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. “नाम जप की महिमा” एक बार की बात है सम्राट अकबर एवं बीरबल ने मार्ग में किसी ब्राह्मण को भीख माँगते देखा। राजा ने बीरबल से पूछा-: यह क्या, एक ब्राह्मण होकर भी ये भीख मांग रहा है ? बीरबल ने तत्काल उतर दिया-: महाराज ! ये पंडित भूला हुआ है। अकबर ने कहा-: तो इस पंडित को रास्ते पे लाओ। बीरबल ने कहा-: आ जायेगा राजन, थोड़ा समय लगेगा। कृप्या तीन माह की अवधि दीजिये। राजा ने स्वीकृति दे दी। शाम को बीरबल ब्राह्मण के घर गया और ब्राह्मण से विद्वान होकर भीख मांगने का कारण पूछा। ब्राह्मण के बताने पर बीरबल ने कहा-: कल से प्रात: आप ४ बजे जाग जायँ और मेरे लिये दो घण्टे इस मंत्र का जप कर दें शाम को एक स्वर्ण मुद्रा रोज आपके घर पहुँचा दी जायेगी। ॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ ॥हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ ब्राह्मण को पहले तो यह सुन कर आश्चर्य हुआ, किन्तु मन ही मन सोचा कि ऐसा करने में क्या हर्ज है ? जप करना स्वीकार कर लिया। पिछले जन्म के उनके पूरे कुल के सँस्कार शुभ थे। ४ बजे उठने और नाम जप करने में कोई कठिनाई भी नहीं हुई। रोज शाम को एक स्वर्ण मुद्रिका मिल जाने से धीरे-धीरे ब्राह्मण धनवान हो गया। राम नाम का अभ्यास करते करते, उनके दिव्य सँस्कारों ने दबे सुसंस्कारों को उभारा। एक दिन ब्राह्मण ने सोचा कि यदि बीरबल के लिय नाम-जप ने धनाढ्य बना दिया तो स्वयं के लिये जपने से तो लोक और परलोक दोनो धनाढ्य हो जायेंगे। ऐसा सोच कर रोज दो घण्टे खुद के लिये भी जपने लगा। भगवन नाम की ऐसी कृपा हुई की ब्राह्मण की कामनायें खत्म होने लगीं और एक दिन ब्राह्मण ने बीरबल से कहा-आप कृप्या सोने की मुद्रिका ना भेजें मैं अब केवल अपने लिये ही जप करूँगा। राम नाम की उपासना ने मेरा विवेक एवं वैराग्य जाग्रत कर दिया, कृष्ण भक्ति की लग्न लग गयी है अब मुझे। एक दिन ब्राहमण ने अपनी पत्नी से कहा-: श्री हरी कृपा से अपनी गरीबी दूर हो गयी है। सब ठीक हो गया अब आप अनुमति दें तो मैं एकान्त में रहकर राम नाम जप की साधना करना चाहता हूँ। पत्नी साध्वी थी, अत: उसने तुरंत स्वीकृति दे दी। अब ब्राह्मण देवता सतत प्रभु स्मरण में रंग गये। साधना फलने फूलने लगी। लोग दर्शनार्थ पधारने लगे, धीरे-धीरे बात राजा तक पहुँची तो अकबर भी एक दिन बीरबल के साथ महात्मा के दर्शन करने पधारे। वापिस लौटते समय अकबर ने कहा महात्मन, मैं भारत का बादशाह अकबर आपसे प्रार्थना करता हूँ :- यदि आपको किसी चीज की जरूरत पड़े तो नि:संकोच संदेश भिजवाईयेगा, तत्काल वह चीज आपको मिल जाएगी। ब्राह्मण देवता मुस्कुराये और बोले-: राजन आपके पास ऐसा कुछ भी नही है, जिसकी मुझे जरूरत हो। हाँ यदि आपको कुछ चाहिये तो माँगने में संकोच न करना। बीरबल ने कहा-: राजन, आपने पहचाना इनको ? ये वही ब्राह्मण हैं जो तीन माह पूर्व भीख माँग रहे थे। राम नाम के जप ने एक भिखारी को सच्चा दानी बना दिया है। यह सुनकर अकबर बड़े आश्चर्य में पड़ गए। यह महत्व है भगवान के पवित्र नामों का। अगर आप भी भौतिक इच्छाओं से परे होना चाहते हैं, तो हर दिन पहला काम यह करें; राम नाम का जप। यह भगवन नाम आप को भी अमीर बना देगा। चाह गई चिंता मिटी, मन हुआ बेपरवाह। जिनको कछु न चाहिये, वे शाहन के शाह॥ ये है राम नाम जप का प्रभाव जो एक भिखारी को भी सच्चा दानी बना देता है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"


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. “रोटी की कीमत” एक बादशाह ने अपने मुल्क में जुल्म, सितम कर के बहुत सा खजाना जमा किया और आबादी से बाहर जंगल में एक गार (गुफा) में सारे खजाने को ख़ुफ़िया तोर पर छुपा दिया था। उस खजाने की सिर्फ दो चाबियाँ थीं एक चाबी बादशाह के पास और एक उसके वजीर के पास थी इन दोनों के अलावा किसी को भी उस गुप्त खजाने का मालूम न था। एक दिन किसी को बताये बगैर बादशाह अकेला अपने खजाने को देखने निकला और गार का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया और अपने खजाने को देख-देख कर खुश हो रहा था और खजाने की चमक से खुश हो रहा था। उसी समय वजीर उस इलाके में आ गया, और उसने देखा की खजाने का दरवाजा खुला है वो हैरान हो गया और ख्याल किया कि कही कल रात जब मैं खजाना देखने आया था तब शायद खजाना का दरवाजा खुला रहे गया होगा, उसने जल्दी-जल्दी खजाने का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और चला गया। खजाने को निहार ने के बाद जब बादशाह का मन भर गया और दरवाजे के पास आया तो ये क्या दरवाजा तो बाहर से बंद हो गया था, उसने जोर-जोर से दरवाजा पीटना शुरू किया पर वहाँ उसकी आवाज़ सुने वाला उस जंगल में कोई ना था वो चिल्लाता रहा। आखिर वो थक हार के खजाने को देखता रहा, बादशाह भूख और पानी के लिये बेहाल हो रहा था दीवाना सा हो गया। वो रेंगता-रेंगता हीरो के संदूक के पास गया और बोला ए दुनिया के कीमती हीरों मुझे एक गिलास पानी दे दो, फिर मोती सोने चाँदी के पास गया और बोला ए मोती चाँदी सोने के खजाने मुझे एक समय का खाना दे दो, बादशाह को ऐसा लगा की हीरे मोती उसे बोल रहे हो की तेरे सारी ज़िन्दगी की कमाई तुझे एक गिलास पानी और एक समय का खाना नही दे सकती। बादशाह भूख से बेहोश हो के गिर गया और जब उसे होश आया तो सारे मोती हीरे बिखर के दीवार के पास अपना बिस्तर बनाया और उस पर लेट गया वो दुनिया को एक पैगाम देना चाहता था लेकिन उसके पास कागज़ और कलम नही था उसने पत्थर से अपनी उंगली फोड़ी और बहते हुए खून से दीवार पर कुछ लिख दिया। वजीर और पूरी फौज बादशाह को तलाश करते रहे पर बहुत दिनों तक बादशाह ना मिला तो वजीर बादशाह के खजाने को देखने आया तो वजीर ने देखा की बादशाह हीरे जवाहरात के बिस्तर पर मरा पड़ा है और उसकी लाश को कीड़े मकोड़े खा रहे थे और बादशाह ने दीवार पर खून से लिखा हुआ है:- "ये सारी दौलत एक घूँट पानी और एक निवाले के बराबर भी नही है।" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"


