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शोले

1970 के दशक की मशहूर फ़िल्म शोले का वह संवाद कौन भूल सकता है जो मौसी और जयदेव (अमिताभ बच्चन) के बीच हुआ था।

अब 1955 में प्रकाशित इब्ने सफ़ी (1928-1980) के एक जासूसी नाविल #ख़ौफ़नाक_इमारत का एक संवाद देखें :

और फिर आध घंटे बाद वह (अली इमरान) टिपटाॅप नाइट क्लब में दाख़िल हो रहा था। लेकिन दरवाज़े में क़दम रखते ही महकमए-सुराग़ रसानी के एक डिप्टी डाइरेक्टर से मुडभेड़ हो गई जो उसके बाप का क्लास फ़ेलो भी रह चुका था।

“ओहो साहबज़ादे, तो अब इधर भी दिखाई देने लगे हो।”

“जी हाँ। अक्सर फ़्लश खेलने के लिए चला आता हूँ” इमरान ने सर झुकाकर बड़ी सआदतमंदी से कहा।

“फ़्लश! तो क्या अब फ़्लश भी,,,”

“जी हाँ, कभी-कभी नशे में दिल चाहता है।”

“ओहो,,,,तो शराब भी पीने लगे हो?”

“वह क्या अर्ज़ करूँ। क़सम ले लीजिए जो कभी तन्हा पी हो। अक्सर शराबी तवायफ़ें भी मिल जाती हैं जो पिलाए बग़ैर मानती ही नहीं।”

“लाहौल वला क़ुव्वत,,,तो तुम आजकल रहमान साहब (महकए-सुराग़ रसानी के डाइरेक्टर जनरल और इमरान के वालिदे-माजिद) का नाम उछाल रहे हो।”

“अब आप ही फ़रमाइए” , इमरान मायूसी से बोला, “जब कोई शरीफ़ लड़की न मिले तो क्या किया जाए। वैसे क़सम ले लीजिए जब कोई मिल जाती है तो मैं तवायफ़ों पर लानत भेजकर ख़ुदा का शुक्र अदा करता हूँ।”

और भी पुराने श्लोक, Dr Balram Shukla के सौजन्य से–

भिक्षो, मांसनिसेवणम्‌ प्रकुरुषे, किं तेन मद्यं बिना।
मद्यं चापि तवप्रिय, प्रियमहो वारांगनाभि: सह॥ तासामर्थ्यरुचि: कुतस्तव धनम्‌, द्यूतेन चौर्येण वा।
द्यूतं चौर्यपरिग्रहोपि भवत:, नष्टस्य कान्या गति:॥”

[ ‘अरे भिखारी, तुम मांस भी खाते हो?’ ‘ख़ाता तो हूँ, लेकिन शराब के बिना उसे खाने में क्या मज़ा!’ ‘तो तुम्हें शराब भी प्रिय है?’ ‘प्रिय तो है, लेकिन जब तवायफ़ों के साथ पियें तब। ’ ‘ये शौक पूरा करने के लिए तुम्हें धन कहाँ से मिलता है?’ ‘जुआ खेलकर और चोरी करके।’ ‘तो आप जुआ भी खेलते हैं और चोरी भी करते हैं?’ ‘आदमी एक बार गिर जाए, फिर उसकी और क्या गति है?’]

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“एक बोध कथा”

पुराने जमाने में एक नगर में दो ब्राह्मण पुत्र रहते थे। एक गरीब था तो दूसरा अमीर! दोनों पड़ोसी थे। गरीब ब्राह्मण की पत्नी उसे रोज़ ताने देती, झगड़ती।एक दिन एकादशी के दिन गरीब ब्राह्मण पुत्र झगड़ों से तंग आ जंगल की ओर चल पड़ता है। ये सोचकर कि जंगल में शेर या कोई हिंसक जीव उसे मार कर खा जायेगा। उस जीव का पेट भर जायेगा और मरने से वह इस कष्ट में भी मुक्त हो जायेगा।

