्या बता रहे थे, देवेश मुंबई में है?”
“हां रजत, उसने वहां मकान ख़रीदा है. दो दिन पश्‍चात् उसका गृह प्रवेश है.
चार-पांच दिन वहां रहकर मैं और अम्मा दिल्ली लौट आएंगे.”
“इस उम्र में इन्हें इतना घुमा रहे हो?” “अम्मा की आने की बहुत इच्छा थी. इंसान की उम्र भले ही बढ़ जाए, इच्छाएं तो नहीं मरतीं न.”
“हां, यह तो है. पिताजी कैसे हैं?”
“पिताजी का दो वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया था. अम्मा यह दुख झेल नहीं पाईं और उन्हें हार्टअटैक आ गया था, बस तभी से वह बीमार रहती हैं. अब तो अल्ज़ाइमर भी बढ़ गया है.”
“तब तो उन्हें संभालना मुश्किल होता होगा. क्या करते हो? छह-छह महीने दोनों भाई रखते होंगे.” ऐसा पूछकर मैं शायद अपने मन को तसल्ली दे रहा था. आशा के विपरीत रमाशंकर बोला, “नहीं-नहीं, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता. अम्मा शुरू से दिल्ली में रही हैं. उनका कहीं और मन लगना मुश्किल है. मैं नहीं चाहता, इस उम्र में उनकी स्थिति पेंडुलम जैसी हो जाए. कभी इधर, तो कभी उधर. कितनी पीड़ा होगी उन्हें यह देखकर कि पिताजी के जाते ही उनका कोई घर ही नहीं रहा. वह हम पर बोझ हैं.”
मैं मुस्कुराया, “रमाशंकर, इंसान को थोड़ा व्यावहारिक भी होना चाहिए. जीवन में स़िर्फ भावुकता से काम नहीं चलता है. अक्सर इंसान दायित्व उठाते-उठाते थक जाता है और तब ये विचार मन को उद्वेलित करने लगते हैं कि अकेले हम ही क्यों मां-बाप की सेवा करें, दूसरा क्यों न करे.”
“पता नहीं रजत, मैं ज़रा पुराने विचारों का इंसान हूं. मेरा तो यह मानना है कि हर इंसान की करनी उसके साथ है. कोई भी काम मुश्क़िल तभी लगता है, जब उसे बोझ समझकर किया जाए. मां-बाप क्या कभी अपने बच्चों को बोझ समझते हैं? आधे-अधूरे कर्त्तव्यों में कभी आस्था नहीं होती रजत, मात्र औपचारिकता होती है और सबसे बड़ी बात जाने-अनजाने हमारे कर्म ही तो संस्कार बनकर हमारे बच्चों के द्वारा हमारे सम्मुख आते हैं. समय रहते यह छोटी-सी बात इंसान की समझ में आ जाए, तो उसका बुढ़ापा भी संवर जाए.”
मुझे ऐसा लगा, मानो रमाशंकर ने मेरे मुख पर तमाचा जड़ दिया हो. मैं नि:शब्द, मौन सोने का उपक्रम करने लगा, किंतु नींद मेरी आंखों से अब कोसों दूर हो चुकी थी. रमाशंकर की बातें मेरे दिलोदिमाग़ में हथौड़े बरसा रही थीं. इतने वर्षों से संचित किया हुआ अभिमान पलभर में चूर-चूर हो गया था. प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी के लिए इतनी मोटी-मोटी किताबें पढ़ता रहा, किंतु पापा के मन की संवेदनाओं को, उनके हृदय की पीड़ा को नहीं पढ़ सका. क्या इतना बड़ा मुक़ाम मैंने स़िर्फ अपनी मेहनत के बल पर पाया है. नहीं, इसके पीछे पापा-मम्मी की वर्षों की तपस्या निहित है.