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. “भगवद्प्रसादनिष्ठ राजा” श्री जगन्नाथपुरी के राजा की भगवत्प्रसाद में बड़ी ही निष्ठा थी, परन्तु एक दिन राजा चौपड़ खेल रहा था, इसी बीच श्रीजगन्नाथ जी के पण्डाजी प्रसाद लेकर आये। राजा के दाहिने हाथ में फासा था। अतः उसने बायें हाथ से प्रसाद को छूकर उसे स्वीकार किया। इस प्रकार प्रसाद का अपमान जानकार पाण्डाजी रुष्ट हो गये। प्रसाद को राजमहल में न पहुँचाकर उसे वापस ले गये। चौपड़ खेलकर राजा उठे और अपने महल में गये। वहाँ उन्होंने नयी बात सुनी कि मेरे अपराध के कारण अब मेरे पास प्रसाद कभी नहीं आयेगा। राजा ने अपना अपराध स्वीकार कर अन्न-जल त्याग दिया। उसने मन में विचारा कि जिस दाहिने हाथ ने प्रसाद का अपमान किया है, उसे मैं अभी काट डालूँगा, यह मेरी सच्ची प्रतिज्ञा है। ब्राह्मणों की सम्मति लेना उचित समझकर राजा ने उन्हें बुलाकर पूछा कि यदि कोई भगवान् के प्रसाद का अपमान करे तो चाहे वह कोई अपना प्रिय अंग ही क्यों न हो, उसका त्याग करना उचित है या नहीं। ब्राह्मणों ने उत्तर दिया कि राजन् ! अपराधी का तो सर्वथा त्याग ही उचित है। राजा ने अपने मन में हाथ कटाना निश्चित कर लिया, परन्तु मेरे हाथ को अब कौन काटे ? यह सोचकर मौन और खिन्न हो गया। राजा को उदास देखकर मंत्री ने उदासी का कारण पूछा। राजा ने कहा-नित्य रात के समय एक प्रेत आता है और वह मुझे दिखाई भी देता है। कमरे की खिड़की में हाथ डालकर वह बड़ा शोर करता है। उसी के भय से मैं दुखी हूँ। मंत्रीने कहा- आज मैं आपके पलंग के पास सोऊँगा और आप अपने को दूसरी जगह छिपाकर रखिये, जब वह प्रेत झरोखे में हाथ डालकर शोर मचायेगा, तभी मैं उसका हाथ काट दूँगा। सुनकर राजा ने कहा-बहुत अच्छा ! ऐसा ही करो। रात होने पर मंत्रीजी के पहरा देते समय राजा ने अपने पलंग से उठकर झरोखे में हाथ डालकर शोर मचाया। मंत्री ने उसे प्रेत का हाथ जानकर तलवार से काट डाला। राजा का हाथ कटा देखकर मंत्रीजी अति लज्जित हुए और पछताते हुए कहने लगे कि मैं बड़ा मुर्ख हूँ, मैंने यह क्या कर डाला ? राजा ने कहा-तुम निर्दोष हो, मैं ही प्रेत था; क्योंकि मैंने प्रभु से बिगाड़ किया था। राजा की ऐसी प्रसादनिष्ठा देखकर अपने पण्डों से श्रीजगन्नाथ जी ने कहा कि अभी-अभी मेरा प्रसाद ले जाकर राजा को दो और उसके कटे हुए हाथ को मेरे बाग में लगा दो। भगवान् के आज्ञानुसार पण्डे लोग प्रसाद को लेकर दौड़े, उन्हें आते देख राजा आगे आकर मिले। दोनों हाथो को फैलाकर प्रसाद लेते समय राजा का कटा हुआ हाथ पूरा निकल आया। जैसा था, वैसा ही हो गया। राजा ने प्रसाद को मस्तक और हृदय से लगाया। भगवत् कृपा अनुभव करके बड़ा भारी सुख हुआ। पण्डे लोग राजा का कटा हुआ वह हाथ ले आये। उसे बाग में लगा दिया गया। उससे दौना के वृक्ष हो गये। उसके पत्र-पुष्प नित्य ही श्रीजगन्नाथ जी के श्रीअंग पर चढ़ते हैं। उनकी सुगन्ध भगवान् को बहुत प्रिय लगती है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"


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. “हम देने वाले कौन” आज हमने भंडारे में भोजन करवाया, आज हमने ये बाँटा, आज हमने वो दान किया। हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय प्रेरणादायक कथा पढ़िये:- एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियाँ काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक प्रार्थना उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना। कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। लकड़हारे ने उसे अपनी प्रार्थना की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- प्रभु ने बताया है कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष है और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके। समय बीता, साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा- ऋषिवर ! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी एक प्रार्थना उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूँ। अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी प्रार्थना सुन कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं। उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर गरीबों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया। लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुँच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया। यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियाँ काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा। कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा-ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता है। साधु ने समझाया, तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया, इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।

कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, कि जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया ! दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं तो कहते हैं मैंने दिलाया। वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने माध्यम मात्र बनाया है।
———-:::×:::———- "जय जय श्री राधे"