जंगल में पहुंचने पर उसे एक गुफ़ा दिखाई दी। वह गुफ़ा की ओर गया। गुफ़ा में एक शेर सोया था और शेर की नींद में ख़लल न पड़े इसके लिये हंस का पहरा था। हंस ने ज़ब दूर से ब्राह्मण पुत्र को आता देखता है तो चिंता में पड़ सोचता है - ये ब्राह्मण आयेगा, शेर जागेगा और इसे मार कर खा जायेगा। आज एकादशी होने से इस दिन मुझे पाप लगेगा। इसे बचाऊं कैसे? उसे उपाय सूझा है और वो शेर के भाग्य की तारीफ़ करते कहता है - ओ जंगल के राजा! उठो, जागो आज आपके भाग्य खुले हैं। एकादशी के दिन स्वय विप्रदेव आपके घर पधारे हैं। आप उठें इनका स्वागत करे और इन्हे दक्षिणा दें रवाना करें। ऐसा करने से आपका मोक्ष हो जायेगा। यह दिन दुबारा आपके जीवन में मिलना दुभर हो। ईश्वर कृपा से आपको पशु योनी से मुक्ति मिल जाये। शेर दहाड़ कर उठता है, हंस की बात उसे सही लगती है।अपनी मांद में पूर्व के शिकार हुए मनुष्यों के गहने वो ब्राह्मण के पैरों में रख, शीश नवाता है, जीभ से उनके पैर चाटता है। हंस ब्राह्मण को इशारा करता है - विप्रदेव! ये सब गहने उठाओ और जितना जल्द हो सके वापस अपने घर जाओ। ये सिंह है, कब मन बदल जाय! ब्राह्मण बात समझता है घर लौट जाता है। इस घटना की पडौसी अमीर ब्राह्मण की पत्नी को जब पता चलता है तो अगली एकादश। को अपने पति को जंगल में उसी शेर की गुफा की ओर भेजती है। आज शेर का पहेरादार बदल जाता है। नया पहरेदार होता है *"कौवा"* । जैसी कौवे की प्रवृति होती है वह वैसा ही सोचता है - बढिया है! ब्राह्मण आया, शेर को जगाऊं! शेर की नींद में ख़लल पड़ेगा, गुस्साएगा, ब्राह्मण को मारेगा तो कुछ मेरे भी हाथ लगेगा, मेरा पेट भर जायेगा। यह सोच वह कांव-कांव कर चिल्लाता है। आवाज से शेर गुस्सा हो जागता है। दूसरे ब्राह्मण पर उसकी नज़र पड़ती है। उसे हंस की बात याद आ जाती है। वो समझ जाता है, आज शेर स्वयं ही समझ जाता हैं कि *कौवा क्यूं कांव-कांव कर रहा है?* पूर्व में हंस के कहने पर एकादशी को किये गये धर्म को नष्ट नहीं करना चाहता।

फिर भी नहीं शेर, शेर होता है जंगल का राजा होता हैं वह दहाड़ कर ब्राह्मण को कहता है –
“हंस उड़ सरवर गये
अब काग भये प्रधान
थे विप्र थांरे घरे जाओ,
में किनाइ नी जिजमान!

अर्थात हंस जो अच्छी सोच वाले, अच्छी मनोवृत्ति वाले थे उड़ के सरोवर यानि तालाब को चले गये हैं और अब कौवा प्रधान पहरेदार है जो मुझे तुम्हें मारने के लिये उकसा रहा है। मेरी बुद्धि घूमे उससे पहले ही हे ब्राह्मण! यहां से चले जाओ। शेर किसी का जजमान नहीं हुआ है! वो तो हंस था जिसने मुझ शेर से भी पुण्य करवा दिया।

दूसरा ब्राह्मण सारी बात समझ जाता है और डर के मारे तुरंत प्राण बचाकर अपने घर की ओर भाग जाता है।

हंस और कौवा कोई और नहीं हमारे ही चरित्र हैं!

