Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙏🙏 खाद्याखाद्य

मैं एक गाँव को जानता हूँ जहाँ से प्रतिवर्ष सेना, पुलिस भर्ती में हर बार आठ दस लड़के चयनित होते हैं। सुरक्षा बलों की भर्ती में सबसे प्रमुख होती है दौड़।
इस गांव के लड़कों को बस दौड़ में आना होता है, बाकी काम अपने आप हो जाते हैं।
कई वर्षों से यह सिलसिला निर्बाध चलता आ रहा है, लोग उदाहरण देते हैं इस गांव के लेकिन पिछली तीन चार भर्तियां हुई तो यहाँ से एक भी लड़का चयनित नहीं हुआ। फिर पता किया, ऐसी क्या बात हो गई?

यहाँ का पानी थोड़ा भारी है। मिठास कम है। मुख्य सड़क पर कई दुकानों में कोल्डड्रिंक की बोतलें बिकनी शुरू हुई। पहले इसका इतना प्रचलन नहीं था।
अब तो हरेक बात पर लड़के लड़कियां सीधे 2 लीटर की बोतल लाते हैं, कुरकुरे का पैकेट और हो गई पार्टी। कोई चाय नहीं पीता तो उसके लिए ठंडा लाओ।
ठंडे का प्रचलन इतना अधिक हो गया है कि गांव की गलियां, नालियां उसकी खाली बोतलों से अटी पड़ी हैं।
कोल्डड्रिंक दूसरा पानी पीने नहीं देता। दूध, घी, छाछ को पचने नहीं देता। फेफड़े कमजोर कर देता है।
कोई भी लड़का अब दौड़ ही क्वालीफाई नहीं कर पाता, कैसे भर्ती हो?
कोल्डड्रिंक से बीयर पर आए और वहाँ से अल्कोहल और फिर सिगरेट।
कुरकुरे से फास्टफूड पर आए और वहाँ से चर्बी के गोले बनकर निकलने लगे।
एक तेजस्वी गांव की युवावस्था में ही भ्रूण हत्या हो गई।
कमजोर, हांफते हुए थुलथुल युवाओं का गाँव बन गया।


अब बात करते हैं शहरों की!
जहां हॉस्पिटल बढ़ाने की बात की जा रही है। चाहे विश्व के कण कण में hospital खोल दो, चाहे हर मनुष्य की कोख से Doctor पैदा करवा दो, चाहे दवाईयों के पेड़ या फसल ही बोने लग जाओ, तब भी लोग तो बीमारियों से मरते ही रहेंगे।

क्यों ?

क्योंकि

काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत कर्म भोग सब भ्राता ।।

जब तक हमारे खान पान की शैली, खाद्य अखाद्य की मर्यादा, नियम संयम की ऐसी तैसी रहेगी तब तक हम लोग मरते रहेंगे।

इस विश्व के शारीरिक रोग का एकमात्र कारण यह छोटी सी मांसल जीभ है। इसी जीभ के स्वाद के लिए लोगों ने भोजन के नियम संयम, आचार, व्यवहार सब खत्म कर दिया और आज hospital में doctors के पैरों पर नाक रगड़कर गिड़गिड़ा रहे हैं। चिल्ला रहे हैं हॉस्पिटल hospital करके।

जब बोला जाता है कि अपने शरीर में कुछ भी कूड़ा कर्कट मत डालो, तो सब गुस्से से सामने वाले को देखते हैं।
असंयमित खाना, असंयमित पीना, बाहर का चाटना, घर घर अशुद्धता शुद्धता का विचार किये बिना चाटना, पैकेट बन्द सामग्रियों को खाना, pesticides, insecticides, रासायनिक उर्वरक खा खाकर रक्त, धमनियों और DNA तक भर देना, पानी को इतना फ़िल्टर कर लेना कि उसमें से सब minerals और essentials nutrients निकाल कर पीना, सुबह सवेरे शाम दोपहर रात जब चाहे तब मुँह चलाना, कोई समय नहीं, कोई नियम नहीं कि कब खाना, क्या खाना, कितना खाना, कैसे खाना, क्यों खाना।

बस भगवान ने मुँह दे दिया तो उसमें कुछ भी कभी भी कैसे भी डाल लो।
सर्दियों तक में कई लोगों को मैंने आम खाते, माजा पीते देखा है।
Ice Cream खाते देखा है। उनके चेहरे पर दर्प भाव रहता है कि वो ऐसा खा पी रहे हैं जो बाप का नाम रोशन कर रहा है।