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इच्छा मृत्यु
जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले, तो काल आया और जैसे ही काल आया, मौत आई तो गीधराज जटायु ने कहा — खवरदार ! ऐ मौत ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना।मैं मौत को स्वीकार तो करूँगा; लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकती, जब तक मैं सीता जी की सुधि प्रभु श्री राम को नहीं सुना देता।
गीधराज जटायु ने कहा — मैं मौत से डरता नहीं हूँ ।तुझे मैं स्वीकार करूँगा; लेकिन मुझे तब तक स्पर्श नहीं करना, जब तक मेरे प्रभु श्री राम न आ जायँ और मैं उन्हें सीताहरण की गाथा न सुना दूँ ।
किन्तु महाभारत के भीष्म पितामह जो महान तपस्वी थे, नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे, 6 महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मौत का इंतजार करते रहे ।आँखों से आँसू गिरते थे।भगवान कृष्ण जब जाते थे तो मन ही मन हँसते थे; क्योंकि सामाजिक मर्यादा के कारण वहिरंग दृष्टि से उचित नहीं था; लेकिन जब जाते थे तो भीष्म के कर्म को देखकर मन ही मन मुसकराते थे और भीष्म पितामह भगवान कृष्ण को देखकर दहाड़ मारकर रोते थे।कन्हैया! मैं कौन से पाप का परिणाम देख रहा हूँ कि आज बाणों की शय्या पर लेटा हूँ ।भगवान कृष्ण मन ही मन हँसते थे, वहिरंग दृष्टि से समझा देते थे भीष्म पितामह को; लेकिन याद रखना वह दृश्य महाभारत का है, जब भगवान श्री कृष्ण खड़े हुए हैं, भीष्मपितामह बाणों की शय्या पर लेटे हैं, आँखों में आँसू हैं भीष्म के, रो रहे हैं ।भगवान मन ही मन मुसकरा रहे हैं ।
रामायण का यह दृश्य है कि गीधराज जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं, भगवान रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं ।बोलो भाई, वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान कृष्ण हँस रहे हैं और रामायण में जटायु जी हँस रहे हैं और भगवान राम रो रहे हैं ।बोलो, भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं?
अंत समय में जटायु को भगवान श्री राम की गोद की शय्या मिली; लेकिन भीषण पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली।जटायु अपने कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहा है, राम जी की शरण में, राम जी की गोद में और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं ।ऐसा अंतर क्यों?
ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था, विरोध नहीं कर पाये थे ।दुःशासन को ललकार देते, दुर्योधन को ललकार देते; लेकिन द्रौपदी रोती रही, बिलखती रही, चीखती रही, चिल्लाती रही; लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे।नारी की रक्षा नहीं कर पाये, नारी का अपमान सहते रहे ।उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और गीधराज जटायु ने नारी का सम्मान किया, अपने प्राणों की आहुति दे दी।तो मरते समय भगवान श्री राम की गोद की शय्या मिली।

जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं उनकी गति भीष्म जैसी होती है और जो अपना परिणाम जानते हुए भी औरों के लिए संघर्ष करता है उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है

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. “भगवान् की असीम दया का फल”
पोस्ट-03

गतांक से आगे:-
महाभारत की बात है महाराज युधिष्ठिर विराटनगर में वास करते थे तो भीष्म जी ने कौरवों की सभा में यह बात कही कि जिस जगह राजा युधिष्ठिर होंगे वहाँ कभी अकाल नहीं होगा। वहाँ कोई महामारी नहीं आयेगी। दैवी प्रकोप नहीं होगा। जहाँ राजा युधिष्ठिर होंगे वहाँ की प्रजा धर्मात्मा बनेगी; सत्यवक्ता होगी और उस देश में धन-धान्य बढेगा, धर्म बढेगा। बहुत-सी बातें कहीं। इन सब बातों को सुनकर दूतों ने बताया कि यह जो बात कहते हैं ये सारी बातें विराटनगर में मिलती हैं। इस आधार पर दुर्योधन ने विराटनगर पर चढ़ाई कर दी। यह ध्यान देना चाहिये कि राजा युधिष्ठिर का कितना भारी प्रभाव पड़ता था। वे जिस देश में वास करते थे, उस देश में धन-धान्य और धर्म की वृद्धि होती थी। वहाँ अकाल नहीं पड़ता था, महामारी नहीं आती थी। विराट नगर में युधिष्ठिर साल भर रहे, किन्तु इस पर किसी का भी लक्ष्य नहीं रहा कि युधिष्ठिर में ये गुण हैं। फिर भी राजा विराट ने युधिष्ठिर से लाभ उठाया और वहाँ के निवासियों ने लाभ उठाये। राजा विराट जब यह जान गये कि ये पाण्डव हैं तो विशेष लाभ उठाये। राजा विराट युधिष्ठिर से बोले कि मैं अपनी लड़की उतरा का विवाह अर्जुन के साथ करूँगा। लेकिन अर्जुन ने कहा कि नहीं, मेरा बेटा अभिमन्यु है, उसके साथ इसका विवाह कर सकते हैं क्योंकि इसे मैंने पढाया है। इसलिये यह मेरी लडके के समान है। विराट ने अभिमन्यु के साथ उतरा का विवाह कर दिया। इसी प्रकार कहीं भी कोई महात्मा रहे उस महात्मा के रहने से स्वाभाविक जो लाभ मिलना है वह तो मिलेगा ही, चाहे उसे जानें, चाहे न जानें। महात्मा को महात्मा जानने और मानने से विशेष लाभ होगा। उसको मानने से भी बहुत लाभ हो जाता है और मान लेने से आगे जाकर वह जान जाता है तथा जानने से विशेष लाभ हो जाता है, जानने से उसमें श्रद्धा हो जाती है और वह श्रद्धा यदि सकाम हो तो भी लाभदायक और निष्काम हो तो और भी लाभदायक है।
यही बात ईश्वर की भक्ति में है। बिना प्रभाव जाने ईश्वर की भक्ति यदि कोई करे तो उससे भी उसको लाभ होता है। जैसे अजामिल ने अपने लडके का नाम ‘नारायण’ रख लिया था। मृत्युकाल में यम के दूत उसे लेने आये तो उसने अपने लडके का नाम लिया – ‘नारायण-नारायण’। अजामिल तो समझता था कि मैं अपने लडके को बुला रहा हूँ। वह यह नहीं समझता था कि मेरे लडके का जो नाम है वही नाम भगवान् का भी है और इसका उच्चारण करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और जब पाप नष्ट हो जाते हैं तब वह यम के द्वार नहीं जाता। उसे यह ज्ञान नहीं था। जब भगवान् के पार्षद आये तब उसे यह ज्ञान हुआ। भगवान् के पार्षदों ने यमदूतों को मार भगाया और वह बच गया। फिर उसने हरिद्वार में जाकर भगवान् की भक्ति की, जिसके प्रभाव से उसका कल्याण हो गया। तात्पर्य यह कि बिना जाने भी भगवान् की भक्ति से लाभ होता है और यदि भगवान् को भगवान् मानकर भक्ति करे तो और भी विशेष लाभ हो जाय। फिर भगवान् के विषय में ज्ञान होने पर उसमें श्रद्धा हो जाय तो और भी अधिक लाभ हो सकता है। वह श्रद्धा यदि निष्काम हो तो उसके लाभ का ठिकाना ही नहीं है।
उपर्युक्त बात समझकर भगवान् के नाम का जप निरन्तर गुप्त-रूप से करना चाहिये। किसी से यह जानना नहीं चाहिये कि मैं जप करता हूँ जप भी एक-तार करना चाहिये। तार टूटने न दे। भगवान् के नाम का जप और भगवान् के स्वरूप का ध्यान शिवजी की भाँति एक-तार करे।
भगवान् के बहुत-से नाम हैं, उनमे कोई भी नाम, जिसमे अपनी श्रद्धा-भक्ति और विश्वास हो वही अपने लिये सबसे बढ़कर है। जैसे मुसलमानों के लिये अल्ला-खुदा, हिन्दुओं के लिये ओम, राम, हरि, गोविन्द, वासुदेव, नारायण आदि कोई भी भगवान् का नाम, जिस नाम के ऊपर अपनी श्रद्धा-भक्ति हो उसी नाम का जप निरन्तर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक करे। यदि भगवान् में प्रेम होने के लिये अथवा भगवान् की प्राप्ति के उद्देश्य से जप करे तो वह जप निष्काम के तुल्य है। यदि कोई भी कामना न करे तो भगवान् उसे समय पर अपने-आप मिलेंगे। अत: भगवान् की प्राप्ति की भी कामना न करे। इस प्रकार का भजन बहुत दामी है।
क्रमशः
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लेखनी: श्रद्धेय श्रीजयदयाल गोयन्दकाजी
पुस्तक: “उपदेशप्रद कहानियाँ” कोड: ६८०
प्रकाशक: गीताप्रेस, गोरखपुर "जय जय श्री राधे"


