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प्रेरक_कथा…

एक शिकारी ने शिकार पर तीर चलाया। तीर पर सबसे खतरनाक जहर लगा हुआ था।
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पर निशाना चूक गया। तीर शिकार की जगह एक फले-फूले पेड़ में जा लगा।
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पेड़ में जहर फैला। वह सूखने लगा। उस पर रहने वाले सभी पक्षी एक-एक कर उसे छोड़ गए।
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पेड़ के कोटर में एक धर्मात्मा तोता बहुत बरसों से रहा करता था। तोता पेड़ छोड़ कर नहीं गया, बल्कि अब तो वह ज्यादातर समय पेड़ पर ही रहता।
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दाना-पानी न मिलने से तोता भी सूख कर कांटा हुआ जा रहा था।
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बात देवराज इंद्र तक पहुंची। मरते वृक्ष के लिए अपने प्राण दे रहे तोते को देखने के लिए इंद्र स्वयं वहां आए।
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धर्मात्मा तोते ने उन्हें पहली नजर में ही पहचान लिया।
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इंद्र ने कहा, देखो भाई इस पेड़ पर न पत्ते हैं, न फूल, न फल। अब इसके दोबारा हरे होने की कौन कहे, बचने की भी कोई उम्मीद नहीं है।
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जंगल में कई ऐसे पेड़ हैं, जिनके बड़े-बड़े कोटर पत्तों से ढके हैं। पेड़ फल-फूल से भी लदे हैं।
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वहां से सरोवर भी पास है। तुम इस पेड़ पर क्या कर रहे हो, वहां क्यों नहीं चले जाते ?
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तोते ने जवाब दिया, देवराज, मैं इसी पर जन्मा, इसी पर बढ़ा, इसके मीठे फल खाए।
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इसने मुझे दुश्मनों से कई बार बचाया। इसके साथ मैंने सुख भोगे हैं। आज इस पर बुरा वक्त आया तो मैं अपने सुख के लिए इसे त्याग दूं ?
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जिसके साथ सुख भोगे, दुख भी उसके साथ भोगूंगा, मुझे इसमें आनंद है।
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आप देवता होकर भी मुझे ऐसी बुरी सलाह क्यों दे रहे हैं ? यह कह कर तोते ने तो जैसे इंद्र की बोलती ही बंद कर दी।
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तोते की दो-टूक सुन कर इंद्र प्रसन्न हुए,
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बोल, मैं तुमसे प्रसन्न हूं, कोई वर मांग लो।
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तोता बोला, मेरे इस प्यारे पेड़ को पहले की तरह ही हरा-भरा कर दीजिए।
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देवराज ने पेड़ को न सिर्फ अमृत से सींच दिया, बल्कि उस पर अमृत बरसाया भी।
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पेड़ में नई कोंपलें फूटीं। वह पहले की तरह हरा हो गया, उसमें खूब फल भी लग गए।
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तोता उस पर बहुत दिनों तक रहा, मरने के बाद देवलोक को चला गया।
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बुरे वक्त में व्यक्ति भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाता है। जो उस समय उसका साथ देता है, उसके लिए वह अपने प्राणों की बाजी लगा देता है।

