Posted in પતિ પત્ની ના ૧૦૦૦ જોક્સ

ચંદ્રકાન્ત બક્ષી

૫૦ થી ૬૦ વર્ષ પછીની જીંદગી ની વાસ્તવિકતા…
પત્નિની પતિને સુધારવાની જીદ ચરમસીમાએ હોય છે.
તેમાંય જો બાળકો મોટા થઈ ગયા હોય, પતિ પત્નિ એકલાં રહેતા હોય તો ભોગ મર્યા…
આ કોઈ એકલાનો પ્રશ્ન નથી…
સમગ્ર સમાજને લાગુ પડે છે…
સવાર પડે ને…

ઉઠો મારે ચાદર ખંખેરવી છે, વહેલા ઉઠવાનું રાખો.

બ્રશ કરતી વખતે સિંન્કનો નળ ધીમો રાખો, નીચે ટાઈલ્સ પર છાંટા ઉડે છે.

ટોયલેટમાંથી નીકળીને પગ લુછણીંયા પર પગ લુંછો. તમે આખા ઘરમાં રામદેવ પીરના ઘોડા જેવા પગલાં પાડો ને સાફ મારે કરવા પડે.

પોતું કરેલું છે, ગેલેરીમાં ના જતા વરસાદના છાંટા પડેલા છે, પાછા પગ ભીના લઈને રૂમમાં આવસો.

દાઢી કરીને બ્રસ ધોઈને ડબ્બામાં મુકો.

નાહવા જાવ એટલે ચડ્ડીબંડ્ડી ડોલમાં નાખજો.

નીકળીને રુમાલ બહાર તાર પર સુકવો.

માથામાં નાંખવાના તેલની બોટલ બંધ કરીને મુકતાં કીડીઓ ચટકે છે.

હજાર વાર કહ્યું આ ભુરો મોટો કાંસકો નહી લેવાનો એ ગુંચ કાઢવા માટે છે.

ધરે હો ત્યારે આ જાડી ટીશર્ટ ના પહેરતા હોય તો.

આ ચાની મલાઈ રકાબીની ધારે ન ચોંટાડતા હોય તો.

ફોન પર વાત કરતાં કરતાં ગેલેરીમાં શું કામ જતા રહો છો, ગામને સંભળાવવાનું છે.

મોબાઈલ જ મંતરવાનો હોય તો ટીવી શું કામ ચાલુ કરો છો.

છેલ્લી વાર કહું છું, ચલો જમવા,
પંખો બંન્ધ કરીને આવજો.

તોડેલી રોટલી પતે પછી જ બીજી તોડતા હોવતો.

જો ફરી પાછું, કેટલી વાર કહ્યું, લેંઘાએ હાથના લુંછો.

કાગળીયું ડસ્ટબીનમાં નાંખો, હાચું કહીયે તો મિસ્ટર બીન જેવું મો કેમ થઈ જાય છે.

જમ્યા પછી તરત આડા ના પડો.

સીંગ ચણાના ફોતરા તરત કચરાપેટી માં નાખો, આખા ઘરમાં ઉડે છે.

દીવાલે ટેકો દઈ ન બેસો તેલના અને ડાઈના ડાઘ પડે છે.

સવારે તો પેપર દોઢ કલાક વાંચેલું, હવે એ ઓનલાઈન થોડું છે તે બદલાઈ જાય.

પેપર વાળીને ટીપોઈ પર મુકતા હોતો.

હજી તો અડધો જ દિવસ પત્યો છે, અને આટલાં બધાં સુચનો !

આ સતત રણકતો રેડીયો એટલે જીવન સંગીત !!!
પણ મિત્રો આ રેડીઓ ની મીઠાસ એટલી મધુર છે કે જો એ ચૂપ થઈ જાય ને તો જીવન થઁભી જ જાય…
નાની ઉંમરે આ બધા છણકા ભણકા પતિ પત્ની માં થી કોઈ ને ના ગમે અને ઝગડો જ કરાવે પણ રિટાયર્ડ થયાં પછી જો આવા છણકા ભણકા ના હોય અને શાંત જીવન જીવતા હોય તો રોબોટ જેવિ જિંદગી લાગે અને જીવન નો સાચો આનંદ વિસરાય જ જાય !!!

🙏તમામ સીનીયર સીટીઝન દંપતી ને સમર્પિત🙏
ચંદ્રકાન્ત બક્ષી

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ईश्वर पर विश्वास किजिए 🙏

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8 साल का एक बच्चा 1 रूपये का सिक्का मुट्ठी में लेकर एक दुकान पर जाकर पूछने लगा,
–क्या आपकी दुकान में ईश्वर मिलेंगे?

दुकानदार ने यह बात सुनकर सिक्का नीचे फेंक दिया और बच्चे को निकाल दिया।

बच्चा पास की दुकान में जाकर 1 रूपये का सिक्का लेकर चुपचाप खड़ा रहा!