कोई किसी का दु:ख देख दु:खी होता है और उसका भला सोचता है – वो हंस है और जो किसी को दु:खी देखना चाहता है, किसी का सुख जिसे सहन नहीं होता – वो कौवा है।

जो आपस में मिलजुल, भाईचारे से रहना चाहते हैं वे हंस प्रवृत्ति के हैं।

जो झगड़े कर एक दूजे को मारने लूटने की प्रवृत्ति रखते हैं वे कौवे की प्रवृति के हैं।

जय श्री कृष्ण 🙏🌹

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••-•{{जीवन का जहाज़ }}•-••
••-•{{ ओशो }}•-••

जीवन बहुत उलझा हुआ है लेकिन अक्सर जो उसे सुलझाने में लगते हैं वे उसे और भी उलझा लेते हैं।

जीवन निश्चय ही बड़ी समस्या है लेकिन उसके लिए प्रस्तावित समाधान उसे और भी बड़ी समस्या बना देते हैं।
क्यों? लेकिन एसा क्यों होता है?

•••••••••••• || ओशो ||.°

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एक विश्वविद्यालय में विधीशास्त्र के एक अध्यापक अपने जीवनभर वर्ष के पहले दिन की पढ़ाई तखते पर ‘चार’ और ‘दो’ के अंक लिखकर प्रारंभ करते थे।

वे दोनों अंकों को लिखकर विद्यार्थियों से पूछते थे : ‘क्या हल है?’

निश्चय ही कोई विद्यार्थी शीघ्रता से कहता : ‘छः!’

और फिर कोई दूसरा कहता : ‘दो!’

लेकिन अध्यापक को चुप सिर हिलाते देखकर अंततः अंतिम संभावना को सोचकर अधिकतम विद्यार्थी चिल्लाते ‘आठ’।

लेकिन अध्यापक तब भी अपना अस्वीकार सूचक सिर हिलाते ही जाते थे!

और तब सन्नाटा छा जाता था क्योंकि और कोई उत्तर तो हो ही नहीं सकता था!

फिर वे अध्यापक हंसते थे और कहते थे : ‘मित्रो, आप सभी ने अत्यंत आधारभूत प्रश्न ही नहीं पूछा तो हल कैसे संभव हो सकता है? आपने यही नहीं जानना चाहा कि वस्तुतः समस्या क्या है?

और जो समस्या को सम्यक रूप से जाने बिना ही समाधान जानने मैं लग जाता है, निश्चय ही वह समाधान तो पाता ही नहीं है और उल्टे समस्या को और उलझा लेता है।’

क्या यह बात सत्य नहीं है कि समस्या को जाने बिना ही समाधान खोज और पकड़ लिए जाते हैं; जबकि समाधान नहीं, महत्वपूर्ण सदा समस्या ही है।

क्योंकि अंततः तो समस्या को उसकी समग्रता में जान लेना ही समाधान बनता है।

और गणित में एसी भूल हो तो हो लेकिन क्या जीवन में भी ऐसा ही नहीं होता है?

क्या वास्तविक समस्या को जाने बिना ही जब हम समाधान के लिए श्रम करने लगते हैं तो सारा श्रम व्यर्थ ही नहीं, आत्मघाती भी सिद्ध नहीं होता है?

मित्र, समस्या को ही जो सही रूप में नहीं जानता है, वह यदि किसी अन्य ही प्रश्न को प्रश्न जानकर हल करता हो तो भी आश्चर्य नहीं है।

क्या आपको उस जहाज़ के बाबत कुछ भी पता नहीं है, जो कि डूब रहा था; और कुछ लोग उसे डूबने से बचाने के लिए उस पर पालिश कर रहे थे।

मैं तो सोचता हूँ कि आपको उस जहाज़ के संबंध में ज़रूर ही पता होगा, क्योंकि मैं तो आपको भी उस पर ही सवार देखता हूँ;

और न केवल सवार ही देखता हूँ बल्कि यह भी देखता हूँ कि जहाज़ डूब रहा है और आप उसे बचाने के लिए उस पर पालिश करने में लगे हैं!

मित्र, वह जहाज़ जीवन का ही जहाज़ तो है।

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ओशो.
” फूल ओर कांटे ”-
(कथा–02)
(जीवन का जहाज़)