किसी के सुख के साथी बनो न बनो, दुख के साथी जरूर बनो। यही धर्मनीति है।

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ओशो ।
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तिब्बत में जब शिष्य दीक्षित होता है, तो दिन में जितनी बार गुरु मिल जाए उतनी बार उससे साष्टांग दंडवत करना पड़ता है। कभी-कभी हजार बार। क्योंकि जितनी बार गुरु मिले . . .
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आश्रम में शिष्य रहता है; गुरु गुजरा, फिर शिष्य मिल गया। पानी लेने जा रहे थे, बीच में गुरु मिल गया; भोजन करने गए, गुरु मिल गया। जब मिल जाए तभी साष्टांग दंडवत। पूरे जमीन पर लेट कर पहला काम साष्टांग दंडवत।
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एक युवक एक तिब्बती मानेस्ट्री में रह कर मेरे पास आया। मैंने उससे पूछा, तूने वहां क्या सीखा? क्योंकि वह जर्मन था और दो साल वहां रह कर आया था। उसने कहा, कि पहले तो मैं बहुत हैरान था, कि यह क्या पागलपन है! लेकिन मैंने सोचा, कुछ देर करके देख लें।
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फिर तो इतना मजा आने लगा। गुरु की आज्ञा थी, कि जहां भी वह मिले उसको झुकूं, फिर धीरे-धीरे जो भी आश्रम में थे, जो भी मिल जाते उसको जुकु ! साष्टांग दंडवत में इतना मजा आने लगा, कि फिर मैंने फिक्र ही छोड़ दी कि क्या गुरु के लिए झुकना! जो भी मौजूद है उसके सामने जुको ।
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फिर तो मजा इतना बढ़ गया, कि लेट जाना पृथ्वी पर सब छोड़ कर। ऐसी शांति उतरने लगी, कि कोई भी न होता तो भी मैं लेट जाता। साष्टांग दंडवत करने लगा वृक्षों को, पहाड़ों को। झुकने का रस लग गया।
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तब गुरु ने एक दिन बुला कर मुझे कहा, अब तुझे मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं। अब तो तुझे झुकने में ही रस आने लगा। हम तो बहाना थे, कि तुझे झुकने में रस आ जाए। अब तो तू किसी के भी सामने झुकने लगा है। और अब तो ऐसी भी खबर मिली है, कि तू कभी-कभी कोई भी नहीं होता और तू साष्टांग दंडवत करता है। कोई है ही नहीं और तू दंडवत कर रहा है।
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उस युवक ने मुझे कहा, कि बस, झुकने में ऐसा मजा आने लगा।
जर्मन अहंकार संसार में प्रगाढ़ से प्रगाढ़ अहंकार है। समस्त जातियों में जर्मन जाति के पास जैसा प्रगाढ़ अहंकार है, वैसा किसी के पास नहीं है। इसलिए दो महायुद्ध वे लड़े हैं। और कोई नहीं जानता, कि कभी भी वे युद्ध के लिए तैयार हो जाएं।
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यह जर्मन युवक झुकने को भी तैयार नहीं था। यह बात ही फिजूल लगती थी, लेकिन फंस गया। लेकिन जब झुका, तो रस आ गया।
एक दफा झुकने का रस आ जाए, एक दफा तुम्हें यह मजा आने लगे, कि नाकुछ होने में मजा है, मिटने में मजा है, खोने में मजा है, तो गुरु हट जाता है। गुरु बुला कर तुम्हें कह देता है, बात खतम हो गई। अब तुम मुझे परेशान न करो। क्योंकि तुम्हारे दंडवत करने से तुमको ही परेशानी होती है । तुमसे ज्यादा गुरु को परेशानी होती है। क्योंकि तुम्हारे लिए तो एक गुरु है, गुरु के लिए हजार शिष्य हैं। हजार का झुकना, और हजार के नमन को हजार बार स्वीकार करना–गुरु की भी तकलीफ है।
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जैसे ही तुम तैयार हो जाते हो, कि झुकना सीख गए; गुरु कहता है, अब भीतर चले जाओ, अब दरवाजे पर मत अटको। अब मुझे छोड़ो। एक दिन गुरु कहता है, मुझे पकड़ लो अनन्यभाव से। और जब तुमने गुरु को पकड़ लिया तो एक दिन गुरु कहता है, अब मुझे तुम बिलकुल छोड़ दो, क्योंकि अब परमात्मा पास है, अब तुम मुझे मत पकड़े रहो।
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कहे कबीर दीवाना
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ओशो
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मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए। द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर श्री हरि खुद शिव से मिलने अंदर चले गए। तब कैलाश की प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी। चिड़िया कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारे विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे।

उसी समय कैलाश पर यम देव पधारे और अंदर जाने से पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की दृष्टि से देखा। गरुड़ समझ गए उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक ले जाएँगे।

गरूड़ को दया आ गई। इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे। उसे अपने पंजों में दबाया और कैलाश से हजारो कोश दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया, और खुद वापिस कैलाश पर आ गया। आखिर जब यम बाहर आए तो गरुड़ ने पूछ ही लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों देखा था।

यम देव बोले “गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो चिड़िया कुछ ही पल बाद यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग द्वारा खा ली जाएगी। मैं सोच रहा था कि वो इतनी जल्दी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर अब जब वो यहाँ नहीं है तो निश्चित ही वो मर चुकी होगी।”

गरुड़ समझ गये “मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए।”
इस लिए श्री कृष्ण कहते है- करता तू वह है, जो तू चाहता है
परन्तु होता वह है, जो में चाहता हूँ
कर तू वह, जो में चाहता हूँ
फिर होगा वो, जो तू चाहेगा ।

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अनोखा हनीमून….


