Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक ब्राह्मण एक गांव से एक बकरी खरीदकर वापस लौट रहा है। बड़ी प्रसिद्ध है कहानी, लेकिन आधी सुनी होगी। मैं पूरी ही सुनाना चाहता हूं। वह बकरी को रखकर कंधे पर वापस लौट रहा है। सांझ हो गयी है, दो चार गुंडों ने उसे देखा है। उन्होंने कहा, अरे, यह बकरी तो बड़ी स्वादिष्ट मालूम पड़ती है। इस नासमझ ब्राह्मण के साथ जा रही है, इसको मजा भी क्या आयेगा, ब्राह्मण को भी क्या, बकरी को भी क्या। इस बकरी को छीन लेना चाहिए। एक गुंडे ने आकर उसके सामने उस ब्राह्मण से कहा, नमस्कार पंडित जी। बड़ा अच्छा कुत्ता खरीद लाये। उसने कहा, कुत्ता! बकरी है महाशय! आंखें कमजोर हैं आपकी? उसने कहा, बकरी कहते हैं इसे आप? आश्चर्य है। हम भी बकरी को जानते हैं। लेकिन आपकी मर्जी, अपनी-अपनी मर्जी, कोई कुत्ते को बकरी कहना चाहे तो कहे। वह आदमी चल पड़ा। उस ब्राह्मण ने सोचा, अजीब पागल हैं इस गांव के। बकरी को कुत्ता कहते हैं? लेकिन फिर भी एक दफे टटोलकर देखा शक तो थोड़ा आया ही। लेकिन उसने पाया कि बकरी है, बिलकुल फिजूल की बात है। अभी दस कदम आगे बढ़ा था। शक मिटाकर किसी तरह आश्वस्त हुआ था कि दूसरा उनका साथी मिला। उसने कहा, नमस्कार पंडित जी! लेकिन आश्चर्य, ब्राह्मण होकर कुत्ता सिर पर रखें! जाति से बाहर होना है? उसने कहा, कुत्ता! लेकिन अब वह उतनी हिम्मत से न कह सका कि यह बकरी है। हिम्मत कमजोर पड़ गयी। उसने कहा, आपको कुत्ता दिखायी पड़ता है? उसने कहा, दिखायी पड़ता है? है। नीचे उतारिए, गांव का कोई आदमी देख लेगा पड़ोस का तो मुश्किल में पड़ जायेंगे।
वह आदमी गया तो उस ब्राह्मण ने उस बकरी को नीचे उतारकर गौर से देखा। वह बिलकुल बकरी थी। यह तो बिलकुल बकरी है, लेकिन दो-दो आदमी भूल कर जायें, यह जरा मुश्किल है। फिर भी सोचा, मजाक भी कर सकते हैं। चला फिर कंधे पर रखकर, लेकिन अब वह डरकर चल रहा है, अब वह जरा अंधेरे में से बचकर निकल रहा है। अब वह गलियों में से चलने लगा है, अब वह रास्ते पर नहीं चल रहा है। तीसरा आदमी उसे एक गली के किनारे पर मिला। उसने कहा, पंडित जी हद्द कर दी। कुत्ता कहां मिल गया? कुत्ते की तलाश मुझे भी है। कहां से ले आये हैं यह कुत्ता, ऐसा मैं भी चाहता हूं। तब तो वह यह भी न कह सका कि क्या कह रहे हैं। उसने कहा कि जी हां, खरीदकर ला रहा हूं। वह आदमी गया कि फिर उसने उतारकर भी नहीं देखा, उसे छोड़ा एक कोने में और भागा। उसने कहा कि अब इससे भाग ही जाना उचित है। झंझट हो जायेगी, गांव के लोग देख लेंगे। पैसे तो मुफ्त गये ही गये, जाति और चली जायेगी।