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अजामिल की पौराणिक कथा ,,,,,,,,,,
(हरी के नाम ” नारायण ” की महिमा )
अजामिल कान्यकुब्ज (प्राचीन कन्नौज) निवासी एक ब्राह्मण था। वह गुणी भी था और समझदार भी। उसने वेद-शास्त्रों का विधिवत अध्ययन प्राप्त किया था। अपने यहाँ आने वाले गुरुजन, सन्त तथा अतिथियों का सम्मान भी वह श्रद्धापूर्वक करता था। इसके साथ ही वह उनसे ज्ञान चर्चा भी किया करता था। उसके घर में नित्यप्रति देवपूजन, यज्ञ तथा ब्राह्मण भोजन कराया जाता था। पूजन विषयक समस्त व्यवस्थायें स्वयं अजामिल देखा करता था। वह प्रयास करता था कि पूजन में प्रयुक्त होने वाली सामग्री फल-फूल तथा समिधाएँ पवित्र और श्रेष्ठ हों। वह वन तथा उपवन में जाकर इन सामग्रियों को एकत्र करता था।
प्रेम प्रसंग
एक दिन अजामिल वन से पूजन सामग्री एकत्रित कर घर लौट रहा था, तो उसने देखा एक कुंज में कोई युवक स्त्री के साथ प्रेम में लिप्त था। अजामिल ने संस्कारवश अपने आपको यह देखने से रोकने का पूरा प्रयत्न किया, किन्तु सफल न हो सका। वह बार-बार इस प्रेम प्रसंग को देखकर आनन्दित होने लगा। बाद में उसने स्त्री से परिचय प्राप्त किया। यह ज्ञात होने पर कि वह वैश्या है, अजामिल प्रतिदिन उसके यहाँ जाने लगा। संसर्ग से धीरे-धीरे उसके सत्कर्म प्रभावित होने लगे और वह वैश्या की प्रत्येक कामना की तुष्टि के लिए तरह-तरह के दुष्कर्मों में लिप्त होता गया। उसने चोरी, डकैती और लूट-पाट शुरू कर दिए। हत्याएँ करने लगा तथा किसी भी प्रकार से धन प्राप्ति हेतु अन्यायपूर्ण कर्म करके उसे सन्तुष्टि प्राप्त होने लगी। स्थिति यह हुई कि वैश्या से अजामिल को नौ पुत्र प्राप्त हुए तथा दसवीं सन्तान उसकी पत्नी के गर्भ में थी।

सन्त समूह का आगमन
एक दिन कुछ सन्तों का समूह उस ओर से गुजर रहा था। रात्रि अधिक होने पर उन्होंने उसी गांव में रहना उपयुक्त समझा, जिसमें अजामिल रहता था। गाँव वालों से आवास और भोजन के विषय में चर्चा करने पर गाँव वालों ने मजाक बनाते हुए साधुओं को अजामिल के घर का पता बता दिया। सन्त समूह अजामिल के घर पहुँच गया। उस समय अजामिल घर पर नहीं था। गाँव वालों ने सोचा था कि आज ये साधु निश्चित रूप से अजामिल के द्वार पर अपमानित होंगे तथा इन्हें पिटना भी पड़ेगा। आगे से ये स्वयं ही कभी इस गाँव की ओर कदम नहीं रखेंगे। सन्त मण्डली ने उसके द्वार पर जाकर राम नाम का उच्चारण किया। घर में से उसकी वही वैश्या पत्नी बाहर आई और साधुओं से बोली- “आप शीघ्र भोजन सामग्री लेकर यहाँ से निकल जायें अन्यथा कुछ ही क्षणों में अजामिल आ जायेगा और आप लोगों को परेशानी हो जायेगी।” उसकी बात सुनकर समस्त साधुगण भोजन की सूखी सामग्री लेकर उसके घर से थोड़ी ही दूरी पर एक वृक्ष के नीचे भोजन बनाने का उपक्रम करने लगे। भोजन बना, भोग लगा और सन्तों ने जब पा लिया, तब विचार किया कि यह भोजन किसी संस्कारी ब्राह्मण कुलोत्पन्न के घर का है। किन्तु समय के प्रभाव से यह कुसंस्कारी हो गया है।

पुत्र की प्राप्ति
सभी सन्त पुन: फिर से अजामिल के घर पहुँचे। उन्होंने बाहर से आवाज़ लगाई। अजामिल की स्त्री बाहर आई। सन्तों ने कहा- “बहन हम तुमसे एक बात कहने आये हैं।” स्त्री ने बताने के लिए कहा। सन्तों ने कहा- “तुम्हारे यहाँ जन्म लेने वाले शिशु का नाम ‘नारायण’ रखना।” संतगणों के ऐसा कहने पर अजामिल की स्त्री ने उन्हें ऐसा ही करने का वचन दिया। अजामिल की स्त्री ने दसवीं सन्तान के रूप में एक पुत्र को ही जन्म दिया, और उसका नाम ‘नारायण’ रख दिया। नारायण सभी का प्रिय था।