— ए लड़के.. 1 रूपये में तुम क्या चाहते हो?
— मुझे ईश्वर चाहिए। आपकी दुकान में है?

दूसरे दुकानदार ने भी भगा दिया।

लेकिन, उस अबोध बालक ने हार नहीं मानी। एक दुकान से दूसरी दुकान, दूसरी से तीसरी, ऐसा करते करते कुल चालीस दुकानों के चक्कर काटने के बाद एक बूढ़े दुकानदार के पास पहुंचा। उस बूढ़े दुकानदार ने पूछा,

— तुम ईश्वर को क्यों खरीदना चाहते हो? क्या करोगे ईश्वर लेकर?

पहली बार एक दुकानदार के मुंह से यह प्रश्न सुनकर बच्चे के चेहरे पर आशा की किरणें लहराईं ৷ लगता है इसी दुकान पर ही ईश्वर मिलेंगे !
बच्चे ने बड़े उत्साह से उत्तर दिया,

—-इस दुनिया में मां के अलावा मेरा और कोई नहीं है। मेरी मां दिनभर काम करके मेरे लिए खाना लाती है। मेरी मां अब अस्पताल में हैं। अगर मेरी मां मर गई तो मुझे कौन खिलाएगा ? डाक्टर ने कहा है कि अब सिर्फ ईश्वर ही तुम्हारी मां को बचा सकते हैं। क्या आपकी दुकान में ईश्वर मिलेंगे?

— हां, मिलेंगे…! कितने पैसे हैं तुम्हारे पास?

— सिर्फ एक रूपए।

— कोई दिक्कत नहीं है। एक रूपए में ही ईश्वर मिल सकते हैं।

दुकानदार बच्चे के हाथ से एक रूपए लेकर उसने पाया कि एक रूपए में एक गिलास पानी के अलावा बेचने के लिए और कुछ भी नहीं है। इसलिए उस बच्चे को फिल्टर से एक गिलास पानी भरकर दिया और कहा, यह पानी पिलाने से ही तुम्हारी मां ठीक हो जाएगी।

अगले दिन कुछ मेडिकल स्पेशलिस्ट उस अस्पताल में गए। बच्चे की मां का आप्रेशन हुआ और बहुत जल्दी ही वह स्वस्थ हो उठीं।

डिस्चार्ज के कागज़ पर अस्पताल का बिल देखकर उस महिला के होश उड़ गए। डॉक्टर ने उन्हें आश्वासन देकर कहा, “टेंशन की कोई बात नहीं है। एक वृद्ध सज्जन ने आपके सारे बिल चुका दिए हैं। साथ में एक चिट्ठी भी दी है”।

महिला चिट्ठी खोलकर पढ़ने लगी, उसमें लिखा था-
“मुझे धन्यवाद देने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपको तो स्वयं ईश्वर ने ही बचाया है … मैं तो सिर्फ एक ज़रिया हूं। यदि आप धन्यवाद देना ही चाहती हैं तो अपने अबोध बच्चे को दीजिए जो सिर्फ एक रूपए लेकर नासमझों की तरह ईश्वर को ढूंढने निकल पड़ा। उसके मन में यह दृढ़ विश्वास था कि एकमात्र ईश्वर ही आपको बचा सकते है। विश्वास इसी को ही कहते हैं। ईश्वर को ढूंढने के लिए करोड़ों रुपए दान करने की ज़रूरत नहीं होती, यदि मन में अटूट विश्वास हो तो वे एक रूपए में भी मिल सकते हैं।”

लष्मीकांत विजय गढ़िया

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

महाभारत का एक प्रसंग हैं,

अश्वमेध यज्ञ चल रहा था, बड़े-बड़े ॠषियों और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दी जा रही थी। कहते हैं, कि उस यज्ञ में बड़े-बड़े देवता आए यहाँ तक कि देवराज इन्द्र तक भी उपस्थित हुये,स्वयं भगवान् श्रीकॄष्ण तक वहाँ साक्षात् उपस्थित थे।

दान देने का उपक्रम चल रहा था, अश्वमेध यज्ञ की पूर्णाहुति की पावन वेला थी, इतने में ही सबने देखा,
कि एक गिलहरी उस यज्ञ-मण्डप पर पहुँची और अपने शरीर को उलट-पुलट करने लगी।

यज्ञ-मण्डप में मौजूद सभी लोग बड़े ताज्जुब से उस गिलहरी को देख रहे थे, और भी ज्यादा आश्चर्य तो इस बात का था कि उस गिलहरी का आधा शरीर सोने का था, और आधा शरीर वैसा ही था, जैसा कि आम गिलहरियों का होता है।

माहाराज युधिष्ठिरजी के लिये यह बात आश्चर्यचकित करने वाली थी, ऐसी गिलहरी पहले कभी नहीं देखी गई।एक बार तो दान-दक्षिणा, मन्त्रोच्चार और देवों के आह्वान का उपक्रम तक ठहर गया।

महाराज युधिष्ठिरजी ने यज्ञ को बीच में ही रोक कर गिलहरी को सम्बोधित करते हुये पूछा:-

ओ गिलहरी! मेरे मन में दो शंकायें हैं,पहली शंका तो यह है कि तुम्हारा आधा शरीर सोने का कैसे है.? और दूसरी शंका यह है, कि तुम यहाँ यज्ञ-मण्डप में आकर अपने शरीर को लोट-पोट क्यों कर रही हो.?