यह जो तीन आदमी कह गये हैं एक बात को तो बड़ी सच मालूम पड़ने लगती है। यह तो आधी कहानी है। दूसरे जन्म में ब्राह्मण फिर बकरी लेकर चलता था। बकरी लेकर लौट रहा है लेकिन पिछले जन्म की याद है। वह जिसको याद रह जाये उसी को तो ब्राह्मण कहना चाहिए, किसी और को ब्राह्मण कहना नहीं चाहिए। बकरी लेकर लौट रहा है, वही गुंडे। असल में हम भूल जाते हैं इसलिए खयाल नहीं रहता है, कि वही वही बार-बार हमको कई बार मिलते हैं, कई जन्मों में वही लोग बार-बार मिल जाते हैं। वही तीन गुंडे, उन्होंने देखा अरे! ब्राह्मण बकरी को लिए चला जा रहा है। छीन लो, उन्हें कुछ पता नहीं है कि पहले भी छीन चुके हैं। किसको पता है? अगर हमें पता हो कि हम पहले भी यही कर चुके हैं तो शायद फिर दुबारा करना मुश्किल हो जाये। फिर उन्होंने षडयंत्र रच लिया है, फिर एक गुंडा उसे रास्ते पर मिला है। उसने कहा, नमस्कार पंडित जी। बड़ा अच्छा कुत्ता कहां ले जा रहे हैं? पंडित जी ने कहा, कुत्ता सच में बड़ा अच्छा है। उसने गौर से देखा, गुंडे ने सोचा, हमको तो बकरी दिखायी पड़ती थी, हम तो धोखा देने के लिए कुत्ता कहते थे। और उस पंडित ने कहा, कुत्ता सच में बड़ा अच्छा है, बड़ी मुश्किल से मिला, बहुत मांगकर लाया, बड़ी मेहनत की, खुशामद की किसी आदमी की, तब मिला। उस गुंडे ने बहुत गौर से फिर से देखा कि मामला क्या है, भूल हो गयी है? लेकिन उसने कहा, नहीं पंडित जी, कुत्ता ही है न! उसने कहा, कैसी बात कर रहे हैं आप, कुत्ता ही है। अब वह गुंडा मुश्किल में पड़ गया है, वह यह भी नहीं कह सकता कि बकरी है, क्योंकि खुद उसने कुत्ता कहा था। दूसरे कोने पर दूसरा गुंडा मिला। उसने कहा कि धन्य हैं। धन्य महाराज, आप कुत्ता सिर पर लिए हुए हैं?
ब्राह्मण ने कहा, कुत्ते से मुझे बड़ा प्रेम है। आपको पसंद नहीं आया कुत्ता? उस आदमी ने गौर से देखा, उसने कहा, कुत्ता! तीसरे चौरस्ते पर मिला है तीसरा आदमी, लेकिन उन दोनों ने उसको खबर दे दी कि मालूम होता है, हम ही गलती में हैं। हमें बकरी दिखायी पड़ रही है। उस तीसरे आदमी ने गौर से देखा। और उस पंडित ने कहा, क्या देख रहे हैं गौर से? उसने कहा, कुछ नहीं, आपका कुत्ता देख रहा हूं। काफी अच्छा है।
हम भीड़ से जी रहे हैं और चल रहे हैं और पुनरुक्ति हमारा आधार बन गया है। चारों तरफ जो हो वह हमें स्वीकार हो जाता है। और अगर पुनरुक्ति की जाये बार-बार असत्य की भी तो वह सत्य मालूम पड़ने लगता है। यह बात बहुत बार दोहरायी गयी है कि संन्यासी वह है जो भाग रहा है जिंदगी से। जो भाग रहा है वह संन्यासी तो क्या है, गृहस्थ भी नहीं है। संन्यासी होना तो बहुत मुश्किल है। जो जिंदगी को जी रहा है वह संन्यासी है। और जो सिर्फ जिंदगी जीने का इंतजाम कर रहा है, और जी नहीं रहा है, वह गृहस्थ है। जो सिर्फ जिंदगी का इंतजाम कर रहा है और जी नहीं रहा है वह गृहस्थ है। और जो जिंदगी को जी रहा है वह संन्यासी है।