अन्त समय
अब अजामिल स्त्री और अपने पुत्र के मोह जाल में लिपट गया। कुछ समय बाद उसका अंत समय भी नजदीक आ गया। अति भयानक यमदूत उसे दिखलाई पड़े। भय और मोहवश अजामिल अत्यंत व्याकुल हुआ। अजामिल ने दु:खी होकर नारायण! नारायण! पुकारा। भगवान का नाम सुनते ही विष्णु पार्षद उसी समय उसी स्थान पर दौड़कर आ गए। यमदूतों ने जिस फाँसी से अजामिल को बांधा था, पार्षदों ने उसे तोड़ डाला। यमदूतों के पूछने पर पार्षदों ने धर्म का रहस्य समझाया। यमदूत नहीं माने। वे अजामिल को पापी समझकर अपने साथ ले जाना चाहते थे। तब पार्षदों ने यमदूतों को डांटकर वहाँ से भगा दिया। हारकर सब यमदूतों ने यमराज के पास जाकर पुकार की। तब धर्मराज ने कहा कि “तुम लोगों ने बड़ा नीच काम किया है। तुमने बड़ा अपराध किया है। अब सावधान रहना और जहाँ कहीं भी, कोई भी किसी भी प्रकार से भगवान के नाम का उच्चारण करे, वहाँ मत जाना।” यमराज ने यमदूतों से कहा “अपने कल्याण के लिए तुम लोग स्वयं भी ‘हरी’ का नाम और यश का गान करो।”

विशेष ,,,,,,, १. पाप भय को उत्पन्न करता है २. प्रभु का नाम आनंद एवं धार्मिक भाव को उत्पन्न करता है ! ३. तामसिक मनोवृत्तियों को नियंत्रण में करने के लिए अच्छी संगत करिये , ज्ञान एवं नैतिकता से भरपूर पुस्तके आप के अच्छे साथी हो सकती है !
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🙏🌷 मां लक्ष्मी जी की एक लोक कथा 🌷🙏

प्राचीन काल में एक यशस्वी राजा थे ! एक बार उनकी पत्नी दमयंती ने अपनी सेविका को गले में गाँठ लगा पीला डोरा बाँधे देखा तो रानी दमयंती ने उस डोरे के बारे में पूछ ही लिया तो उसने उत्तर दिया, यह मां लक्ष्मी का डोरा है !
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दमयंती ने पूछा इससे क्या होता है. सेविका ने कहा, इसके पहनने से घर में सुख सम्पत्ति आती है और पहले से हो तो और भी बढ जाती है1 रानी को अच्छा लगा. उसने भी एक डोरा ले कर 16 गांठे दे कर अपने गले में बाँध लिया.
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रात में राजा नल ने दमयंती से गले के पीले डोरे के बारे में पूछा तो रानी ने सारी बातें बता दीं, इस पर नल ने कहा, हमें किस बात की कमी है और उस डोरे को तोड कर फेंक दिया !
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कुछ देर बाद राजा को सपने में एक औरत दिखी जो कह रही थी- ” मैं जा रही हूँ. उसी समय एक दूसरी औरत भी वहां आ गयी बोली मैं आ रही हूँ. नल को यही सपना बारह दिन तक रोज आता रहा तो वह उदास रहने लगा.
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दमयंती ने पूछा कि उदास क्यों हैं तो राजा ने कहा, समझ में नहीं आता वे दोनों औरतें कौन हैं. अगली बार राजा ने उन दोनों का नाम पूछा तो पहली बोली मैं लक्ष्मी हूँ और दूसरी ने अपना नाम दरिद्रा बताया. जल्द ही राजा नल को पता चला कि पखवारे भर के भीतर उनका सब धन जाता रहा है.
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वे इतने गरीब हो गये कि खाने तक को न रहा. वे जंगल में कन्द मूल खाकर रहने लगे. एक दिन उनके पाँच बरस के बेटे को भूख लगी तो दमयंती ने नल से मालिन के यहाँ से छाछ माँगकर लाने को कहा. मालिन ने राजा को छाछ देने से मना कर दिया.
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एक दिन जंगल में बेटे को सांप ने डस लिया. वे पुत्ररत्न खो कर दुःखी थे कि राजा नहा कर धोती सुखा रहा था तभी तेज हवा धोती उडा ले गई. रानी ने अपनी आधी साड़ी फाड़ कर नल को दी. बाद में राजा खाने के दो तीतर मार लाया, रानी ने तीतर भूने तो भुने तीतर उड गये.
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वे भूखे प्यासे आगे बढे तो रास्ते में राजा के दोस्त का घर पडा. उसने दोनों को जिस कमरे में ठहराया था वहाँ रखे लोहे के औजार और सामान धरती में समा गए. चोरी का इल्जाम लगने के डर से वे वहां से भाग गये.
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आगे चलकर राजा की बहन का घर पडा. राजा की बहन ने पुराने महल में ठहराया और सोने के थाल में उन्हें खाना भेजा तो थाल मिट्टी की परात में बदल गया. परात को जमीन में गाडकर वे फिर भाग निकले.
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रास्ते में एक साहूकार का घर आया. साहूकार ने नल और दमयंती के ठहरने की व्यवस्था जिस हवेली में की वहाँ खूंटी पर हीरों का हार टंगा था. पास ही दीवार पर मोर का चित्र बना था. देखते ही देखते मोर हार को निगलने लगा. यह अचरज देखकर वे वहाँ से भी चोरी के डर से भाग चले
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दमयंती ने सलाह दी कि शहर की ओर भागने से बेहतर है जंगल में कुटिया बनाकर रहा जाये. वे जंगल में तो नहीं गये पर एक सूखे बगीचे में रहने लगे. दोनो बगीचे को सींचते और देख रेख करते.
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दोनों की मेहनत से वह बगीचा हरा भरा हो गया तो एक दिन बगीचे का मालिक वहाँ आया और खुश हो कर पूछा तुम दोनों कौन हो. नल और दमयंती ने कहा हम राहगीर हैं. नौकरी खोजते हैं. बाग़ के मालिक ने उन्हें अपने यहां नौकर रख लिया.
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एक दिन बाग की मालकिन ने सम्पदा देवी की कथा करवायी. सबको बुलवाया. दमयंती भी गयी थी उसने भी कथा सुनकर सम्पदा देवी का डोरा ले लिया. राजा ने रानी से फिर पूछा ये कैसा डोरा पहना है ?
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दमयंती बोली यह वही डोरा है जिसे आपने एक बार तोडकर फेंक दिया था. हमें इतनी विपत्तियाँ झेलनी पडी. सम्पदा देवी हम पर नाराज हो गयीं. दमयंती ने कहा, यदि सम्पदा माता सच्ची हैं तो हमारे दिन फिर से लौट आएगे.
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उसी रात नल ने सपना देखा. एक स्त्री कह रही हैं मैं जा रही हूँ, दूसरी स्त्री मैं आ रही हूँ. राजा के पूछने पर पहली औरत ने अपना नाम दरिद्रा तो दूसरी ने लक्ष्मी बताया. राजा ने लक्ष्मी से पूछा अब तो नहीं जाओगी.
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लक्ष्मी बोली यदि तुम्हारी पत्नी सम्पदा का डोरा लेकर कथा सुनती रहेगी तो कभी नही पर तुम डोरा तोड दोगे तो चली जाऊँगी. उधर बाग की मालकिन किसी रानी को हार देने जाती थी उस हार को दमयन्ती गूंथती थी.
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रानी को दमयंती का बनाया हार बहुत पसंद आया. रानी के पूछने पर बाग़ की मालकिन ने बताया कि उसकी नौकरानी ने बनाया है. रानी ने बाग की मालकिन से दोनों के नाम पूछने को कहा. उसने नाम पूछे तो पता चला कि वे नल दमयंती हैं. बाग का मालिक ने उन्हें आदर सहित कुछ धन दिया और उनसे क्षमा माँगने लगा.
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अब नौकरी न हो सकती थी, सो दोनों अपने राजमहल की तरफ चले. रास्ते में साहूकार का घर आया. यहाँ वे उसी कमरे में ठहरे तो देखा कि दीवार पर बना मोर नौलखा हार उगल रहा है. साहूकार ने यह चमत्कार देख राजा के पैर पकड लिये और खूब सारा धन भेंट किया.
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आगे चलने पर बहन के घर आया. नल उसी पुराने महल में ठहरा जहां मिट्टी की परात दबायी थी. वह जगह खोदी तो हीरे जड़ा थाल निकला. राजा ने बहन को बहुत सा धन भेंट में दे आगे चल दिया.
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इसके बाद नल दमयंती मित्र के घर पहुँचे और उसी कमरे में ठहरे जिसमें पहले रुके थे. मित्र के लोहे के औजार और सब सामान सही सलामत मिल गये. उसने उपहार दे विदा किया.
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आगे चलने पर उसकी धोती एक पेड़ पर उलझी हुई मिल गयी. तो राजकुमार जिसको सांप ने डस लिया था उसी के साथ खेलता हुआ मिल गया.
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अपने महलों में पहुचने पर दमयंती की सखियों ने मंगल गान गाया और नल का उसके मंत्रियों और अधिकारियों ने जी खोल कर स्वागत किया. संपदा जी (लक्ष्मी) कथा ने उनके बुरे दिन अच्छे दिनों में बदल दिये.
विशेष। ….. प्रचलित लोक कथाएं हमें लक्ष्मी एवं दरिद्रा के आने पर हमारे जीवन में आने वाले बदलाव की ओर संकेत करती है और त्रिगुणात्मक श्रष्टि के विभिन्न प्रभाव को दर्शाती है जिससे मानव तमोगुणी विचार ( काम, क्रोध , मद, लोभ एवं मोह ) को धारण ना करे ! इस कथा में पीला धागा एवं १६ गांठ को जो महत्व दिया गया है वो संभवतः हिन्दू मान्यताओं में धागे अनेक प्रकार से हमें अपने कर्तव्यों का ” स्मरण” करने हेतु प्रयोग होता है ! जैसे रक्षा बंधन , यज्ञोपवीत एवं कन्याओ को नवरात्रो में बांधते है ! परन्तु उस धागे को तोडना राजा के अहंकार ( अहंकार एक तामसिक वृत्ति है ) को दर्शाता है ! दरिद्रा भी तामसिक है अतः लक्ष्मी एवं दरिद्रा दोनों का स्वप्न में आने का तातपर्य स्पष्ट है की “घर से सतोगुण जा रहा है और तमोगुण आ रहा है !
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भवसागर से पार होने के लिये मनुष्य शरीर रूपी सुन्दर नौका मिल गई है। सतर्क रहो कहीं ऐसा न हो कि वासना की भँवर में पड़कर नौका डूब जाय।
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मानसिक मल या मन की मैल