आख़िर उन्होंने ही तो मेरी आंखों को सपने देखने सिखाए. जीवन में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा दी. रात्रि में जब मैं देर तक पढ़ता था, तो पापा भी मेरे साथ जागते थे कि कहीं मुझे नींद न आ जाए. मेरे इस लक्ष्य को हासिल करने में पापा हर क़दम पर मेरे साथ रहे और आज जब पापा को मेरे साथ की ज़रूरत है, तो मैं व्यावहारिकता का सहारा ले रहा हूं. दो वर्ष पूर्व की स्मृति मन पर दस्तक दे रही थी. सीवियर हार्टअटैक आने के बाद मम्मी बीमार रहने लगी थीं.
एक शाम ऑफिस से लौटकर मैं पापा-मम्मी के बेडरूम में जा रहा था, तभी अंदर से आती आवाज़ से मेरे पांव ठिठक गए. मम्मी पापा से कह रही थीं, “इस दुनिया में जो आया है, वह जाएगा भी. कोई पहले, तो कोई बाद में. इतने इंटैलेक्चुअल होते हुए भी आप इस सच्चाई से मुंह मोड़ना चाह रहे हैं.”
“मैं क्या करूं पूजा? तुम्हारे बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी मेरे लिए कठिन है. कभी सोचा है तुमने कि तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा?” पापा का कंठ अवरुद्ध हो गया था, किंतु मम्मी तनिक भी विचलित नहीं हुईं और शांत स्वर में बोलीं थीं, “आपकी तरफ़ से तो मैं पूरी तरह से निश्‍चिंत हूं. रजत और रितु आपका बहुत ख़्याल रखेंगे, यह एक मां के अंतर्मन की आवाज़ है, उसका विश्‍वास है जो कभी ग़लत नहीं हो सकता.”
इस घटना के पांच दिन बाद ही मम्मी चली गईं थीं. कितने टूट गए थे पापा. बिल्कुल अकेले पड़ गए थे. उनके अकेलेपन की पीड़ा को मुझसे अधिक मेरी पत्नी रितु ने समझा. यूं भी वह पापा के दोस्त की बेटी थी और बचपन से पापा से दिल से जुड़ी हुई थी. उसने कभी नहीं चाहा, पापा को अपने से दूर करना, किंतु मेरा मानना था कि कोरी भावुकता में लिए गए फैसले अक्सर ग़लत साबित होते हैं. इंसान को प्रैक्टिकल अप्रोच से काम लेना चाहिए. अकेले मैं ही क्यों पापा का दायित्व उठाऊं? दोनों बड़े भाई क्यों न उठाएं? जबकि पापा ने तीनों को बराबर का स्नेह दिया, पढ़ाया, लिखाया, तो दायित्व भी तीनों का बराबर है. छह माह बाद मम्मी की बरसी पर यह जानते हुए भी कि दोनों बड़े भाई पापा को अपने साथ रखना नहीं चाहते, मैंने यह फैसला