लेकिन उन मूर्खाधिराजों को यही नहीं पता कि यही दर्प भाव hospital और doctors लाखों का तुमसे लूटकर तुम्हें जीवन भर रोगी बनाकर तोड़ेंगे।
जब बोला जाता है कि नौकरानी से सब काम करवा लो लेकिन भोजन स्वयं बनाओ तो उसमें नारी सशक्तिकरण घुसकर और आधुनिकता का हवाला देकर hospital में एक bed book करवा लेते हैं।
मर जायेंगे, आह माई आह माई करते रहेंगे लेकिन भोजन नौकरानी ही बनाएगी जिसका पता नहीं किस विचार, कौन से तरंगों से, कौन से ऊर्जा लेवल से, कौन से भावना डालकर, किस शुद्धता से वह भोजन तैयार करेगी या करेगा। बस लोलुप जीभ को तो स्वाद मिलना चाहिए और मोटी चमड़ी को आराम।
भले ही इससे पूरा परिवार का स्वास्थ्य हाशिये पर ही क्यों न आ जाये।
Sauce, buiscuits, नमकीन, cold drinks, पिज़्ज़ा, burger, गंदे बासी canned juices सबके घर में पड़े होंगे। और लैपटॉप पर काम करते भक्षण चलता रहेगा लेकिन अजवाईन, हरड़, सौंफ, मेथी दाना, पीपली, गोंद, इत्यादि शायद ही कोई महीने में खाता हो।
यह सब खाने में सबकी नानी मर जाती है लेकिन नानी के साथ साथ यह भी जल्दी hospital के bed पर मरे पाए जाते हैं।

सारे ग़लत काम करेंगे खुद, लेकिन चिल्लायेंगे Hospital और Doctors को।

जिस दिन इस जीभ को संयमित कर लिया तो उसी दिन समझिये कि आप स्वस्थ्य होते चले जायेंगे।

जिस दिन अपने kitchen या रसोई को शरीर के मंदिर के तौर पर बनाकर उस रसोई घर को घर का एक औषधालय बना लेंगे तो उसी दिन से आप स्वस्थ्य होते जाएंगे।

जिस दिन आपकी रसोई में आपके घर की स्त्रियों के अलावा किसी अन्य का प्रवेश वर्जित होगा, उसी दिन से आपका Hospitals और Doctors से नाता टूटने लगेगा।

जिस दिन आपने यह व्रत ले लिया कि मुझे बाहर का नहीं खाना और सबके घर घर का नहीं चाटना, उसी दिन से आपके घर से रोग रवाना हो जायेंगे। बहुत आवश्यक हो तभी इस व्रत या नियम को तोड़ें।

जिस दिन आपने यह व्रत ले लिया कि मुझे मात्र मौसमी फल और सब्जियों का ही सेवन करना है, ठीक उसी दिन से वैभव और लक्ष्मी अपना बोरिया बिस्तर लेकर आपके घर में ठिकाना बनाने आ जाएंगी।

और एक अन्य महत्वपूर्ण बात

तन को बली बना लो ऐसा, सह ले सर्दी वर्षा घाम।
मन को बलि बना लो ऐसा, टेक न छाड़े आठों याम।

मन को ऐसा बलिष्ठ बना लो कि कोई तुम्हें अपने नियम से डिगा न सके।
ऐसा नहीं कि मित्रों ने कहा तो तुम भी अपने घर का संस्कार भुलाकर अखाद्य सेवन करने लगे ।

मतलब तुम्हारे माँ बाप का संस्कार इतना गिरा था कि अन्य दोस्तों के संस्कार उस पर हावी हो गए।
तुम इतने कमजोर निकले कि उनकी गलत बातें तुमने ग्रहण कर लीं लेकिन अपनी अच्छी बातों या आदतों का प्रभाव तुम उन पर नहीं डाल सके। धिक्कार है तुम्हें।
तो तुम उनके गुलाम हो।

मैं बार बार कहता रहूँगा कि जिस दिन तुमने अपने रहन सहन, आचार विचार, खान पान, नियम संयम को संयमित एवं नियमित कर लिया उसी दिन से सब ठीक हो जाएगा।

बलराज कुँवर

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