“अनोखा हनीमून….

रमेश जी के सबसे छोटे बेटे मोहन का विवाह धूमधाम से सम्पन्न हो गया था…..रमेशबाबू और सुशीला देवी को चार संताने थी….तीन बेटियां और चौथे में सबसे छोटा पुत्र मोहन….
रमेश बाबू जब करीब तीस वर्ष पूर्व इस शहर आये थे तो उन्होंने सड़क किनारे साप्ताहिक बाज़ार में रेडीमेड कपड़े बेचने का काम शुरू किया था….
एक कमरे का घर… उसीमे किचन ,बैडरूम और दुकान का सामान भी…..बेहद तकलीफ भरे जाने कितने वर्ष गुजारे थे उनदोनो ने….
किंतु कठोर परिश्रम और बच्चो को बेहतर जीवन देने की ललक की वजह से वो हर मुश्किल से लड़ते हुए आगे बढ़ते चले गए थे….
आज शहर के मुख्य चौराहे पर उनकी मशहूर रेडीमेड कपड़ो और साड़ियों का शोरूम था….
अपना बड़ा सा घर था ,गाड़ी घोड़ा नोकर चाकर सबकुछ था….फिर भी रमेशबाबू और सुशीला देवी एक एक पैसा बस बच्चो पे खर्च किया करते थे….खुद पे खर्च करना तो जैसे कभी उन्हें आया ही नही….
चारो बच्चो की शिक्षा और पालन में कोई कमी नही छोड़ी थी उन्होंने….
फिर तीनो पुत्रियों का संस्कारी और सम्पन्न घरों में विवाह किया….और अब मोहन का विवाह भी हो गया था….
मोहन के लिए उन्होंने बचपन के मित्र और सरकारी स्कूल के चपरासी हरिगोपाल की पुत्री सुधा को बहुत पहले ही चुना था…..
मोहन भी सुधा को जीवनसाथी के रुप मे पाकर बहुत खुश था…..
विवाह की भागम भाग और मेहमानों की विदाई के बाद आज पहली बार पूरा परिवार एक साथ खाने बैठा था….
तीनो बेटियां अभी कुछ दिन मायके रुकने वाली थी….
सुधा छोटी ननद के साथ मिलकर सबको परोस रही थी….

“सुधा बिटिया और मोहन….. अब तुम दोनों सप्ताह दस दिन के लिए कही घूम आओ….
तुम दोनों का दाम्पत्य जीवन आरम्भ हो रहा है…
विवाह के उपरांत मनुष्य का एक नवजन्म होता है ऐसे में तुम दोनों कुछ दिन किसी ठंडे और हरे भरे इलाके में बिता आओ ताकि दाम्पत्य जीवन मे हमेशा ठंडक और हरियाली बनी रहे…
रमेश बाबू ने भोजन के पश्चात इलायची का दाना मुहं में रखते हुए कहा…..

“तुम्हारे बाबूजी ठीक कह रहे है बेटा…..
दुकान और घर की फिक्र छोड़कर तुम दोनो कुछ दिन बाहर घूम आओ….सुशीला देवी बेटे की तरफ देखते हुए कह रही थी….

“मां…. बाबूजी….
आप दोनों की अनुमति हो तो मैं कुछ कहना चाह रही थी… सुधा नजरे नीची करते हुए बीच मे बोल पड़ी….

“हां बेटा …..बोलो बोलो….
इसमे भला अनुमति की क्या बात है…सास ससुर एक साथ बोल पड़े….

“मां -बाबूजी आप दोनों ने पूरा जीवन बच्चो के बेहतर भविष्य के लिए खपा दिया है….
पिताजी के मुंह से बचपन से सब सुनती रही हूँ कि आप दोनों अपने लिए एक साड़ी या गमछा तक खरीदने से पहले दस बार सोचते थे लेकिन बच्चो के लिए कभी कोई कमी नही रखी…..
बाबूजी आप दोनों तो शादी के बाद किसी बर्फीले या हरे भरे इलाके में घूमने नही गए फिर आप बताइए कि कैसे इतना ठंडा स्वभाव और हरा भरा दाम्पत्य जीवन आप दोनों को मिला…..
हमदोनो के सामने घूमने के लिए पूरा जीवन पड़ा है…
अब घूमने और दुनिया देखने की बारी किसी की है तो वो आप दोनों की है….
हम दोनों ने आप दोनों का यूरोप घूमने का एक महीने का प्लान बना दिया है….
वीजा…. टिकट सबका इंतजाम हो चुका है….
कल मैं आपदोनो को लेकर मॉल जाऊंगी ताकि यूरोप के मौसम के अनुसार गर्म कपड़े और यात्रा के दूसरे जरूरी सामान की खरीद हो जाये….
अगले रविवार आपलोगो को निकलना है…और हां टूर कम्पनी वाले आपलोगो का हर तरह से ख्याल रखेंगे….