जब मन विषयों में आसक्त रहता है तो उसे मानसिक मल कहते हैं। जब संसार की मोहमाया व विषयों से वैराग्य हो जाए तो उसे मन की निर्मलता कहते हैं।

मानसिक तीर्थ,,,

सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रह:।।
सर्वभूतदया तीर्थं तीर्थमार्जवमेव च।
दान तीर्थं दमस्तीर्थं संतोषस्तीर्थमेव च।।
ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं नियमस्तीर्थमुच्यते।
मन्त्राणां तु जपस्तीर्थं तीर्थं तु प्रियवादिता।।
ज्ञानं तीर्थं धृतिस्तीर्थमहिंसा तीर्थमेव च।
आत्मतीर्थं ध्यानतीर्थं पुनस्तीर्थं शिवस्मृति:।।

अर्थात्—सत्य तीर्थ है, क्षमा तीर्थ है, इन्द्रियनिग्रह तीर्थ है, सभी प्राणियों पर दया करना, सरलता, दान, मनोनिग्रह, संतोष, ब्रह्मचर्य, नियम, मन्त्रजप, मीठा बोलना, ज्ञान, धैर्य, अहिंसा, आत्मा में स्थित रहना, भगवान का ध्यान और भगवान शिव का स्मरण—ये सभी मानसिक तीर्थ कहलाते हैं।
शरीर और मन की शुद्धि, यज्ञ, तपस्या और शास्त्रों का ज्ञान ये सब-के-सब तीर्थ ही हैं। जिस मनुष्य ने अपने मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया, वह जहां भी रहेगा, वही स्थान उसके लिए नैमिष्यारण, कुरुक्षेत्र, पुष्कर आदि तीर्थ बन जाएंगे।

अत: मनुष्य को ज्ञान की गंगा से अपने को पवित्र रखना चाहिए, ध्यान रूपी जल से राग-द्वेष रूपी मल को धो देना चाहिए और यदि वह सत्य, क्षमा, दया, दान, संतोष आदि मानस तीर्थों का सहारा ले ले तो जन्म-जन्मान्तर के पाप धुलकर परम गति को प्राप्त कर सकता है।

‘भगवान के प्रिय भक्त स्वयं ही तीर्थरूप होते हैं। उनके हृदय में भगवान के विराजमान होने से वे जहां भी विचरण करते हैं; वही महातीर्थ बन जाता है।
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” जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !”

