Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

नाटक

“तुम्हारी माँ क्या बोल रही है? ये सच है क्या?”

“जी हाँ पापा, अनु का कहना है कि अब हमें अपने लिये अलग घर ले लेना चाहिये।” दरवाजे की आड़ में छिपी अनु मंद-मंद मुस्करा रही थी।

“अभी शादी को महीना भर नहीं हुआ और तू बहु के सुर में सुर मिलाने लगा। आखिर मुझे भी तो पता लगे दिक्कत क्या है यहाँ।”

“मुझे तो नहीं। कल कहीं आपको मुझ से दिक्कत हुई और आपने मुझे यहाँ से निकाल दिया फिर?”

“भला मुझे क्यों दिक्कत होने लगी और मैं तुझे निकालूँगा ही क्यूँ ? मेरा खून है तू ,पाल-पोस के बड़ा किया है तुझे।”

” नहीं वो बात नहीं है पापा…….पाल-पोस कर, पढ़ा-लिखा कर तो दादू ने भी आपको इतना लायक और कामयाब बना दिया। वो भी आपको उतना ही प्यार करतें हैं जितना आप मुझे। फिर भी दादू की बढ़ती उम्र की दिक्कतों की वजह से आपने उन्हें गाँव भिजवा दिया। ……. अगर कल को मेरे साथ कुछ ऐसा-वैसा हो गया और आपने मुझे निकाल दिया तो मैं कहाँ जाऊँगा। बस इसलिये सोचा अभी से अपने लिये अलग घर का बन्दोबस्त कर लूँ।”

पिता की अंगारे बरसाती हुई आँखें अब मारे शर्म के ज़मीन में गड़ी जा रहीं थीं। बिना कुछ कहे वे वहाँ से अपने कमरे में चले गये। गाँव फ़ोन लगाया, “बाबूजी दो दिन बाद आ रहा हूँ …….नहीं, अकेले ही आऊँगा …….आपको ले जाने के लिए……..बस समझ लीजिये लायक पोते ने आपके नालायक बेटे की आँखें खोल दी।”

इधर बेटे और बहु की आँखों में चमक और चेहरे पर मुस्कान तैर रही थी, दोनों का नाटक जो सफल हो गया था।

मीनाक्षी चौहान

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