“और हां… मां…. मेरे लिए लंदन से एक हेट जरूर लेती आना…मोहन हंसते हुए बोला और फिर सुधा और मोहन खिलखिला कर हंसने लगे….

दुनिया भर के दुख तकलीफ उठा चुके रमेशबाबु को यकीन नही हो रहा था कि आज के युग मे शादी होकर आयी पुत्रवधु अपने सेर सपाटे की सोचने के बजाय सास ससुर के लिए विदेश दौरे का प्रोग्राम बनाने मे लगी थी….

“वाह भाभी…. आप दोनो ने खुद की बजाय मम्मी पापा के हनीमून का इंतजाम कर दिया है….
बोलते हुए तीनो बहने अपने भाई और भाभी से लिपट गयी थी …..
एक दोस्त की सुंदर रचना

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☝🏼एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके कर्म और भाग्य अलग अलग क्यों*

एक प्रेरक कथा …
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एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया-

मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना, किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ..?

इसका क्या कारण है ?
राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये ..
अचानक एक वृद्ध खड़े हुये बोले – महाराज आपको यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है..

☝🏼राजा ने घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं..
राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा “तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।”

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा..

राजा हक्का बक्का रह गया ,दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे..

राजा को महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास समय नहीं है…
आगे आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा..
वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है..

राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न..

उत्सुकता प्रबल थी..
राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर उस गाँव में पहुंचा..
गाँव में उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही..

जैसे ही बच्चा पैदा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया..

राजा को देखते ही बालक हँसते हुए बोलने लगा ..
राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुन लो –
तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई राजकुमार थे..
एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली ।हमने उसकी चार बाटी सेंकी..

अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये..
अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा –
“बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो , जिससे मेरा भी जीवन बच जाय …

इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले..

तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा आग …? चलो भागो यहां से ….।

वे महात्मा फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही..

किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि..
बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?
भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये..
मुझसे भी बाटी मांगी…
किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि
चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?

अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !..
आपके पास भी आये,दया की याचना की..
दया करते हुये ख़ुशी से आपने अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी ।
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और बोले..
तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा ।
बालक ने कहा “इस प्रकार उस घटना के आधार पर हम अपना अपना भोग, भोग रहे हैं…
और वो बालक मर गया

धरती पर एक समय में अनेकों फल-फूल खिलते हैं,किन्तु सबके रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद भिन्न होते हैं ..।

राजा ने माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के हॆ–
ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र

जातक सब अपना
किया, दिया, लिया

ही पाते हैं..
यही है जीवन…
“गलत पासवर्ड से एक छोटा सा मोबाइल नही खुलता..

तो सोचिये ..