किया था कि हम तीनों बेटे चार-चार माह पापा को रखेंगे. पापा को जब इस बात का पता चला, तो कितनी बेबसी उभर आई थी उनके चेहरे पर. चेहरे की झुर्रियां और गहरा गई थीं. उम्र मानो 10 वर्ष आगे सरक गई थी. सारी उम्र पापा की दिल्ली में गुज़री थी. सभी दोस्त और रिश्तेदार यहीं पर थे, जिनके सहारे उनका व़क्त कुछ अच्छा बीत सकता था, किंतु… सोचते-सोचते मैंने एक गहरी सांस ली.
आंखों से बह रहे पश्‍चाताप के आंसू पूरी रात मेरा तकिया भिगोते रहे. उफ्… यह क्या कर दिया मैंने. पापा को तो असहनीय पीड़ा पहुंचाई ही, मम्मी के विश्‍वास को भी खंडित कर दिया. आज वह जहां कहीं भी होंगी, पापा की स्थिति पर उनकी आत्मा कलप रही होगी. क्या वह कभी मुझे क्षमा कर पाएंगी? रात में कई बार अम्मा का रमाशंकर को आवाज़ देना और हर बार उसका चेहरे पर बिना शिकन लाए उठना, मुझे आत्मविश्‍लेषण के लिए बाध्य कर रहा था. उसे देख मुझे एहसास हो रहा था कि इंसानियत और बड़प्पन हैसियत की मोहताज नहीं होती. वह तो दिल में होती है. अचानक मुझे एहसास हुआ, मेरे और रमाशंकर के बीच आज भी प्रतिस्पर्धा जारी है. इंसानियत की प्रतिस्पर्धा, जिसमें आज भी वह मुझसे बाज़ी मार ले गया था. पद भले ही मेरा बड़ा था, किंतु रमाशंकर का क़द मुझसे बहुत ऊंचा था.
गाड़ी मुंबई सेंट्रल पर रुकी, तो मैं रमाशंकर के क़रीब पहुंचा. उसके दोनों हाथ थाम मैं भावुक स्वर में बोला, “रमाशंकर मेरे दोस्त, चलता हूं. यह सफ़र सारी ज़िंदगी मुझे याद रहेगा.” कहने के साथ ही मैंने उसे गले लगा लिया.
आश्‍चर्यमिश्रित ख़ुशी से वह मुझे देख रहा था. मैं बोला, “वादा करो, अपनी फैमिली को लेकर मेरे घर अवश्य आओगे.”
“आऊंगा क्यों नहीं, आखिऱ इतने वर्षों बाद मुझे मेरा दोस्त मिला है.” ख़ुशी से उसकी आवाज़ कांप रही थी. अटैची उठाए पापा के साथ मैं नीचे उतर गया. स्टेशन के बाहर मैंने टैक्सी पकड़ी और ड्राइवर से एयरपोर्ट चलने को कहा. पापा हैरत से बोले, “एयरपोर्ट क्यों?” भावुक होकर मैं पापा के गले लग गया और रुंधे कंठ से बोला, “पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए. हम वापिस दिल्ली जा रहे हैं. अब आप हमेशा वहीं अपने घर में रहेंगे.” पापा की आंखें नम हो उठीं और चेहरा खुशी से खिल उठा.
“जुग जुग जिओ मेरे बच्चे.” वह बुदबुदाए. कुछ पल के लिए उन्होंन अपनी आंखें बंद कर लीं, फिर चेहरा उठाकर आकाश की ओर देखा. मुझे ऐसा लगा मानो वह मम्मी से कह रहे हों, देर से ही सही, तुम्हारा विश्‍वास सही निकला.

