Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

दुर्वासा बह्म साधक थे ( मतलब बह्मा विष्णु शिव को परमेश्वर ना मानकर ॐ को ही परमेश्वर मानना ) वे एक बार स्वर्ग गये रास्ते में‌ अप्सरा सज धज कर जा रही थी उसके गले में सुंदर मोतियों की माला थी । दुर्वासा ने अप्सरा को कहा यह माला मुझे दे दो अप्सरा ने सोचा ऋषि है कोई श्राप दे देगा माला दो पीछा छुडाओ । अप्सरा ने कहा लिजिये ऋषिवर और माला दे दी । दुर्वासा ऋषि ने वो माला अपने लम्बे लम्बे बालो में लपेट कर लगा दी उसी रास्ते में आगे इन्द्र की सवारी साज बाज के साथ जा रही थी ऋषि ने वो निकाल माला हाथी पर बैठे इन्द्र को दे दी इन्द्र ने सम्मान के साथ लेकर अपने ऐरावत हाथी पर रख दी ऐरावत ऐसे ऐसे रखे भेंट पुष्प हटाता रहता था तो उसने माला को पुष्प के साथ फेंक दी माला रास्ते में पडी देख दुर्वासा बडा कुपित हुआ बोला इन्द्र तुझे राज का बडा अभिमान हो गया है तुने मेरी दी माला का अपमान किया है तुने मेरी भेंट का अपमान किया तेरा राज नष्ट हो जायेगा इन्द्र हाथी से उतरा और क्षमा याचना करने लगा कि ऋषि इस हाथी ने भूल वश हटा दी थी पर दुर्वासा बोला जो बोलना था वो बोल दिया अब मेरे बस का कुछ नही और कुछ ही समय में इन्द्र का राज नष्ट हो गया ।अब आपको क्या लगता है गलती किसकी थी …..?*अप्सरा की जिसनें माला दी ।*ऋषि की जिसने माला ली १० मिनिट बाद किसी और को बिन मांगे दी ।‌*इन्द्र की जिसने माला हाथी की ऊपर रखी ।* हाथी की जिसने माला को पुष्प समझ‌ कर फेंक दिया ।संत रामपाल जी कहते है यह बह्म तक के साधक साधना करते बह्म तक उस से मोक्ष तो होता नही और श्राप और वरदान दे कर अपनी भक्ति पुंजी नष्ट करते औरो को भी हताहत करते है कबीर , ७२ अक्षोणी खा गया , वो चुनक ऋषिवर एक । देह धारे यह मौत फिरे , यह सभी काल के भेख (भेष) ।। ‌‌ दुर्वासा कोपे तहां , समझ ना आई नीच । 56 कोटी यादव कटे , मची रूधिर की कीच ।। *( भक्ति से भगवान तक ) पुस्तक से साभार

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