गलत कर्मो से स्वर्ग के दरवाजे कैसे खुलेंगे

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द्वितीय विश्वयुद्ध का समय… जर्मनी के बमवर्षकों का खौफ… लन्दन में दूध की लंबी लाईन.
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वितरण कर रहे व्यक्ति ने घोषणा की… केवल एक बोतल बची है, बाकी के लोग कल आयें.
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आखिरी दूध की बोतल जिस शख्स के हाथ आनी थी उसके ठीक पीछे एक महिला खड़ी थी जिसकी गोद में एक छोटा बच्चा था. उसके चेहरे पर अचानक चिंता की लकीरें उभर आईं… लेकिन उसने देखा वितरण करने वाला व्यक्ति उसके हाथ में बोतल थमा रहा था. वह चौंकी क्योंकि उसके आगे खड़ा व्यक्ति बिना दूध लिए लिए लाईन से हट गया था… ताकि छोटे बच्चे को गोद में लिए वह महिला दूध हासिल कर सके.
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अचानक तालियों की आवाज आने लगी. लाईन में खड़े सभी व्यक्ति उस शख्स का करतलध्वनि से अभिनन्दन कर रहे थे. लेकिन उसने उस महिला के पास जाकर केवल इतना कहा कि आपका बच्चा बहुत ही प्यारा है. वह इंग्लैंड का भविष्य है उसकी अच्छी परवरिश करिए.
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इस घटना की खबर प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के पास जब पहुंची तो वे जर्मनी के जबरदस्त हमलों की विभीषिका से उत्पन्न चिंता से उबरकर बोल पड़े : हिटलर को संदेश भेज दो , ब्रिटेन की जीत को कोई नहीं रोक सकता क्योंकि यहां के लोग अपने देश पर मंडरा रहे संकट के समय, अपना निजी हित भूलकर देश के बारे में सोचते हैं.
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चर्चिल का विश्वास सच निकला. ब्रिटेन विश्वयुद्ध में विजेता बनकर उभरा.
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हमारे देश पर भी संकट मंडरा रहा है. क्या हम अपनी चारित्रिक श्रेष्ठता प्रमाणित करने को तैयार हैं……?!?

….आम आदमी, न्युज चैनल, प्रशासनिक कर्मचारी, नेतागण, डाक्टर्स सभी अगर अपने हिस्सें के काम को ईमानदारी पुर्वक करे तो कोई कारण नहीं जो कोरोना के खिलाफ युद्ध में हमारा देश विजयी ना हों……..
राष्ट्र देवो भवः🙏🏻🚩

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संस्कारों का अंतर देखें-

जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील में एक मुस्लिम बाहुल गाँव है नाम है झालोडा। इस गाँव में मंगलिया सियाह मुसलमानों की १०० % जनसँख्या है। झालोडा से ३ किलोमीटर दूर भानियाना मार्ग पर रायधर (भाटी ) राजपूतों की एक ढानी है, जिसमे मात्र ५५ लोगों की जनसंख्या है … जबकि झालोडा में मुसलमानों की जनसँख्या 500 से अधिक है।

मुसलमान भेड़ पालक हैं। झालोडा की मुसलमानों की भेड़ें कई बार राय्धरों के खेतों में चरने आ जाती है जिसके कारण खेतों को भारी हानि होती है। पिछली खरीफ की फसल भी मुसलमानों की भेड़ों के कारण हानि की भेट चढ़ गईं। बहुत बार शिकायत आदि की गई परन्तु मुसलमानों के कानो पर जूं तक नहीं रेंगी।

एक दिन ऐसे ही मुसलमानों की भेड़ें राजपूतों के खेतों में चरने पहुँच गई। भेड़ों के रखवाले ग्वाले जानबुझ कर भेड़ों को खेतों में छोड़ देते थे। खेत के मालिक के दो लड़कों ने भेड़ों को खेत से बहार भगाया और एक मैंडा (नर भेड ) को पकड़ा और काट कर अपने मित्रों के साथ मिल कर खा गये।

खोये नर की खोज प्रारंभ हुई और लड़कों द्वारा नर को काट कर खाने के साक्षय मिल गए।
झालोडा के मुसलमानों की भीड़ ने राजपूतों पर हमला कर दिया, किन्तु मुसलमानों को ये अंदाजा नहीं था की राजपूत मुंहतोड़ उत्तर देंगे!

राजपूतों के लड़कों ने मुसलमानों की भीड़ को घसीट घसीट कर धोया, मुसलमानों के हौंसले पस्त हो गए और वे भाग कर अपने गाँव पहुँच गए ….

राजपूतों ने इस हमले को गंभीरता से लिया और पास पड़ोस के अन्य हिन्दुओं को इस घटना की सुचना दी! राजपूत संघठित होकर अगले कदम का इंतजार करने लगे ….

पोकरण का एम् एल ए शालेह फ़क़ीर राजस्थान सरकार में मंत्री हैं। मुसलमानों ने तुरंत बात मंत्री तक पहुंचाई। भानियाना और पोकरण से पुलिस ने राजपूतों के गाँव पर धर पकड करनी चाहि किन्तु अन्य ग्रामीण हिन्दू समाज ने पुलिस को समझाया और स्थिति से अवगत करवाया और साथ ही किसी भी हिन्दू युवा की गिरफ्तारी पर पुलिस को चेतावनी दी गई की अगर आपने ऊपर से आये दबाव के कारण कोई भी कारवाही की तो स्थिति आपके हाथों से निकल भी सकती है!