गिलहरी ने युधिष्ठिरजी की तरफ मधुर मुस्कान के साथ कहा:-

महाराज युधिष्ठिरजी! आपका प्रश्न बहुत सार्थक हैं। बात दरअसल यह है, कि आपके इसी यज्ञ-स्थल से कोई दस कोस दूर एक गरीब लकडहारे का परिवार तीन दिन से भूखा था। उस लकडहारे ने जैसै-तैसे कर रोटियों का इन्तजाम किया। रात की वेला हो चुकी थी,पूरा परिवार भूख से बेहाल था लेकिन, जैसे ही वे खाना खाने बैठे तो देखा, कि उस घर के बाहर दरवाजे पर एक भूखा भिक्षुक खड़ा था, और खाने के लिये माँग रहा था।

लकडहारे ने अपनी पत्नी से कहा, कि तुम लोग भोजन कर लो और मेरे हिस्से की जो रोटी हैं, वह इस भूखे को दे दो।

वह भूखा भिक्षुक रोटी खाने लगा और रोटी खाते-खाते उसने कहा कि मैं अभी भी भूखा हूँ, मेरा पेट नहीं भरा है,
तब लकडहारे की पत्नी ने कहा कि इसे मेरे हिस्से की भी रोटी इन्हें दे दो, लकडहारे के पत्नी की रोटी भी दे दी गई,
मगर फिर भी वह भूखा रहा।

बच्चों ने भी अपनी-अपनी रोटियाँ दे दी लकडहारे के परिवार ने अपने मन को समझाया कि हम तीन दिन से भूखे हैं और एक दिन भूखे रह लेंगे तो क्या फर्क पड़ेगा! हमारे द्वार पर आया कोई प्रार्थी भूखा नहीं लौटना चाहिये।

भूखे ने रोटियाँ खाई, पानी पीया और चल दिया।

गिलहरी ने आगे का वृत्तान्त बताया कि उस भूखे व्यक्ति के भोजन करने के बाद मैं उधर से गुजरी। जिस स्थान पर उस भिक्षुक ने भोजन किया था, वहाँ रोटी के कुछ कण बिखर गये थे। मैं उन कणों के ऊपर से गुजरी तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ, कि जहाँ-जहाँ मेरे शरीर पर वे कण लगे थे वह सोने का हो गया। मैं चौक पड़ी, उस छोटे से लकडहारे के अंश भर दान से,एक छोटे से शुभ-कर्म से मेरे शरीर का आधा हिस्सा सोने का हो गया।

मैंने यहाँ के अश्वमेध यज्ञ के बारे में सुना,तो सोचा कि वहाँ महान् यज्ञ का आयोजन हो रहा हैं, महादान दिया जा रहा है, तप हो रहा है, शुभ से शुभ कर्म आयोजित हो रहे हैं। यदि मैं इस यज्ञ में शामिल होऊँ, तो मेरा शेष शरीर भी सोने का हो जायेगा।

लेकिन,माहाराज युधिष्ठिरजी, मैं एक बार नहीं सौ बार आपके इन दान से गिरे इन कणों पर लोट-पोट हो गई हूँ लेकिन मेरा बाकी का शरीर सोने का न बन पाया। मैं यह सोच रही हूँ, कि असली यज्ञ कौन-सा है? आपका यह अश्वमेध-यज्ञ या उस लकडहारे की आंशिक आहुति वाला वह यज्ञ?

माहाराज युधिष्ठिरजी आपका यह यज्ञ केवल एक दम्भाचार भर हैं।

गिलहरी के ऐसे तर्कपूर्ण वृतांत को सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण ने वरदहस्त मुद्रा में गिलहरी को बिना मांगे मनोवांछित वरदान सहित मधुर मुस्कान से उसे मुक्ति का वरदान दिया ।।

जीवन में उस किसान का-सा यज्ञ हो सके, तो जीवन का पुण्य समझो। ऐसा कोई यज्ञ न लाखों खर्च करने से होगा और न ही घी की आहुतियों से होगा। भूखे-प्यासे किसी आदमी के लिये, किसी पीड़ित, अनाथ और दर्द से कराहते हुये व्यक्ति के लिये अपना तन, मन, अपना धन कोई भी अगर अंश भर भी दे सको, प्रदान कर सको, तो वह आपकी ओर से एक महान् यज्ञ होगा, एक महान् दान और एक महान् तप होगा,

भगवान् करे, आप सबके जीवन में ऐसे पुण्य-पल ऐसी पावन-वेला सृजित हो उपलब्ध हो।

🙏🏻🙏🏻जय श्री राम🙏🏻🙏🏻

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