Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

भिखारी की नौकरी

सीमा सिलाई मशीन पर बैठी कपडे काट रही थी . साथ ही बड़बडाये जा रही थी . उफ़ ! ये कैची तो किसी काम की नहीं रही बित्ता भर कपडा काटने में ही उँगलियाँ दुखने लगी हैं .

पता नहीं वो राहूल ग्राइंडिंग वाला कहाँ चला गया . हर महीने आया करता था तो कालोनी भर के लोगों के चाकू कैंची पर धार चढ़ा जाता था , वो भी सिर्फ चंद पैसों में !

राहूल एक ग्राइंडिंग करने वाला यही कोई 20-25 साल का एक युवक था . बहुत ही मेहनती और मृदुभाषी .

चेहरे पे उसके हमेशा पसीने की बूंदें झिलमिलाती रहती लेकिन साथ ही मुस्कुराहट भी खिली रहती .

जब कभी वो कालोनी में आता तो किसी पेड़ के नीचे अपनी विशेष प्रकार की साइकिल को स्टैंड पर खड़ा करता , जिसमे एक पत्थर की ग्राइंडिंग व्हील लगी हुई थी . और सीट पे बैठ के पैडल चला के घुमते हुए पत्थर की व्हील पर रगड़ दे के चाक़ू और कैंचियों की धार तेज कर देता .

इसी बहाने कालोनी की महिलाएं वहाँ इकठ्ठा हो के आपस में बातें किया करती .

जब वो नाचती हुई ग्राइंडिंग व्हील पर कोई चाकू या कैंची रखता तो उससे फुलझड़ी की तरह चिंगारिया निकलती , जिसे बच्चे बड़े कौतूहल से देखा करते और आनन्दित भी होते .

फिर वो बड़े ध्यान से उलट पुलट कर चाकू को देखता और संतुष्ट हो के कहता , “लो मेमसाब ! इतनी अच्छी धार रखी है कि बिलकुल नए जैसा हो गया !

अगर कोई उसे 10 माँगने पर 5 रूपये ही दे देता तो भी वो बिना कोई प्रतिवाद किये चुपचाप जेब में रख लेता .

मैंने अपनी पाँच साल की बेटी मिनी को आवाज लगाई . “मिनी जा के पड़ोस वाली सरला आंटी से कैची तो मांग लाना जरा” ! पता नहीं ये राहूल कितने दिन बाद कॉलोनी में आएगा .

थोड़ी देर बाद जब मिनी पड़ोस के घर से कैंची ले के लौटी तो उसने बताया कि उसने राहूल को अभी कॉलोनी में आया हुआ देखा है .

मैंने बिना समय गवाँये जल्दी से अपने बेकार पड़े सब्जी काटने वाले चाकुओं और कैंची को इकठ्ठा किया और बाहर निकल पड़ी .

बाहर जाके मैंने जो देखा वो मुझे आश्चर्य से भर देने वाला दृश्य था !!

क्या देखती हूँ कि राहूल अपनी ग्राइंडिंग वाली साइकिल के बजाय एक अपाहिज भिखारी की छोटी सी लकड़ी की ठेला गाडी को धकेल के ला रहा है , और उस पर बैठा हुआ भिखारी “भगवान के नाम पे कुछ दे दे बाबा !” की आवाज लगाता जा रहा है .

उसके आगे पैसों से भरा हुआ कटोरा रखा हुआ है . और लोग उसमे पैसे डाल देते थे .

पास आने पर मैंने बड़ी उत्सुकता से सोहन से पूछा , “राहूल ये क्या ?
और तुम्हारी वो ग्राइंडिंग वाली साइकिल ??

राहूल ने थोड़ा पास आके धीमे से फुसफुसाते हुए स्वर में कहा , “मेमसाब ! सारे दिन चाकू कैंची तेज करके मुझे मुश्किल से सत्तर अस्सी रुपये मिलते थे .

जब कि ये भिखारी अपना ठेला खींचने का ही मुझे डेढ़ सौ दे देता है ! इसलिए मैंने अपना पुराना वाला काम बंद कर दिया .

मैं हैरत से राहूल को दूर तक भिखारी की ठेला गाडी ले जाते देखती रही ! !!

और सोचती रही , एक अच्छा भला इंसान जो कल तक किसी सृजनात्मक कार्य से जुड़ा हुआ समाज को अपना योगदान दे रहा था आज हमारी ही सामाजिक व्यवस्था द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया !

हम अनायास एक भिखारी को तो उसकी आवश्यकता से अधिक पैसे दे डालते हैं , लेकिन एक मेहनतकश इन्सान को उसके श्रम का वह यथोचित मूल्य भी देने में संकोच करने लगते हैं !

उससे मोल भाव करते हैं . यदि हम हुनरमंद और मेहनतकशों को उनके श्रम का सही मूल्य चुकाएँ तो समाज में उसके श्रम की उपयोगिता बनी रहे . उसकी खुद्दारी और हमारी मानवता दोनों शर्म सार होने से बच जाये।

भिखारियो को नगद (रूपये) सहयोग देना बन्द करे।

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