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  • માઁ *
    મોટાં મોટાં બંગલાવાળા શેઠોના એરિયામાં એક માણસ નીકળ્યો અને કોઈ વસ્તું વેંચવા નીકળ્યો હોય એ અદાથી બોલવા લાગ્યો, “ઊંઘ લેવી….. ઊંઘ….. “
    બધાંને ભારે આશ્ચર્ય થયું કે આ માણસ પાગલ તો નથી ને ?
    તેવામાં અનિંદ્રા થી પીડિત એક શેઠ તેની પાસે ગયાં અને બોલ્યાં, “ભાઈ, મને ઊંઘ નથી આવતી.”
    તે માણસ બોલ્યો, ” શેઠ, એક કલાક માટે તમે બધાં ઘરની બહાર નીકળો.
    હું એક કલાકમાં તમને એવું ઓશીકું બનાવી આપું કે ત્યાં માથું ટેકવ્યા બાદ તરત જ ઊંઘ આવી જશે.
    ” શેઠને મનમાં શંકા ઉપજી કે, ” આ ચોરીનાં ઇરાદે તો નહિ આવ્યો હોય ને ?” કેટલીક શંકા – કુશંકાઓ શેઠ મનમાં કરવાં લાગ્યાં.
    શેઠને વિચાર મગ્ન જોઈને, તેનાં મોં પરના ભાવો કળીને કુશળ માણસ બોલી ઉઠ્યો,
    ” શેઠ, તમે ચિંતા ન કરો. મારો ઈરાદો ચોરી કરવાનો નથી.”
    શેઠે તે માણસ પર વિશ્વાસ મૂકીને પોતાનું ઘર એક કલાક સોંપી દીધું.
    તે માણસે એક કલાકમાં ઓશીકું તૈયાર કરી આપ્યું. શેઠને આપ્યું. શેઠે કહ્યું કે,
    “આજ રાત્રે જોઈ જોવું કે કેવીક ઊંઘ આવે છે પછી તમને પૈસા આપીશ.”
    આખરે તો શેઠ ને !
    ખાતરી કર્યા વિના પૈસા થોડા આપે ?
    તે માણસ હસતાં હસતાં બોલ્યો, ” શેઠ, મારે કંઈ પૈસાની ઉતાવળ નથી. હું જ્યારે ફરતો ફરતો તમારે ઘરે આવીશ ત્યારે હું જે માંગુ તે તમારે મને આપવું પડશે. બોલો છે મંજૂર?”
    શેઠ બોલ્યા, ” ભાઈ, મારી ઊંઘ – મારાં આરામના બદલામાં જે જોઈતું હોય તે તું લઈ શકે છે.”
    શેઠની વાત સાંભળીને પ્રસન્ન થઈને તે માણસ ચાલી નીકળ્યો.
    તે રાત્રિએ શેઠને ઘસઘસાટ ઊંઘ આવી.
    શેઠે પોતાનાં આડોશી – પાડોશી ને આ વાત કરી. બધાં ને તે માણસને મળવાની ઉત્સુકતા થઈ. કેટલાકને થયું કે તે માણસ તંત્ર – મંત્રનો જાણકાર હશે જેથી આવું જાદુઈ ઓશીકું બનાવી શક્યો.
    થોડાં દિવસો બાદ ફરી એ માણસ આવ્યો.
    બધાં શેઠનાં પાડોશીઓ અને સગા – વ્હાલાં જાદુઈ ઓશિકા માટે પડાપડી કરવાં લાગ્યાં.
    ધીરે – ધીરે આખી શેરીના લોકોને તે માણસે આ જાદુઈ ઓશીકું બનાવી આપ્યું.
    બધાં ને ઘસઘસાટ ઊંઘ આવવાં લાગી !
    જ્યારે પૈસાનું પૂછ્યું ત્યારે કહ્યું કે, *” શેઠ લોકો, હું એક મહિના પછી તમારી બધાની પાસે આવીશ.
    તમે બધાં ભેગાં થજો.
    હું આપની પાસે મારાં મહેનતાણા ની માંગણી કરીશ.” તે માણસ ચાલી નીકળ્યો.
    મહિના બાદ તે આવ્યો.
    બધાં શેઠ લોકોએ તે માણસનું ફૂલ હારથી સ્વાગત કર્યું.
    કોઈએ પાણી પાયું, કોઈ ચા અને શરબત લઈ આવ્યા. બધાએ તેની આગતા – સ્વાગતા કરી. તે માણસે બધાં શેઠને બોલાવીને મિટિંગ કરી બધા એ પૂછ્યું, ” બોલો ભાઈ, તમારે શું અપેક્ષા છે?
    તમે કહો તે પૈસા આપીએ. રહેવાનું ઠેકાણું ન હોય તો ઘર બનાવી આપીએ.
    આપ જે બોલો તે અમો કરી આપવા તૈયાર છીએ.”
    તે માણસે કહ્યું, ” ગમે તે એક ઘરમાંથી મે બનાવેલું જાદુઈ ઓશીકું મંગાવી આપો.”
    એક શેઠ ઓશીકું લઈ આવ્યાં.
    તે માણસ બોલ્યો, ” હું તમને મારી કહાની કહેવા માંગીશ.”
    *”હું પણ તમારી જેમ સંપત્તિવાન શેઠ જ છું. મારી પત્નીના કહેવા પ્રમાણે હું મારી માતાને વૃદ્ધાશ્રમ મૂકી આવ્યો હતો તે દિવસથી મારી ઊંઘ હરામ થઈ ગઈ હતી.*
    મારી માતા એ વૃધ્ધાશ્રમમાં અંતિમ શ્વાસ લીધો, ત્યાંના વ્યવસ્થાપકો એ મને ફોન કરીને બોલાવ્યો, મે મારી માતાની અંતિમ વિધિ સંપન્ન કરી.
    માતાની યાદગીરી રૂપે તેમનો સાડલો મારાં ઘરે લઈ આવ્યો. તે રાત્રે મારાં મોં પર સાડલો વીંટાળીને માં ને યાદ કરીને ખૂબ જ રડ્યો, તે રાત્રે શું જાદુ થયો કે મને ઘસઘસાટ નીંદર આવી ગઈ ! તે રાતથી રોજ હું મારી માતાના સાડલા ને પાસે રાખીને સૂવું છું, મને સારી નીંદર આવે છે.
    “એકવાર અચાનક રાત્રે મને મારી માં સપનામાં આવી અને બોલી, ” બેટા, તે ભલે મને વૃદ્ધાશ્રમ માં મોકલી, મને કોઈ વાંધો ન હતો, તું તો મારો પેટ જણ્યો હું કાયમ તારું ભલું ઇચ્છું છું પણ બેટા, દુનિયામાં બીજી માં કોઈ ને કોઈ વૃધ્ધાશ્રમમાં જીવન ગુજારી રહી છે, તેમને ઘરે પાછી લાવ તો મને મોક્ષ થશે બેટા !”
    હું ઊંઘમાંથી સફાળો જાગી ગયો અને મને પ્રેરણા થઈ. હું આસપાસના વિસ્તારમાં ફર્યો અને માહિતી મેળવી કે કોનાં ઘરની માં વૃધ્ધાશ્રમમાં છે? મે સર્વે કર્યો.
    હું તમારાં બધાની માતાને મળવા વૃધ્ધાશ્રમમાં ગયો હતો અને વચન આપ્યું હતું કે થોડાક મહિનામાં જ હું તમને તમારા ઘરે આદર સાથે લાવીશ.
    તે માણસે શેઠનાં ઓશિકાનું કવર કાઢ્યું તો ગાદી અને કવરની વચ્ચે કેટલાક સાડલાના લીરા અને કટકા ગોઠવેલાં હતાં.
    તે માણસ બોલ્યો, ” જે ઘરમાં હું ઓશીકું બનાવવાં ગયો ત્યાં ત્યાં તેમની માતાના સાડલાનાં લીરાં લેતો આવ્યો અને ઓશિકા વચ્ચે ગોઠવી દીધાં.
    તમારી ઊંઘનું રહસ્ય કોઈ જાદુ નથી પણ તમારી માતાઓ નો પ્રેમ છે, મારે કોઈ પૈસા નથી જોઈતા પણ હું જે તમારી માતાને વચન આપીને આવ્યો છું તે તમે પૂરું કરજો.” આટલું બોલીને માણસ અટકી ગયો !
    બધેય નીરવ શાંતિ હતી. તમામ શેઠ જનોની આંખોમાં પસ્તાવાના આંસૂ હતા. બધા જ લોકોએ વચન નિભાવ્યું. આજે ઘરે ઘરે માતાની સન્માન ભેર પધરામણી થઇ છે.
    સંતોષ પામીને તે માણસ હવે બીજી શેરી અને બીજા ઘરોની મુલાકાતે નીકળ્યો છે. કદાચ એ તમારાં ઘરે પણ આવશે, શું તમે તેનાં માટે બારણું ખોલશો ને ???
  • હિતેશ રાયચુરા
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સારો_માણસ