पुलिस ने दोनों पक्षों को बैठा कर शान्ति बनाये रखने के लिए कहा और समझाया कि पुलिस सदेव तो वहां बैठ नहीं सकती थी। अब अगला कदम राजपूत समाज ने ये उठाया की मुसलमानों की भेड़ों को अपनी भूमि से निकलने ये चरने देने से मना कर दिया …..

हजारों भेड़ें और उसके मालिकों के लिए बड़ी समस्या हो गई। भेड़ों के लिए न चारा और न पानी! कब तक इस प्रकार से कोई जीवित रह सकता है? अंत में मुसलमानों ने राजपूतों के सामने आत्समर्पण किया, क्षमा याचन करनी पड़ी, आर्थिक दंड भुगता और आगे से कभी इस प्रकार की कोई हरकत न करने का लिखित आश्वासन दिया!

ये घटना मात्र कुछ माह पूर्व की ही है …

बंगाल वालो को बता दूँ की आज भी बंगाल में हिन्दू ६० % से अधिक हैं! फिर क्यूँ भाग रहे हो?
अशोक भारती जी का लेख-

जयहिंदूराष्ट्र

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एक शिकारी ने शिकार पर तीर चलाया। तीर पर सबसे खतरनाक जहर लगा हुआ था।*

पर निशाना चूक गया। तीर शिकार की जगह एक फले-फूले पेड़ में जा लगा।

पेड़ में जहर फैला। वह सूखने लगा। उस पर रहने वाले सभी पक्षी एक-एक कर उसे छोड़ गए।

पेड़ के कोटर में एक धर्मात्मा तोता बहुत बरसों से रहा करता था। तोता पेड़ छोड़ कर नहीं गया, बल्कि अब तो वह ज्यादातर समय पेड़ पर ही रहता।

दाना-पानी न मिलने से तोता भी सूख कर कांटा हुआ जा रहा था।

बात देवराज इंद्र तक पहुंची। मरते वृक्ष के लिए अपने प्राण दे रहे तोते को देखने के लिए इंद्र स्वयं वहां आए।

धर्मात्मा तोते ने उन्हें पहली नजर में ही पहचान लिया।

इंद्र ने कहा, देखो भाई इस पेड़ पर न पत्ते हैं, न फूल, न फल। अब इसके दोबारा हरे होने की कौन कहे, बचने की भी कोई उम्मीद नहीं है।

जंगल में कई ऐसे पेड़ हैं, जिनके बड़े-बड़े कोटर पत्तों से ढके हैं। पेड़ फल-फूल से भी लदे हैं।

वहां से सरोवर भी पास है। तुम इस पेड़ पर क्या कर रहे हो, वहां क्यों नहीं चले जाते ?

तोते ने जवाब दिया, देवराज, मैं इसी पर जन्मा, इसी पर बढ़ा, इसके मीठे फल खाए।

इसने मुझे दुश्मनों से कई बार बचाया। इसके साथ मैंने सुख भोगे हैं। आज इस पर बुरा वक्त आया तो मैं अपने सुख के लिए इसे त्याग दूं ?

जिसके साथ सुख भोगे, दुख भी उसके साथ भोगूंगा, मुझे इसमें आनंद है।

आप देवता होकर भी मुझे ऐसी बुरी सलाह क्यों दे रहे हैं ? यह कह कर तोते ने तो जैसे इंद्र की बोलती ही बंद कर दी।

तोते की दो-टूक सुन कर इंद्र प्रसन्न हुए,

बोल, मैं तुमसे प्रसन्न हूं, कोई वर मांग लो।

तोता बोला, मेरे इस प्यारे पेड़ को पहले की तरह ही हरा-भरा कर दीजिए।

देवराज ने पेड़ को न सिर्फ अमृत से सींच दिया, बल्कि उस पर अमृत बरसाया भी।

पेड़ में नई कोंपलें फूटीं। वह पहले की तरह हरा हो गया, उसमें खूब फल भी लग गए।

तोता उस पर बहुत दिनों तक रहा, मरने के बाद देवलोक को चला गया।

बुरे वक्त में व्यक्ति भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाता है। जो उस समय उसका साथ देता है, उसके लिए वह अपने प्राणों की बाजी लगा देता है।

किसी के सुख के साथी बनो न बनो, दुख के साथी जरूर बनो। यही धर्मनीति है।
मंगलमय प्रभात
स्नेह वंदन
प्रणाम