राम चन्द्र आर्य

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—–विजेता —–

“बाबा, खेलो न!”
“दोस्त, अब तुम जाओ। तुम्हारी माँ तुम्हें ढूँढ रही होगी।”
“माँ को पता है- मैं तुम्हारे पास हूँ । वो बिल्कुल परेशान नहीं होगी। पकड़म- पकड़ाई ही खेल लो न !”
“बेटा, तुम पड़ोस के बच्चों के साथ खेल लो। मुझे अपना खाना भी तो बनाना है ।”
“मुझे नहीं खेलना उनके साथ । वे अपने खिलौने भी नहीं छूने देते ।” अगले ही क्षण कुछ सोचते हुए बोला, “मेरा खाना तो माँ बनाती है, तुम्हारी माँ कहाँ है?”
“मेरी माँ तो बहुत पहले ही मर गयी थी।” नब्बे साल के बूढ़े ने मुस्कराकर कहा ।
“बच्चा उदास हो गया। बूढ़े के नज़दीक आकर उसका झुर्रियों भरा चेहरा अपने नन्हें हाथों में भर लिया,”अब तुम्हें अपना खाना बनाने की कोई जरूरत नहीं, मै माँ से तुम्हारे लिए खाना ले आया करूँगा। अब तो खेल लो!”
“दोस्त!” बूढ़े ने बच्चे की आँखों में झाँकते हुए कहा, “अपना काम खुद ही करना चाहिए—और फिर—अभी मैं बूढ़ा भी तो नहीं हुआ हूँ—है न !”
“और क्या, बूढ़े की तो कमर भी झुकी होती है।”
“तो ठीक है, अब दो जवान मिलकर खाना बनाएँगें ।” बूढ़े ने रसोई की ओर मार्च करते हुए कहा। बच्चा खिलखिलाकर हँसा और उसके पीछे-पीछे चल दिया।
कुकर में दाल-चावल चढ़ाकर वे फिर कमरे में आ गये।बच्चे ने बूढ़े को बैठने का आदेश दिया, फिर उसकी आँखों पर पटटी बाँधने लगा।
पटटी बँधते ही उसका ध्यान अपनी आँखों की ओर चला गया- मोतियाबिन्द के आपरेशन के बाद एक आँख की रोशनी बिल्कुल खत्म हो गई थी। दूसरी आँख की ज्योति भी बहुत तेजी से क्षीण होती जा रही थी।
“बाबा,पकड़ो—पकड़ो!” बच्चा उसके चारों ओर घूमते हुए कह रहा था,
उसने बच्चे को हाथ पकड़ने के लिए हाथ फैलाए तो एक विचार उसके मस्तिक में कौंधा-जब दूसरी आँख से भी अंधा हो जाएगा—तब?—तब?—वह—क्या करेगा?—किसके पास रहेगा?—बेटों के पास? नहीं—नहीं! बारी-बारी से सबके पास रहकर देख लिया—हर बार अपमानित होकर लौटा है—तो फिर?—
“मैं यहाँ हूँ—मुझे पकड़ो!”
उसने दृढ़ निश्चय के साथ धीरे-से कदम बढ़ाए—हाथ से टटोलकर देखा—मेज—उस पर रखा गिलास—पानी का जग—यह मेरी कुर्सी और यह रही चारपाई—और –और—यह रहा बिजली का स्विच—लेकिन —तब—मुझ अंधे को इसकी क्या ज़रूरत होगी?—होगी—तब भी रोशनी की ज़रुरत होगी—अपने लिए नहीं—दूसरों के लिए—मैंने कर लिया—मैं तब भी अपना काम खुद कर लूँगा!”
“बाबा, तुम मुझे नहीं पकड़ पाए—तुम हार गए—तुम हार गए!” बच्चा तालियाँ पीट रहा था।
बूढ़े की घनी सफेद दाढ़ी के बीच होंठों पर आत्मविश्वास से भरी मुस्कान थिरक रही थी। ----- सुकेश साहनी

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😴😴 रात्रि कहानी 🌝🌝

एक मुसलमान फकीर मरने को था। किसी ने उससे पूछा मरते वक्त कि तुमने किससे सीखा ज्ञान।

उसने कहा बड़ा कठिन है। किस-किस के नाम लूं? जीवन में एक भी क्षण ऐसा नहीं बीता जब मैंने किसी से कुछ न सीखा हो। एक बार रास्ते से निकलता था, एक छोटा सा बच्चा हाथ में दीया जलाए हुए कहीं जा रहा था। मैंने उस बच्चे से पूछा कि क्या बेटे तुम बता सकते हो कि दीये में जो ज्योति है, यह कहां से आई है? मैंने सोचा था कि छोटा बच्चा है चकित होकर रह जाएगा, उत्तर न दे पाएगा। लेकिन उस बच्चे ने क्या किया? उसने फूंक मार दी और दीये को बुझा दिया और मुझसे पूछा कि अब तुम ही बताओ कि ज्योति कहां चली गई है? मैंने उस बच्चे के पैर पकड़ लिए मुझे एक गुरु मिल गया था और जाना कि छोटे बच्चे के प्रति भी यह भाव लेना कि वह छोटा है गलत है। वहां भी कुछ रहस्यपूर्ण मौजूद हुआ है, वहां भी कुछ जन्मा है। केवल उम्र में पीछे होने से उसे छोटा मान लेना भूल है। मेरे पास कोई उत्तर न था। तब मैंने जाना कि जो मैंने पूछा था वह बड़ा अज्ञानपूर्ण था। और तब मैंने जाना कि जहां तक उस प्रश्न के उत्तर का संबंध है, मैं भी उतना ही बच्चा हूं जितना वह बच्चा है। मेरे बुजुर्ग होने का भ्रम टूट जाना, एक अद्भुत शिक्षा थी जो एक छोटे से बच्चे ने मुझे दी थी वह मेरा गुरु हो गया था।

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