માથે દિવાળીનો તહેવાર હતો , એટલે આજે રવિવારે પણ અડધો દિવસ બજાર ખુલી હતી.. સુભાષભાઈને બાળકોના કપડાંની દુકાન હતી.. જે હવે બેય દિકરા જ ચલાવતા.. પણ આજે મોટાને બહાર જવાનું થયું , એટલે મદદ કરવા એ દુકાને ગયા હતા..
બપોરે પાછા આવતી વખતે , રસ્તામાંથી દ્રાક્ષ , દાડમ અને સફરજન છોકરાંઓ માટે લેતા આવ્યા.. છોકરાં યે પુરા છ.. , બે મોટાના .. બે નાનાના.. ને વેકેસનમાં આવેલી વચેટ દિકરીના બે..
રોજની જેમ જમીને આરામમાં ગયા પછી ચારેક વાગ્યે ઉઠ્યા.. ત્યાં ધીંગામસ્તી વાળું ટોળું આવી ગયું.. સુભાષભાઈએ ભાતભાતની માંગણીઓ અને ઉતાવળ વચ્ચે.. કોઈને સફરજન સુધારી આપ્યું.. કોઈકને દાડમના દાણા કાઢી દીધા..
ખાવાનું પુરું થયું.. પાછળથી ગળે ટીંગાઈને રમત કરતી ચકુડીએ કહ્યું..
” દાદા.. આજે શેની વારતા કહેશો..?”
” જુઓ.. શાંતિથી બેસો.. આજે રાજા કે પરીની નહીં.. પણ મારી જ વારતા કહીશ..”
” આજે સવારે.. આપણી દુકાને એક નાનો છોકરો એના પપ્પા સાથે આવ્યો.. એના જન્મદિવસ માટે કપડાં લીધા.. પૈસા દેવા આવ્યા ત્યારે એના પપ્પા પાસે પચાસ રુપિયા ઓછા નિકળ્યા.. એટલે મેં કહ્યું કે .. ‘તમે ઓળખીતા પાસેથી પૈસા લઈ આવો.. હું આ પેકેટ અહીં રાખું છું.. દુકાન બપોર સુધી ખુલ્લી છે ’ .. કલાક પછી એ પૈસા આપી પેકેટ લઈ ગયા..
” પછી શું થયું.. એ કહું.. દુકાનેથી હું આવતો હતો.. રસ્તામાં ફળવાળાની લારી જોઈ.. એટલે મન થયું.. કે લાવ છોકરાંઓ માટે લેતો જાઉં.. મેં દ્રાક્ષ , દાડમ અને સફરજન લીધાં.. ખીસ્સામાં જોયું.. તો પાકીટ ના મળે.. દુકાને ભૂલાઈ ગયું હતું.. મેં ફળની થેલી પાછી આપી.. એટલે ફળવાળાએ કહ્યું.. ‘દાદા.. પૈસા ભૂલાઈ ગયા હોય તો કાલે આપી જજો.. હું કાયમ અહીં જ લારી રાખું છું’…. ને.. હું તમારા માટે આ ફળ લઈ આવ્યો..
એમ કહી એણે વાત પુરી કરી.. અને છોકરાંઓને પુછ્યું..
” બોલો છોકરાંવ.. હું સારો માણસ કહેવાઉં.. કે ફળવાળો..?”
સૌ એકી સાથે બોલ્યા .. ” ફળવાળો..”
ત્યાં રાજલ બોલી..” નાનાબાપા.. અમારી ટીચર કહે છે કે .. ‘આપણાથી ભૂલ થઈ જાય તો , ભગવાન પાસે માફી માંગી લઈએ .. તો એ માફ કરી દે.. ને આપણને સારા માણસ બનાવી દે’ .. મને એ ગીત ગાતાં આવડે છે.. ગાઉં..?”
એ પલોંઠી વાળીને બેસી ગઈ.. હાથ જોડ્યા.. આંખો મીંચી.. ને ગાવા લાગી..
” ઈતની શક્તિ હમેં દેના દાતા.. મનકા વિશ્વાસ કમજોર હો.. ના..”
બીજા છોકરાં પણ જોરજોરથી ગાવા લાગ્યા..
ત્યાં નાની વહુ ચા લઈને આવી.. આવું દૃષ્ય જોઈ, હસતી હસતી કપ મુકીને ચાલી ગઈ..

  • જયંતીલાલ ચૌહાણ ૧૪-૬-૨૧