अगर भागने की भाषा में सोचना हो तो गृहस्थ जिंदगी से भागा हुआ हो सकता है, संन्यासी भागा हुआ नहीं हो सकता। लेकिन हम भागे हुए संन्यासियों को जानते हैं। असल में हमने भागे हुओं को ही संन्यासी समझ रखा है। इसलिए बड़ी भूल हो गयी है। संन्यासी और जिंदगी से भागेगा? तो फिर जिंदगी को जीयेगा कौन? फिर जिंदगी को जीयेगा कौन? और संन्यासी अगर जिंदगी से भागेगा तो परमात्मा को फिर जानेगा कौन? क्योंकि कहीं अगर परमात्मा है तो जिंदगी में ही छिपा है। नहीं, संन्यासी जिंदगी को जीता है वह उसकी परिपूर्णता में। लेकिन निश्चित ही परिपूर्णता में जीने के लिए बहुत-सी बातें उससे छूटकर गिर जाती हैं। आप यह मत सोचना कि वह छोड़ देता है। मेरे हाथों में कंकड़-पत्थर भरे हों और मुझे हीरों की खदान मिल जाये और मैं पत्थर छोड़ दूं हाथ से और हीरों की खदान से हीरे बीनने लगूं और आप कहें कि यह आदमी बड़ा पागल मालूम होता है, इसने कंकड़-पत्थरों का त्याग कर दिया। तो पागल मैं हूं या आप? आपको हीरे नहीं दिखायी पड़ रहे हैं, आपको हीरे की खदानें नहीं दिखायी पड़ रही हैं। आपको सिर्फ इतना ही दिखायी पड़ रहा है कि मेरे हाथों में कंकड़-पत्थर थे, वे मैंने छोड़ दिये। मैं बड़ा त्यागी हूं। अब तक किसी संन्यासी ने कोई त्याग नहीं किया। सिर्फ नासमझ त्याग कर लेते हैं, बात दूसरी है।
संन्यासी तो और वृहत्तर आनंद को उपलब्ध हो जाता है, इसलिए क्षुद्र से उसे हाथ खाली करने पड़ते हैं। वह हाथ से छोड़ता नहीं है, चीजें छूट जाती हैं, बेमानी हो जाती हैं। अगर आपको हीरा मिल जाये तो आप पत्थर को हाथ में लेकर चलेंगे? या कि पत्थर आपको छोड़ना पड़ेगा? नहीं, पता ही नहीं चलेगा कि कब पत्थर हाथ से छूट गया और हीरा आ गया। हां, दूसरे, जिनके हाथों में अभी भी पत्थर हैं, वे समझेंगे कि बड़ा त्यागी आदमी है। उन्हें वह हीरा दिखायी नहीं पड़ रहा है। और कुछ ऐसे हीरे हैं जो दिखायी नहीं पड़ते। धर्म का उन्हीं हीरों से संबंध है जो दिखायी नहीं पड़ते। कुछ ऐसे भोग हैं जो दिखायी नहीं पड़ते।
संन्यासी वह नहीं है जिसने भोग छोड़ दिया, संन्यासी वह है जो भोग की पूर्णता को उपलब्ध हुआ, जो अब परमात्मा को भी भोग रहा है। इसे ठीक से ही समझ लेना–जो परमात्मा को भी भोग रहा है। जो भोजन कर रहा है तो सिर्फ भोजन ही नहीं कर रहा है, भोजन में परमात्मा का स्वाद भी समाविष्ट है। और जो अगर आपके सुंदर चेहरे को देख रहा है तो आपके सुंदर चेहरे को ही नहीं देख रहा है, आपके भीतर से जो सौंदर्य की अनंत धारा जुड़ी है प्रभु से, वह भी उसे दिखायी पड़ गयी है। संन्यासी का अर्थ है–वह जिसने भोग का राज जान लिया, जिसने जीवन के रस की उपलब्धि की कला, कीमिया सीख ली। लेकिन हम तो यही सोचते रहे हैं कि भागने वाला संन्यासी है। भागने वाला रुग्ण है, संन्यासी नहीं है। भागने वाला विक्षिप्त है। भागने वाला, जो हाथ में था कंकड़-पत्थर वह भी छोड़ दिया है, और हीरे तो उसे मिले नहीं। वह बड़ी मुश्किल में पड़ गया है। इसलिए जिसे हम इस देश में संन्यासी कह रहे हैं, सारी दुनिया में वह बड़ी मुश्किल में पड़ा हुआ आदमी है। उसने घर भी छोड़ दिया, पत्नी भी छोड़ दी, बच्चे भी छोड़ दिये, और परमात्मा भी उसे मिला नहीं। वह त्रिशंकु की भांति बीच में अटका रह गया।

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